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View Full Version : Dada Lakhmi Chand - Haryana's great visionary-poet



dndeswal
October 26th, 2006, 11:28 PM
(This post is in Devanagari script. If there is difficulty in reading the text, there is need to install ‘Mangal’ font (http://vedantijeevan.com:9700/font.htm).)

प्रस्तुत है दादा लखमीचंद की एक रागनी । लगता है दादा की भविष्वाणियां सच साबित हो रही हैं । कुछ * वाले शब्दों के अर्थ अंत में दिए गए हैं ।

कलियुग
(राजकवि दादा लखमी चन्द जी)



समद ऋषि जी ज्ञानी हो-गे जिसनै वेद विचारा ।
वेदव्यास जी कळूकाल* का हाल लिखण लागे सारा ॥ टेक ॥

एक बाप के नौ-नौ बेटे, ना पेट भरण पावैगा -
बीर-मरद हों न्यारे-न्यारे, इसा बखत आवैगा ।
घर-घर में होंगे पंचायती, कौन किसनै समझावैगा -
मनुष्य-मात्र का धर्म छोड़-कै, धन जोड़ा चाहवैगा ।

कड़ कै न्यौळी बांध मरैंगे, मांग्या मिलै ना उधारा* ॥1॥
वेदव्यास जी कळूकाल का हाल लिखण लागे सारा ।

लोभ के कारण बल घट ज्यांगे*, पाप की जीत रहैगी -
भाई-भाण का चलै मुकदमा, बिगड़ी नीत रहैगी ।
कोए मिलै ना यार जगत मैं, ना सच्ची प्रीत रहैगी -
भाई नै भाई मारैगा, ना कुल की रीत रहैगी ।

बीर नौकरी करया करैंगी, फिर भी नहीं गुजारा ॥2॥
वेदव्यास जी कळूकाल का हाल लिखण लागे सारा ।

सारे कै प्रकाश कळू का, ना कच्चा घर पावैगा* -
वेद शास्त्र उपनिषदां नै ना जाणनियां पावैगा ।
गौ लोप हो ज्यांगी दुनियां में, ना पाळनियां पावैगा -
मदिरा-मास नशे का सेवन, इसा बखत आवैगा ।

संध्या-तर्पण हवन छूट ज्यां, और वस्तु* जांगी बाराह ॥3॥
वेदव्यास जी कळूकाल का हाल लिखण लागे सारा ।

कहै लखमीचंद छत्रापण* जा-गा, नीच का राज रहैगा -
हीजड़े मिनिस्टर बण्या करैंगे, बीर कै ताज रहैगा ।
दखलंदाजी और रिश्वतखोरी सब बे-अंदाज रहैगा -
भाई नै तै भाई मारैगा, ना न्याय-इलाज रहैगा ।

बीर उघाड़ै सिर हांडैंगी, जिन-पै दल खप-गे थे अठाराह* ॥4॥
वेदव्यास जी कळूकाल का हाल लिखण लागे सारा ।


कळूकाल = कलियुग

कड़ कै न्यौळी बांध मरैंगे, मांग्या मिलै ना उधारा = लोग कमर में या जेब में पैसा बांधे रखेंगे, फिर भी मांगने पर या उधार में पैसा नहीं मिलेगा ।

लोभ के कारण बल घट ज्यांगे = घी-दूध आदि महंगा हो जायेगा, लोग लोभ में आकर इसे खरीद नहीं पायेंगे और उनका शारीरिक बल घटता जायेगा ।

सारे कै प्रकाश कळू का, ना कच्चा घर पावैगा = कलियुग में सब जगह (बिजली का) उजाला रहेगा और सब मकान पक्के होंगे ।

वस्तु जांगी बाराह = सोना, चांदी, तांबा आदि बारह धातु (वस्तु) गायब हो जायेंगी ।

छत्रापण जा-गा = क्षत्रियपन मिट जायेगा

जिन-पै दल खप-गे थे अठाराह = द्रोपदी के चीरहरण के कारण महाभारत हुआ था जिसमें कुल 18 सेनाऐं खत्म हो गईं थीं (कौरवों के पास 11 अक्षौहिणी सेना थी और पांडवों के पास 7) ।
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downtoearth
October 26th, 2006, 11:38 PM
(This post is in Devanagari script. If there is difficulty in reading the text, there is need to install ‘Mangal’ font (http://vedantijeevan.com:9700/font.htm).)





एक बाप के नौ-नौ बेटे, ना पेट भरण पावैगा -
बीर-मरद हों न्यारे-न्यारे, इसा बखत आवैगा ।
घर-घर में होंगे पंचायती, कौन किसनै समझावैगा
.deswaal sir badhiya sauda likhaya,,, yu sey kalyug......thanx

rkumar
October 26th, 2006, 11:58 PM
My father used to tell about Lakhmi Chand as he was his biggest admirer. Lakhmi Chand was truely a great philosopher , poet and singer.

RK^2

rakeshsehrawat
October 27th, 2006, 06:34 AM
समद ऋषि जी ज्ञानी हो-गे जिसनै वेद विचारा ।
वेदव्यास जी कळूकाल* का हाल लिखण लागे सारा ॥ टेक ॥

एक बाप के नौ-नौ बेटे, ना पेट भरण पावैगा -
बीर-मरद हों न्यारे-न्यारे, इसा बखत आवैगा ।
घर-घर में होंगे पंचायती, कौन किसनै समझावैगा -
मनुष्य-मात्र का धर्म छोड़-कै, धन जोड़ा चाहवैगा ।

कड़ कै न्यौळी बांध मरैंगे, मांग्या मिलै ना उधारा* ॥1॥
वेदव्यास जी कळूकाल का हाल लिखण लागे सारा ।

लोभ के कारण बल घट ज्यांगे*, पाप की जीत रहैगी -
भाई-भाण का चलै मुकदमा, बिगड़ी नीत रहैगी ।
कोए मिलै ना यार जगत मैं, ना सच्ची प्रीत रहैगी -
भाई नै भाई मारैगा, ना कुल की रीत रहैगी ।

बीर नौकरी करया करैंगी, फिर भी नहीं गुजारा ॥2॥
वेदव्यास जी कळूकाल का हाल लिखण लागे सारा ।

सारे कै प्रकाश कळू का, ना कच्चा घर पावैगा* -
वेद शास्त्र उपनिषदां नै ना जाणनियां पावैगा ।
गौ लोप हो ज्यांगी दुनियां में, ना पाळनियां पावैगा -
मदिरा-मास नशे का सेवन, इसा बखत आवैगा ।

संध्या-तर्पण हवन छूट ज्यां, और वस्तु* जांगी बाराह ॥3॥
वेदव्यास जी कळूकाल का हाल लिखण लागे सारा ।

कहै लखमीचंद छत्रापण* जा-गा, नीच का राज रहैगा -
हीजड़े मिनिस्टर बण्या करैंगे, बीर कै ताज रहैगा ।
दखलंदाजी और रिश्वतखोरी सब बे-अंदाज रहैगा -
भाई नै तै भाई मारैगा, ना न्याय-इलाज रहैगा ।

बीर उघाड़ै सिर हांडैंगी, जिन-पै दल खप-गे थे अठाराह* ॥4॥




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Bahut badhiya Deswal Sir

dndeswal
November 1st, 2006, 01:45 AM
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कहते हैं कि युधिष्ठिर के पोते परीक्षित के बाद कलियुग आरंभ हो गया था । प्रस्तुत है परीक्षित और कलियुग की बातचीत (दादा लखमीचंद की वाणी से)

कलियुग बोल्या परीक्षित ताहीं, मेरा ओसरा आया ।
अपने रहण की खातिर मन्नै इसा गजट बणाया॥

सोने कै काई ला दूंगा, आंच साच पै कर दूंगा -
वेद-शास्त्र उपनिषदां नै मैं सतयुग खातिर धर दूंगा ।
असली माणस छोडूं कोन्या, सारे गुंडे भर दूंगा -
साच बोलणियां माणस की मैं रे-रे-माटी कर दूंगा ।

धड़ तैं सीस कतर दूंगा, मेरे सिर पै छत्र-छाया ।
अपने रहण की खातिर मन्नै इसा गजट बणाया ॥

मेरे राज मैं मौज करैंगे ठग डाकू चोर लुटेरे -
ले-कै दें ना, कर-कै खां ना, ऐसे सेवक मेरे ।
सही माणस कदे ना पावै, कर दूं ऊजड़-डेरे -
पापी माणस की अर्थी पै जावैंगे फूल बिखेरे ॥

ऐसे चक्कर चालैं मेरे मैं कर दूं मन का चाहया ।
अपने रहण की खातिर मन्नै इसा गजट बणाया ॥
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anilkadian
November 1st, 2006, 03:51 AM
bhoot badiya cheej padwa di Deswal ji,
mera to je sa bhar aaya.
poorane aadmiya ney bhi saara gyan tha per pher aaj akhir mein haalat khraab ho ey lee.:(
saachi kahi sein saari baat...istey bhoond bakhat nahi aa sakta:(

dndeswal
November 8th, 2006, 06:42 PM
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मनुष्य का शरीर अस्थाई है । पुनर्जन्म द्वारा मानव की आत्मा नया शरीर धारण करती रहती है । इसी को विस्तार से समझाने के लिए प्रस्तुत है दादा लखमीचंद की यह रागनी जो एक रेलगाड़ी के रूप में कल्पित की गई है। कुछ * लगे हुए शब्दों के अर्थ अंत में लिखे हैं, उन्हें पढना मत भूलना, नहीं तो शायद यह रागनी समझ में नहीं आयेगी ।

जीवन की रेल
(राजकवि दादा लखमीचंद जी)

हो-ग्या इंजन* फेल चालण तै, घंटे बंद, घडी रह-गी ।
छोड़ ड्राइवर* चल्या गया, टेशन पै रेल* खड़ी रह-गी ॥टेक॥

भर टी-टी* का भेष रेल में बैठ वे कुफिया काल गये -
बंद हो-गी रफ्तार चलण तैं, पुर्जे सारे हाल गये ।
पांच ठगां* नै जेब कतर ली, डूब-डूब धन-माल गये -
बानवें करोड़ मुसाफिर* थे, वे अपना सफर संभाल गये ॥1॥

ऊठ-ऊठ कै चले गए, सब खाली सीट पड़ी रह-गी ।
छोड़ ड्राइवर चल्या गया, टेशन पै रेल खड़ी रह-गी ॥

टी-टी, गार्ड और ड्राइवर अपनी ड्यूटी त्याग गए -
जळ-ग्या सारा तेल खतम हो, कोयला पाणी आग गए ।
पंखा फिरणा बंद हो-ग्या, बुझ लट्टू गैस चिराग गए -
पच्चीस पंच* रेल मैं ढूंढण एक नै एक लाग गए ॥2॥

वे भी डर तैं भाग गए, कोए झांखी खुली भिड़ी रह-गी ।
छोड़ ड्राइवर चल्या गया, टेशन पै रेल खड़ी रह-गी ॥

कल-पुर्जे सब जाम हुए भई, टूटी कै कोए बूटी* ना -
बहत्तर गाडी खड़ी लाइन मैं, कील-कुहाड़ी टूटी ना ।
तीन-सौ-साठ लाकडी* लागी, अलग हुई कोई फूटी ना -
एक शख्स* बिन रेल तेरी की, पाई* तक भी ऊठी ना ॥3॥

एक चीज तेरी टूटी ना, सब ठौड़-की-ठौड़ जुड़ी रह-गी ।
छोड़ ड्राइवर चल्या गया, टेशन पै रेल खड़ी रह-गी ॥

भरी पाप की रेल अड़ी तेरी पर्वत पहाड़ पाळ आगै -
धर्म-लाइन गई टूट तेरी नदिया नहर खाळ आगै ।
चमन चिमनी का लैंप बुझ-ग्या आंधी हवा बाळ आगै -
किन्डम हो गई रेल तेरी जंक्शन जगत जाळ आगै ॥4॥

कहै लखमीचंद काळ आगै बता किसकी आण अड़ी रहैगी* ?
छोड़ ड्राइवर चल्या गया, टेशन पै रेल खड़ी रह-गी ॥
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इंजन - मनुष्य का दिल

ड्राइवर - आत्मा

रेल - मानव शरीर

भर टी-टी का भेष - टी-टी के वेश में यमदूत

बानवें करोड़ मुसाफिर - सांसों की संभावित गिनती

पच्चीस पंच - घरवाले और नजदीकी रिश्तेदार

पांच ठग - पंचभूत, जिनसे शरीर बना है (पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि)

बूटी - दवाई/ इलाज

तीन-सौ-साठ लाकडी* - शरीर की हड्डियां

पाई - पैसा, मोल

एक शख्स - आत्मा

काळ आगै बता किसकी आण अड़ी रहैगी - काल के सामने भला किसकी आन (शान) अड़ सकती है?
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devdahiya
November 8th, 2006, 07:04 PM
He was a legend and will always be remembered till such time there are Jats on this planet.He created history.Gyani-dhyani bandda tha bhai .Though a Brahmin,he loved our Kaum equally well.Thanks DND ji for refreshing the memories and updating us all.

dndeswal
November 25th, 2006, 03:45 PM
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जन्म-मरण
(राजकवि दादा लखमीचंद जी)

लाख-चौरासी खतम हुई बीत कल्प-युग चार गए ।
नाक में दम आ लिया, हम मरते-मरते हार गए ॥टेक॥

बहुत सी मां का दूध पिया पर आज म्हारै याद नहीं -
बहुत से भाई-बहन हुए, पर एक अंक दर याद नही ।
बहुत सी संतान पैदा की, पर गए उनकी मर्याद नहीं -
बहुत पिताओं से पैदा हुए, पर उनका घर भी याद नहीं ॥1॥

शुभ-अशुभ कर्म करे जग में, स्वर्ग-नरक कई बार गए ।
नाक में दम आ लिया, हम मरते-मरते हार गए ॥

कहीं लिपटे रहे जेर में अपने कर्म करीने से -
कहीं अंडों में बंद रहे कहीं पैदा हुए पसीने से ।
कहीं डूबे रहे जल में, कहीं उम्र कटी जल पीने से -
फिर भी कर्म हाथ नहीं आया, मौत भली इस जीने से ॥2॥

कभी आर और कभी पार, डूब फिर से मंझधार गए ।
नाक में दम आ लिया, हम मरते-मरते हार गए ॥

कभी तो मूल फूल में रम-ग्या, कभी हर्ष का स्योग लिया -
कभी निर्बलता कभी प्रबलता, कभी रोगी बण-कै रोग लिया ।
कभी नृपत कभी छत्रधारी, कभी जोगी बण-कै जोग लिया -
भोग भोगने आये थे, उन भोगों ने हमको भोग लिया ॥3॥

बड़े-बड़े योगी इस दुनियां में सोच-समझ सिर मार गए ।
नाक में दम आ लिया, हम मरते-मरते हार गए ॥

आशा, तृष्णा और ईर्ष्या होनी चाहियें रस-रस में -
वो तो बस में हुई नहीं, हम हो गए उनके यश में ।
न्यूं सोचूं था काम-क्रोध नै मार गिरा दूं गर्दिश में -
काम-क्रोध तै मरे नहीं, हम हो गए उनके बस में ॥4॥

इतनी कहै-कै लखमीचंद भी मरे नहीं, दड़ मार गए ।
नाक में दम आ लिया, हम मरते-मरते हार गए ॥
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naveen_chaudhary
November 25th, 2006, 04:32 PM
Bhai sahab...I was looking for this ragini for quite some time and logged in today to post a thread to find out but you already have the answer.

I heard this in train while commuting between Rohtak-Delhi and it touched me. Does anyone have an audio for this one?

devdahiya
November 26th, 2006, 07:45 AM
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जन्म-मरण
(राजकवि दादा लखमीचंद जी)

लाख-चौरासी खतम हुई बीत कल्प-युग चार गए ।
नाक में दम आ लिया, हम मरते-मरते हार गए ॥टेक॥

बहुत सी मां का दूध पिया पर आज म्हारै याद नहीं -
बहुत से भाई-बहन हुए, पर एक अंक दर याद नही ।
बहुत सी संतान पैदा की, पर गए उनकी मर्याद नहीं -
बहुत पिताओं से पैदा हुए, पर उनका घर भी याद नहीं ॥1॥

शुभ-अशुभ कर्म करे जग में, स्वर्ग-नरक कई बार गए ।
नाक में दम आ लिया, हम मरते-मरते हार गए ॥

कहीं लिपटे रहे जेर में अपने कर्म करीने से -
कहीं अंडों में बंद रहे कहीं पैदा हुए पसीने से ।
कहीं डूबे रहे जल में, कहीं उम्र कटी जल पीने से -
फिर भी कर्म हाथ नहीं आया, मौत भली इस जीने से ॥2॥

कभी आर और कभी पार, डूब फिर से मंझधार गए ।
नाक में दम आ लिया, हम मरते-मरते हार गए ॥

कभी तो मूल फूल में रम-ग्या, कभी हर्ष का स्योग लिया -
कभी निर्बलता कभी प्रबलता, कभी रोगी बण-कै रोग लिया ।
कभी नृपत कभी छत्रधारी, कभी जोगी बण-कै जोग लिया -
भोग भोगने आये थे, उन भोगों ने हमको भोग लिया ॥3॥

बड़े-बड़े योगी इस दुनियां में सोच-समझ सिर मार गए ।
नाक में दम आ लिया, हम मरते-मरते हार गए ॥

आशा, तृष्णा और ईर्ष्या होनी चाहियें रस-रस में -
वो तो बस में हुई नहीं, हम हो गए उनके यश में ।
न्यूं सोचूं था काम-क्रोध नै मार गिरा दूं गर्दिश में -
काम-क्रोध तै मरे नहीं, हम हो गए उनके बस में ॥4॥

इतनी कहै-कै लखमीचंद भी मरे नहीं, दड़ मार गए ।
नाक में दम आ लिया, हम मरते-मरते हार गए ॥
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Lakhami dada at his best...........Thanks DND ji for taking pains in sharing wid all of us here.jindaggi ka NICHODD hei ye.

deepakchoudhry
November 26th, 2006, 04:51 PM
Excellent DND Bhai...And thanks for all your effort.

kharub
November 26th, 2006, 08:00 PM
Excellent thread and posts Deswal Ji ........... highly appreciated

dndeswal
December 17th, 2006, 12:35 PM
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All the Raagnis and Bhajans written above have been put in Haryanavi Folk Lore (http://www.jatland.com/home/Haryanavi_Folk_Lore) page of Jatland Wiki. If any Jatlander has a nice raagni of Dada Lakhmi Chand, the same may be written here - I would be converting it in Devanagri text and then put on Wiki section. After this post, I am not going to add more text here from my side in this thread, but would put it directly on the Wiki page.

दादा लखमीचंद के कुछ शिष्य (चेले) भी काफी मशहूर हुए थे । उनमें से एक था 'रत्तन नाई' - गांव दादयां (बेरी) का । उसी की एक रागनी यहां पेश है ।

सतगुरु जी की सेवा करिये, राखिये ध्यान वचन कै मांह -
दान देण तैं धन मिलता और मुक्ति हरि-भजन कै मांह ।

जिसा संग उसा चढ़ै रंग, तासीर तखम (खानदान) की पाया करै -
यो जीव करम के बंध में आ-कै दुख-सुख तन पै ठाया करै ।
सच्चा सौदा और भले की संगत शुभ कर्मां तैं थ्याया करै -
चितला च्यातर करै कमाई, मूरख मूल गंवाया करै ।

कायर हो वो पीठ दिखा ज्या, डटै सूरमा रण कै मांह ।
दान देण तैं धन मिलता और मुक्ति हरि-भजन कै मांह ॥१॥

बुरा किसै का करै ना सोचै, बुरा वचन बोलै मतना -
घर बैठे की भक्ति या, तू जगहां-जगहां डौलै मतना ।
काम, क्रोध मोह में फंस कै अमृत में विष घोळै मतना -
गाहक मिलै तै माळ दिखा, बिन गाहक गांठ खोलै मतना ।

परमानन्द में लौ हो-ज्या, फिर घरां रहो चाहे बण कै मांह -
दान देण तैं धन मिलता और मुक्ति हरि-भजन कै मांह ॥२॥

बाहवड़ कै-नै के देखै सै, गई हुई आवै कोन्या -
आगरली तेरे तैं आगै, भाजे तैं थ्यावै कोन्या ।
या-ऐ भूल तेरी मोटी, तू हाजिर नै चाहवै कोन्या -
जै हाजिर नै चाहवै तै, मंत्र तोल्ले खावै कोन्या ।

मन की चाही बणती कोन्या, फंस-ग्या पैर बिघन कै मांह ।
दान देण तैं धन मिलता और मुक्ति हरि-भजन कै मांह ॥३॥

कहै रत्तनसिंह गुरुवचन पै डटणा सहज बात कोन्या -
मेर-तेर और विषय-भोग तैं हटणा सहज बात कोन्यां ।
इस दुनियां में आया सै, मिटना भी सहज बात कोन्यां -
रंग-रूप और राग तैं न्यारा छंटणा भी सहज बात कोन्यां ।

आस करै अभ्यास करै, तै गुरु दर्शन दें क्षण-पल कै मांह ।
दान देण तैं धन मिलता और मुक्ति हरि-भजन कै मांह ॥४॥

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choudharyneelam
December 17th, 2006, 06:01 PM
(कलियुग
(राजकवि दादा लखमी चन्द जी)



समद ऋषि जी ज्ञानी हो-गे जिसनै वेद विचारा ।
वेदव्यास जी कळूकाल* का हाल लिखण लागे सारा.

Nice post Sir....even i was also searching for the same stuff at home to share with you all but you posted it earlier...there is one Dadaji at our neighbourhood and he use to tell us such things...he is soo nice that he first recite it in typical haryanvi and then side by side explain the meaning of every sentence so that we can understand him what he is speaking...and these things can be heard by grandparents only....nahin to puri puri koi nahin jaanta isse....anyways nice to see this post...keep sharing such things.

dahiyars
December 18th, 2006, 09:05 PM
Dear Dayanand ji

One more creatin of Dada Lakhmi.

R.S.Dahiya

choudharyneelam
December 19th, 2006, 06:07 PM
Dear Dayanand ji

One more creatin of Dada Lakhmi.

R.S.Dahiya

I liked reading this....:)

sejwaldeepak
August 25th, 2007, 12:05 PM
Thread being opened..as per owner req..

dndeswal
August 25th, 2007, 12:12 PM
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This is only to point out that all the above ragnis are now part of Haryanavi Folk Lore (http://www.jatland.com/home/Haryanavi_Folk_Lore) page at Jatland Wiki.

If anyone of you could add a good ragni of Lakhmi Chand on that page, it would be a useful contribution.
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dndeswal
September 24th, 2007, 11:45 PM
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नाचने-गाने का और लखमीचंद के सांगों का विरोध भी बहुत होता था, क्योंकि उन दिनों में आर्यसमाज का प्रभाव बहुत बढ़ गया था । आत्मविश्वासी पंडित जी ने विरोधों का जमकर मुकाबला किया । पुरुषों द्वारा स्त्रियों का भेष धारण करने की सफाई देते थे : इन मर्दों का के दोष भला धारण में भेष जनाना । इस बारे में उनकी यह रागनी पेश है :

लाख चौरासी जीया जून में नाचै दुनियां सारी
नाचण मैं के दोष बता या अक्कल की हुशियारी...

सबतैं पहलम विष्णु नाच्या पृथ्वी ऊपर आकै
फिर दूजै भस्मासुर नाच्या सारा नाच नचा कै
गौरां आगै शिवजी नाच्या, ल्याया पार्वती नै ब्याह-कै
जल के ऊपर ब्रह्मा नाच्या कमल फूल के मांह-कै
ब्रह्मा जी नै नाच-नाच कै रची सृष्टि सारी...

गोपियों में कृष्ण नाच्या करकै भेष जनाना
विराट देश में अर्जुन नाच्या, करया नाचना गाणा
इंद्रपुरी में इन्द्र नाचै जब हो मींह बरसाणा
गढ़ मांडव में मलके नाच्या करया नटों का बाणा
मलके नै भी नाच-नाच कै ब्याहली राजदुलारी...
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bhupendra
September 26th, 2007, 02:10 PM
Padh ke ne jee sa aagya. err DND G ne bhee hat hat ke suayee.



[quote=dndeswal;148236].
नाचने-गाने का और लखमीचंद के सांगों का विरोध भी बहुत होता था, क्योंकि उन दिनों में आर्यसमाज का प्रभाव बहुत बढ़ गया था । आत्मविश्वासी पंडित जी ने विरोधों का जमकर मुकाबला किया । पुरुषों द्वारा स्त्रियों का भेष धारण करने की सफाई देते थे : इन मर्दों का के दोष भला धारण में भेष जनाना । इस बारे में उनकी यह रागनी पेश है :

dndeswal
December 15th, 2007, 06:54 PM
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दादा लखमीचन्द के कुछ मशहूर सांगों के नाम ये हैं :

श्रंगार एवं प्रेम प्रधान सांग

(1) नौटंकी (2) धर्म कौर - रघुबीर सिंह (3) हूर मेनका
(4) ज्यानी चोर (5) चन्द्रकिरण (6) राजा भोज - सरणदे
(7) चापसिंह (8) शाही लकड़हारा
(9) हीर रांझा

धर्म और नीतिप्रधान सांग

(1) सत्यवान सावित्री (2) भगत पूर्णमल (3) पदमावत
(4) चीर पर्व (5) नल दमयन्ती (6) विराट पर्व
(7) राजा हरिश्*चन्द्र (8) सेठ ताराचन्द
(9) भूप पुरंजन, मीराबाई

इसके अलावा जयमल फत्ता, अंजना देवी, भरथरी, पिंगला, चंद्रहास, रूप-बसंत, सरवर नीर, चीरहरण, शकुन्तला, ध्रुव भगत जैसे सांगों का भी मंचन किया ।

लखमीचंद की एक और मशहूर रागनी प्रस्तुत है जिसमे एक ही अक्षर से शब्द और पूरी पंक्ति की छन्द रचना की गई है ।

अलख अगोचर अजर अमर अन्तर्यामी असुरारी...
गुण गाऊं गोपाल गरुडगामी गोविन्द गिरधारी ...
परम परायण पुरुषोत्तम परिपूर्ण हो पुरुष पुराण
नारायण निरलेप निरन्तर निरंकार हो निर्माण
भागवत भक्त भजैं भयभंजन भ्रमभजा भगवान
धर्म धुरंधर ध्यानी ध्याव धरती धीरज ध्यान
सन्त सुजान सदा समदर्शी सुमरैं सब संसारी ...
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vivekdh
December 18th, 2007, 02:28 PM
DND ji ye sarre saang urr ragni ki CD kit te mil sake hain manne ye sarri pehli baar paddi hain or mera jee rajji ho gaya

dndeswal
January 31st, 2008, 08:05 PM
DND ji ye sarre saang urr ragni ki CD kit te mil sake hain manne ye sarri pehli baar paddi hain or mera jee rajji ho gaya

विवेक, मुझे तो पता नहीं कि इनके कैसेट या सी.डी. मिलते भी होंगे या नहीं, मिलेंगे भी तो उनकी आवाज में तो मिलने से रहे । उस जमाने में तो कोई रिकार्डिंग की तकनीक भी नहीं थी । जाटलैंड का एक लिंक यह है, इसमें लखमीचंद की कुछ रागनियां डाउनलोड की जा सकती हैं :

http://www.jatland.com/forums/showthread.php?t=18914 (http://www.jatland.com/forums/showthread.php?t=18914)


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sanjeetsparp
February 28th, 2008, 05:52 PM
All the sayings of that time ... were in real time happenings.... They have a vision in there mind ...
At that time people listen to them also ..

But now a days ... only filmi songs and people put some words on those lyrics and make something something ... Nothing else ..

Also Non-Veg jokes in between .... the new singers now a days, which are doing these type of hings are the real killers of the haryanvi Fortune the Poets like Dada Lakhmi Chand has made ...

No one to carry forward the culture of Haryana now a days .. a few individual are working on right tracks ... but these Ragni Singers now a days are the real killers of Haryanvi Culture...

Even no one who sell the real cassettes and CD of those poets

dndeswal
May 26th, 2008, 10:40 PM
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दादा लखमीचंद सोनीपत जिले के जांटी गांव में पैदा हुए थे । किसी समय यह गांव यमुना किनारे था, पर आजकल यमुना यहां से कई किलोमीटर दूर, पूर्व की ओर चली गई है । गांव के खेतों में ऊपर की एक फुट मिट्टी हटा दो तो नीचे यमुना की रेत मिलती है - काफी खेत खराब हो चुके हैं - लोगों ने अपने खेतों से यमुना रेत बेचकर काफी पैसा कमाया है । पर अब हालात काफी खराब हैं, कोई बारह-पन्द्रह फुट तक गहरे गढ़े गांव के चारों ओर हो चुके हैं, जाने का रास्ता मुश्किल से मिलता है ।

कुछ ही दिन पहले मुझे उस गांव में जाने का मौका मिला । एक गांव वाला बोला - दादा लखमीचंद ने भविष्यवाणी की थी कि जगत-प्रलय से सौ साल पहले ही जांटी गांव में प्रलय आ जायेगी । मैने उससे पूछा - क्या यह भविष्यवाणी सच हो जायेगी ?

वह जांटी-वासी बोला - जी, बिल्कुल होगी, यह तो दिखाई ही दे रहा है - जिस साल अच्छी बारिश हो गई, हमारा गांव तो उसी साल डूब जायेगा, जगत-प्रलय तो बहुत दूर की बात है ।
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arunshamli
May 27th, 2008, 05:03 AM
दयानंद जी एक रागणी सुनी थी काफी पहले , इब तो ठीक ठाक याद बी नही है, अगर आपको याद हो तो कृपया इसे भी पूरा करे| मुझे ठीक से याद नही है, परन्तु यह रागणी शायद लख्मीचंद की नही है

बेशर्मी छा गी सारे के बिगड़े सबके दीन
......हो किसपे करे रे यकीन

झुट्ठे तेरे बाट तराज्जू झुट्ठी खोल्ली तने दूकान
झूठा सोद्दा बेचन लाग्ग्या नही अकल का नाम निशान
झूठा बोलले कमती तोल्ले आये गया के काट्टे कान
झूठा लेख्खा जोख्खा देख्या झुठ्ठी देख्खी तेरी बही
झूठ्ठे ते पकवान बनाये झूठे बेचचे दूध दही
झूठी लेवा झूठ मेवा और बता के कसर रही
भाई खान पान पहरान बदल गया बुद्धि हुयी मलीन होओ किसपे करे रे यकीन
बेशर्मी छा गी सारे के बिगड़े सबके दीन हो किसपे करे रे यकीन

झुठ्ठी यारी यार बी झुट्ठे झुट्ठे करते कर व्यव्हार
झुट्ठे रिश्ते नात्ते रहगे लोग दिखावा रहग्या प्यार
बीर मरद का ना मरद बीर ने कोए से मे ना ऐतबार
उल्टा हो जमाना हुया धरम कर्म का बिल्कुल अंत
वेद पाठी पंडत कोन्या टोहे त ना मिलते संत
बहई कायर छत्री निर्धन बणिया बाम्महण बिद्या हीन होओ किसे पे करे र यकीन
बेशर्मी छा गी सारे के बिगड़े सबके दीन हो किसपे करे रे यकीन


इसको गाया राजकिशन अगवान्पुरिया ने था.

jatanomics
May 28th, 2008, 02:19 PM
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दादा लखमीचंद सोनीपत जिले के जांटी गांव में पैदा हुए थे । किसी समय यह गांव यमुना किनारे था, पर आजकल यमुना यहां से कई किलोमीटर दूर, पूर्व की ओर चली गई है । गांव के खेतों में ऊपर की एक फुट मिट्टी हटा दो तो नीचे यमुना की रेत मिलती है - काफी खेत खराब हो चुके हैं - लोगों ने अपने खेतों से यमुना रेत बेचकर काफी पैसा कमाया है । पर अब हालात काफी खराब हैं, कोई बारह-पन्द्रह फुट तक गहरे गढ़े गांव के चारों ओर हो चुके हैं, जाने का रास्ता मुश्किल से मिलता है ।

कुछ ही दिन पहले मुझे उस गांव में जाने का मौका मिला । एक गांव वाला बोला - दादा लखमीचंद ने भविष्यवाणी की थी कि जगत-प्रलय से सौ साल पहले ही जांटी गांव में प्रलय आ जायेगी । मैने उससे पूछा - क्या यह भविष्यवाणी सच हो जायेगी ?

वह जांटी-वासी बोला - जी, बिल्कुल होगी, यह तो दिखाई ही दे रहा है - जिस साल अच्छी बारिश हो गई, हमारा गांव तो उसी साल डूब जायेगा, जगत-प्रलय तो बहुत दूर की बात है ।
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very true mr deswal.. keep pouring such real stuff