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View Full Version : Happy holiiiiiiiiiiiiiiii



DrRajpalSingh
March 6th, 2012, 05:55 PM
Friends,

The festival of colours--HOLI--is knocking at the doors. Holi offers an occasion to analyse our past deeds, correct them for the good of our present to work for bright perspective in future. So bury the by gone differences, if any, and join celebrations in a befitting manner to spread the MESSAGE OF LOVE FORGIVENESS AND UNITY.

Greetings

kuldeeppunia25
March 6th, 2012, 05:57 PM
http://themarkaz.com/wp-content/uploads/2012/02/happy-holi-wallpapers-35.jpg


Dear all jatlanders, Wish u and your family a very happy and colorful HOLIIIIIIIII,,,,,,

ravinderjeet
March 6th, 2012, 06:04 PM
आपको भी होली की शुभ कामनाएं |

JSRana
March 6th, 2012, 06:59 PM
14064

Happy Holi

vijaykajla1
March 6th, 2012, 11:25 PM
होली वही हो जो स्वाधीनता की आन बन जाये..
होली वही हो जो गणतंत्रता की शान बन जाये ..

भरो पिचकारीओं मैं पानी ऐसे तीन रंगों का ..
जो कपड़ो पर गिरे तो हिन्दुस्तान बन जाये !!

सभी जाटलैंड वासियों एवम उनके परिवार वालों को होली की हार्दिक शुभकामनाएँ !!!

Fateh
March 7th, 2012, 12:15 AM
होली वही हो जो स्वाधीनता की आन बन जाये..
होली वही हो जो गणतंत्रता की शान बन जाये ..

भरो पिचकारीओं मैं पानी ऐसे तीन रंगों का ..
जो कपड़ो पर गिरे तो हिन्दुस्तान बन जाये !!

सभी जाटलैंड वासियों एवम उनके परिवार वालों को होली की हार्दिक शुभकामनाएँ !!!

A very Happy Holi to all jat landers, their family members and friends

premsukhdidel
March 7th, 2012, 07:23 AM
http://greetings.webdunia.com/cards/en/holi/bi_holi_19_feb_10_112505.jpg

!!! आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनायें !!!

PAWANTHAKAN
March 7th, 2012, 08:24 AM
Yes brother this holi is very colorful but that color is blood of our jat community.if you want to see come (mayar) hisar.our jat heroes are fighting with h.p.,c.r.p. And r.a.f.for our cause(aarakshan)

DrRajpalSingh
March 7th, 2012, 08:25 AM
Today is the Holi Festival, celebrated as a symbol of victory of believer, Prahlad Bhagat, in the existence of the God over the Atheist, his aunt Holika. Celebrate it with due fun-fare and austerity.

Fateh
March 7th, 2012, 10:36 AM
Friends,

The festival of colours--HOLI--is knocking at the doors. Holi offers an occasion to analyse our past deeds, correct them for the good of our present to work for bright perspective in future. So bury the by gone differences, if any, and join celebrations in a befitting manner to spread the MESSAGE OF LOVE FORGIVENESS AND UNITY.

Greetings

I fully agree with you, A very happy Holi to all brothers, regards

kuldeeppunia25
March 7th, 2012, 10:53 AM
रंग-बिरंगी होली आई

ओअली आई, सओली आई
रंग-बिरंगी होली आई

कोय मारै रंग, कोय मारै गुब्बारा
कोय मारै गोबर, कोय मारै गॉरा

मेरे भी खेलण की उठी खुमारी
मैं भी ठा लाया एक पुरानी पिचकारी

आच्छा-सा घोल त्यार करया
पिचकारी मैं रंग भरया

दूर तैं चॉली आवै एक छोरी
लागै थी सुथरी शक्ल की गोरी

लहरावैं थे लाम्बे बॉल
गज़ब की थीं उसकी चाल

मन्नै पिचकारी दबाई
पर रंग की फुहार ना आई

मैं बोल्या, पिचकारी, तेरे के सै बीमारी
चालती क्यूँ ना, रंग डालती क्यूँ ना

पिचकारी बोली-कोन्या चालूँ
तरे घी-सा कोन्या घालूँ

मैं बोल्या, चॉल पड़, क्यूं होली का मौका ख़ोरी
फागण मैं ऐकली कित पावैगी इसी गोरी

पिचकारी बोली, तूँ निपट सै कोरा
ध्यान तै देख, छोरी कोन्या, यू सै छोरा

किसी चॉल्ली फ़ैशन की बीमारी
साच कह री सै तूं पिचकारी

मन्नै सांस सब्र का घाल्या
पिचकारी नैं ले कै आगै चाल्या

फेर देख्या एक जोड़ा चाल्या आवै
चूपचाप थे दोनूँ, ना आपस में बतलावै

मै बोल्या, इनके मारूँ, होली का खुमर तारूँ

पिचकारी बोली, रहण दे
इन दोनुआ नै जाण दे

मैं बोल्या, क्यूं, के फांसी आगी
पिचकारी नै हांसी आगी

न्यू बोली, इन्न पैं तू के रंग चढ़ावैगा
इनकी करणी सुण के दुखी हो जावैगा

ये आये सैं भविष्य के रंग मिटा कै,
रामू डॉक्टर धोरै दोनूँ जाकै

छोरा-छोरी का पता लगा कै
अजन्मी कन्या नै कोख़ तैं हटा है

ना सोची इनैं कुछ भी समाज़ की
किसी पीढ़ी से या आज की

कित तैं आवैंगी बहू, जै जन्मैंगी ना छोरी
बिना रंगा के रहैगी होली, फागण की या मस्ती कोरी

मैं बोल्या, पिचकारी, तू के घर घॉलैगी
बता तो दे, तू किते चालैगी, के ना चॉलैगी

पिचकारी बोली, मैं चालूँगी,
रंगा तैं घर भर डालूँगी

जिस दिन हर तरफ़ हो ज्यागी ईमानदारी
बेटा अर बेटी सबनैं लागैंगी एक-सी प्यारी

छोटे बड़े का मान होगा, ना होगी किते तब लाचारी
खुशियाँ के रंग बरसावैगी, म्हारे संस्काराँ की पिचकारी

copy frm FB/Jagbir rathi

anuragsunda
March 7th, 2012, 10:57 AM
"Happy Holi"

Play with Gullal-joy-happiness

---------------Save Water!!!!!!!!!!!!!!!!!

ravinderjeet
March 7th, 2012, 11:56 AM
Today is the Holi Festival, celebrated as a symbol of victory of believer, Prahlad Bhagat, in the existence of the God over the Atheist, his aunt Holika. Celebrate it with due fun-fare and austerity.

होली या होला , भुने हुए अनाज को कहते हैं | खासकर किसान जातियां इस त्यौहार को ज्यादा मनाती थी | जब उनकी फसल भूनने के लायक ,यानी होले के लायक हो जाती थी | वास्तव में फसल के पकने की ख़ुशी में ये पर्व मनाया जाता हे | प्रहलाद और होलिका की मनघडंत कहानी ब्राहमण पोंगा-पंथीओं ने इस पर्व के साथ जोड़ दी हे जो की सरासर गलत हे | इस्सी तरह बाकी के भी लगभग सभी त्योहारों के साथ इन्होने पोराणिक काल्पनिक कहानिओं को जोड़ दिया हे और लोगों को भर्मित कर रखा हे ------- सद- भावनाओं सहित |

DrRajpalSingh
March 7th, 2012, 03:37 PM
होली या होला , भुने हुए अनाज को कहते हैं | खासकर किसान जातियां इस त्यौहार को ज्यादा मनाती थी | जब उनकी फसल भूनने के लायक ,यानी होले के लायक हो जाती थी | वास्तव में फसल के पकने की ख़ुशी में ये पर्व मनाया जाता हे | प्रहलाद और होलिका की मनघडंत कहानी ब्राहमण पोंगा-पंथीओं ने इस पर्व के साथ जोड़ दी हे जो की सरासर गलत हे | इस्सी तरह बाकी के भी लगभग सभी त्योहारों के साथ इन्होने पोराणिक काल्पनिक कहानिओं को जोड़ दिया हे और लोगों को भर्मित कर रखा हे ------- सद- भावनाओं सहित |

Thanks for enlightening us.

Really several Indian festivals are connected with seasons, crops and change of weathers.

Regards

ravinderpannu
March 7th, 2012, 03:41 PM
HAppy Holi to all...!!

Sure
March 7th, 2012, 04:41 PM
रंग-बिरंगी होली आई

ओअली आई, सओली आई
रंग-बिरंगी होली आई

कोय मारै रंग, कोय मारै गुब्बारा
कोय मारै गोबर, कोय मारै गॉरा

मेरे भी खेलण की उठी खुमारी
मैं भी ठा लाया एक पुरानी पिचकारी

आच्छा-सा घोल त्यार करया
पिचकारी मैं रंग भरया

दूर तैं चॉली आवै एक छोरी
लागै थी सुथरी शक्ल की गोरी

लहरावैं थे लाम्बे बॉल
गज़ब की थीं उसकी चाल

मन्नै पिचकारी दबाई
पर रंग की फुहार ना आई

मैं बोल्या, पिचकारी, तेरे के सै बीमारी
चालती क्यूँ ना, रंग डालती क्यूँ ना

पिचकारी बोली-कोन्या चालूँ
तरे घी-सा कोन्या घालूँ

मैं बोल्या, चॉल पड़, क्यूं होली का मौका ख़ोरी
फागण मैं ऐकली कित पावैगी इसी गोरी

पिचकारी बोली, तूँ निपट सै कोरा
ध्यान तै देख, छोरी कोन्या, यू सै छोरा

किसी चॉल्ली फ़ैशन की बीमारी
साच कह री सै तूं पिचकारी

मन्नै सांस सब्र का घाल्या
पिचकारी नैं ले कै आगै चाल्या

फेर देख्या एक जोड़ा चाल्या आवै
चूपचाप थे दोनूँ, ना आपस में बतलावै

मै बोल्या, इनके मारूँ, होली का खुमर तारूँ

पिचकारी बोली, रहण दे
इन दोनुआ नै जाण दे

मैं बोल्या, क्यूं, के फांसी आगी
पिचकारी नै हांसी आगी

न्यू बोली, इन्न पैं तू के रंग चढ़ावैगा
इनकी करणी सुण के दुखी हो जावैगा

ये आये सैं भविष्य के रंग मिटा कै,
रामू डॉक्टर धोरै दोनूँ जाकै

छोरा-छोरी का पता लगा कै
अजन्मी कन्या नै कोख़ तैं हटा है

ना सोची इनैं कुछ भी समाज़ की
किसी पीढ़ी से या आज की

कित तैं आवैंगी बहू, जै जन्मैंगी ना छोरी
बिना रंगा के रहैगी होली, फागण की या मस्ती कोरी

मैं बोल्या, पिचकारी, तू के घर घॉलैगी
बता तो दे, तू किते चालैगी, के ना चॉलैगी

पिचकारी बोली, मैं चालूँगी,
रंगा तैं घर भर डालूँगी

जिस दिन हर तरफ़ हो ज्यागी ईमानदारी
बेटा अर बेटी सबनैं लागैंगी एक-सी प्यारी

छोटे बड़े का मान होगा, ना होगी किते तब लाचारी
खुशियाँ के रंग बरसावैगी, म्हारे संस्काराँ की पिचकारी

copy frm FB/Jagbir rathi


Bahut Badhiya kuldeep, keep it up.

Holi ki bahut bahut subhkamnaye to all Jat Landers.

Arvindc
March 7th, 2012, 06:59 PM
होली या होला , भुने हुए अनाज को कहते हैं | खासकर किसान जातियां इस त्यौहार को ज्यादा मनाती थी | जब उनकी फसल भूनने के लायक ,यानी होले के लायक हो जाती थी | वास्तव में फसल के पकने की ख़ुशी में ये पर्व मनाया जाता हे | प्रहलाद और होलिका की मनघडंत कहानी ब्राहमण पोंगा-पंथीओं ने इस पर्व के साथ जोड़ दी हे जो की सरासर गलत हे | इस्सी तरह बाकी के भी लगभग सभी त्योहारों के साथ इन्होने पोराणिक काल्पनिक कहानिओं को जोड़ दिया हे और लोगों को भर्मित कर रखा हे ------- सद- भावनाओं सहित |
हो ये भी सकता है की होळी (होलिकादहन) मैं भुने हुवे अनाज को होला कहते होँ|
इतिहास होली भारत का अत्यंत प्राचीन पर्व है जो होली, होलिका या होलाका[4] (http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A5%80#cite_note-3) नाम से मनाया जाता था। वसंत की ऋतु में हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने के कारण इसे वसंतोत्सव (http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8B%E0%A 4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%B5) और काम-महोत्सव भी कहा गया है।

http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/f/f6/Holi2.jpg/280px-Holi2.jpg (http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Holi 2.jpg) http://bits.wikimedia.org/skins-1.18/common/images/magnify-clip.png (http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0:Holi 2.jpg)
राधा-श्याम गोप और गोपियो की होली


इतिहासकारों का मानना है कि आर्यों में भी इस पर्व का प्रचलन था लेकिन अधिकतर यह पूर्वी भारत में ही मनाया जाता था। इस पर्व का वर्णन अनेक पुरातन धार्मिक पुस्तकों में मिलता है। इनमें प्रमुख हैं, जैमिनी के पूर्व मीमांसा-सूत्र और कथा गार्ह्य-सूत्र। नारद पुराण (http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A6_%E0%A4%AA%E0% A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A3) औऱ भविष्य पुराण (http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AD%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A 4%AF_%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A3 ) जैसे पुराणों की प्राचीन हस्तलिपियों और ग्रंथों में भी इस पर्व का उल्लेख मिलता है। विंध्य क्षेत्र (http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A 4%AF_%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A5%87%E0%A4%A4 %E0%A5%8D%E0%A4%B0) के रामगढ़ (http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%97%E0%A4%A2%E0%A 4%BC) स्थान पर स्थित ईसा से ३०० वर्ष पुराने एक अभिलेख में भी इसका उल्लेख किया गया है। संस्कृत साहित्य में वसन्त ऋतु और वसन्तोत्सव अनेक कवियों के प्रिय विषय रहे हैं।
सुप्रसिद्ध मुस्लिम पर्यटक अलबरूनी (http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%85%E0%A4%B2%E0%A4%AC%E0%A4%B0%E0%A5%82%E0%A 4%A8%E0%A5%80) ने भी अपने ऐतिहासिक यात्रा संस्मरण में होलिकोत्सव का वर्णन किया है। भारत के अनेक मुस्लिम कवियों ने अपनी रचनाओं में इस बात का उल्लेख किया है कि होलिकोत्सव केवल हिंदू ही नहीं मुसलमान भी मनाते हैं। सबसे प्रामाणिक इतिहास की तस्वीरें हैं मुगल काल (http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%97%E0%A4%BC%E0%A4%B2) की और इस काल में होली के किस्से उत्सुकता जगाने वाले हैं। अकबर (http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%85%E0%A4%95%E0%A4%AC%E0%A4%B0) का जोधाबाई (http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%9C%E0%A5%8B%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A 4%BE%E0%A4%88) के साथ तथा जहाँगीर (http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%9C%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%97%E0%A 5%80%E0%A4%B0) का नूरजहाँ (http://hi.wikipedia.org/w/index.php?title=%E0%A4%A8%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A4% 9C%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%81&action=edit&redlink=1) के साथ होली खेलने का वर्णन मिलता है। अलवर संग्रहालय के एक चित्र में जहाँगीर को होली खेलते हुए दिखाया गया है।[5] (http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A5%80#cite_note-4) शाहजहाँ (http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%9C%E0%A4%B9%E0%A 4%BE%E0%A4%81) के समय तक होली खेलने का मुग़लिया अंदाज़ ही बदल गया था। इतिहास में वर्णन है कि शाहजहाँ के ज़माने में होली को ईद-ए-गुलाबी या आब-ए-पाशी (रंगों की बौछार) कहा जाता था।[6] (http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A5%80#cite_note-hindu-5) अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र (http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AC%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A 4%B0_%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%B9_%E0%A4%9C%E0%A4%B C%E0%A4%AB%E0%A4%BC%E0%A4%B0) के बारे में प्रसिद्ध है कि होली पर उनके मंत्री उन्हें रंग लगाने जाया करते थे।[7] (http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A5%80#cite_note-krishnaradha-6) मध्ययुगीन हिन्दी साहित्य में दर्शित कृष्ण की लीलाओं में भी होली का विस्तृत वर्णन मिलता है।
इसके अतिरिक्त प्राचीन चित्रों, भित्तिचित्रों और मंदिरों की दीवारों पर इस उत्सव के चित्र मिलते हैं। विजयनगर (http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%9C%E0%A4%AF%E0%A4%A8%E0%A 4%97%E0%A4%B0) की राजधानी हंपी (http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B9%E0%A4%82%E0%A4%AA%E0%A5%80) के १६वी शताब्दी के एक चित्रफलक पर होली का आनंददायक चित्र उकेरा गया है। इस चित्र में राजकुमारों और राजकुमारियों को दासियों सहित रंग और पिचकारी के साथ राज दम्पत्ति को होली के रंग में रंगते हुए दिखाया गया है। १६वी शताब्दी की अहमदनगर (http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%85%E0%A4%B9%E0%A4%AE%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A 4%97%E0%A4%B0) की एक चित्र आकृति का विषय वसंत रागिनी ही है। इस चित्र में राजपरिवार के एक दंपत्ति को बगीचे में झूला झूलते हुए दिखाया गया है। साथ में अनेक सेविकाएँ नृत्य-गीत व रंग खेलने में व्यस्त हैं। वे एक दूसरे पर पिचकारियों से रंग डाल रहे हैं। मध्यकालीन भारतीय मंदिरों के भित्तिचित्रों और आकृतियों में होली के सजीव चित्र देखे जा सकते हैं। उदाहरण के लिए इसमें १७वी शताब्दी की मेवाड़ (http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A1%E0%A 4%BC) की एक कलाकृति में महाराणा को अपने दरबारियों के साथ चित्रित किया गया है। शासक कुछ लोगों को उपहार दे रहे हैं, नृत्यांगना नृत्य कर रही हैं और इस सबके मध्य रंग का एक कुंड रखा हुआ है। बूंदी (http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AC%E0%A5%82%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%80_%E0% A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%BE) से प्राप्त एक लघुचित्र में राजा को हाथीदाँत के सिंहासन पर बैठा दिखाया गया है जिसके गालों पर महिलाएँ गुलाल मल रही हैं।[8] (http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A5%80#cite_note-history-7)


सोजन्य: विकिपीडिया (http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A5%80)

DrRajpalSingh
March 7th, 2012, 09:18 PM
हो ये भी सकता है की होळी (होलिकादहन) मैं भुने हुवे अनाज को होला कहते होँ|
इतिहास

होली भारत का अत्यंत प्राचीन पर्व है जो होली, होलिका या होलाका[4] (http://hi.wikipedia.org/wiki/होली#cite_note-3) नाम से मनाया जाता था। वसंत की ऋतु में हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने के कारण इसे वसंतोत्सव (http://hi.wikipedia.org/wiki/वसंतोत्सव) और काम-महोत्सव भी कहा गया है।

http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/f/f6/Holi2.jpg/280px-Holi2.jpg (http://hi.wikipedia.org/wiki/चित्र:Holi2.jpg) http://bits.wikimedia.org/skins-1.18/common/images/magnify-clip.png (http://hi.wikipedia.org/wiki/चित्र:Holi2.jpg)
राधा-श्याम गोप और गोपियो की होली


इतिहासकारों का मानना है कि आर्यों में भी इस पर्व का प्रचलन था लेकिन अधिकतर यह पूर्वी भारत में ही मनाया जाता था। इस पर्व का वर्णन अनेक पुरातन धार्मिक पुस्तकों में मिलता है। इनमें प्रमुख हैं, जैमिनी के पूर्व मीमांसा-सूत्र और कथा गार्ह्य-सूत्र। नारद पुराण (http://hi.wikipedia.org/wiki/नारद_पुराण) औऱ भविष्य पुराण (http://hi.wikipedia.org/wiki/भविष्य_पुराण) जैसे पुराणों की प्राचीन हस्तलिपियों और ग्रंथों में भी इस पर्व का उल्लेख मिलता है। विंध्य क्षेत्र (http://hi.wikipedia.org/wiki/विंध्य_क्षेत्र) के रामगढ़ (http://hi.wikipedia.org/wiki/रामगढ़) स्थान पर स्थित ईसा से ३०० वर्ष पुराने एक अभिलेख में भी इसका उल्लेख किया गया है। संस्कृत साहित्य में वसन्त ऋतु और वसन्तोत्सव अनेक कवियों के प्रिय विषय रहे हैं।
सुप्रसिद्ध मुस्लिम पर्यटक अलबरूनी (http://hi.wikipedia.org/wiki/अलबरूनी) ने भी अपने ऐतिहासिक यात्रा संस्मरण में होलिकोत्सव का वर्णन किया है। भारत के अनेक मुस्लिम कवियों ने अपनी रचनाओं में इस बात का उल्लेख किया है कि होलिकोत्सव केवल हिंदू ही नहीं मुसलमान भी मनाते हैं। सबसे प्रामाणिक इतिहास की तस्वीरें हैं मुगल काल (http://hi.wikipedia.org/wiki/मुग़ल) की और इस काल में होली के किस्से उत्सुकता जगाने वाले हैं। अकबर (http://hi.wikipedia.org/wiki/अकबर) का जोधाबाई (http://hi.wikipedia.org/wiki/जोधाबाई) के साथ तथा जहाँगीर (http://hi.wikipedia.org/wiki/जहाँगीर) का नूरजहाँ (http://hi.wikipedia.org/w/index.php?title=नूरजहाँ&action=edit&redlink=1) के साथ होली खेलने का वर्णन मिलता है। अलवर संग्रहालय के एक चित्र में जहाँगीर को होली खेलते हुए दिखाया गया है।[5] (http://hi.wikipedia.org/wiki/होली#cite_note-4) शाहजहाँ (http://hi.wikipedia.org/wiki/शाहजहाँ) के समय तक होली खेलने का मुग़लिया अंदाज़ ही बदल गया था। इतिहास में वर्णन है कि शाहजहाँ के ज़माने में होली को ईद-ए-गुलाबी या आब-ए-पाशी (रंगों की बौछार) कहा जाता था।[6] (http://hi.wikipedia.org/wiki/होली#cite_note-hindu-5) अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र (http://hi.wikipedia.org/wiki/बहादुर_शाह_ज़फ़र) के बारे में प्रसिद्ध है कि होली पर उनके मंत्री उन्हें रंग लगाने जाया करते थे।[7] (http://hi.wikipedia.org/wiki/होली#cite_note-krishnaradha-6) मध्ययुगीन हिन्दी साहित्य में दर्शित कृष्ण की लीलाओं में भी होली का विस्तृत वर्णन मिलता है।
इसके अतिरिक्त प्राचीन चित्रों, भित्तिचित्रों और मंदिरों की दीवारों पर इस उत्सव के चित्र मिलते हैं। विजयनगर (http://hi.wikipedia.org/wiki/विजयनगर) की राजधानी हंपी (http://hi.wikipedia.org/wiki/हंपी) के १६वी शताब्दी के एक चित्रफलक पर होली का आनंददायक चित्र उकेरा गया है। इस चित्र में राजकुमारों और राजकुमारियों को दासियों सहित रंग और पिचकारी के साथ राज दम्पत्ति को होली के रंग में रंगते हुए दिखाया गया है। १६वी शताब्दी की अहमदनगर (http://hi.wikipedia.org/wiki/अहमदनगर) की एक चित्र आकृति का विषय वसंत रागिनी ही है। इस चित्र में राजपरिवार के एक दंपत्ति को बगीचे में झूला झूलते हुए दिखाया गया है। साथ में अनेक सेविकाएँ नृत्य-गीत व रंग खेलने में व्यस्त हैं। वे एक दूसरे पर पिचकारियों से रंग डाल रहे हैं। मध्यकालीन भारतीय मंदिरों के भित्तिचित्रों और आकृतियों में होली के सजीव चित्र देखे जा सकते हैं। उदाहरण के लिए इसमें १७वी शताब्दी की मेवाड़ (http://hi.wikipedia.org/wiki/मेवाड़) की एक कलाकृति में महाराणा को अपने दरबारियों के साथ चित्रित किया गया है। शासक कुछ लोगों को उपहार दे रहे हैं, नृत्यांगना नृत्य कर रही हैं और इस सबके मध्य रंग का एक कुंड रखा हुआ है। बूंदी (http://hi.wikipedia.org/wiki/बूंदी_जिला) से प्राप्त एक लघुचित्र में राजा को हाथीदाँत के सिंहासन पर बैठा दिखाया गया है जिसके गालों पर महिलाएँ गुलाल मल रही हैं।[8] (http://hi.wikipedia.org/wiki/होली#cite_note-history-7)
सोजन्य: विकिपीडिया (http://hi.wikipedia.org/wiki/होली)

Congratulation for beautiful presentation.