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View Full Version : Dohe



amritameerut01
March 26th, 2009, 12:05 PM
Found the earlier thread locked , thats y posting in a new one.:)

कंकड़ पत्थर जोड़कर , मस्जिद लियो बनाये ,
चढ़ कर मुलाह बांग दे , क्या बहरा हुआ खुदाए I

देवी बड़ी ना देवता , सूरज बड़ा ना चन्द ,
आदि अंत दोनों बड़े , के गुरु के गोविन्द I

माला फेरूँ ना हरी भजूं , मुख से कहूँ ना राम,
मेरे हरी मोको भजें , तब पाऊं विश्राम I

भय से भक्ति करें सबै , भय से पूजा होए ,
भय पारस है जीव को , निर्भय होए ना कोए I

शब्द बराबर धन नहीं , जो कोई जाने बोल ,
हीरा तो दामों मिलें , शब्द मोल ना तोल I

sunitahooda
March 26th, 2009, 01:46 PM
Amazing thread Amrita....Anil will contribute a lot:)

मनका मनका फेर के मिटा ना मन का फेर
कनका मनका डारी के मन का मनका फेर

Hope its right

satyeshwar
March 26th, 2009, 02:43 PM
One of my favorites:
Kabira garv na kijiye, ooncha dekh aavaas
Kaal pado bhui letna, oopar jamsi ghaas

Another one I really like:
Kabira man nirmal bhaya, jaisa ganga neer
Paache paache hari firey, kehat Kabir Kabir

chandra16
March 26th, 2009, 04:08 PM
Chalti Chakki Dekh Kar, Diya Kabira Roye
Dui Paatan Ke Beech Mein,Sabit Bacha Na Koye

ksangwan
March 26th, 2009, 05:04 PM
माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय ।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय ॥

गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय ।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो मिलाय ॥

माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर ।
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ॥

बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नही फल लागे अति दूर ॥

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥

amritameerut01
March 26th, 2009, 05:25 PM
Amazing thread Amrita....Anil will contribute a lot:)

मनका मनका फेर के मिटा ना मन का फेर
कनका मनका डारी के मन का मनका फेर

Hope its right


Thnx Sunita.......

It is :

माला फेरत युग गया , फिरा ना मनका फेर ,
करका मनका डारी दे , मनका मनका फेर I

amritameerut01
March 26th, 2009, 05:28 PM
Thnx to all for their contribution.

Kindly try to post max. 5 dohe at a time only, otherwise readers might loose interest. :)

And dont forget to post ur favourite one...;)

anilsinghd
March 26th, 2009, 07:22 PM
Put meaning and brief explanations as well if possible!

I will do the same!
( I have a book and will write from the same! :))

And i apologise for repeating any one of those!

=====================

My first 5
=========
कबीर गर्व न कीजिये , इस जोवन की आस
टेसू फूला दिवस दस , खंखर भय पलास !
( जवानी की आशा (मद) में , पड़कर क्यूँ अपना जीवन बिगाड़ रहे हो ? पलास के पौधे को फूलों के झाड़ जाने पर उसकी और कोई निहारता तक नहीं है , वैसे ही तेरी यह जवानी है )


कबीर गर्व न कीजिये , ऊंचा देखि आवास
काल परों भूईं लेटना , ऊपर जमसी घास !
(अपनी भव्य ईमारत को देख कर गर्व मत कर , आखिर में तुझे पृथ्वी के भीतर ही लेटना है और तेरे ऊपर घास को ही उगना है )


कबीरा गर्व न कीजिये , चाम लपेटी हाड
हयबर ऊपर छत्रतट , तो भी देवें गाड़ !
(शरीर का घमंड मत कर , सर्वोत्तम घोडे की सवारी तथा एक्चात्र राज्य का स्वामी होने पर भी एक दिन तेरे शरीर को लोग भूमि में गाड़ देंगे )

प्रेम न बाडी उपजे , प्रेम न हाट बिकाए
राजा प्रजा जो भी रुचे , शीश देही ले जाए !
( प्रेम बाडी में नहीं उगता , न बाजार में बिकता , राजा हो या साधारण इंसान , जिसे चाहिए , अपने सर्व निछावर करके प्राप्त कर सकता है !)


ऊंचे कुल का जनमिया , करनी उंच न होए
सुवर्ण कलश सुरा भरा , साधुन निंदा होए
(सिर्फ उच्च कुल में जन्म्नें से ही किसी का आचरण उच्च श्रेणी का नहीं हो जाता , सोने के कलश में यदि मदिरा भरी हो तो भी श्रेष्ट पुरुष उसकी निंदा ही करते हैं )

anilsinghd
March 26th, 2009, 07:24 PM
Another one I really like:
Kabira man nirmal bhaya, jaisa ganga neer
Paache paache hari firey, kehat Kabir Kabir


Sorry can't stop myelf from adding this one to your's Satyeshwar!

माला फेरूँ न हरी भजूँ , मुख से कहूं न राम
मेरे हरी मौको भजें , तब पाऊँ विश्राम !! :)




Only to realise later that Amrita had posed this one earlier ! : )

htomar
March 26th, 2009, 08:14 PM
As the owner of this thread requested....I am submiting only 5 dohe....


(1)
सफल वही है आजकल, वही हुआ सिरमौर।
जिसकी कथनी और है, जिसकी करनी और।।

(2)
हमको यह सुविधा मिली, पार उतरने हेतु।
नदिया तो है आग की, और मोम का सेतु।।

(3)
हर कोई हमको मिला, पहने हुए नकाब।
किसको अब अच्छा कहें, किसको कहें खराब।।

(4)
सुख सुविधा के कर लिये, जमा सभी सामान।
कौड़ी पास न प्रेम की, बनते है धनवान ।।

(5)
सागर से रखती नहीं, सीपी कोई आस।
एक स्वाती की बूँद से, बुझ जाती है प्यास।।

vijay
March 27th, 2009, 02:13 AM
ऐसी वाणी बोलिये, मन का आपा खोये ।
औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय ॥

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिलया कोई ।
जो मन खोजा आपना, तो मुझ से बुरा ना कोई ॥

साँईं इतना दीजिये, जामें कुटुम्ब समाये ।
मैं भी भूखा ना रहूँ, साधू ना भूखा जाये ॥

दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे ना कोये ।
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे होये ॥

धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होये ।
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आये फ़ल होये ॥

Nishantrathi82
March 27th, 2009, 10:27 AM
I m sorry mujhe 1 bhi pooora naahe aata. So i m watching all the Posts and thanks Amrita g and other Contributors its really a nice thread after a long time. :)

chandra16
March 27th, 2009, 10:54 AM
"Kabir Soyee Soorma, Man Soon Maande Jhoojh
Panch Pyada Paari Le, Door Kare Sab Dooj"

In the time period Kabir lived there were lot of wars and fighting taking around. Instead of this fighting and killing outside, Kabir redirects our attention to waging a war inside of us via this verse. The mind is the root of all our troubles. This mind is what creates a myriad of thoughts that drive us everywhere and do not allow us to rest in peace. Thoughts are instigated, fed and driven by our five sensual desires - Lust, Anger, Intoxication with Pride, Attachment and Greed. He calls these as pawns because they are protecting the true enemy that lies behind - The Mind. Here the game is won only when we go beyond the sensual (pawn-like) pleasures and conquer the Mind who has been running the show. Kabir then tells us that removing the mind takes away the root of all misery which is the feeling of the "other". There is no "other" anymore as this distinction comes via a creation of our mind. Once the mind is gone there is nobody else except us ourselves.

ksangwan
March 27th, 2009, 11:07 AM
खैर, खून, खाँसी, खुसी, बैर, प्रीति, मदपान।
रहिमन दाबे न दबै, जानत सकल जहान॥

टूटे सुजन मनाइए, जो टूटे सौ बार।
रहिमन फिरि फिरि पोहिए, टूटे मुक्ताहार॥

बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय।
रहिमन बिगरे दूध को, मथे न माखन होय॥

रहिमन विपदा ही भली, जो थोरे दिन होय।
हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय॥

amritameerut01
March 27th, 2009, 11:39 AM
These are simple to understand thats y not explaining the meaning...:)

माँगन मरण समान है , मत मांगो कोई भीख ,
माँगन से मरना भला , यह सतगुरु की सीख I

मेरा मुझ में कुछ नाही , जो कुछ है सो तेरा,
तेरा तुझ को सोपते , क्या लागे है मेरा I

कबीरा गर्व ना कीजिये , कबहू ना हँसिये कोए ,
अजयी नाव समुन्द्र में , का जाने का होए I

जहाँ दया वहां धर्म है , जहाँ लोभ वहां पाप,
जहाँ क्रोध वहां काल है ,जहाँ क्षमा वहां आप I

जल में बसे कमोध्नी , चन्दा बसे अकास ,
जो है जांको भवता , सो ताहि के पास I

htomar
March 27th, 2009, 11:40 AM
यों ही होता है सदा, हर चूनर के संग
पंछी बनकर धूप में, उड़ जाते हैं रंग


पंछी मानव, फूल, जल, अलग-अलग आकार
माटी का घर एक ही, सारे रिश्तेदार


सीधा सादा डाकिया जादू करे महान
एक ही थैले में भरे आँसू और मुस्कान


छोटा कर के देखिए जीवन का विस्तार
आँखों भर आकाश है बाँहों भर संसार

satyeshwar
March 27th, 2009, 12:25 PM
Kisi ne kabhi yeh doha suna hai kya?
Jab man changa to kathoti mein ganga

Sant Ravidas ji ka hai aur iske peeche ek badi hi acchi kahaani bhi hai. Yadi kisi ko iske baare mein kuch aur jaankaari ho to mujhe avashya bataiye.

vijay
March 27th, 2009, 12:46 PM
kisi ne kabhi yeh doha suna hai kya?
jab man changa to kathoti mein ganga

sant ravidas ji ka hai aur iske peeche ek badi hi acchi kahaani bhi hai. Yadi kisi ko iske baare mein kuch aur jaankaari ho to mujhe avashya bataiye.


एक बार एक पर्व के अवसर पर पड़ोस के लोग गंगा-स्नान के लिए जा रहे थे। रैदास (रविदास) के शिष्यों में से एक ने उनसे भी चलने का आग्रह किया तो वे बोले, "गंगा-स्नान के लिए मैं अवश्य चलता किन्तु एक व्यक्ति को जूते बनाकर आज ही देने का मैंने वचन दे रखा है। यदि मैं उसे आज जूते नहीं दे सका तो वचन भंग होगा। गंगा स्नान के लिए जाने पर मन यहाँ लगा रहेगा तो पुण्य कैसे प्राप्त होगा ? मन जो काम करने के लिए अन्त:करण से तैयार हो वही काम करना उचित है। मन सही है तो इसे कठौते के जल में ही गंगास्नान का पुण्य प्राप्त हो सकता है।"

कहा जाता है कि इस प्रकार के व्यवहार के बाद से ही कहावत प्रचलित हो गयी कि - मन चंगा तो कठौती में गंगा।

dndeswal
March 27th, 2009, 12:46 PM
Kisi ne kabhi yeh doha suna hai kya?
Jab man changa to kathoti mein ganga

Sant Ravidas ji ka hai aur iske peeche ek badi hi acchi kahaani bhi hai. Yadi kisi ko iske baare mein kuch aur jaankaari ho to mujhe avashya bataiye.

This story can be read at the following link:


http://suresh-gupta.blogspot.com/2008/11/blog-post_18.html


.

vijay
March 27th, 2009, 12:52 PM
I read it on Wikipedia :

http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B0%E0%A5%88%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8

hoodarajesh
March 27th, 2009, 01:10 PM
छोटा हूँ तो क्या हुआ, जैसे आँसू एक।
सागर जैसा स्वाद है, तू चखकर तो देख।।
देखा तेरे शहर को, भीड़ भीड़ ही भीड़।
तिनके ही तिनके मिले, मिला न कोई नीड़।।
कतरा-कतरा घुल रही, घर-घर बूढ़ी आँख।
बेटे-बहुओं को लगे, सुरखाबों के पांख।।
सब कुछ पलड़े पर चढ़ा, क्या नाता क्या प्यार।
घर का आँगन भी लगे, अब तो इक बाज़ार।।
मैंने देखा देश का, बड़ा सियासतदान।
न चेहरे पर आँख थी, न चेहरे पर कान।।
जागा लाखों करवटें, भीगा अश्क हज़ार।
तब जाकर मैंने किए, काग़ज़ काले चार।।
मैं खुश हूँ औज़ार बन, तू ही बन हथियार।
वक्त करेगा फ़ैसला, कोन हुआ बेकार।।
सब-सा दिखना छोड़कर, खुद-सा दिखना सीख।
संभव है सब हों ग़लत, बस तू ही हो ठीक।।
तू पत्थर की ऐंठ है, मैं पानी की लोच।
तेरी अपनी सोच है, मेरी अपनी सोच।।
लौ से लौ को जोड़कर, लौ को बना मशाल।
क्या होता है देख फिर, अंधियारों का हाल।।
आसमान के जोश में, रख धरती का होश।
कटकर अपने मूल से, बढ़ा न कोई कोश।।
जिसके उर में आग है, उसके सुर में राग।
सूरज सदा जगाएगा, जाग भले ना जाग।।
जीता तो तेरी धरा, हारा ते आकाश।
शंख फूँक अब युद्ध का, काट भरम का पाश।।
मैंने 'है' को 'है' कहा, नीयत रखकर नेक।
अब यह तेरा काम है, सही-ग़लत तू देख।।

amritameerut01
March 27th, 2009, 01:17 PM
This one is really nice.


http://photos1.blogger.com/blogger/3688/481/400/Dohe.jpg (http://photos1.blogger.com/blogger/3688/481/1600/Dohe.1.jpg)

vijay
March 27th, 2009, 01:34 PM
My favorite :


रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय ।
टूटे से फिर ना जुड़े़, जुड़े़ गाँठ परि जाय ॥

ksangwan
March 27th, 2009, 01:43 PM
पायो जी म्हे तो रामरतन धन पायो।
बस्तु अमोलक दी म्हारे सतगुरु, किरपा को अपणायो।
जनम जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो।
खरचै नहिं कोई चोर न लेवै, दिन-दिन बढत सवायो।
सत की नाव खेवहिया सतगुरु, भवसागर तर आयो।
मीरा के प्रभु गिरधरनागर, हरख-हरख जस पायो॥

मीरा

anilsangwan
March 27th, 2009, 02:13 PM
Rahiman Paani Raakhiye, Bin Paani sab Soon,
Paani gaye na Oobrey, Moti - Maanas - Choon !!

Matlab : Rahim ji kehtey hain ki insaan ko "Paani" (sharam) rakhni chahiye. Jis prakar se bina Paani k choon ( Aata) aur Moti ( Pearl) kisi kaam k nahi... waise hi Insaan jo ki achey burey ki sharam na rakhey woh bhi bekaar hai... :)

htomar
March 27th, 2009, 02:38 PM
राजनीति की नीति का, है ना पारावार
जैसे चाहो मोड़ दो अर्थों का संसार

पल पल निष्ठा बदलना, राजनीति का खेल
आज गले जो मिल रहे कल वे ही अनमेल

मनुज बदलते हैं नहीं, बदल रहे हैं अर्थ
कल जिनके गुन गा रहे, अब दिखते वे व्यर्थ

मंत्री पद के लोभ में दल निष्ठा को तोड़
छोड़ छाड़ कर जा रहे ऐसी देखी होड़

संप्रदाय अरु जाति की राजनीति बेकार
कटुता दिन दिन बढ़ रही नफ़रत का संसार

सत्ता के सुख भोग की होड़ लगी चहुँ ओर
लूट मची सब ओर है, जित देखो तित चोर

Anjalis
March 27th, 2009, 03:53 PM
"रसखान के दोहे"







प्रेम प्रेम सब कोउ कहत, प्रेम न जानत कोइ।
जो जन जानै प्रेम तो, मरै जगत क्यों रोइ॥


कमल तंतु सो छीन अरु, कठिन खड़ग की धार।
अति सूधो टढ़ौ बहुरि, प्रेमपंथ अनिवार॥


काम क्रोध मद मोह भय, लोभ द्रोह मात्सर्य।
इन सबहीं ते प्रेम है, परे कहत मुनिवर्य॥


बिन गुन जोबन रूप धन, बिन स्वारथ हित जानि।
सुद्ध कामना ते रहित, प्रेम सकल रसखानि॥


अति सूक्ष्म कोमल अतिहि, अति पतरौ अति दूर।
प्रेम कठिन सब ते सदा, नित इकरस भरपूर॥


प्रेम अगम अनुपम अमित, सागर सरिस बखान।
जो आवत एहि ढिग बहुरि, जात नाहिं रसखान॥


भले वृथा करि पचि मरौ, ज्ञान गरूर बढ़ाय।
बिना प्रेम फीको सबै, कोटिन कियो उपाय॥


दंपति सुख अरु विषय रस, पूजा निष्ठा ध्यान।
इन हे परे बखानिये, सुद्ध प्रेम रसखान॥


प्रेम रूप दर्पण अहे, रचै अजूबो खेल।
या में अपनो रूप कछु, लखि परिहै अनमेल॥


हरि के सब आधीन पै, हरी प्रेम आधीन।
याही ते हरि आपु ही, याहि बड़प्पन दीन॥

Anjalis
March 27th, 2009, 03:55 PM
रहिमन मोम तुरंग चढ़ि, चलिबो पावक मांहि।
प्रेम पंथ ऐसो कठिन, सब कोउ निबहत नांहि।।

रहिमन याचकता गहे, बड़े छोट है जात।
नारायण हू को भयो, बावन आंगुर गात।।

रहिमन वित्त अधर्म को, जरत न लागै बार।
चोरी करि होरी रची, भई तनिक में छार।।

समय लाभ सम लाभ नहिं, समय चूक सम चूक।
चतुरन चित रहिमन लगी, समय चूक की हूक।।


चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।
जिनको कछु न चाहिए, वे साहन के साह।।

amritameerut01
March 27th, 2009, 04:21 PM
Kisi ne kabhi yeh doha suna hai kya?
Jab man changa to kathoti mein ganga

Sant Ravidas ji ka hai aur iske peeche ek badi hi acchi kahaani bhi hai. Yadi kisi ko iske baare mein kuch aur jaankaari ho to mujhe avashya bataiye.


Is it a doha or a kahawat???:confused:
Kripya koi iss visheya par prakaash daale....:)

amritameerut01
March 27th, 2009, 04:25 PM
Though earlier one is a kahawat, is the one written below is also a kahawat or ????



"karat karat abhyaas ke jadmati hot sujan"

kya iske aage peeche bhi kuch hai or is it complete???

ksangwan
March 27th, 2009, 04:31 PM
"karat karat abhyaas ke jadmati hot sujan"
"rasari aavt jat ke sil pe padat nisan"





Though earlier one is a kahawat, is the one written below is also a kahawat or ????



"karat karat abhyaas ke jadmati hot sujan"

kya iske aage peeche bhi kuch hai or is it complete???

amritameerut01
March 27th, 2009, 04:39 PM
"karat karat abhyaas ke jadmati hot sujan"
"rasari aavt jat ke sil pe padat nisan"

kripya karke laal pankti ka arth bhi bata dijiye...:)

hoodarajesh
March 27th, 2009, 04:49 PM
तप से ही संसार में बंधु निखरता नेह
जितना तपती है धरा उतना बरसे मेह
जल से करना सीखिए विघ्नों का प्रतिकार
पत्थर को भी काटती जिसकी शीतल धार
तू तू मैं मैं से रहित जब होता है प्यार
दुनिया घर सी दीखती घर लगता संसार

ksangwan
March 27th, 2009, 04:56 PM
bar-bar abyas ke anpad bhi vidavan ho jate hai
jaise rasi ke bar bar ek sil(pathar) pe aane jaane se pathar ke kathor hote huye bhi us pe nisan pad jata hai
(purane time me jab kuye se rasi-balti se pani nikalte the to us kuye ki sil pe nisan pad jata tha)



kripya karke laal pankti ka arth bhi bata dijiye...:)

ksangwan
March 27th, 2009, 05:05 PM
or jayada detail ke liye ye link hai

http://prabhakargopalpuriya.blogspot.com/2007/08/blog-post_24.html


kripya karke laal pankti ka arth bhi bata dijiye...:)

Anjalis
March 27th, 2009, 06:27 PM
जाट का मैं लाडला तिरखा लगी सरीर
अगन लगी बुझती नईं, बिना पिए जल-नीर
बिना पिए जल-नीर,--रस्ते में कुयाँ चुनाया
किस पापी ने यै जुल्म कमाया, उस पै डोल ना पाया!

anilsinghd
March 27th, 2009, 06:40 PM
or jayada detail ke liye ye link hai

http://prabhakargopalpuriya.blogspot.com/2007/08/blog-post_24.html


And I remember this story in our course work ! Do not remember the class and the book though ! :) !

anilsinghd
March 27th, 2009, 06:43 PM
जाट का मैं लाडला तिरखा लगी सरीर
अगन लगी बुझती नईं, बिना पिए जल-नीर
बिना पिए जल-नीर,--रस्ते में कुयाँ चुनाया
किस पापी ने यै जुल्म कमाया, उस पै डोल ना पाया!



Anjali ji , please can you put in meanings as well! :)


Nice compilations all! :)


Please put the meaning as well so that we can all learn something ! :)

skarmveer
March 27th, 2009, 06:51 PM
Kabira khada bazar mein sabke mangey khair,
Na kahu say dosti na kahu say bair.

Badey badai na karey badey na boley bol
Rahiman heera kab kahey lakh taka mero mol.

Pothi padh-2 jag mua bhaya na padit koi,
dhai aakher prem key padhey so pandit hoi.

Rahiman vipda ho bhali jo thorey din hoy,
hit unhit ya jagat mein jani pert sab koy.

anilsinghd
March 28th, 2009, 01:08 AM
आज के दोहे "माया" के ऊपर हैं!


कबीर माया मोहिनी , मांगी मिलै न हाथ
मना उतारी जूठ करि , लागी डोले साथ !!

माया मोहिनी के सामान है , मांगने से नहीं मिलती , जो इसे झूठा समझकर परे झटक देता है , उसी में पूर्णता आ जाती है !

कबीर माया बेसवा , दोनूं की एक जात
आवत को आदर करे , जात न बूझे बात !

माया और वेश्या दोनों की एकरूप हैं , पहले मिलने पे तो आदर करती हैं , जाते समय बात तक नहीं पूछती !

कबीर माया रूख्दी , दो फल को दातार
खावत , खरचत मुक्ति भै , संचत नरक दुवार !

माया रुपी वृक्ष कल्याण और नरक दोनों फलों को देने वाला है , परमार्थ के कार्यों में खर्च करने से कल्याण होता है , वही संग्रह करने से नरक-द्वार मिलता है !


कबीर यह संसार की , झूठी माया मोह
जिही घर जिता बधँव , तिही घर तेता दोह !

सांसारिक मोह माया तो झूठी है , जिस घर में धन ऐश्वर्य को लेकर जितनी प्रसन्नता दिखती है , उस घर में उतना ही परस्पर बैर , द्वेष , शोक विद्यमान है !


माया मुई न मन मूवा , मरी मरी गया शरीर
आशा तृष्णा न मुई , कह गए दास कबीर !

Anjalis
March 28th, 2009, 12:25 PM
anjali ji , please can you put in meanings as well! :)


nice compilations all! :)


please put the meaning as well so that we can all learn something ! :)

घर से बाप्पू की किसी बात पे वोह घने छो में लिकड़ता है, मन में छो के मारे आग लगी हुई थी , उसी सन्दर्भ में ये दोहा है

मैं जाट पिता का लाड़ला पुत्र हूँ, मुझे प्यास लगी है । मेरे मन में जो आग लगी है वह बिना पानी पिए नहीं बुझेगी । हालाँकि रास्ते में पक्का कुआँ बना हुआ है लेकिन न जाने किस पापी ने यह ज़ुल्म किया है कि उस पर डोल नहीं रखा है ।

Anjalis
March 28th, 2009, 12:27 PM
थोड़ा-सा नीर पिला दै, बाकी घाल मेरे लोटे मैं
अरे तूँ भले घराँ की दीखै, तन्ने जन्म लिया टोटे मैं
तू मेरे साथ होले गैल, दामण मढ़वा दिऊँ घोटै मैं !

sachinb
March 28th, 2009, 12:42 PM
ye thread dekh kar mere man mein bhi Doha likhane ki ichha Jagrit hui,,,,ek doha hai

"Jaat Lath Bajaayega,,,,
Jat Land Badhtaa Jaayega":rock

amritameerut01
March 28th, 2009, 05:06 PM
दोष पराये देख कर ,चला हसंत हसंत ,
अपने याद ना आई , जिनका आदि ना अंत i


जो घर साधू ना पुजिये , धरती सेवा नाही ,
ते घर मरघट सा दिखे , भूत बसे दिन माही i

sunitahooda
March 28th, 2009, 05:11 PM
Anjali ye to mujhe ek deshi kahawat lag rahi hai?
थोड़ा-सा नीर पिला दै, बाकी घाल मेरे लोटे मैं
अरे तूँ भले घराँ की दीखै, तन्ने जन्म लिया टोटे मैं
तू मेरे साथ होले गैल, दामण मढ़वा दिऊँ घोटै मैं !

htomar
March 28th, 2009, 05:50 PM
तू पत्थर की ऐंठ है, मैं पानी की लोच।
तेरी अपनी सोच है, मेरी अपनी सोच।।


सब-सा दिखना छोड़कर, खुद-सा दिखना सीख।
संभव है सब हों ग़लत, बस तू ही हो ठीक।।


सब कुछ पलड़े पर चढ़ा, क्या नाता क्या प्यार।
घर का आँगन भी लगे, अब तो इक बाज़ार।।

anilsinghd
March 30th, 2009, 04:42 PM
ye thread dekh kar mere man mein bhi Doha likhane ki ichha Jagrit hui,,,,ek doha hai

"Jaat Lath Bajaayega,,,,
Jat Land Badhtaa Jaayega":rock


Ain't funny by any stretch of imagination! :)

annch
March 31st, 2009, 05:51 AM
Kabira Teri Jhompri, Gal Katiyan Ke Paas, Jo Karenge So Bharenge, Tu Kyon Bhayo Udaas..

amritameerut01
March 31st, 2009, 11:41 AM
क्षमा शोभते उस भुजंग को जिसके पास गरल हो ,
उसका क्या जो दंतहीन , विषहीन , विनीत सरल हो i

जो बडन को लघु कहे , नहीं कबीर घट जाए ,
गिरिधर मुरलीधर कहे , कछु दुःख मानत नाए i

साँच बराबर तप नहीं , झूट बराबर पाप ,
जाके ह्रदय साँच है, ताके ह्रदय आप i

माया तजे तो क्या हुआ , मान ताज़ा नहीं जाए ,
मान बड़े मुनिवर गए , मान सबन को भाए i

सुर, नर, मुनि, जन, देवता, ब्रह्म, विष्णु,महेश,
ऊँचा महल कबीर का , पार ना पावे शेष i

htomar
March 31st, 2009, 11:42 AM
कहति नटति रीझति मिलति खिलति लजि जात।
भरे भौन में होत है, नैनन ही सों बात॥

anilsinghd
April 8th, 2009, 08:41 PM
काला नाला ही में जल , सो फिर पानी होए
जो पानी मोती भया , सो फिर नीर न होए !!



तन मन लज्जा न करें , काम बाण उर्शाल
एक काम सब बस किये , सुर नर मुनि बेहाल !!



कबीरा यह गति अटपटी , चटपटी लखी न जाये
जो मन की खटपट पिटे , अधर भया ठहराए !!



कबीरा लहरी समुद्र की मोती बिखरे आये
बगुला परख न जानही , हंसा चुन चुन खाए !





सांच बराबर तप नहीं , झूठ बराबर पाप
जाके ह्रदय सांच है , वाके ह्रदय आप !




@ अंजू / अंजू : दिस वन फॉर यू :)




सबका हूता लीजिये , सोचा शब्द निहार
पक्षपात नहीं कीजिये , कहे कबीर विचार :) !

anilsinghd
April 9th, 2009, 01:56 AM
भक्ति महल बहु उंच है , दूर से ही दर्शाए
जो कोई जन भक्ति करे , शोभा वरनी न जाए !


बलिहारी गुरु आपुनो , घडी घडी सौ सौ बेर
मानुष से देवत किया , करत न लागी बेर !


दुर्लभ मानुष जनम है , देह न बारम्बार
तरुवर जो पत्ते झरे , बहुरि न लागे डार !


मांगन मरण सामान है , मत मांगो कोई भीख
मांगन से मरना भला , यही सतगुरु की सीख !



कहना था सो कह दिया , अब कछु कहा न जाए
एक रहा दूजा रहा , दरिया लहर समाये !!

annch
April 9th, 2009, 10:10 AM
Anil,
Khod Khad Dharati Sahe
Kaat Koot Vanaraay
Kutil Vachan Sadhu Sahe
Aur Se Saha Na Jaaye:p

Arr yo Anju ka doha-
Kehna tha so keh diya, baaki raha na kuch,
Jug bhala toh kab bhala, Jab rehna aaye chup:D





@ अंजू / अंजू : दिस वन फॉर यू :)




सबका हूता लीजिये , सोचा शब्द निहार
पक्षपात नहीं कीजिये , कहे कबीर विचार :) !

anilsinghd
April 9th, 2009, 05:20 PM
Anil,
Khod Khad Dharati Sahe
Kaat Koot Vanaraay
Kutil Vachan Sadhu Sahe
Aur Se Saha Na Jaaye:p

Arr yo Anju ka doha-
Kehna tha so keh diya, baaki raha na kuch,
Jug bhala toh kab bhala, Jab rehna aaye chup:D


:) :) Appreciate that! :)

anilsinghd
April 9th, 2009, 05:21 PM
प्रेम छिपाए न छिपे , जा घाट परगट होए
जो पे मुख बोले नहीं , नैन देते हैं रोये !


सुख के संगी स्वार्थी दुःख में रहते दूर
कहे कबीर परमार्थी दुःख सुख सदा हुजूर !


सुर नर मुनि जन देवता , ब्रह्म विष्णु महेश
ऊंचा महल कबीर का पार न पावे सेष !



कृष्ण करीमा एक है , नाम धराया दोए
कहे कबीरा दो सुनी भरम पड़े मति खोये !



प्रेमी ढून्दन मैं फिरूं , प्रेमी मिले न कोए
प्रेमी सो प्रेमी मिले , विष से अमृत होए !!


प्रेम बिना धीरज नहीं , विरह बिना बैराग
सतगुरु बिन जावे नहीं , मन मन सा का दाग !



कुशल कुशल जो पूछता , जग में रहा न कोए
जरा मुई न मन मुआ , कुशल कहाँ से होए !!

anilsinghd
April 9th, 2009, 09:20 PM
ज्ञान रतन का जातां कर , माटी का संसार
हाय कबीरा फिर गया , फीका है संसार !!

कबीर मन पंछी भया , भय ते बाहर जाए
जो जैसी संगती करे , सो तैसा फल पाए !!

लकडी जल कोयला भई , कोयला जल भयो राख
मैं पापिन ऐसी जली , कोयला भई न राख !!

करता था तो क्यूँ रहा , अब करी क्यूँ पछताए
बोए पेड़ बबूल का , अम्बवा कहाँ से पाए !!!


भक्ति भजन हरी नाम है , दूजा दुःख अपार
मनसा वाचा कर्मणा कबीरा सुमिरन सार !!!

arvindsinghrot
April 9th, 2009, 11:52 PM
sabte pahelin you pada tha....

kal kare so aaj kar, aaj kare so ab !
pal main pralay hoegi, bahuri karega kab !!


ajkal ye bhi sain ....

na mera hai kuch bhi, na tera hai koe !
jo mann prem bharat, phoot phoot hai roye !!

na paden ka chaanv hai, na nadiya ka neer !
mera aapan kuch hai, to mera hridya or peer !!

anilsinghd
April 11th, 2009, 08:06 PM
तीरथ गए से एक फल , संत मिले फल चार
संत गुरु मिले अधिक फल , कहे कबीर विचार सुनो ....

प्रेम पियाला जो पिलाया , शीश दक्षिणा देये
लोभी शीश न दे सके , नाम प्रेम का लेये !

माया मरी न मैं मारा , मर मर गया शरीर
आशा तृष्णा न मरी , कह गए दास कबीर ..!

माखी गुड में गडी रहे , पंख रहे लिपटाए
हाथ पल और सर धुनें , लालच बुरु बलाए!!

मन मोटा मन पातरा मन पानी मन लाये
मन की जैसी उपजे , तैसी ही हो जाये !!


सातों शब्द जो बाजते , घर घर होर राग
ते मंदिर खाली पड़े , बैठन लागे काग !!

anilsinghd
April 12th, 2009, 01:48 AM
दास कहावन कठिन है , मैं दासन का दास
अब तो ऐसा होई रहा , पाँव तले की घास !!



भक्ति महल बहु उंच है , दूर ही ते दर्शाए
जो कोई जन भक्ति करे , शोभा बरनी न जाए !



एक दिन ऐसा होयेगा सब सौं परे बिछोह
राजा रानी राव रंक सावध क्यूँ नहीं होए ?




नींद निशानी मौत की , उठ कबीरा जाग
और रसायन छाडी के , नाम रसायन लाग !!




मैं रोयुन सब जगत को , मौको रोवे न कोए
मौको रोवे सोचना जो शब्द बोए की होए !!

Samarkadian
April 12th, 2009, 12:57 PM
पर-उपदेश कुशल बहुतेरे ;
जे अचरिन, नर नहीं घनेरे!

करम प्रधान विश्व करी राखा!

तुलसीदास

anjusin
April 12th, 2009, 04:20 PM
जहाँ दया वाही धरम है,जहाँ लोभ वाही पाप,
जहाँ क्रोध वहीँ पाप है, जहाँ छमा वहां आप!

anilsinghd
April 13th, 2009, 09:41 PM
Good one Samar and Anju ! :)

============================



कबीरा ज्ञान विचार बिन हरी ढूँढन को जाए
तन में तिरलोकी बसे अब तक परखा नाए !!

विषय वासना उरझी कर जनम गंवाया बात
अब पछतावा क्या करे निज करनी कर याद ...

अति हठ मत बाँवरे हठ से बात न होए
ज्यूँ ज्यूँ भीजे कामरी त्यूं त्यूं भारी होए !!

ज्ञान समागम प्रेम सुख दया भक्ति विश्वास
गुरु सेवा ते पाइए सतगुरु चरण निवास !!

शील शमा जब उपजे अलख द्रिष्टी तब होए
बिन शील पहुंचे नहीं लाख कथे जो कोए !!

पिया पिया रस जानिए उतरे नहीं खुमार
नाम अमल पाता रहे पिए अमीरस सार !!

anilsinghd
May 29th, 2009, 02:12 PM
मेरा मुझ में कुछ नहीं जो कुछ है सो तेरा
तेरा तुझको सौंपते क्या लागे हैं मेरा ?

करता था तो क्यूँ रहा अब करी क्यूँ पछताए
बोए पेड़ बबूल का अम्बवा कहाँ से पाए ?

सुमिरन सूरत लगाये कर मुख से कछु न बोल
बाहर का पट बंद कर अन्दर का पट खोल !

ज्ञान रतन का जतन कर माटी का संसार
हाय कबीरा फिर गया फीका है संसार ...

आये हैं तो जायेंगे राजा रंक फ़कीर
एक सिंहासन चढी चले एक बंधे जंजीर !

कागा काको धन हरे कोयल काको देत
मीठे शब्द सुनाये के जग अपनों कर लेत !

भक्ति भजन हरी नाम है दूजा दुःख अपार
मनसा वाचा कर्मणा कबीर सुमिरन सार !!

deepakchoudhry
May 29th, 2009, 02:15 PM
Kabir was a true saint.

amritameerut01
July 5th, 2009, 12:12 PM
भीगे राधा के नयन, तिरते कई सवाल।
कभी न ऊधौ पूछता, ब्रज में आकर हाल।।


चिठ्ठी अब आती नहीं रोज़ सोचता बाप।
जब-जब दिखता डाकिया और बढ़े संताप।।


रह-रहकर के काँपते माँ के बूढ़े हाथ।
बूढ़ा पीपल ही बचा अब देने को साथ।।


बहिन द्वार पर है खड़ी रोज़ देखती बाट।
लौटी नौकाएँ सभी छोड़-छोड़कर घाट।।


आँगन गुमसुम है पड़ा द्वार गली सब मौन।
सन्नाटा कहने लगा अब लौटेगा कौन।।


नगर लुटेरे हो गए सगे लिए सब छीन।
रिश्ते सब दम तोड़ते जैसे जल बिन मीन।।


रोज़ काटती जा रही सुधियों की तलवार।
छीन लिया परदेस ने प्यार भरा परिवार।।


वह नदिया में तैरना घनी नीम की छाँव।
रोज़ रुलाता है मुझे सपने तक में गाँव।।

हरियाली पहने हुए खेल देखते राह।
मुझे शहर में ले गया पेट पकड़कर बाँह।।


डब-डब आँसू हैं भरे नैन बनी चौपाल।
किस्से बाबा के सभी बन बैठे बैताल।।


बँधा मुकद्दर गाँव का पटवारी के हाथ
दारू मुर्गे के बिना तनिक न सुनता बात।।

ajit2009
July 5th, 2009, 12:49 PM
http://www.jatland.com/forums/attachment.php?attachmentid=3546&stc=1&d=1246773717

...........kabir kabir kya karte ho , kabhi kabir kya dekha hai ..................
..........kyun mithya dhan par marte ho,ye bas veywaharik rekha hai.......



:rockManushay ka sabse bada janam data :rock


.....dhobi ka kuta ghar ka na ghat ka ,
jo do tuk isko dale wahi chora jat ka....
:o

jattejram
July 5th, 2009, 12:52 PM
Maala to Kar Mein Phire, Jeebh Phire Mukh Mahin !
Manua to Chahun Dish Phire, Yeh to Simran Nahin !!

amritameerut01
July 7th, 2009, 12:47 PM
कुत्ता रोया फूटकर यह कैसा जंजाल।
सेवा नमकहराम की करता नमकहलाल।।




http://www.jatland.com/forums/attachment.php?attachmentid=3546&stc=1&d=1246773717

...........kabir kabir kya karte ho , kabhi kabir kya dekha hai ..................
..........kyun mithya dhan par marte ho,ye bas veywaharik rekha hai.......



:rockmanushay ka sabse bada janam data :rock


.....dhobi ka kuta ghar ka na ghat ka ,
jo do tuk isko dale wahi chora jat ka....
:o

amritameerut01
July 7th, 2009, 12:55 PM
कर्म भाग्य दोनों बड़े , इससे बढ़कर कौन
कर्म लगन से कीजिये , भाग्य रहे ना मौन i

मानव का मन कब मिला , नित होती तकरार
धरती अम्बर मिल गए , दरिया के उस पार i

ढाई आखर प्रेम के , कहत न लागे देर
उम्र सिरानी खोज जेंहि , जगत न पायो हेर i

मै क्या जानू तू बता , तू है मेरा कौन
मेरे मन् की बात को , बोले तेरा मौन i

anilsinghd
August 14th, 2009, 05:55 PM
सुर नर मुनि जन देवता ब्रह्मा विष्णु महेश
ऊंचा महल कबीर का पार न पावे शेष !

कृष्ण करीमा एक है नाम धराया दोए
कहे कबीरा दो सुनी भ्रम पड़े मति खोये !

प्रेमी ढूँढन मैं फिरूं प्रेमी मिले न कोए
प्रेमी सो प्रेमी मिले विष से अमृत होए

प्रेम बिना धीरज नहीं विरह बिना वैराग
सतगुरु बिन जावे नहीं मन मन सा का दाग

मैं मेरी जब जायेगी तब आवेगी और
जब यह निश्चल होयेगा तब पावेगा ठोर !

प्रेम भक्ति में रची रहे मोक्ष मुक्ति फल पाए
शब्द माहि जब मिली रहे नहीं आवे नहीं जाए!

प्रेम छिपाए न छिपे जा घाट परगट होए
जो पे मुख बोले नहीं नैन देते हैं रोये !

bbagaria
August 18th, 2009, 09:35 PM
wonderfull collection, by my point of view this could be one of the best thread on JL.
well done all and keep on.

anilktomar
August 19th, 2009, 03:15 PM
aarr ye wale bhi sune kisi nai

1). Kabeera baitha ped pai .......

2). Raghukul reet sada chali aayii....

amritameerut01
August 19th, 2009, 04:31 PM
मैंने "है" को "है" कहा , नियत रख कर नेक ,
अब ये तेरा काम है , सही गलत तू देख i

anilsinghd
August 21st, 2009, 06:23 PM
Sabase Laghuta Hi Bhali
Laghuta Se Sab Hoye
Jasa Dwitiya Ka Chandrama
Shashi Lahai Sab Koye
:)


================

It is always better to be humble. Being humble is an effective
way of getting results. The Moon of the second day ( after the no
moon day) is loved by all.
===============


While surfing got a pdh on Dohas by Kabir , which contain the text and English meaning , let me know if anyone needs it. Drop me an email at anilsinghd1@gmail.com and i will revert.

Its like 127 kb and i am not able to upload , may the admins can help on this , Sitaram ji ?

sjakhars
August 21st, 2009, 06:34 PM
Sorry Anil. 100 kb is the size limit for attachments.

anilsinghd
August 21st, 2009, 06:55 PM
Sorry Anil. 100 kb is the size limit for attachments.

Then i have to copy paste it few at a time :)

anilsinghd
August 21st, 2009, 06:57 PM
|| 1 ||
Maya Taje To Kya Hua
Maan Taja Naa Jaaye
Maan Bade Munivar Gaye
Maan Saban Ko Khaye
It is very easy to give up efforts and lose weath. It is really very difficult to give up the ego. Very great and analytical people have fallen victim to ego. The ego is killing one and all.








|| 2 ||
Kade Abhimaan Na Kijiye
Kaha Kabir Samajhaye
Ja Seer Aha Jo Sanchare
Pade Chouryasi Jaaye
Don't have ego. He who has ego is restless always.








|| 3 ||
Sukha Ke Sangi Swarthi
Dukh Me Rahate Door
Kahe Kabir Parmarathi
Dukh Sukh Sada Hujoor
The fair weather friends stay away when we face the rough weather. Those who understand the truth are with us at all times.








|| 4 ||
Sabase Laghuta Hi Bhali
Laghuta Se Sab Hoye
Jasa Dwitiya Ka Chandrama
Shashi Lahai Sab Koye
It is always better to be humble. Being humble is an effective way of getting results. The Moon of the second day ( after the no moon day) is loved by all.








|| 5 ||
Chhama Badan Ko Uchit Hai
Chhotan Ko Utpat
Ka Bishno Ka Ghati Gaya
Jo Bhrug Mari Laat
Forgiveness befits the person who is great. One who is petty does something destructive. What is the loss incured by God Vishnu after receiving a blow from Maharishi Bhrugu.

anilsinghd
August 26th, 2009, 11:42 PM
Jaisa Bhojan Kijiye
Vaisa Hi Mana Hoye
Jaisa Paani Pijiye
Taisi Vani Hoye
Your mind is affected by the food that you consume. Your voice is the reflection of the drinks you have.








|| 7 ||
Kabira Te Nar Andh Hai
Jo Guru Kahate Aur
Hari Ruthe Guru Thor Hai
Guru Ruthe Nahi Thor
Kabir says that the people who do not understand Guru are blind. If God is displeased with us then Guru is there for salvation. If he is displeased there can be no salvation.








|| 8 ||
Kabira Dheeraj Ke Dhare
Haathi Man Bhar Khaaye
Tuk Tuk Bekar Me
Svan Ghare Ghar Jaaye
As the elephant has patience it eats till its mind is satisfied. But the impatient dog runs here and there in the hope of food.








|| 9 ||
Ghee Ke To Darshan Bhale
Khana Bhala Na Tel
Dana To Dushman Bhala
Murakh Ka Kya Mel
It is better if one can just have a chance of looking at the purified butter. It is not good to eat oil. It is good to have a sensible person as our enemy than to befriend a fool.

anilsinghd
August 28th, 2009, 03:18 PM
Chandan Jaisa Sadhu Hai
Sarp Hi Sab Sansar
Taake Ang Lapta Rahe
Mana Me Nahi Vikar
A good person is like a sandal tree. The world is like a snake. The snake resides on the sandal tree but the sandal tree does not become poisonous to any extent.
|| 11 ||
Vruksha Bola Paat Se
Sun Patte Meri Baat
Is Ghar Ki Yah Reet Hai
Ik Aawat Ik Jaat
A tree tells a leave that listen to the tradition of my family. It is that one comes while another goes.








|| 12 ||
Mai Meri Jab Jayegi
Tab Aayegi Aur
Jab Ye Nishchal Hoyega
Tab Pavega Thor
When ego will go then someone else will come. When the mind becomes calm then the truth is revealed.








|| 13 ||
Dhan Rahe Na Jauvan Rahe
Rahe Gaav Na Dhaam
Kahe Kabira Jas Rahe
Kar De Kisika Kaam
Niether the wealth has permanance nor the youth. What someone can have forever is his good name. This someone can achieve only after working for the wellbeing of others.








|| 14 ||
Jhute Sukha Ko Sukha Kahe
Manat Hai Mana Mouj
Jagat Chabena Kaal Ka
Kuch Mukh Me Kuch Goud
Our mind is delighted in having sensual pleasures. Let us understand that the world is being devoured by the time. Somebody is in the mouth while others are on the platter.








|| 15 ||
Maan Badai Naa Kare
Bada Na Bole Bol
Hira Mukha Se Na Kahe
Laakh Hamara Mol
Dont have ego. Dont talk big. A diamond never says that it has a great cost.








|| 16 ||
Gyani Se Kahiye Kaha
Kahat Kabir Lajaye
Andhe Aage Nachate
Kala Akarat Jaaye
When Kabir is asked to teach an intellectual then he feels shy. What is the use of showing dancing skills to one who is blind.