Madhya Kalin Rajasthan men Jat Janpad

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Author of this article is Laxman Burdak लक्ष्मण बुरड़क

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मध्यकालीन राजस्थान में जाट जनपद

प्रसिद्ध अंग्रेज इतिहासविद जेम्स टॉड राजस्थान की उत्सर्गमयी वीर भूमि के अतीत से बड़े अभिभूत होते हुए कहते हैं, "राजस्थान की भूमि में ऐसा कोई फूल नहीं उगा जो राष्ट्रीय वीरता और त्याग की सुगन्ध से भरकर न झूमा हो। वायु का एक भी झोंका ऐसा नहीं उठा जिसकी झंझा के साथ युद्ध देवी के चरणों में साहसी युवकों का प्रथान न हुआ हो।[1]

राजस्थान : एक परिचय

राजस्थान भारत वर्ष के पश्चिम भाग में अवस्थित है जो प्राचीन काल से विख्यात रहा है। तब इस प्रदेश में कई इकाईयाँ सम्मिलित थी जो अलग-अलग नाम से सम्बोधित की जाती थी। उदाहरण के लिए जयपुर राज्य का उत्तरी भाग मध्यदेश का हिस्सा था तो दक्षिणी भाग सपालदक्ष कहलाता था। अलवर राज्य का उत्तरी भाग कुरुदेश का हिस्सा था तो भरतपुर, धोलपुर, करौली राज्य शूरसेन देश में सम्मिलित थे। मेवाड़ जहाँ शिवि जनपद का हिस्सा था वहाँ डूंगरपुर-बांसवाड़ा वार्गट (वागड़) के नाम से जाने जाते थे। इसी प्रकार जैसलमेर राज्य के अधिकांश भाग वल्लदेश में सम्मिलित थे तो जोधपुर मरुदेश के नाम से जाना जाता था। बीकानेर राज्य तथा जोधपुर का उत्तरी भाग जांगल देश कहलाता था तो दक्षिणी बाग गुर्जरत्रा (गुजरात) के नाम से पुकारा जाता था। इसी प्रकार प्रतापगढ़, झालावाड़ तथा टोंक का अधिकांस भाग मालवादेश के अधीन था। [2] हर्ष शिलालेख से यह भी ज्ञात होता है कि तंत्रपाल नामक प्रतिहारों का दूत जब चौहान नरेश वाक्पति से मिलने आया तो वह अनंतगोचार आया. इतिहासकार अनंतगोचार को हर्ष के आस-पास का क्षेत्र मानते हैं.(रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.37 -38) वर्त्तमान शेखावाटी के क्षेत्र को अनंतगोचार कह सकते हैं.

इतिहासकार रतन लाल मिश्र मानते हैं कि राजस्थान में राजपूतकुलों के शासन के पूर्व इस क्षेत्र में जाट जाति उपस्थित थी जिसका शासन गणराज्य की पंचायत पद्धति पर चलता था. [3] ठाकुर देशराज ने जाट इतिहास में अनेक जाट गणराज्यों का वर्णन किया है. [4] डॉ पेमा राम ने 'राजस्थान के जाटों का इतिहास' पुस्तक में राजस्थान के जाटों के गणराज्य एवं उनका पतन तथा जाट जनपदों की प्रशासनिक व्यवस्था पर विस्तार से प्रकाश डाला है. [5]

बाद में जब राजपूतों ने इस राज्य के विविध भागों पर अपना आधिपत्य जमा लिया तो उन भागों का नामकरण अपने-अपने वंश अथवा स्थान के अनुरुप कर दिया। ये राज्य उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़, प्रतापगढ़, जोधपुर, बीकानेर, किशनगढ़, सिरोही, कोटा, बूंदी, जयपुर, अलवर, करौली, झालावाड़, और थे। भरतपुर, धोलपुरमें जाटों का राज्य रहा तथा टोंक में मुस्लिम राज्य था.[6] [7]

इन राज्यों के नामों के साथ-साथ इनके कुछ भू-भागों को स्थानीय एवं भौगोलिक विशेषताओं के परिचायक नामों से भी पुकारा जाता है। ढ़ूंढ़ नदी के निकटवर्ती भू-भाग को ढ़ूंढ़ाड़ (जयपुर) कहते हैं। मेव तथा मेद जातियों के नाम से अलवर को मेवात तथा उदयपुर को मेवाड़ कहा जाता है। मरु भाग के अन्तर्गत रेगिस्तानी भाग को मारवाड़ भी कहते हैं। डूंगरपुर तथा उदयपुर के दक्षिणी भाग में प्राचीन ५६ गांवों के समूह को ""छप्पन नाम से जानते हैं। माही नदी के तटीय भू-भाग को कोयल तथा अजमेर के पास वाले कुछ पठारी भाग को ऊपरमाल की संज्ञा दी गई है। [8] [9]

राजस्थान को आजादी से पहले राजपूताना नाम से पुकारा जाता था जो यह भ्रम उत्पन्न करता था कि यह राजपूत बहुल प्रदेश है. हकीकत में ऐसा नहीं है. राजपूताना नाम की बुनियाद अकबर के समय में उनके अच्छे संबंद होने के कारण पड़ी परन्तु प्रचार नहीं हुआ. राजपूताना नाम का प्रचार कर्नल टाड की 'राजस्थान' के लिखे जाने के पश्चात अंग्रेज सरकार के काल में हुआ. [10] अंग्रेजों के शासनकाल में राजस्थान के विभिन्न इकाइयों का एकीकरण कर इसका राजपूताना नाम दिया गया, कारण कि उपर्युक्त वर्णित अधिकांश राज्यं में राजपूतों का शासन था। ऐसा भी कहा जाता है कि सबसे पहले राजपूताना नाम का प्रयोग जार्ज टामस ने किया। राजपूताना के बाद इस राज्य को राजस्थान नाम दिया गया। प्रसिद्ध इतिहास लेखक कर्नल टॉड ने इस राज्य का नाम "रायस्थान' रखा क्योंकि स्थानीय साहित्य एवं बोलचाल में राजाओं के निवास के प्रान्त को रायथान कहते थे। इसा का संस्कृत रुप राजस्थान बना। हर्ष कालीन प्रान्तपति, जो इस भाग की इकाई का शासन करते थे, राजस्थानीय कहलाते थे। सातवीं शताब्दी से जब इस प्रान्त के भाग राजपूत नरेशों के आधीन होते गये तो उन्होंने पूर्व प्रचलित अधिकारियों के पद के अनुरुप इस भाग को राजस्थान की संज्ञा दी जिसे स्थानीय साहित्य में रायस्थान कहते थे। जब भारत स्वतंत्र हुआ तथा कई राज्यों के नाम पुन: परिनिष्ठित किये गये तो इस राज्य का भी चिर प्रतिष्ठित नाम राजस्थान स्वीकार कर लिया गया। [11]


राजस्थान में जाटों की संख्या प्रायः सभी जातियों से अधिक है. जो कि कुल आबादी का 9.28 % है. सन् 1931 की जनगणना रिपोर्ट के अनुसार 1042152 जनसंख्या जाटों की थी. किसी-किसी रियासत में उनकी आबादी कुल आबादी का 23 प्रति शत तक थी. राजपूतों की आबादी उस समय राजस्थान में केवल 633830 थी. जो कुल आबादी का 5.65 % थी. राजस्थान में जाट राजपूतों की दुगुनी संख्या में थे और उनसे पहले से वहां बसे हुए थे.[12]

जांगल देश में प्रमुख जाट जनपद

वर्तमान बीकानेर तथा जोधपुर संभाग का उत्तरी भाग प्राचीन काल से जांगल देश कहलाता था । इसके अंतर्गरत वर्तमान बीकानेर, चुरू, हनुमानगढ़ और गंगानगर जिले आते हैं. भूतपूर्व बीकानेर राज्य की स्थापना से पहले इस भूभाग में जाटों के सात गणराज्य थे. दयालदास के अनुसार विक्रम की 16 वीं शताब्दी पूर्वार्ध में इन जनपदों (राज्य) की स्थिति इस प्रकार अंगरेजी के समान सन्दर्भ अंक शब्द के अंत में कुछ ऊपर थी. [13] [14]

अनुक्रमांक नाम जनपद नाममुखिया गाँवों की संख्या राजधानी
1. पूनिया कान्हा 360 बड़ी लून्दी (लूद्दी)
2. बेणीवाल रायसल 360 रायसलाणा
3. सोहुवा अमरा 84 धाणसिया
4. सिहाग चोखा 140 सूई
5. सारण पूला 360 भाड़ंग
6. गोदारा पाण्डू 360 शेखसर
7. कसवां कंवरपाल 360 सीधमुख

गाँवों की कुल संख्या 2024

इस तरह दयालदास के अनुसार उस समय जाटों के अधीन गाँवों की संख्या 2040 थी. जबकि कर्नल टाड ने जोहियों को भी जाट मानते हुए जाट राज्यों के गाँवों की संख्या 2200 बताई है जो इस प्रकार है[15]-

अनुक्रमांक नाम जनपद नाममुखिया गाँवों की संख्या राजधानी
1. पूनिया कान्हा 300 बड़ी लून्दी (लूद्दी)
2. बेणीवाल रायसल 150 रायसलाणा
3. जोहिया शेरसिंह 600 भुरूपाल[16]
4. सिहाग चोखा 150 सूई
5. सारण पूला 300 भाड़ंग
6. गोदारा पाण्डू 700 शेखसर

गाँवों की कुल संख्या 2200[17]


इनसे अलग ठाकुर देशराज ने जाटों के अधीन गाँवों की कुल संख्या 2660 बताई है. [18] डॉ कर्णी सिंह लिखते हैं कि बीका राठोड से पहले राजस्थान के इस प्रदेश पर जाटों के सात गोत्रों के शक्तिसाली गणराज्य थे. इनका विवरण निम्नानुसार है -[19]

अनुक्रमांक नाम जनपद नाममुखिया गाँवों की संख्या राजधानी अधिकार में प्रमुख कस्बे
1. पूनिया कान्हा 300 बड़ी लून्दी (लूद्दी) भादरा , अजीतपुरा, सीधमुख , राजगढ़ , ददरेवा , सांखू
2. बेणीवाल रायसल 150 रायसलाणा भूकरका, सोनरी, मनोहरपुर , कूई , बाय
3. जोहिया शेरसिंह 600 भुरूपाल[20] जैतपुर , कुमाना, महाजन , पीपासर, उदासर
4. सिहाग चोखा 150 सूई/पल्लू[21] रावतसर , बिरमसर , दांदूसर, गण्डेली, देवासर ,मोटेर
5. सारण पूला 360 भाड़ंग खेजड़ा, फोग , बुचावास , सूई , बदनु , सिरसला
6. गोदारा पाण्डू 700 शेखसर/लाघड़िया शेखसर, पुण्डरासर , गुसांईसर बड़ा , घड़सीसर , गरीबदेसर , रुनगेसर , कलू
7. कसवां कंवरपाल 400 सीधमुख चुरू, खासोली, खारिया, सरसला, पीथुवीसींसर, आसलखेड़ी, रिड़खला, बूंटिया, रामसरा, थालोड़ी, ढाढर, भामासी, बीनासर, बालरासर, भैंरुसर, ढाढरिया, धान्धू, आसलू, लाखाऊ, दूधवा, जसरासर, लाघड़िया, चलकोई

गाँवों की कुल संख्या 2660

जाटों की इन शाखाओं के अलावा ठाकुर देशराज ने जाटों की कुछ अन्य शाखाओं और उनके राज्यों का उल्लेख किया है जिसमें सुहाग, भादू, भूकर, चाहर, जाखड़ और नैन मुख्य हैं [22] [23]इस तरह इतिहासकारों द्वारा दी गयी संख्या में पर्याप्त अन्तर है. मुंशी सोहन लाल ने भूतपूर्व बीकानेर रियासत का कुल एरिया 23500 वर्गमील और गाँवों की संख्या 1739 दी है. [24]जबकि जाटों का अधिकार पूर्व बीकानेर रियासत के एक हिस्से पर ही था. ऐसा लगता है की इन प्रमुख जाट पट्टियों में जाटों की दूसरी शाखाओं व अन्य जातियों के गाँव भी मिले हुए थे. कभी-कभी एक शाखा के गाँव एक स्थान पर न होकर अलग-अलग भी होते थे. जैसे सीधमुख तहसील राजगढ़ में कसवां जाटों का आधिपत्य था और चुरू तथा चुरू तहसील के अनेक गाँवों पर भी उनका अधिकार था, किंतु इन दोनों स्थानों के बीच लूद्दी में पूनिया जाटों का तथा ददरेवा में चौहान राजपूतों के ठिकाने थे. इस तरह एक गाँव के विभिन्न भागों को विभिन्न जाट शाखाओं में जोड़ने से व अलग-अलग गिनने से जाट राज्यों के अधीन इन गाँवों की संख्या आई होगी.[25] [26]


लाघडिया व शेखसर के गोदारा

शेखसरलाघड़िया दोनों ही गोदारों की राजधानियाँ थी. शेखसर चुरू से लगभग 58 मील उत्तर-पश्चिम में है जबकि लाघड़िया डूंगरगढ़ तहसील में है. इनके अधीन 360 से 700 गाँवों का होना लिखा है. अतः जाट राज्यों में गोदारों की शक्ति सबसे अधिक थी. वैसे इन जाटों में फूट और प्रतिस्पर्धा रहती थी. राठोड़ बीका ने जब इस इलाके की और राज्य स्थापित करने की दृष्टी से प्रयाण किया तो उस समय लाघड़िया का शासक पांडू गोदारा था जिसके दान देने की चर्चा चारों और फ़ैली हुई थी. [27][28]

भाड़ंग के सारण

सारण जनपद - वर्तमान सरदारशहर का सम्पूर्ण क्षेत्र क्षेत्र तथा रिणी (तारानगर) का इलाका सारण जनपद का भाग था. इसे सारणौटी कहा जाता था तथा भाडंग इसकी राजधानी थी. सारण जनपद में कोहिना, मेहरी, व आधि बिल्यू 2 -1 /2 खेड़े महिया जाटों द्वारा आबाद थे.

भाड़ंग चुरू जिले की तारानगर तहसील में चुरू से लगभग 40 मील उत्तर में बसा था. पृथ्वीराज चौहान के बाद अर्थार्त चौहान शक्ति के पतन के बाद भाड़ंग पर किसी समय जाटों का आधिपत्य स्थापित हो गया था. जो 16 वीं शताब्दी में राठोडों के इस भू-भाग में आने तक बना रहा. पहले यहाँ सोहुआ जाटों का अधिकार था और बाद में सारण जाटों ने छीन लिया. जब 16 वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में राठोड इस एरिया में आए, उस समय पूला सारण यहाँ का शासक था और उसके अधीन 360 गाँव थे. इसी ने अपने नाम पर पूलासर (तहसील सरदारशहर) बसाया था जिसे बाद में सारण जाटों के पुरोहित पारीक ब्राह्मणों को दे दिया गया. पूला की पत्नी का नाम मलकी था, जिसको लेकर बाद में गोदारा व सारणों के बीच युद्ध हुआ. [29] मलकी के नाम पर ही बीकानेर जिले की लूणकरणसर तहसील में मलकीसर गाँव बसाया गया था.[30] सारणों में जबरा और जोखा बड़े बहादुर थे. उनकी कई सौ घोड़ों पर जीन पड़ती थी. उन्हीं के नाम पर जबरासर और जोखासर गाँव अब भी आबाद हैं, मन्धरापुरा में मित्रता के बहाने राठोडों द्वारा उन्हें बुलाकर भोज दिया गया और उस स्थान पर बैठाने गए जहाँ पर जमीन में पहले से बारूद दबा रखी थी. उनके बैठ जाने पर बारूद आग लगवा कर उन्हें उड़ा दिया गया.[31][32]

धाणसिया के सोहुआ

धाणसिया हनुमानगढ़ जिला, राजस्थान में, चुरू से लगभग 45 मील उत्तर-पश्चिम में स्थित था. इस पर सोहुआ जाटों का अधिकार था. दयालदास की ख्यात के अनुसार इनका 84 गाँवों पर अधिकार था और राठोडों के आगमन के समय इनका मुखिया सोहुआ अमरा था. कहा जाता है की पहले भाड़ंग पर सोहुआ जाटों का अधिकार था. किंवदन्ती है कि सोहुआ जाटों की एक लड़की सारणों को ब्याही थी. उसके पति के मरने के बाद वह अपने एकमात्र पुत्र को लेकर अपने पीहर भाडंग आ गयी और वहीं रहने लगी. भाड़ंग के सोहुआ जाट उस समय गढ़ चिनवा रहे थे लेकिन वह गढ़ चिनने में नहीं आ रहा था. तब किसी ने कहा कि नरबली दिए बिना गढ़ नहीं चिना जा सकता. [33] कोई तैयार नहीं होने पर विधवा लड़की के बेटे को गढ़ की नींव में चुन दिया. वह बेचारी रो पीटकर रह गयी. गढ़ तैयार हो गया, लेकिन माँ के मन में बेटे का दुःख बराबर बना रहा. एक दिन वह ढाब पर पानी भरने गयी तो वहां एक आदमी पानी पीने आया. लड़की के पूछने पर जब आगंतुक ने अपना परिचय एक सारण जाट के रूप में दिया तो उसका दुःख उबल पड़ा. उसने आगंतुक को धिक्कारते हुए कहा कि क्या सारण अभी जिंदा ही फिरते हैं ? आगंतुक के पूछने पर लड़की ने सारी घटना कह सुनाई. इस पर वह बीना पानी पिए ही वहां से चला गया. उसने जाकर तमाम सारणों को इकठ्ठा कर उक्त घटना सुनाई. तब सारणों ने इकठ्ठा होकर भाडंग पर चढाई की. बड़ी लड़ाई हुई और अंततः भाड़ंग पर सारणों का अधिकार हो गया. [34] इसके बाद सोहुआ जाट धाणसिया की तरफ़ चले गए और वहां अपना अलग राज्य स्थापित किया. उनके अधीन 84 गाँव थे. [35][36]

सीधमुख के कसवा

सीधमुख राजगढ़ तहसील में चुरू से 45 मील उत्तर-पूर्व में बेणीवालों की राजधानी रायसलाना से 18 मील दक्षिण-पूर्व में स्थित है. कर्नल टाड ने यद्यपि जाटों की कसवा शाखा का उल्लेख जाटों के प्रमुख ठिकानों में नहीं किया है लेकिन दयालदास, पाऊलेट, मुंशी सोहन लाल आदि ने कसवा जाटों को प्रमुख ठिकानों में गिना है. उनके अनुसार कसवां जाटों का प्रमुख ठिकाना सीधमुख था और राठोडों के आगमन के समय कसवां कंवारपल उनका मुखिया था तथा 400 गाँवों पर उसकी सत्ता थी.[37]

कसवां जाटों के भाटों तथा उनके पुरोहित दाहिमा ब्रह्मण की बही से ज्ञात होता है की कंसुपाल पड़िहार 5000 फौज के साथ मंडोर छोड़कर पहले तालछापर पर आए, जहाँ मोहिलों का राज था. कंसुपाल ने मोहिलों को हराकर छापर पर अधिकार कर लिया. इसके बाद वह आसोज बदी 4 संवत 1125 मंगलवार (19 अगस्त 1068) को सीधमुख आया. वहां रणजीत जोहिया राज करता था जिसके अधिकार में 125 गाँव थे. लड़ाई हुई जिसमें 125 जोहिया तथा कंसुपाल के 70 लोग मारे गए. इस लड़ाई में कंसुपाल विजयी हुए. सीधमुख पर कंसुपाल का अधिकार हो गया और वहां पर भी अपने थाने स्थापित किए. सीधमुख विजय के बाद कंसुपाल सात्यूं (चुरू से 12 कोस उत्तर-पूर्व) आया, जहाँ चौहानों के सात भाई (सातू, सूरजमल, भोमानी, नरसी, तेजसी, कीरतसी और प्रतापसी) राज करते थे. कंसुपाल ने यहाँ उनसे लड़ाई की जिसमें सातों चौहान भाई मरे गए. चौहान भाइयों की सात स्त्रियाँ- भाटियाणी, नौरंगदे, पंवार तथा हीरू आदि सती हुई. सतियों ने कंसुपाल को शाप दिया, जिसके कारण पड़िहार कंसुपाल ने जाटों के यहाँ विवाह किया, जिसमें होने वाली संतान कसवां कहलाई. फाल्गुन सुदी 2 शनिवार, संवत 1150, 18 फरवरी, 1049, के दिन कंसुपाल का सात्यूं पर कब्जा हो गया. फ़िर सात्यूं से कसवां लोग समय-समय पर आस-पास के भिन्न-भिन्न स्थानों पर फ़ैल गए और उनके अपने-अपने ठिकाने स्थापित किए. [38] [39]

ज्ञानाराम ब्रह्मण की बही के अनुसार कंसुपाल के बाद क्रमशः कोहला, घणसूर, महसूर, मला, थिरमल, देवसी, जयसी और गोवल सीधमुख के शासक हुए. गोवल के 9 लडके थे- चोखा , जगा, मलक, महन, ऊहड, रणसी, भोजा और मंगल. इन्होने अलग अलग ठिकाने कायम किए जो इनके थाम्बे कहे जाते थे. चोखा के अधिकार में 12 गाँव यथा दूधवा, बाड़की, घांघू, लाघड़िया, सिरसली, सिरसला, बिरमी, झाड़सर, भुरड़की इत्यादि. बरगा के अधिकार में हड़ियाल, महणसर, गांगियासर, लुटू, ठेलासर, देपालसर, कारंगा, कालेराबास (चुरू का पुराना नाम) आदि , रणसी के अधिकार में जसरासर, दूधवामीठा, रिड़खला, सोमावासी, झारिया, आसलखेड़ी, गिनड़ी, पीथीसर, धीरासर, ढाढर, बूंटिया इत्यादि. जगा के अधिकार में गोंगटिया, बीगराण, मठौड़ी, थालौड़ी, भैंरूसर, इन्दरपुरा, चलकोई आदि तथा ऊहण के अधिकार में नोपरा, जिगासरी, सेवाटादा], मुनड़िया, रुकनसर आदि. इसी प्रकार अन्य थामों के नाम और गाँवों का वर्णन है. [40] परवाना बही राज श्रीबिकानेर से भी ज्ञात होता है की चुरू के आसपास कसवां जाटों के अनेक गाँव रहे थे यथा चुरू (एक बास), खासोली, खारिया (दो बास), सरसला, पीथुवीसींसर, आसलखेड़ी, रिड़खला (तीन बास), बूंटिया, रामसरा, थालोड़ी, ढाढर, भामासी, बीनासर, [[बालरासर], भैंरुसर (एक बास), ढाढरिया (एक बास) धान्धू, आसलू, लाखाऊ, दूधवा, जसरासर, लाघड़िया, चलकोई आदि. भाटों की बही के अनुसार कंसुपाल के एक वंशज चोखा ने संवत 1485 माघ बदी 9 शुक्रवार (31 दिसम्बर 1428) को दूधवाखारा पर अधिकार कर लिया. [41]

विक्रम की 16 वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में अन्य जाट राज्यों के साथ कसवां जाटों के राज्य को भी राठोडों ने अधिकृत कर लिया. यद्यपि मूल रूप में कसवां जाटों के प्रमुख सीधमुख के कंवारपाल ने राठोडों की अधीनता ढाका युद्ध के बाद ही स्वीकार कर ली थी, लेकिन हो सकता है कि बाकी कस्बों के स्थानीय ठिकानों पर छोटे-मोटे भूस्वामी काबिज बने रहे हों, जिन्हें हराकर राठोडों ने शनैः शनैः उन सब ठिकानों पर अधिकार कर लिया. [42] [43]

लूद्दी (लून्दी) के पूनियां

लूद्दी चुरू से 38 मील उत्तर-पूर्व में और सीधमुख से 16 मील दक्षिण-पूर्व में राजगढ़ कसबे के पास है. यह पूनिया जाटों की राजधानी थी. [44] इसके तीन बास है - लूद्दी छाजू, लूद्दी खुबा और लूद्दी झावर . किसी समय लूद्दी स्मरद्ध कस्बा रहा होगा, लेकिन अब यह अति साधारण गाँव है. पूनियों के अधीन 360 गाँव थे. [45]

ठाकुर देशराज ने लिखा है की पूनिया जांगल देश में ईसा के प्रारम्भिक काल में पहुँच गए थे. उन्होने इस भूमि पर 16 वीं सदी के पूर्वार्ध तक राज किया. रठोड़ों के आगमन के समय इनका राजा कान्हादेव था. कान्हा बड़ा स्वाभिमानी योद्धा था. उसने राव बीका की अधीनता स्वीकार नहीं की. अंत में राठोडों ने उसके दमन के लिए उनके एरिया में गढ़ बनाना प्रारंभ किया. दिन में राठोड़ गढ़ बनाते थे और पूनिया जाट रात को आकर गढ़ ढहा देते थे. कहा जाता है की राजगढ़ के बुर्जों में कुछ पूनिया जाटों को चुन दिया गया था. बड़े संघर्ष के बाद ही पूनियों को हराया जा सका था. पूनियों ने राठोड नरेश रामसिंह को मारकर बदला चुकाया. [46] [47]

सूई के सिहाग

सूई चुरू से उत्तर-पश्चिम में 58 मील दूर तथा गोदारा जाटों के ठिकाने शेखसर से 12 मील उत्तर-पूर्व में लूणकरणसर तहसील में है. यह सिहाग जाटों की राजधानी थी और यह प्रदेश सियागगोटी कहलाता था. दयालदास ने इनके गाँवों की संख्या 140 लिखी है जबकि कर्नल टाडठाकुर देशराज ने इनको असिहाग लिखा है तथा इनके गाँवों की संख्या 150 बताई है जिन पर इनका अधिकार था. [48] ठाकुर देशराज व दयालदास के अनुसार इनकी राजधानी पल्लू थी. और राजा का नाम चोखा था. इनके राज्य की सीमा में रावतसर, बीरमसर, दांदूसर, गण्डेली आदि थे. सिहागों का दूसरा ठिकाना संभवतः पल्लू रहा हो जो सूई से कुछ मील दूर नोहर तहसील में है.

चौहानों के काल में पल्लू जैन धर्म का एक प्रमुख केन्द्र था, जहाँ से 11 वीं शताब्दी की अनेक मूर्तियाँ मिली हैं जिनमें एक राष्ट्रीय संग्रहालय नई दिल्ली व एक बीकानेर संग्रहालय में है. कहा जाता है कि पहले इसका नाम कोट किलूर था जो बादमें इस ठिकाने के जाट सरदार की लड़की के नाम पर पल्लू हो गया. पल्लू के बारे में एक कथा प्रचलित है कि मूगंधड़का नामक जाट का कोट किलूर पर अधिकर था. उसने डरकर दिल्ली के साहब नामक शहजादे से अपनी बेटी पल्लू का विवाह कर दिया. लेकिन वह मन से नहीं चाहता था, अतः उसने अपने दामाद को भोजन में विष देदिया जो अपने महल में जाकर मरगया. कुछ देर बाद जाटने अपने बेटे को पता लगाने के लिए भेजा कि साहब मरगया या नहीं. उसने जैसे ही महल की खिड़की में मुंह डाला, क्रुद्ध पल्लू ने उसका सिर काट लिया और उसकी लाश को महल में छुपा लिया. इस प्रकार बारी-बारी से उसने पांचो भाइयों को मार दिया, इस पर जाट ने कहा-

जावै सो आवै नहीं, यो ही बड़ो हिलूर (फितूर)।
के गिटगी पल्लू पापणी, के गिटगो कोट किलूर ।।[49]

विक्रम की 16 वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में अन्य जाट ठिकानों की तरह पल्लूसूई पर भी राठोड़ों का अधिकार हो गया. कहते हैं कि सिहाग जाटों ने बाद में भी सरलता से राठोड़ों की अधीनता स्वीकार नहीं की थी. तब सिहाग जाटों को धोखे से बुलाकर एक बाड़े में खड़ा करके जला दिया गया था. [50][51]

सिहाग नरेश चोखाजी के बारे में एक कथा प्रचलित है जो इस प्रकार है. एक बार गोदारा नरेश ने सिहाग नरेश को चिडाने के लिए एक दूत भेजा. उस समय सिहाग नरेश चोखाजी पल्लू के पास देवासर गाँव में एक तालाब पर स्नान कर रहे थे. जब चोखाराम जी स्नान कर पूजा में ध्यानमग्न थे तब दूत उनके पास आया और कहा कि मैं गोदारा नरेश का दूत हूँ, मुझे भेंट दीजिये. चोखाजी ने जबाब दिया कि आपको भोजन करना है तो तैयार हो जाएगा परन्तु मैं भेंट नहीं देता. दूत ने वैसा ही कहा जैसा उसको आदेशित किया गया था कि आप कैसे राजा हैं? इस पर चोखा रामजी ने चुल्लूभर पानी लिया और दूत पर फैंक दिया और कहा कि यह भेंट लो और अब जाओ. दूत आश्चर्य चकित रह गया जब पानी सोने की असर्फियों में बदल गया. जब दूत गोदारा नरेश के पास लोटा तो उसने सुनाया -

सियागां मैं सम्प घणों, दूजी जात न जोड़ ।
सियाग चोखै दान दियो, छपन लाख करोड़ ।।

रायसलाणा के बेणीवाल

रायसलाणा चुरू से 50 मील उत्तर-पूर्व में और सारण जाटों के ठिकाने भाड़ंग से 18 मील उत्तर-पूर्व में स्थित है. यह बेणीवाल जाटों की राजधानी था. बेणीवालों के कितने गाँव थे, इसके बारे में इतिहासकारों में बड़ा मतभेद है. ठाकुर देशराज ने बेणीवालों के गाँवों की संख्या 84, चारण रामनाथ रत्नू ने 40, और मुंशी ज्वालासहय ने वाकए राजपूताना में 150 दी है. दयालदास ने अपनी ख्यात में संख्या 360 गाँवों के होने का उल्लेख किया है. [52] राठोड़ों के आगमन के समय इनका सरदार रायसल था. रायसल की बेटी मलकी का विवाह भाड़ंग के सरदार पूला सारण के साथ हुआ था. इसी मलकी के अपहरण काण्ड को लेकर गोदारों का शेष सब जाटों से युद्ध हुआ था और अंत में सीधमुख के पास ढाका नमक स्थान पर जो लड़ाई हुई, उसमें गोदारों के सहायक राठोड़ों की विजय हुई थी, जिसके परिणाम स्वरूप रायसलाणा के ठिकाने पर भी राठोड़ों का अधिकार हो गया था. [53] [54]

भूरुपाल के जोहिया

जैसलमेर, जांगल देश और मारवाड़ के बहुत से प्रदेश पर इनका राज रहा है. राठोड़ों से पहले उनके राज्य में 600 गाँव थे. शेरसिंह उनका राजा था. राठोड़ों को नाकों चने शेरसिंह ने ही चबाये थे. भूरुपाल में उनकी राजधानी थी. बीका ने गोदारों और अपनी सेना लेकर जोहिया जाटों पर आक्रमण किया. शेरसिंह ने अपनी सेनाएं इकट्ठी करके दोनों शक्तियों का सामना किया. शेरसिंह बड़ा बांका योद्धा था. बीका राठोड इस युद्ध को आसानी से नही जीत सका. अंत में विजय कि कोई सूरत न देख बीका ने शेरसिंह को षडयंत्र से मरवा दिया. [55][56][57]

रिड़ी-बिग्गा के जाखड़

  • जाखड़ - जाखड़ जाटों का ठिकाना बिग्गा तहसील डूंगरगढ़ में था. इनका गोत्र पड़िहार बतलाया गया है. कहते हैं कि कोलियोजी पड़िहार पहले पहल मंडोर से आकर ग्राम केऊ तहसील डूंगरगढ़़ में बसा था. इसका बेटा जक्खा हुआ जिसने अपने नाम पर जाखासर बसाया. कहते हैं उसने अपने परिवार के रिश्ते वहां बसे जाटों में करने आरंभ कर दिए थे तथा 'नए जाट गोत्र' जाखड़ का जनक कहलाया. उसकी एक लड़की का नाम रिड़ी था, जिसके नाम पर रिड़ी गाँव बसाया. जक्खा का बेटा मैहन था, जिसका बेटा बिग्गा बड़ा शूरवीर हुआ. इसी के नाम पर बिग्गा गाँव बसा. कहते हैं कि बिग्गा ने गायों की रक्षा के लिए राठ मुसलमानों से युद्ध किया जिसमें गैरक्षार्थ वह संवत 1393 (1336) में काम आया. पाऊलेट ने बीकानेर गजेटियर में बिग्गा की म्रत्यु का समय 1315 दिया है. बिग्गाजी का जन्म विक्रम संवत 1358 (1301) में रिड़ी में हुआ रहा. बिग्गा और उसके आसपास के एरिया में बिग्गा गोरक्षक लोकदेवता के रूप में पूजे जाते हैं.[58] गाँव बिग्गारिड़ी में जाखड़ जाटों का भोमिचारा था और लंबे समय तक जखड़ों का इन पर अधिकार बना रहा.[59]

पिचकराई के सींवर

मलकी और लाघड़िया युद्ध

उस समय पूला सारण भाड़ंग का शासक था और उसके अधीन 360 गाँव थे. पूला की पत्नी का नाम मलकी था जो बेनीवाल जाट सरदार रायसल की पुत्री थी. उधर लाघड़िया में पांडू गोदारा राज करता था. वह बड़ा दातार था. एक बार विक्रम संवत 1544 (वर्ष 1487) के लगभग लाघड़िया के सरदार पांडू गोदारा के यहाँ एक ढाढी गया, जिसकी पांडू ने अच्छी आवभगत की तथा खूब दान दिया. उसके बाद जब वही ढाढी भाड़ंग के सरदार पूला सारण के दरबार में गया तो पूला ने भी अच्छा दान दिया. लेकिन जब पूला अपने महल गया तो उसकी स्त्री मलकी ने व्यंग्य में कहा "चौधरी ढाढी को ऐसा दान देना था जिससे गोदारा सरदार पांडू से भी अधिक तुम्हारा यश होता. [60]इस सम्बन्ध में एक लोक प्रचलित दोहा है -

धजा बाँध बरसे गोदारा, छत भाड़ंग की भीजै ।

ज्यूं-ज्यूं पांडू गोदारा बगसे, पूलो मन में छीज ।।[61]

सरदार पूला मद में छका हुआ था. उसने छड़ी से अपनी पत्नी को पीटते हुए कहा यदि तू पांडू पर रीझी है तो उसी के पास चली जा. पति की इस हरकत से मलकी मन में बड़ी नाराज हुई और उसने चौधरी से बोलना बंद कर दिया. मलकी ने अपने अनुचर के मध्यम से पांडू गोदारा को सारी हकीकत कहलवाई और आग्रह किया कि वह आकर उसे ले जाए. इस प्रकार छः माह बीत गए. एक दिन सब सारण जाट चौधरी और चौधराईन के बीच मेल-मिलाप कराने के लिए इकट्ठे हुए जिस पर गोठ हुई. इधर तो गोठ हो रही थी और उधर पांडू गोदारे का पुत्र नकोदर 150 ऊँट सवारों के साथ भाड़ंग आया और मलकी को गुप्त रूप से ले गया. [62] पांडू वृद्ध हो गया था फ़िर भी उसने मलकी को अपने घर रख लिया. परन्तु नकोदर की माँ, पांडू की पहली पत्नी, से उसकी खटपट हो गयी इसलिए वह गाँव गोपलाणा में जाकर रहने लगी. बाद में उसने अपने नाम पर मलकीसर बसाया. [63]

पूला ने सलाह व सहायता करने के लिए अन्य जाट सरदारों को इकठ्ठा किया. इसमें सीधमुख का कुंवरपाल कसवां, घाणसिया का अमरा सोहुआ, सूई का चोखा सियाग, लूद्दी का कान्हा पूनिया और पूला सारण स्वयं उपस्थित हुए. गोदारा जाटों के राठोड़ों के सहायक हो जाने के कारण उनकी हिम्मत उन पर चढाई करने की नहीं हुई. ऐसी स्थिति में वे सब मिलकर सिवानी के तंवर सरदार नरसिंह जाट के पास गए [64] और नजर भेंट करने का लालच देकर उसे अपनी सहायता के लिए चढा लाए. [65]

तंवर नरसिंह जाट बड़ा वीर था. वह अपनी सेना सहित आया और उसने पांडू के ठिकाने लाघड़िया पर आक्रमण किया. उसके साथ सारण, पूनिया, बेनीवाल, कसवां, सोहुआ और सिहाग सरदार थे. उन्होंने लाघड़िया को जलाकर नष्ट कर दिया. लाघड़िया राजधानी जलने के बाद गोदारों ने अपनी नई राजधानी लूणकरणसर के गाँव शेखसर में बना ली. [66] युद्ध में अनेक गोदारा चौधरी व सैनिक मारे गए, परन्तु पांडू तथा उसका पुत्र नकोदर किसी प्रकार बच निकले. नरसिंह जाट विजय प्राप्त कर वापिस रवाना हो गया. [67]

ढाका का युद्ध (1488) और जाट गणराज्यों का पतन

इधर गोदारों की और से पांडू का बेटा नकोदर राव बीका व कान्धल राठोड़ के पास पुकार लेकर गया जो उस समय सीधमुख को लूटने गए हुए थे. नकोदर ने उनके पास पहुँच कर कहा कि तंवर नरसिह जाट आपके गोदारा जाटों को मारकर निकला जा रहा है. उसने लाघड़िया राजधानी के बरबाद होने की बात कही और रक्षा की प्रार्थना की. इसपर बीका व कान्धल ने सेना सहित आधी रात तक नरसिंह का पीछा किया. नरसिंह उस समय सीधमुख से ६ मील दूर ढाका नमक गाँव में एक तालाब के किनारे अपने आदमियों सहित डेरा डाले सो रहा था. रास्ते में कुछ जाट जो पूला सारण से असंतुष्ट थे, ने कान्धल व बीका से कहा की पूला को हटाकर हमारी इच्छानुसार दूसरा मुखिया बना दे तो हम नरसिंह जाट का स्थान बता देंगे. राव बीका द्वारा उनकी शर्त स्वीकार करने पर उक्त जाट उन्हें सिधमुख से ६ मील दूरी पर उस तालाब के पास ले गए, जहाँ नरसिंह जाट अपने सैनिकों सहित सोया हुआ था.[68] [69]

राव कान्धल ने रात में ही नरसिंह जाट को युद्ध की चुनोती दी. नरसिंह चौंक कर नींद से उठा. उसने तुरंत कान्धल पर वार किया जो खाली गया. कान्धल ने नरसिंह को रोका और और बीका ने उसे मार गिराया. [70] घमासान युद्ध में नरसिंह जाट सहित अन्य जाट सरदारों कि बुरी तरह पराजय हुई. दोनों और के अनेक सैनिक मरे गए. कान्धल ने नरसिह जाट के सहायक किशोर जाट को भी मार गिराया. इस तरह अपने सरदारों के मारे जाने से नरसिह जाट के साथी अन्य जाट सरदार भाग निकले. भागती सेना को राठोड़ों ने खूब लूटा. इस लड़ाई में पराजय होने के बाद इस एरिया के सभी जाट गणराज्यों के मुखियाओं ने बिना आगे युद्ध किए राठोड़ों की अधीनता स्वीकार कर ली और इस तरह अपनी स्वतंत्रता समाप्त करली. फ़िर वहाँ से राव बीका ने सिधमुख में डेरा किया. वहां दासू बेनीवाल राठोड़ बीका के पास आया. सुहरानी खेड़े के सोहर जाट से उसकी शत्रुता थी. दासू ने बीका का आधिपत्य स्वीकार किया और अपने शत्रु को राठोड़ों से मरवा दिया. [71] इस तरह जाटों की आपसी फूट व वैर भाव उनके पतन का कारण बना.[72]

अनन्त गोचर के जाट जनपद

इतिहासकार अनंतगोचार को हर्ष के आस-पास का क्षेत्र मानते हैं.(रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.37 -38). अनंतगोचार में जाटों के छोटे-छोटे कई गणराज्य थे:

सरणाऊ के बुरड़क

  • बुरडक (975 AD - 1258 AD) - बुरडक जाटों का ठिकाना सरणाऊ तहसील दांतारामगढ जिला सीकर में था. इनको चौहानों में से निकलना बतलाया गया है. दिल्ली पति महीपाल तंवर के अधीन सरनाउ को रावराजा बुरड़कों की राजधानी संवत 1032 में बनाया. बुरड़कों की राजधानी सरनाऊ संवत 1032 से संवत 1315 (975 AD - 1258 AD) तक रही. संवत 1315 (1258 AD) में यह दिल्ली के बादशाह शमसुद्दीन इलतुतमिश (1211–1236) के पुत्र नसिरुदीन महमूद (1246–1266) के अधीन हुई. बादशाह ने गानोड़ा गाँव के ढाका मोमराज को 52000 फ़ौज का मनसबदार बनाया. उस समय सरनाऊ कोट राजधानी चौधरी कालूरामजी बुरडक के पुत्र पदमसिंहजी बुरडक तथा जगसिंहजी बुरडक के अधिकार में थी. इस जागीर में 84 गाँव थे.मोम राज ढाका ने संवत 1308 से 1315 के बीच 6 बार बुरड़कों पर हमला किया पर बुरड़क अविजित रहे. अंत में संवत 1315 (1258 AD) की आसोज माह के अमावस को सभी बुरड़क जब निशस्त्र हालाणी बावडी पर श्राध के लिये एकत्रित हुये उस समय मोमराज ढाका ने 25000 की फ़ौज लेकर उनपर तोपों से हमला किया. सभी बुरड़क मारे गए और किला नष्ट कर दिया गया. अधिक जानकारी के लिए देखें - बुरड़क गोत्र का इतिहास

लढाणा के बिजारणिया

  • बिजारणिया जाटों का राज्य सीकर जिले में पलसाना के पास लढाणा में था. भाट लोगों के अनुसार इनका: वंश - सोमवंश, गोत्र - विश्वामित्र, शाखा - मारधुने, प्रवर तीन थे. संवत 1135 (1078 AD) में नल्ह के पुत्र वीरसिंह ने विजारणा खेडा गाँव बसाया. संवत 1235 (1178 AD) में लढाणा में किला बनाया. संवत 1312 (1255 AD) में जग सिंह ने पलसाना पर अधिकार कर लिया. संवत 1572 (1515 AD) में इस वंश में देवराज नामक सरदार था. [73] अधिक जानकारी के लिए देखें - बिजारणिया

लोसल के थालोड़

  • थालोड़ गोत्र की उत्पति चौहान वंश में आबू पर्वत से मानी गयी है. चौधरी बाबलजी धमाणा से आये और चैत बदी दूज संवत 1221 (1164 AD) में लोसल-खेड़ा गाँव बसाया. थालोड़ की राजधानी लोसल थी. थालोड़ खुवान माता की पूजा करते हैं. इनके कुल देवता शकल जी उर्फ़ सावल जी हैं. शकलजी का जन्म थालोड़ गोत्र में गाँव खुडी में पिता तहराजजी के घर चैत बदी 5 संवत 1652 (1595 AD) को हुआ. अधिक जानकारी के लिए देखें थालोड़.

जाटों के अन्य ठिकाने

उपरोक्त जनपदों के अलावा जाटों की कुछ अन्य गोत्रों के ठिकाने राजस्थान के विभिन्न भागों में थे. यहाँ संक्षेप में लिखा जा रहा है. इनके विस्तार की आवश्यकता है.

जांगल प्रदेश -

  • सांगवान गोत्र का राज्य मारवाड़ के अंतर्गत सारसू जांगल प्रदेश था. इनके पूर्वज आदू राजा से लेकर 13 पीढी तक इनका राज्य सारसू जांगल पर रहा. भादू गोत्र के जाटों का जांगल देश में राज रहा इन्होने भादरा गाँव बसाया. संमतराजे इनमें प्रसिद्ध राजा हुए हैं. बादमें इनका एक दल अजमेर-मेरवाडा की तरफ़ चला गया, जहाँ कई गाँवों पर इन्होने अधिकार कर लिया जो अकबर के समय इनके हाथ से निकल गए.

आनंत गोचर प्रदेश

मारवाड़ इसी तरह ठाकुर देशराज ने मारवाड़ में अनेक अन्य जाट वंशों का विभिन्न इलाकों में शासन करने का उल्लेख किया है.


ये सारे प्रमाण इस बात के सबूत हैं की राजस्थान में विभिन्न भागों पर जाटों की सत्ता थी और वे अलग अलग स्थानों पर कभी शासन करते थे.[77]

References

  1. http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/rj185.htm डॉ. कैलाश कुमार मिश्र, राजस्थान : एक परिचय
  2. http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/rj185.htm डॉ. कैलाश कुमार मिश्र, राजस्थान : एक परिचय
  3. रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.43
  4. ठाकुर देशराज, जाट इतिहास, पेज 587 -627
  5. डॉ पेमा राम:राजस्थान के जाटों का इतिहास, प्रकाशक: - राजस्थानी ग्रंथागार, सोजती गेट, जोधपुर, 2010, ISBN: 81-86103-96-1
  6. इम्पीरियल गजैटियर
  7. http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/rj185.htm डॉ. कैलाश कुमार मिश्र, राजस्थान : एक परिचय
  8. गोपीनाम शर्मा / सोशियल लाइफ इन मेडिवियल राजस्थान / पृष्ठ ३
  9. http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/rj185.htm डॉ. कैलाश कुमार मिश्र, राजस्थान : एक परिचय
  10. ठाकुर देशराज, जाट इतिहास, पेज 587
  11. डॉ. गोपीनाम शर्मा / राजस्थान का सांस्कृतिक इतिहास / राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, जयपुर / प्रथम संस्करण १९८९ / पृष्छ ३)
  12. ठाकुर देशराज, जाट इतिहास, पेज 694
  13. दयालदास की ख्यात, भाग 2, पेज 8
  14. Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 201
  15. Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 201
  16. ठाकुर देशराज, जाट इतिहास, पेज 624
  17. कर्नल टाड, अन्नाल्स एंड एन्टीक्विटीस ऑफ़ राजस्थान, भाग 2, पेज 360
  18. ठाकुर देशराज, जाट इतिहास, पेज 612, 620
  19. Dr Karni Singh (1947): The Relations of House of Bikaner with Central Power, Munsi Ram Manohar Lal Pub. Pvt, 54 Rani Jhansi Road, New Delhi. Dr Brahmaram Chaudhary, The Jats, Vol. 2, Ed Dr Vir Singh, Originals, Delhi, 2006, ISBN 81-88629-52-9, p. 250
  20. ठाकुर देशराज, जाट इतिहास, पेज 624
  21. ठाकुर देशराज व दयालदास के अनुसार इनकी राजधानी पल्लू थी. और राजा का नाम चोखा था.
  22. ठाकुर देशराज, जाट इतिहास, पेज 612
  23. Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 202
  24. मुंशी सोहनलाल, तवारीख राज श्री बीकानेर, पेज 1, 13
  25. गोविन्द अग्रवाल, चुरू मंडल का शोधपूर्ण इतिहास, पेज 109-110
  26. Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 202
  27. मुंशी सोहनलाल, तवारीख राज श्री बीकानेर, पेज 97
  28. Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 202
  29. दयालदास ख्यात, देशदर्पण, पेज 20
  30. Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 209
  31. चौधरी हरिश्चंद्र नैन, बीकानेर में जनजाति, प्रथम खंड, पेज 18
  32. Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 202
  33. पंरेऊ, मारवाड़ का इतिहास, प्रथम खंड, पेज 92
  34. गोविन्द अग्रवाल, चुरू मंडल का शोधपूर्ण इतिहास, पेज 112-113
  35. दयालदास ख्यात, देशदर्पण, पेज 20
  36. Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 203
  37. Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 203
  38. गोविन्द अग्रवाल, चुरू मंडल का शोधपूर्ण इतिहास, पेज 115-116
  39. Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 203-204
  40. सात्यूं के ब्राहमण ज्ञानाराम की बहीहस्तलिखित्) , पेज 10-16 गोविन्द अग्रवाल, चुरू मंडल का शोधपूर्ण इतिहास, पेज 116
  41. Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 203
  42. गोविन्द अग्रवाल, चुरू मंडल का शोधपूर्ण इतिहास, पेज 116-117
  43. Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 205
  44. ठाकुर देशराज ने पूनिया जाटों की राजधानी झंसल तहसील भद्र लिखी है जाट इतिहास, पेज 613
  45. Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 205
  46. ठाकुर देशराज , जाट इतिहास, पेज 613-614
  47. Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 205
  48. ठाकुर देशराज , जाट इतिहास, पेज 616
  49. मरू भारती, वर्ष 12, अंक 1
  50. चौधरी हरिश्चंद्र नैन, बीकानेर में जनजाति, प्रथम खंड, पेज 18
  51. Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 205-206
  52. दयालदास ख्यात, देशदर्पण, पेज 20
  53. गोविन्द अग्रवाल, चुरू मंडल का शोधपूर्ण इतिहास, पेज 121
  54. Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 206
  55. सुखसम्पति राय भंडारी, देशी राज्यों के इतिहास
  56. वाकय-राजपूताना
  57. ठाकुर देशराज , जाट इतिहास, पेज 624
  58. पाऊलेट, बीकानेर गजेटियर, p. 90
  59. Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 206
  60. Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 208
  61. Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 208
  62. नैणसी की ख्यात, भाग 2, पेज 202
  63. Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 209
  64. दयालदास री ख्यात , पेज 9
  65. Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 209
  66. डॉ दशरथ शर्मा री ख्यात, अनूप संस्कृत पुस्तकालय, बीकानेर, संवत 2005, पेज 7
  67. Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 209
  68. नैणसी की ख्यात, भाग 2, पेज 203
  69. Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 209
  70. नैणसी की ख्यात, भाग 2, पेज 203
  71. नैणसी की ख्यात, भाग 2, पेज 203
  72. Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 210
  73. ठाकुर देशराज : जाट इतिहास, 1934 , पृ. 599
  74. ठाकुर देशराज, बिकानेरीय जागृति के अग्रदूत चौधरी हरिश्चंद्र नैन, पेज 335-337
  75. Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 206
  76. ठाकुर देशराज , जाट इतिहास, पेज 591, 593, 595, 602, 6o4
  77. Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 207