Banswara
From Jatland Wiki
Banswara is a city in Banswara District in south Rajasthan in India. It gets the name from dominance of "bans" or bamboo forests. It is also known as 'City of Hundred Islands', due to presence of numerous islands in the Mahi River, which flows through Banswara. Banswara is located at 23°33′N 74°27′E / 23.55°N 74.45°E / 23.55; 74.45. It has an average elevation of 302 metres (990 ft).
Part of Banswara was earlier included in Malwa region.
Contents |
Origin of Panwar
Dr Atal Singh Khokhar says in his book “Jaton ki utpati evam vistar” [1]that the Banswara inscription of Parmara king Bhoja indicates that his ancestor Siyaka, Siyaka’s son Vakpatiraja, Vakpatiraja’s son Sindhuraja, his son Bhojdeo came from Kasala in east Sudan to Gagar river in Nigeria and from there to Dor in Israel where he became ruler. Bhoja settled his followers at Bataneaea Assyria province’s Damiscus, Dara’s area and made Dara his capital. From there he came to Maharashtra and conquered Konkan area. He had defeated raja Keshideo of Shilahar vansha with the help of Rajendra Chol. [2]
Bhadrakali Temple Bajna
- Bhadrakali Temple Bajna - We also find the temple of Bhadrakali at place called Bajna at a distance of 36 km from Ratlam city in Malwa region. This Bhadrakali temple is of the period of Parmara rulers and known as Garhkhankhai mataji. This temple is situated in dense forested area of the valley at the sangam of Karan river and Mahi river. Raja Bhoj had constructed this temple. This place is also recognized as shaktipitha in India. The excavations at this site has produced rare idols of Shiva in yoga pose, Lakshami, Gajasursanhar, Surya and Nataraja. The world famous 'Tripurasundari ma' temple at a distance of 60 km from this place is situated at village Talwada in Banswara district in Rajasthan. An inscription of 1540 AD found here reveals that this temple was constructed prior to the rule of Kanishka. Some people believe it to be constructed before 3rd century AD. There was a very ancient place here known as 'Garhpoli' which is called as 'Umarai' at present. Excavations in 1982 at this place have produced idols of Shiva with Parvati on his thigh. Ganesha and Kartikeya are seated on both sides.[3]
Jat Gotras in Banswara district
Bagaria, Doot, Garhwal, Puniya, Rana,
बांसवाड़ा का परिचय
राजस्थान का बांसवाड़ा शहर ऎसा क्षेत्र है जहां मध्यप्रदेश गुजरात और राजस्थान, तीनों ही लोक संस्कृतियों के सम्यक् रूप से दर्शन किए जा सकते हैं।
प्राचीनकाल में यहां के शासकों ने एक से बढ़कर एक भव्य राजमहल, दुर्ग, जल महल, देवालय और दर्शनीय स्थलों का निर्माण किया है, वहीं आधुनिक काल में भी माही बांध के जल भराव से अनेकानेक दर्शनीय स्थल बने हैं।
धार्मिक एवं पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण यह शहर अब राजस्थान के खूबसूरत और मनोहारी शहरों में गिना जाने लगा है।
अरावली पर्वत श्रृंखला की सुरम्य पहाड़ियों के पृष्ठबल से युक्त इस मनोहारी क्षेत्र में प्रकृति अपनी पूरी छटा बिखेरती है। चारों तरफ लक-दक हरियाली और विस्तृत भाग में व्याप्त राजतालाब में लबालब भरा पानी यहां की प्राकृतिक छटा को चार चांद लगा देता है।
बांसवाड़ा में प्रकृति प्रेमी शासकों ने अतीत में शहर के चारों ओर स्थित तालाबों पर पक्के घाट बनवाये और उन्हें प्रकृति विहार की स्थली बनाया। शहर के पूर्व में बाई तालाब, जिसे अब आनंद सागर कहा जाता है, उत्तर में डायलाब तथा दक्षिण में राजतालाब बनाया हुआ है। इनमें राजतालाब का स्थान महत्त्वपूर्ण रहा है, जिस क्षेत्र में यह स्थल है उसे पृथ्वीगंज के नाम से यहां के शासक महाराजा पृथ्वीसिंह से जाना जाता है।
राज तालाब के चारों और पक्का परकोटा बना हुआ है। इसी प्रकार दोनों तरफ जिस तरह के घाट बनाये गये हैं वे स्थापत्य कला का विशिष्ट नमूना है। इन घाटों के मध्यवर्ती भाग पर मंदिरनुमा स्थल है। बरसात के बाद पहाड़ों की हरियाली को प्रतिबिम्बित करती पानी की लहरें अठखेलियां खाती हुई यहां के सौन्दर्य का बखान करती हैं वहीं ठंडी हवा के झौंके हर किसी को सुकून देते हैं।
भगवानदासजी महाराज की छतरी
राजतालाब के दक्षिणी पाश्र्व में बने विस्तृत घाट और परिसर पर भगवानदासजी महाराज की छतरी नामक स्थल है, जो जन-जन की आस्था का केन्द्र है। भगवानदासजी इस क्षेत्र में बहुत बड़े सिद्ध एवं चमत्कारिक महात्मा हुए हैं, जिन्होंने अपने समय में कठोर तपस्या से ईश्वरीय शक्ति हांसिल की और इसका उपयोग जन कल्याण के कार्यों में किया। यह इस शताब्दी के आरंभिक दिनों की बात है। उन दिनों भगवानदासजी महाराज के धार्मिक उपदेशों की बदौलत यह स्थल आध्यात्मिक जागृति का तीर्थ बन गया। उनकी स्मृति में भक्तजनों ने इस स्थल पर समाधि, छतरी व देवालय निर्मित कराये हैं। यहां कुछ अन्य संतों की छतरियां भी हैं। बांसवाड़ा शहर के काफी संख्या में भक्तगण वहां जाकर पूजा-अर्चना करते हैं। ख़ासकर नागर जाति के ब्राह्मणों की इस स्थल के प्रति अगाध आस्था और आदर है।
वर्ष में एक बार देव-दीवाली पर भगवानदासजी की छतरी वाले क्षेत्र में मेला लगता है। मेलार्थी भक्तजन सांझ ढलते ही जब असंख्य दीप जलाकर उनका जल में विसर्जन करते हैं तब समूचा राजतालाब दीपों की जगमगाहट और उनके बिम्ब-प्रतिबिम्बों से बड़ा ही मनोहारी हो उठता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि अलौकिक संत समाधिस्थ होने बाद भी यहां विचरते हैं। कई बार लोगों ने धवल वस्त्रों में महाराज की मूर्ति को इस परिक्षेत्र में विचरण करते भी देखा है। विशेषकर पूर्णिमा की रात को यह नज़ारा दिखाई देता है।
इस छतरी के पाश्र्व में स्थित पुराने कुएं को लेकर जन-विश्वास है कि इसका पानी अत्यंत पाचक है। तत्कालीन महारावल लक्ष्मणसिंह और अन्य शासकों द्वारा इस कुएं का पानी मंगवाकर पीने के उदाहरण हैं। यहां एक धर्मशाला भी है। जन श्रद्धा है कि भगवानदास जी महाराज की छतरी पर आकर जो भी मनोकामना की जाती है वह अवश्य पूरी होती है। यह छतरी आशाओं का वह द्वार है जहां से व्यथा लेकर आने वाला मुस्कान लेकर लौटता है।
राजतालाब की पाल के दूसरी ओर सड़क सतह से काफी नीचे लंबे-चौड़े क्षेत्र में आम्रों की झुरमुट के बीच राधाकुंड नामक प्राचीन स्थल है, जो हरिद्वार और प्रयाग की तरह पवित्र एवं मोक्षदायक माना गया है। इस स्थल के चारों ओर प्राचीन शिल्प की बनी छोटी-छोटी मंदरियां हैं और इन सबके बीच में एक गहरा जलकुंड है, जहां का पानी निर्मल और शीतल है। इस बारे में कहा जाता है कि यह पंद्रहवीं शताब्दी के बाद बना है। यहां के मंदिरों व कुण्ड की मरम्मत और जीर्णोद्वार कर इसे पूर्ववत बनाये जाने को लेकर नागर समाज ने काफी प्रयास किए हैं। राधाकुण्ड ख़ासकर पितरों के श्राद्ध, क्रियाकर्म, और अस्थि विसर्जन के लिए प्रयुक्त होता रहा है और आज भी लोग वहां जाकर पितरों के निमित्त मोक्षकारक कर्म करते हैं। मुंडन, स्नान एवं तर्पण इत्यादि भी करते हैं।
वीर तेजाजी का स्थानक एवं मंदिर
राजतालाब के मुख्य चौक पर लोक देवता वीर तेजाजी का स्थानक एवं मंदिर है, जो बहुत पुराना है। लोकदेवता तेजाजी के प्रति बांसवाड़ा जिले में इस कदर जनास्था रही है कि इस स्थल पर मेला भरता रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में यह मेला बहुत कम होकर रह गया है। मान्यता है कि तेजाजी की पूजा-अर्चना करते रहने से नारू का रोग नहीं लगता। लोग-बाग यहां आकर चांदी के तार चढ़ाते हैं, इन तारों को स्थानीय भाषा में ‘वारा’ कहा जाता है।
नदी-नालों से घिरा यह वनवासी इलाका काफी समय पहले तक ‘नारू’ रोग का प्रकोप स्थल माना जाता रहा है। उन दिनों नारू निकलना आम बात थी। लोगों की मान्यता थी कि कृमि रोग और नारू निकलना दैवी प्रकोप के कारण ही होता है। ऎसे में देवता को खुश करने के लिए उस समय लोग भांति-भांति के टोने-टोटकों और मंत्र-तंत्रों का सहारा लिया करते। तेजाजी के प्रति लोगों में गहरा विश्वास था कि उनकी कृपा से नारू या कृमि रोग का कष्ट सहन नहीं करना पड़ता है।
नारू रोग से ग्रस्त रोगी तेजाजी बावसी के नाम से पीड़ित अंग पर धागा बांध देते, इसे ‘तांती’ कहा जाता है, इससे धीरे-धीरे कष्ट जाता रहता है और लोग भले-चंगे हो जाते। इसके बाद जब भी भादों मास की शुक्ल पक्ष की दशमी को लगने वाले मेले में आकर नर-नारी तेजाजी की प्रतिमा की विविध उपचारों से पूजा-अर्चना करते और अपनी-अपनी बाधा के अनुसार अलग-अलग लंबाइयों के चांदी के तारों को ‘नारू’ का प्रतीक मानकर तेजाजी के चरणों में समर्पित करते। यह क्रम आज भी निर्बाध रूप से चला आ रहा है। लोग कहते हैं.....‘वारो सडाव्यो ऎटले वारो ग्यो’। मेले के अवसर पर भक्तजन तेजाजी की शौर्य गाथाएं सुना-सुनाकर वातावरण को दिव्य शब्दों से गुंजायमान कर देते हैं। यह स्थान दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। हालांकि इस क्षेत्र में नारू के करीब-करीब पलायन के बाद से अब श्रद्धालुओं की संख्या कम हो चली है।
इसके निकट ‘काली कल्याण धाम’ है जो दीन-दुखियों के कष्ट निवारण के लिए प्रसिद्ध रहा है। यहां कला राठौड़ का एक मंदिर बना हुआ है, जहां के प्रतिष्ठापक बद्रीदास महाराज को कलाजी एवं अन्य दिव्य पुरुषों के भाव आते हैं और उस स्थिति में वे लोगों को उनके दुःख-दर्द निवारण के उपाय बताते हैं व कुछ रोगों का प्रारंभिक ईलाज भी करते हैं। अब महन्त डॉ. बद्रीदास महाराज का स्थानक चित्तौड़गढ़ में हो गया है।
यहां संत उदासी महाराज की छतरी है। ये भी संत भगवानदासजी महाराज की ही तरह अलौकिक सिद्ध एवं चमत्कारपूर्ण महात्मा थे। यहां उनकी धूंणी है, जो श्रद्धा का धाम है। विस्तृत भू-भाग में फैले काली कल्याण धाम में बहुत बड़ी धर्मशाला व विश्राम गृह है।
राजतालाब एवं इसके निकट के क्षेत्र में दो प्राचीन स्मारक हैं इनमें एक शहर विलास की कोठी तथा दूसरा राजतालाब क्षेत्र का विशालकाय दरवाजा है। शहर विलास की कोठी वहां से कुछ दूर एक ऊंचे पहाड़ पर स्थित है। तिमंजिला इस कोठी की छत से सारे बांसवाड़ा शहर के विहंगम दृश्य का आनन्द लिया जा सकता है। यहां के राजा ने गोल घेरे वाली इस विशालकाय कोठी को इसलिए बनवाया था, ताकि राज परिवार शहर का नज़ारा देख सके। राजा द्वारा यहां से शिकार का आनन्द भी लिया जाता था। कहा जाता है कि शहर विलास की कोठी से राज महल तक कोई गुप्त गुफा मार्ग है। जनश्रुति के अनुसार इस कोठी के नीचे काफी मात्रा में धन भी गड़ा हुआ है। राजतालाब का विशाल दरवाजा निर्माण की अद्भुत कला का जीर्ण-शीर्ण उदाहरण है। यहां राजाओं के जमाने में दरवाजे के अंदर राजा का हाथी बांधा जाता था। कुछ वर्ष पूर्व तक वहां हाथी को बांधने में प्रयुक्त की जाने वाली लोहे की भारी-भरकम सांकले भी थी, लेकिन अब नहीं है। दरवाजे के पास ही आचार्य मन्दिर है जिसका संबंध पुष्टिमार्गीय सम्प्रदाय से माना जाता है।
देवझूलनी ग्यारस के दिन यहां परम्परागत मेला लगता है, जो शहरी क्षेत्र का सबसे बड़ा मेला होता है व इसमें शहरवासियों के अलावा गांवों से भी हजारों-हजार लोग भाग लेते हैं। इस दिन शहर भर के देवालयों की राम रवाड़ियां यहां सम्मिलित होती हैं, झूले-चकड़ोल लगते हैं और अखाड़ों का करतब होता है। वहां से सारा धार्मिक जुलूस वापस शहर की ओर जाता है, जिसकी जगह-जगह पूजा-अर्चना होती है। राजाओं के जमाने में शासक की सवारी निकलती थी। मेले का दृश्य बड़ा ही मनोरम हो जाता है। पश्चिमांचल का लाल सूर्ख सूरज, हरियाली के लक-दल वातावरण, पानी से लबालब राजतालाब के मुहाने रखी श्रृंखलाबद्ध देव रवाड़ियां, उनके निकट घंटे-घड़ियालों के साथ आरति और भजन-कीर्तनों की लहर, शंखनाद और अखाड़ों के हैरत अंगेज करतबों से समूचा परिक्षेत्र महाआह्लाद का स्रोत बन जाता है और तब लगता है मानों अध्यात्म, मनोरंजन और उमड़ती जनमेदिनी पारंपरिक उल्लास और श्रद्धा का ज्वार उफना रही हो। निरंतर उपेक्षा और अनदेखी से राजतालाब क्षेत्र अपनी पहचान खोता जा रहा है। इस स्थल के पर्यटन विकास पर पर्याप्त ध्यान दिया जाना चाहिए। इसके लिए यह जरूरी है कि समूचे क्षेत्र से अतिक्रमण हटाकर जीर्ण-शीर्ण देवालयों का व्यवस्थित ढंग से उद्धार किया जाय, तालाब को निरन्तर संकीर्ण करने जैसी प्रवृत्तियों पर रोक लगे और राज तालाब की पाल एवं रिंगवाल को ठीक कर मेलास्थल का विस्तार किया जाय और पारंपरिक मेले को सुव्यवस्थित करने के लिए कारगर कदम उठाये जाए। राजतालाब का शहरी पर्यटन दृष्टि से विकास किया जाए तो यह उदयपुर की पिछोला और फतहसागर झील क्षेत्र की तरह पर्यटकों का धाम बन सकता है।
Back to Jat Villages



