dndeswal
November 12th, 2006, 02:01 PM
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"Current Affairs" फोरम में जाते हुए कई बार मुझे करंट सा लगता है । उसमें एक थ्रैड चली थी - "Should a widow remarry or not" (http://www.jatland.com/forums/showthread.php?t=12509) जिस पर काफी बवाल मचा था, बात का बतंगड़ भी बन गया था - चाहे खुद पढ़ लो । मेरे द्वारा पुराने समाज में प्रचलित एक रिवाज ('नियोग') का जिक्र करने पर कईयों ने कुछ ऐसा रुख अपना लिया था जैसे कोई पहाड़ टूट पड़ा हो । यह किस्सा वहीं पर लिखना चाहता था - पर दुबारा बवाल न मचे, इसलिए इसको यहीं Humor forum में लिख रहा हूँ ।
हमारा जाट समाज दूसरी जातियों की बजाय इस मामले में काफी उदार (liberal) है । पहले भी विधवा विवाह होते थे - बेशक फेरे लेने का रिवाज न रहा हो । अगर कारणवश किसी और गांव में विधवा का विवाह होता तो उसे "बिठा आना" कहा जाता था ।
पहले की बात है । एक चौधरी के बेटे का ब्याह होने के कुछ दिन बाद ही देहान्त हो गया और बहू विधवा हो गई । चौधरी का दूसरा बेटा बहुत छोटा था, इसलिए उसने अपने समधी से सलाह-मशविरा करके बहू को साथ वाले गांव में किसी के यहां "बिठा दिया" ।
महामारी फैली हुई थी । तीन महीने बाद चौधरी ने नाई को उसका 'बेरा-बिचार लाने' (कुशलक्षेम पूछने) भेजा । वहां जाकर नाई ने देखा कि जिस आदमी के यहां वे उसे बिठा कर आये थे उस बेचारे का दो दिन पहले ही महामारी से देहान्त हो गया था और बहू फिर से विधवा हो गई थी ।
गांव वापस आने पर चौधरी ने नाई से पूछा - " रै, के बेरा-बिचार ल्याया सै?" नाई मुंह लटका कर बोला - "चौधरी साहब, तीन महीने पहल्यां तै उसनै बिठा-कै आये थे, वो तो फिर खड़ी हो गई" !!:)
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"Current Affairs" फोरम में जाते हुए कई बार मुझे करंट सा लगता है । उसमें एक थ्रैड चली थी - "Should a widow remarry or not" (http://www.jatland.com/forums/showthread.php?t=12509) जिस पर काफी बवाल मचा था, बात का बतंगड़ भी बन गया था - चाहे खुद पढ़ लो । मेरे द्वारा पुराने समाज में प्रचलित एक रिवाज ('नियोग') का जिक्र करने पर कईयों ने कुछ ऐसा रुख अपना लिया था जैसे कोई पहाड़ टूट पड़ा हो । यह किस्सा वहीं पर लिखना चाहता था - पर दुबारा बवाल न मचे, इसलिए इसको यहीं Humor forum में लिख रहा हूँ ।
हमारा जाट समाज दूसरी जातियों की बजाय इस मामले में काफी उदार (liberal) है । पहले भी विधवा विवाह होते थे - बेशक फेरे लेने का रिवाज न रहा हो । अगर कारणवश किसी और गांव में विधवा का विवाह होता तो उसे "बिठा आना" कहा जाता था ।
पहले की बात है । एक चौधरी के बेटे का ब्याह होने के कुछ दिन बाद ही देहान्त हो गया और बहू विधवा हो गई । चौधरी का दूसरा बेटा बहुत छोटा था, इसलिए उसने अपने समधी से सलाह-मशविरा करके बहू को साथ वाले गांव में किसी के यहां "बिठा दिया" ।
महामारी फैली हुई थी । तीन महीने बाद चौधरी ने नाई को उसका 'बेरा-बिचार लाने' (कुशलक्षेम पूछने) भेजा । वहां जाकर नाई ने देखा कि जिस आदमी के यहां वे उसे बिठा कर आये थे उस बेचारे का दो दिन पहले ही महामारी से देहान्त हो गया था और बहू फिर से विधवा हो गई थी ।
गांव वापस आने पर चौधरी ने नाई से पूछा - " रै, के बेरा-बिचार ल्याया सै?" नाई मुंह लटका कर बोला - "चौधरी साहब, तीन महीने पहल्यां तै उसनै बिठा-कै आये थे, वो तो फिर खड़ी हो गई" !!:)
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