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Viewsराजकवि दादा लखमी चन्द जी की कविताएंFrom Jatland Wiki
Lakhmi Chand - The Great poet of HaryanaAbout the authorLakhmi Chand was born in ‘Janti’ जांटी village which now falls in Sonepat district of Haryana. River Yamuna is a few kilometers from this village but in the first decade of 1900 A.D., the village used to be on Yamuna’s banks. The river has now changed its streams a few kilometers away, towards Uttar Pradesh. Lakhmi Chand was a Brahmin and had the exceptional qualities of a poet. In the decades of 1940s and 1950s, he became famous because of his folk dramas called “Saang”.
राजकवि दादा लखमी चन्द जी की कविताएंकलियुग(राजकवि दादा लखमी चन्द जी)
समद ऋषि जी ज्ञानी हो-गे जिसनै वेद विचारा । वेदव्यास जी कळूकाल* का हाल लिखण लागे सारा ॥ टेक ॥
बीर-मरद हों न्यारे-न्यारे, इसा बखत आवैगा । घर-घर में होंगे पंचायती, कौन किसनै समझावैगा - मनुष्य-मात्र का धर्म छोड़-कै, धन जोड़ा चाहवैगा ।
वेदव्यास जी कळूकाल का हाल लिखण लागे सारा ।
भाई-भाण का चलै मुकदमा, बिगड़ी नीत रहैगी । कोए मिलै ना यार जगत मैं, ना सच्ची प्रीत रहैगी - भाई नै भाई मारैगा, ना कुल की रीत रहैगी ।
वेदव्यास जी कळूकाल का हाल लिखण लागे सारा ।
वेद शास्त्र उपनिषदां नै ना जाणनियां पावैगा । गऊ लोप हो ज्यांगी दुनियां में, ना पाळनियां पावैगा - मदिरा-मास नशे का सेवन, इसा बखत आवैगा ।
वेदव्यास जी कळूकाल का हाल लिखण लागे सारा ।
हीजड़े मिनिस्टर बण्या करैंगे, बीर कै ताज रहैगा । दखलंदाजी और रिश्वतखोरी सब बे-अंदाज रहैगा - भाई नै तै भाई मारैगा, ना न्याय-इलाज रहैगा ।
वेदव्यास जी कळूकाल का हाल लिखण लागे सारा ।
कळूकाल = कलियुगकड़ कै न्यौळी बांध मरैंगे, मांग्या मिलै ना उधारा = लोग कमर में या जेब में पैसा बांधे रखेंगे, फिर भी मांगने पर या उधार में पैसा नहीं मिलेगा । लोभ के कारण बल घट ज्यांगे = घी-दूध आदि महंगा हो जायेगा, लोग लोभ में आकर इसे खरीद नहीं पायेंगे और उनका शारीरिक बल घटता जायेगा । सारे कै प्रकाश कळू का, ना कच्चा घर पावैगा = कलियुग में सब जगह (बिजली का) उजाला रहेगा और सब मकान पक्के होंगे । वस्तु जांगी बाराह = सोना, चांदी, तांबा आदि बारह धातु (वस्तु) गायब हो जायेंगी । छत्रापण जा-गा = क्षत्रियपन मिट जायेगा जिन-पै दल खप-गे थे अठाराह = द्रोपदी के चीरहरण के कारण महाभारत हुआ था जिसमें कुल 18 सेनाऐं खत्म हो गईं थीं (कौरवों के पास 11 अक्षौहिणी सेना थी और पांडवों के पास 7) ।
अपने रहण की खातिर मन्नै इसा गजट बणाया॥
वेद-शास्त्र उपनिषदां नै मैं सतयुग खातिर धर दूंगा । असली माणस छोडूं कोन्या, सारे गुंडे भर दूंगा - साच बोलणियां माणस की मैं रे-रे-माटी कर दूंगा ।
अपने रहण की खातिर मन्नै इसा गजट बणाया ॥
ले-कै दें ना, कर-कै खां ना, ऐसे सेवक मेरे । सही माणस कदे ना पावै, कर दूं ऊजड़-डेरे - पापी माणस की अर्थी पै जावैंगे फूल बिखेरे ॥
अपने रहण की खातिर मन्नै इसा गजट बणाया ॥
जीवन की रेल
हो-ग्या इंजन* फेल चालण तैं, घंटे बंद, घडी रह-गी । छोड़ ड्राइवर* चल्या गया, टेशन पै रेल* खड़ी रह-गी ॥टेक॥
बंद हो-गी रफ्तार चलण तैं, पुर्जे सारे हाल गये । पांच ठगां* नै गोझ काट ली, डूब-डूब धन-माल गये - बानवें करोड़ मुसाफिर* थे, वे अपना सफर संभाल गये ॥1॥
छोड़ ड्राइवर चल्या गया, टेशन पै रेल खड़ी रह-गी ॥
जळ-ग्या सारा तेल खतम हो, कोयला पाणी आग गए । पंखा फिरणा बंद हो-ग्या, बुझ लट्टू गैस चिराग गए - पच्चीस पंच* रेल मैं ढूंढण एक नै एक लाग गए ॥2॥
छोड़ ड्राइवर चल्या गया, टेशन पै रेल खड़ी रह-गी ॥
बहत्तर गाडी* खड़ी लाइन मैं, कील-कुहाड़ी टूटी ना । तीन-सौ-साठ लाकडी* लागी, अलग हुई कोई फूटी ना - एक शख्स* बिन रेल तेरी की, पाई* तक भी ऊठी ना ॥3॥
छोड़ ड्राइवर चल्या गया, टेशन पै रेल खड़ी रह-गी ॥
धर्म-लाइन गई टूट तेरी नदिया नहर खाळ आगै । चमन चिमनी का लैंप बुझ-ग्या आंधी हवा बाळ आगै - किन्डम हो गई रेल तेरी जंक्शन जगत जाळ आगै ॥4॥
छोड़ ड्राइवर चल्या गया, टेशन पै रेल खड़ी रह-गी ॥
ड्राइवर - आत्मा रेल - मानव शरीर भर टी-टी का भेष - टी-टी के वेश में यमदूत बानवें करोड़ मुसाफिर - सांसों की संभावित गिनती पच्चीस पंच - घरवाले और नजदीकी रिश्तेदार पांच ठग - पंचभूत, जिनसे शरीर बना है (पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि) बूटी - दवाई/ इलाज बहत्तर गाडी - एक मिनट में नाड़ी या दिल की धड़कनों की गिनती तीन-सौ-साठ लाकडी - शरीर की हड्डियां पाई - पैसा, मोल एक शख्स - आत्मा काळ आगै बता किसकी आण अड़ी रहैगी - काल के सामने भला किसकी आन (शान) अड़ सकती है?
शेर और गाय का संवादएक पिता है , हेरे फ़िर तुझे कैसे ज्ञान नही ! अधर्म करके जीना चाहता , राजधर्म का ध्यान नही मोंत भूख का एक पिता है , फ़िर तुझे कैसे ज्ञान नही अधर्म करके जीना चाहता , राज धर्म का ध्यान नही !
इस सुंदर रचना को पंडित जी ने इस मार्मिक दृष्टान्त की सहायता से समझाने का पर्यास किया है: एक मालिक के घर पर एक गऊ अपाहिज हो जाती है !मालिक ने गऊ को घर से निकल दिया ! गऊ दूर जंगल में जाकर अपना पेट गुजरा करती है ! परमात्मा की कृपा से उसका एक सांड से मिलन हो जाता है ! सांड के मिलने से उसका काफी परिवार हुआ ! दिन बितते चले जाते हैं ! एक बार परिवार की सभी सदय्स्या गउएँ मिलकर कहती है , हे माँ इस हद से पार , खाई के परली( दूसरी ) तरफ़ काफी लम्बी २ घास उगी है , सहज ही पेट भर जाता है !वह लंगडी गाय उनके साथ चली जाती है !भगवान् की ऐसी निगाह फिरि , एक शेर का आना हो जाता है !शेर के दहाड़ने से सभी गउएँ भाग जाती हैं !वह लंगडी गऊ अकेली रह जाती है ! शेर उसे दबोच लेता ! वह दुआएं करती है ! रे भाई मेरा एक छोटा बच्चा है , में उसको दूध पिला के तेरे समक्ष आजाउंगी ! शेर ने उसको छोड़ दिया! उसने अपने बच्चे को दूध पिलाया, मन को संतोष मिला शान्ति मिली! और फ़िर अपन वचन पुरा करती हुई उसके सामने आकर खड़ी हो जाती है जब वह गऊ को मारने के लिए झपटा , वह कहती है, " रे पापी ये बता मुझे क्यों मारना चाहता है ? वह कहता है मुझे भूख लगी है और यदि भूख को ना मेटा जाए तो आत्मा को ठेस लगती है ! आत्मा मुसने से फ़िर कुछ नही रहता ! गऊ कहती है , रे पापी मुझे मेरी मोंत दिखाई देती है !क्या मेरी आत्मा नही मुसती ? तेरी भी आत्मा मुसती है ! भूख लगने से भी आत्मा मुसती है , मोत दिखने से भी आत्मा मुसती है ! दोनों का एक ही जगह से जन्म हुआ है , कुछ ज्ञान कर, ज्ञान क बिना तू अधुरा है ! ज्ञान के बिना तुझे सुख नही मिल सकता , मोक्ष नही मिल सकता ! वह लंगडी गऊ उस शेर को ज्ञान देती है! क्या भला ?
ज्ञान से ऋषि तपस्या करते , जो तुझको पड़ा पड़ा सहणा ! ज्ञान से कार व्यवहार चालते, साहूकार से ऋण लेना ! ज्ञान से प्रजा का पालन करके, ब्याज मूल सब दे देना ! अरे ले कर्जा कोए मार किसे का , जो रहती ये सच्ची शान नही ! अधर्म करके जीना ......
जहाँ गई वो साथ गया , उसने प्रेम से उदर भरा दिया! सत्यकाम ने गुरु के वचन को धर्मनाव पर तिरा दिया, फ़िर से बात सुनी सांड की यम् का दर्शन करा दिया! ज्ञानी पुरूष कोण कहे , पशुओं में भी भगवान् नही ! अधर्म करके जीना .
ज्ञान के कारण सो कोस परे , ज्ञान के कारण पास खड़े ! ज्ञान के कारण ऋषि तपस्या करते , बन इश्वर के दास खड़े , मुझ को मोक्ष मिले होण ने, न्यू करके पूरी आस खड़े जान जाओ पर रहो धर्म पे , इस देह का मान गुमान नही ! अधर्म करके जीना ..........
ज्ञान बिना मेरी टांग टूटगी , ज्ञान बिना कूदी खाई ! ज्ञान बिना में लंगडी होगी , ज्ञान बिना बुड्ढी ब्याई ! ज्ञान बिना तू मुझको खाता, कुछ मन में ध्यान करो भाई ! लख्मीचंद कह क्यों भूल गए सब, धर्म शरण की यो राही! इस निराकार का बच्चा बन ज्या, क्यों कह मेरे में भगवान् नही ! अधर्म करके जीना चाहता , राजधर्म का ध्यान नही ! मोंत भूख का एक पिता है , फ़िर तुझे कैसे ज्ञान नही अधर्म करके जीना चाहता , राज धर्म का ध्यान नही आप सभी यू ट्यूब पर इस सुंदर रागनी की विडियो का भी लुत्फ उठा सकते हैं : http://au.youtube.com/watch?v=83vaB9Er91E
जन्म-मरण
लाख-चौरासी खतम हुई बीत कल्प-युग चार गए । नाक में दम आ लिया, हम मरते-मरते हार गए ॥टेक॥
बहुत से भाई-बहन हुए, पर एक अंक दर याद नही । बहुत सी संतान पैदा की, पर गए उनकी मर्याद नहीं - बहुत पिताओं से पैदा हुए, पर उनका घर भी याद नहीं ॥1॥
नाक में दम आ लिया, हम मरते-मरते हार गए ॥
कहीं अंडों में बंद रहे कहीं पैदा हुए पसीने से । कहीं डूबे रहे जल में, कहीं उम्र कटी जल पीने से - फिर भी कर्म हाथ नहीं आया, मौत भली इस जीने से ॥2॥
नाक में दम आ लिया, हम मरते-मरते हार गए ॥
कभी निर्बलता कभी प्रबलता, कभी रोगी बण-कै रोग लिया । कभी नृपत कभी छत्रधारी, कभी जोगी बण-कै जोग लिया - भोग भोगने आये थे, उन भोगों ने हमको भोग लिया ॥3॥
नाक में दम आ लिया, हम मरते-मरते हार गए ॥
वो तो बस में हुई नहीं, हम हो गए उनके यश में । न्यूं सोचूं था काम-क्रोध नै मार गिरा दूं गर्दिश में - काम-क्रोध तै मरे नहीं, हम हो गए उनके बस में ॥4॥
नाक में दम आ लिया, हम मरते-मरते हार गए ॥
नृत्य कलानाचने-गाने का और लखमीचंद के सांगों का विरोध भी बहुत होता था, क्योंकि उन दिनों में आर्यसमाज का प्रभाव बहुत बढ़ गया था । आत्मविश्वासी पंडित जी ने विरोधों का जमकर मुकाबला किया । पुरुषों द्वारा स्त्रियों का भेष धारण करने की सफाई देते थे : इन मर्दों का के दोष भला धारण में भेष जनाना । इस बारे में उनकी यह रागनी पेश है :
नाचण मैं के दोष बता या अक्कल की हुशियारी...
फिर दूजै भस्मासुर नाच्या सारा नाच नचा कै गौरां आगै शिवजी नाच्या, ल्याया पार्वती नै ब्याह-कै जल के ऊपर ब्रह्मा नाच्या कमल फूल के मांह-कै ब्रह्मा जी नै नाच-नाच कै रची सृष्टि सारी...
गोपियों में कृष्ण नाच्या करकै भेष जनाना विराट देश में अर्जुन नाच्या, करया नाचना गाणा इंद्रपुरी में इन्द्र नाचै जब हो मींह बरसाणा गढ़ मांडव में मलके नाच्या करया नटों का बाणा मलके नै भी नाच-नाच कै ब्याहली राजदुलारी...
ईश वन्दनालखमीचंद की एक मशहूर रागनी प्रस्तुत है जिसमे एक ही अक्षर से शब्द और पूरी पंक्ति की छन्द रचना की गई है ।
अलख अगोचर अजर अमर अन्तर्यामी असुरारी... गुण गाऊं गोपाल गरुडगामी गोविन्द गिरधारी ... परम परायण पुरुषोत्तम परिपूर्ण हो पुरुष पुराण नारायण निरलेप निरन्तर निरंकार हो निर्माण भागवत भक्त भजैं भयभंजन भ्रमभजा भगवान धर्म धुरंधर ध्यानी ध्याव धरती धीरज ध्यान सन्त सुजान सदा समदर्शी सुमरैं सब संसारी ...
मशहूर स्वांगों के नामदादा लखमीचन्द के कुछ मशहूर सांगों के नाम ये हैं :
(1) नौटंकी (2) धर्म कौर - रघुबीर सिंह (3) हूर मेनका (4) ज्यानी चोर (5) चन्द्रकिरण (6) राजा भोज - सरणदे (7) चापसिंह (8) शाही लकड़हारा (9) हीर रांझा
(1) सत्यवान सावित्री (2) भगत पूर्णमल (3) पदमावत (4) चीर पर्व (5) नल दमयन्ती (6) विराट पर्व (7) राजा हरिश्चन्द्र (8) सेठ ताराचन्द (9) भूप पुरंजन, मीराबाई
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