Mool Chand Siyag

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चौधरी मूलचन्द सियाग

चौधरी मूलचन्द सियाग (1887 - 1978) राजस्थान में नागौर जिले के महान जाट सेवक, किसानों के रक्षक तथा समाज-सेवी महापुरुष थे। आपने अपने काम के साथ ही अपनी समाज-सेवा, ग्राम-उत्थान ओर शिक्षा प्रसार की योजनानुसार गांव-गांव में घूम-घूम कर किसानों के बच्चों को विद्याध्ययन की प्रेरणा दी। आपने मारवाड़ में छात्रावासों की एक श्रंखला खड़ी कर दी | आपने "मारवाड़ जाट कृषक सुधारक सभा" और "मारवाड़ किशान सभा" नामक संस्थाओं की स्थापना की । आपने मारवाड़ जाट इतिहास की रचना करवाई ।

मारवाड़ में किसानों की हालत

जिस समय चौधरी मूलचन्द का जन्म हुआ, उस समय मारवाड में किसानों की हालत बडी दयनीय थी। मारवाड का ८३ प्रतिशत इलाका जागीरदारों के अधिकार में था इन जागीरदारों में छोटे-बडे सभी तरह के जागीदार थे। छोटे जागीरदार के पास एक गांव था तो बडे जागीरदार के पास बारह से पचास तक के गांवो के अधिकारी थें और उन्हें प्रशासन, राजस्व व न्यायिक सभी तरह के अधिकार प्राप्त थे। ये जागीरदार किसानों से न केवल मनमाना लगान (पैदावार का आधा भग) वसूल करते थे बल्कि विभिन्न नामों से अनेक लागबाग[1] व बेगार भी वसूल करते थें किसानों का भूमि पर कोई अधिकार नहीं था और जागीरदार जब चाहे किसान को जोतने के लिए दे देता थां किसान अपने बच्चों के लिए खेतों से पूंख (कच्चे अनाज की बालियां) हेतु दो-चार सीटियां (बालियां) तक नहीं तोड सकता था। जबकि इसके विपरीत जागीरदार के घोडे उन खेतों में खुले चरते और खेती को उजाडते रहते थे और किसान उन्हें खेतों में से नहीं हटा सकते थे। इसके अलावा जागीरदार अपने हासिल (भूराजस्व) की वसूली व देखरेख के लिए एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी जो ‘कण्वारिया‘ कहलाता था, रखता था। यह कणवारिया फसल पकने के दिनों में किसानों की स्त्रियों को खतों से घर लौटते समय तलाशी लेता था या फिर किसानों के घरों की तलाशी लिया करता था कि कोई किसान खेत से सीटियां तोडकर तो नहीं लाया है। यदि नया अनाज घर पर मिल जाता था तो उसे शारीरिक और आर्थिक दण्ड दोनों दिया जाता था।

लगान के अलावा जागीरदारों ने किसान का शोषण करने के लिए अनेक प्रकार की लागें (अन्य कर) लगा रखी थी जो विभिन्न नामों से वसूल की जाती थी, जैसे मलबा लाग, धुंआ लाग आदि-आदि इसके अलावा बैठ-बेगार का बोझ तो किसानों पर जागीरदार की आरे से इतना भारी था कि किसान उसके दबाव से सदैव ही छोडकर जागीरदार की बेगार करने के लिए जाना पडता था। स्वयं किसान को ही नहीं, उनकी स्त्रियों को भी बेगार देनी पडती थी। उनको जागीरदारों के घर के लिए आटा पीसना पडता था। उनके मकानों को लीपना-पोतना पडता था और भी घर के अन्य कार्य जब चाहे तब करने पडते थे। उनका इंकार करने का अधिकार नहीं था और न ही उनमे इतना साहस ही था। इनती सेवा करने पर भी उनको अपमानित किया जाता था। स्त्रियां सोने-चांदी के आभूषण नहीं पहन सकती थी। जागीरदार के गढ के समाने से वे जूते पहनकर नहीं निकल सकती थी। उन्हें अपने जूते उतारकर हाथों में लेने पडते थे। किसान घोडों पर नहीं बैठ सकते थे। उन्हे जागीरदार के सामने खाट पर बैठने का अधिकार नहीं था। वे हथियार लेकर नहीं चल सकते थें किसान के घर में पक्की चीज खुरल एव घट्टी दो ही होती थी। पक्का माकन बना ही नहीं सकते थे। पक्के मकान तो सिर्फ जागीरदार के कोट या महल ही थे। गांव की शोषित आबादी कच्चे मकानों या झोंपडयों में ही रहती थी। किसानों को शिक्षा का अधिकार नहीं था। जागीरदार लोग उन्हें परम्परागत धंधे करने पर ही बाध्य करते थे। कुल मिलाकर किसान की आर्थिक व सामाजिक स्थिति बहुत दयनीय थी । जी जान से परिश्रम करने के बाद भी किसान दरिद्र ही बना रहता था क्योंकि उसकी कमाई का अधिकांश भाग जागीरदार और उसके कर्मचारियों के घरों में चला जाता था। ऐसी स्थिती में चौधरी मूलचन्द ने मारवाड के किसानों की दशा सुधारने का बीडा उठाया।

चौधरी श्री मूलचन्दजी का जीवन परिचय

चौधरी श्री मूलचन्दजी का जन्म वि.सं. १९४४ (१८८७ई.) पौष कृष्णा ६ को नागौर से लगभग ६ मील उत्तर बालवा नामक एक छोटे-से गांव में चौधरी श्री मोतीरामजी सियाग के घर हुआ था। इनकी माताजी का नाम दुर्गादेवी था। जब ये ९ वर्ष के हुए तब आफ पिताजी ने इन्हें नजदीक के गांव अलाय में जैन यति गुरांसा अमरविजयजी के पास उपासरे में पढने हेतु भेज दिया। उपासरे में भोजन और निवास दोनों सुविधाएं थी। उपासरे के बाहर गांव में भी एक अन्य स्थान पर शिक्षक पुरानी पद्धति से हिन्दी भाषा और गणित के पहाडे व हिसाब करना आदि पढाते थे, मूलचन्दजी उपासरे के अलावा वहां भी पढने जाने लगे। जैन उपासरे की अनुशासित व संयमी दिनचर्या यथा समय पर उठना, शौच जान, उपासरे की सफाई करना, स्नान, भोजन और फिर पढने जाना आदि से मूलचन्दजी में समय का सदुपयोग व परिश्रम करने की आदत विकसित हुई। तीन वर्ष तक यही क्रम चलता रहा जिसेस आपको पढने-लिखने व हिसाब किताब का पूरा ज्ञान हो गया। प्रायः सब प्रकार की हिनदी पुस्तकों को आप पढने और समझने लगे थे। कुछ संस्कृत के लोक भी अर्थ सहित याद कर लिये गये थे। गणित के जटिल प्रश्नों को हल करने की क्षमता भी विकसित हो गयी थी। उपासरे में धर्म-चर्चा व उससे सम्बंधित प्राप्त पुस्तकें, प्रवासी जैन बंधुओं से मिलना व उनसे चर्चा करना आदि से आपका ज्ञान बढता ही गया, बुद्धि में प्रखरता और विचारों में व्यवहारिक पढाई में पारंगत हो जाने के बाद चौधरी मूलचन्दजी अपने अध्यापक व जैन गुरांसा से आर्शीवाद लेकर पास के एक गांव गोगे लाव में बच्चों को पढाने हेतु अध्यापक बनकर चले गये।

अलया में जहां चौधरी साहब विद्यार्थी थे, वहां गोगेलाव में अध्यापक होने के नाते इन्हें अपने व्यवहार में बदलाव लाना पडा। गांव में अब विद्यार्थियों के अलावा गांववासी भी आपका सम्मान व अभिवादन करते थे। आप वहां विद्यार्थियों को हिन्दी व गणित पढाने के साथ व्यवहारिक ज्ञान और सदाचरण की शिक्षा भी देते थे। पढने वाले बच्चों में ज्यादातर महाजनों के बच्चे थे। चौधरी सहाब का इन दिनों ऐसे व्यक्तियों से समफ हुआ। जो अंग्रेजी जानते थे। तब इन्हें भी अपने में अंग्रेजी ज्ञान की कमी महसूस होने लगी और धीरे-धीरे इनमें अंग्रेजी पढने की जिज्ञासा बढने लगी। गोगेलाव में अंग्रेजी पढना संभव नहीं था, क्योंकि एक तो वे स्वयं अध्यापक थे, और दूसरा यहां जो भी अंग्रेजी पढे-लिखे लोग आते थे, अधिक समय नहीं ठहरते थे और छुट्टी पर चले जाते थे। अन्त में अंग्रेजी पढने की इच्छा अधिकाधिक बलवती होने पर ढाई-तीन वर्ष गोगेलाव में रहने के बाद पुनः अलाव लौट आये।

चौधरी मूलचन्दजी अलाव में वापिस गुरांसा के पास जैन उपासरे में रहनें लगे और अंग्रेजी की शिक्षा प्राप्त करने हेतु रेल्वे के बाबू और स्टेशन मास्टर के पास आने जाने लगे और अंग्रेजी पढने लगे। अब चौधरी साहब को उपासरे में भोजन करने से ग्लानि होने लगी तो उन्होंने रेल्वे गार्ड से कोई काम दिलाने की प्रार्थना की। गार्ड इन्हें सूरतगढ ले गया और वहां रेल्वे के पी.डब्ल्यू.आई. के यहां नौकर रखवा दिया। कुछ दिनों तक घर पर कार्य करने के बाद गार्ड ने इन्हें आठ रूपया मासिक पर रेल्वे की नौकरी मे लगा दिया, जहां टंकी में पानी ऊपर चढाने वाली मशीन पर काम करना था। इनके बडे भाई श्री रामकरणजी उस समय कमाने के लिए कानपुर गये हुए थें जब वह वापिस घर आये, चौधरी मूलचन्दजी को भी अपने साथ कानपुर ले गये ताकि ज्यादा कमाया जा सके। परन्तु जब वहां इनके लायक कोई काम नहीं मिला तो आप पुनः सूरतगढ लौट आये। चौधरी साहब अब यहां अस्पताल जाकर कपाउण्डरी का काम सीखने लगे। कुछ दिनों बाद यहीं पर आपका परिचय पोस्ट ऑफिस के संसपेक्टर महोदय से हुआ जिन्होने पोस्ट ऑफिस में मेल-पियोन के पद पर लगा दिया। कुछ दिनों तक काम सीखने के बाद आपको एक महीने में पोस्टमैन बनाकर महाजन (बीकानेर रियासत) स्टेशन भेज दिया। वहां चौधरी साहब डाक बांटने हेतु घर-घर और गांव-गांव घूमने लगे और अनेक व्यक्तियों के संफ मे आने लगें अत्यन्त मनोयोग व प्रसननतापूर्वक काम करने के कारण महाजन के सभी समाज और वर्गों के लोग इनसे बहुत खुश थें इसी बीच इनका तबादला सूरतगढ हो गया। वहां वह पहले भी रह चुके थे। सूरतगढ में आप कई वर्ष तक रहे। इस दौरान अनेक विषयों की पुस्तकों के पठन तथा मनन और विशिषटजनों के सत्संग के साथ पोस्टमैन का कार्य बडी इ्रमानदारी से करते रहें सूरतगढ से फिर आपका तबादला नोखा हो गया, जहां ढाई तीन वर्ष के लगभग रहें अन्त में नोखा से आपकी बदला अपने ही घर नागौर में हो गई।

इस दौरान चौधरी साहब के मन में समाज-सेवा का भव पैदा हो गया था और वह इस दिशा में कर्या करने लग गये थे। नागौर में आपको देहातो में डाक वितरण का कार्य सौंपा गया था। आप अपने काम के साथ् ही अपनी समाज-सेवा, ग्राम-उत्थान ओर शिक्षा प्रसार की योजनानुसार गांव-गांव में घूम-घूम कर किसानों के बच्चों को विद्याध्ययन की प्रेरणा देने लगे। इससे जागीरदारों को बडी तकलीफ होने लगी और उन्होंने अपने प्रभाव का इस्तमाल कर इनका स्थनान्तरण गांवो से नागौर शहर की ड्यूटी पर करवा दियां फिर भी आप अपने मिशन में लगे रहे और जब समाज-सेवा के कार्य भार ज्यादा बढने लगा तो आपने १९३५ ई. में नोकरी से त्यागपत्र देकर पूरे जोश के साथ कृषक समाज के उत्थान के कार्य में जुट गये और अनेक कष्टों को सहते हुए अंतिम सांस तक इसी कार्य में लगे रहे।

शिक्षा के माध्यम से जन सेवा

चौधरी मूलचन्दजी जी के मन में शिक्षा के माध्यम से जन सेवा की प्रेरणा जाट स्कूल संगरिया से मिली । आपके प्रयास से ४ अप्रेल १९२७ को चौधरी गुल्लारामजी के मकान में "जाट बोर्डिंग हाउस जोधपुर" की स्थापना की । चौधरी मूलचन्दजी की इच्छा नागौर में छात्रावास खोलने की थी. आपने अपने घर पर कुछ छात्रों को पढ़ने के लिए रखा. बाद में बकता सागर तालाब पर २१ अगस्त १९३० को नए छात्रावास की नींव डाली । इस छात्रावास के खर्चे की पूरी जिम्मेदारी चौधरी मूलचन्दजी पर थी ।

आपने जाट नेताओं के सहयोग से अनेक छात्रावास खुलवाए । बाडमेर में १९३४ में चौधरी रामदानजी डऊकिया की मदद से छात्रावास की आधारशिला रखी । १९३५ में मेड़ता छात्रावास खोला । आपने जाट नेताओं के सहयोग से जो छात्रावास खोले उनमें प्रमुख हैं:- सूबेदार पन्नारामजी धीन्गासरा व किसनाराम जी रोज छोटी खाटू के सहयोग से डीडवाना में, इश्वर रामजी महाराजपुरा के सहयोग से मारोठ में, भींयाराम जी सीहाग के सहयोग से परबतसर में, हेतरामजी के सहयोग से खींवसर में छात्रावास खुलवाए । इन छात्रावासों के अलावा पीपाड़, कुचेरा, लाडनुं, रोल, जायल, अलाय, बीलाडा, रतकुडि़या, आदि स्थानों पर भी छात्रावासों की एक श्रंखला खड़ी कर दी । इस शिक्षा प्रचार में मारवाड़ के जाटों ने अपने पैरों पर खड़ा होने में राजस्थान के तमाम जाटों को पीछे छोड़ दिया ।

मारवाड़ जाट कृषक सुधारक सभा के संस्थापक

सन् १९३७ में चटालिया गांव के जागीरदार ने जाटों की ८ ढाणियों पर हमला कर लूटा और अमानुषिक व्यवहार किया । चौधरी साहब को इससे बड़ी पीड़ा हुई और उन्होंने तय किया की जाटों की रक्षा तथा उनकी आवाज बुलंद करने के लिए एक प्रभावसाली संगठन आवश्यक है । अतः जोधपुर राज्य के किसानों के हित के लिए २२ अगस्त १९३८ को तेजा दशमी के दिन परबतसर के पशु मेले के अवसर पर "मारवाड़ जाट कृषक सुधारक सभा" नामक संस्था की स्थापना की । चौधरी मूलचंद इस सभा के प्रधानमंत्री बने, गुल्लाराम जी रतकुडिया इसके अध्यक्ष नियुक्त हुए और भींया राम सिहाग कोषाध्यक्ष चुने गए । इस सभा का उद्देश्य जहाँ किसानों में में फ़ैली कुरीतियों को मिटाना था, वहीं जागीरदारों के अत्याचारों से किसानों की रक्षा करना भी था.

मारवाड़ किसान सभा की स्थापना

किसानों की प्रगती को देखकर मारवाड़ के जागीरदार बोखला गए । उन्होंने किसानों का शोषण बढ़ा दिया और उनके हमले भी तेज हो गए । जाट नेता अब यह सोचने को मजबूर हुए की उनका एक राजनैतिक संगठन होना चाहिए । सब किसान नेता २२ जून १९४१ को जाट बोर्डिंग हाउस जोधपुर में इकट्ठे हुए जिसमें तय किया गया कि २७ जून १९४१ को सुमेर स्कूल जोधपुर में मारवाड़ के किसानों की एक सभा बुलाई जाए और उसमें एक संगठन बनाया जाए । तदानुसार उस दिनांक को मारवाड़ किसान सभा की स्थापना की घोषणा की गयी और मंगल सिंह कच्छवाहा को अध्यक्ष तथा बालकिशन को मंत्री नियुक्त किया गया.

मारवाड़ किशान सभा का प्रथम अधिवेशन २७-२८ जून १९४१ को जोधपुर में आयोजित किया गया । मारवाड़ किसान सभा ने अनेक बुलेटिन जारी कर अत्याधिक लगान तथा लागबाग[2] समाप्त करने की मांग की । मारवाड़ किसान सभा का दूसरा अधिवेशन २५-२६ अप्रेल १९४३ को सर छोटू राम की अध्यक्षता में जोधपुर में आयोजित किया गया । इस सम्मेलन में जोधपर के महाराजा भी उपस्थित हुए । वास्तव में यह सम्मेलन मारवाड़ के किसान जागृति के इतिहास में एक एतिहासिक घटना थी । इस अधिवेशन में किसान सभा द्वारा निवेदन करने पर जोधपुर महाराज ने मारवाड़ के जागीरी क्षेत्रों में भूमि बंदोबस्त शु्रू करवाने की घोषणा की । मारवाड़ किसान सभा जाटों के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि थी ।

मारवाड़ जाट इतिहास के रचयिता

१९३४ में सीकर में आयोजित जाट प्रजापति महायज्ञ के अवसर पर ठाकुर देशराज ने 'जाट इतिहास' प्रकाशित कराया, तब से ही चौधरी मूलचन्दजी के मन में लगन लगी कि मारवाड़ के जाटों का भी विस्तृत एवं प्रमाणिक रूप से इतिहास लिखवाया जाए क्योंकि 'जाट इतिहास' में मारवाड़ के जाटों के बारे में बहुत कम लिखा है । तभी से आप ठाकुर देशराज जी से बार-बार आग्रह करते रहे । आख़िर में आपका यह प्रयत्न सफल रहा और ठाकुर देशराज जी ने १९४३ से १९५३ तक मारवाड़ की यात्राएं की, उनके साथ आप भी रहे, प्रसिद्ध-प्रसिद्ध गांवों व शहरों में घूमे, शोध सामग्री एकत्रित की, खर्चे का प्रबंध किया और १९५४ में "मारवाड़ का जाट इतिहास" नामक ग्रन्थ प्रकाशित कराने में सफल रहे । मारवाड़ के जाटों के लिए चौधरी मूलचंदजी की यह अमूल्य देन थी ।

जाट जाति के गौरव को प्रकट करने वाले साहित्य के प्रकशान व प्रचार में भी चौधरी मूलचंदजी की बड़ी रूचि थी । ठाकुर देशराज जी द्वारा लिखित 'जाट इतिहास' के प्रकाशन व प्रचार में आपने बहुत योगदान दिया एवं जगह-जगह स्वयं ने जाकर इसे बेचा । 'जाट वीर तेजा भजनावाली' तथा 'वीर भक्तांगना रानाबाई' पुस्तकों का लेखन व प्रकाशन भी आपने ही करवाया था । आपने जाट जाति के सम्बन्ध में उस समय तक जितना भी साहित्य प्रकाशित हुआ था, उसे मंगवाकर संग्रह किया तथा उसके लिए नागौर के छात्रावास में एक पुस्तकालय स्थापित किया । अब यह पुस्तकालय आपके नाम से "श्री चौधरी मूलचंदजी सीहाग स्मृति जाट समाज पुस्तकालय" किशान केसरी श्री बल्देवराम मिर्धा स्मारक ट्रस्ट धर्मशाला नागौर में स्थित है ।

चौधरी मूलचन्द जी का मूल्यांकन

चौधरी मूलचन्द जी सीहाग का मूल्यांकन करें तो वे अपने आप में एक जीवित संस्था थे, उनके द्वारा स्थापित संस्थाएं तो केवल उनकी छाया मात्र थी । वे भारत के अन्य प्रान्तों में 'राजस्थान के महारथी' के नाम से प्रसिद्ध थे । उन्होंने अपना पूरा जीवन जातीय सेवा व मारवाड़ के किसानों की दशा सुधारने व उन्हें ऊंचा उठाने में लगा दिया और जीवन के अन्तिम समय तक उसमें लगे रहे । उनकी सेवाओं के लिए १७ जनवरी १९७५ को विशाल समारोह में मारवाड़ के कृषक समाज की और से आपको एक अभिनन्दन पत्र भेंट किया गया जिसमें आपको "किशान जागृति के अग्रदूत" और 'कर्मठ समाज सुधारक' के रूप में याद किया

चौधरी बलदेव राम जी मिर्धा तो यहाँ तक कहा करते थे की मुझे जनसेवा के कार्य को करने में यदि किसी एक व्यक्ति ने प्रेरणा दी तो वह चौधरी मूलचन्द जी सीहाग थे । ऐसे महान जाट सेवक, किसानों के रक्षक तथा समाज-सेवी चौधरी मूलचन्द जी सीहाग का देहावसान पौष शुक्ला १३ संवत २०३४ तदनुसार शनिवार २१ जनवरी १९७८ को हो गया.

मूर्ति अनावरण

3 जनवरी 2015 को किसान छात्रावास नागोर में जाट समाज की ओर से किसान जागृति के प्रणेता स्व. मूल चंदजी सिहाग की मूर्ति का अनावरण किया गया। इसके बाद एक करोड़ की लागत से तैयार छात्रावास में नवनिर्मित हाल का लोकार्पण किया । इस अवसर पर नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी, सहकारिता मंत्री अजय सिंह किलक व सांसद सी. आर. चौधरी तथा अन्य गणमान्य नागरिकों के साथ ही मूलचंद जी की पुत्रवधू शायरी देवी उपस्थित थी। (जाट-परिवेश, जनवरी, 2015)

Author लेखक: Laxman Burdak लक्ष्मण बुरड़क

संदर्भ

Translation in English by Dayanand Deswal

Chaudhary Mool Chand Siyag


Chaudhary Mool Chand Sihag (1887-1978) hailed from Nagaur district of Rajasthan, a great social reformer and messiah of farmers, who rendered valuable service to the Jat community. Apart from his own profession, he did commendable social service, tried to ameliorate living conditions in villages by inspiring village kids to get school education. He also established a chain of student hostels in the Marwar region. He established two famous institutions – The Marwar Jat Farmers' Reforms Society and “Marwar Farmer Union”. He also got published Marwar Jat History.


The conditions of farmers in Marwar


At the time of the birth of Ch. Mool Chand, the farmers of Marwar region were living in pitiable conditions. Almost 63 per cent of the region was under the occupation of tiny and big landlords. While the tiny landlords owned one single village each, the big landlords had 12-50 villages each, with all the rights in administration, revenue and judiciary. They not only collected taxes from farmers in the shape of 50% of grain production but also exploited them through the institution of bonded labour. The farmers had no ownership of the cultivated lands, landlords used to offer the land to farmer for ploughing, at their sweet will, the farmer was not allowed even to pluck a raw plant from the standing crop. The landlords used to employ a Class-IV employee called ‘Kanvariya’, whose duty was to body-search the farmers, their family members working in fields and also to search their houses at the time of harvest. If a portion of fresh crop was found inside the farmers’ homes, they were punished and fined.


The farmers were also exploited by way of other mini-taxes in different names – ‘garbage duty’, ‘smoke-duty’ etc. etc. The unemployment among farmers often prompted them to work under these big landlords, mostly as unpaid workers. Not only farmers, their wives had also to work as an un-paid worker. Even after so much of service, they were not allowed to wear gold or silver ornaments, they were also not permitted to wear shoes when passing in front of a Jagirdar’s house, when they had to pick up their shoes in hands. The farmers were not permitted to ride hordes, not were they allowed to be seated on a cot (charpai) in front of Jagirdars (landlords). They could not carry a weapon. Most of them used to live in mud houses and education was out of their reach. The rich jagirdars forced them to adopt only the traditional occupations. In totality, the economic and social conditions of farmers were pitiable; they remained utter poor even after hard work as their earnings were diverted towards the homes of big landlords and their employees. In such a time, Ch. Mool Chand undertook the task of upliftment of living conditions of farmers.


A glimpse of life of Ch. Mool Chand


Ch. Mool Chand was born in 1887 AD in the house of Ch. Motiram ji Sihag, in village Balwa, about 6 miles north of Nagaur town. His mother’s name was Mrs. Durga Devi. At the age of 9, he was sent to a school in the neighbouring village, Alai, run by a Jain monk. There, both the boarding and lodging were also available. In front of this Jain temple, there used to be another school where teachings were based on traditional mathematical tables, through Hindi language. Mool Chand started to attend to that school also. The Jain school had a disciplined and set routine like taking early bath on a daily basis, early wake-up, cleaning the premises, having food in time and going to bed early. This led to his better utilization of time and doing hard work. He read almost all available Hindi books, apart from solving mathematical quizzes and memorizing some Sanskrit shlokas with their meaning. The religious discussions at the Jain temple, the related literature, meeting the members of expatriate Jain community and engaging in discussions with them – all this led to his enhancement of knowledge. After gaining traditional skills and finishing his curriculum of syllabus and with the blessings of Jain monk, Ch. Mool Chand went to neighbouring village named Gogelav where he started teaching the village kids.


At this new place, Ch. Mool Chand had to mould his behaviour and habits according to the circumstances. Apart from students, the villagers also had great regard for him. Apart from teaching mathematics and Hindi, he used to render them the traditional knowledge and discipline. Most of the students were from well-to-do families. During those days, Mool Chand came across some gentlemen who had learnt English. After that, he felt the desire of learning English language but it was not possible to learn this in Gogelav village because of the fact that he himself was a teacher and the English teachers there were rarely available. After spending about three years in Gogelav, he returned to his own village, Alav.


He again began to live in the Jain temple and started learning English from a Railway station-master. Now, he felt guilty of dining in Jain temple and requested the railway-guard to try to get him some job. The railway-guard took him to Suratgarh and kept him in the service of a railway PWI. After working in the house of PWI, he got a job in the Railways on a monthly pay of 8 rupees where he started to operate a water-pump. Ch. Mool Chand’s elder brother, Ram Karan, was in Kanpur in those days. When he returned from Kanpur, he took Mool Chand with him to Kanpur so that a little more money could be earned. When a suitable job could not be found at Kanpur, Ch. Mool Chand returned to Suratgarh. There, he started learning a compounder’s job at the city hospital. After some time, he met with an inspector in the post office, who posted him as dak-sorter. After some training, he was sent to ‘Mahajan’ station in Bikaner State. There, he got a chance to move from house to house in so many villages and came in contact with many villagers. The people of Mahajan town were very happy with him, because of his excellent public service. In the meantime, he was transferred to Suratgarh, where he had lived earlier too. He served in Suratgarh for a couple of years where he got a chance to read books on varied subjects and came in contact with many prominent persons. He was doing a postman’s job honestly and after some time, got transferred to Nokha, where he remained for two-and-half years. After Nokha, he was transferred to his own home town, Nagaur.


During this period, he reared the concept of social service and started working in this direction. In Nagaur, he was entrusted with the task of distributing dak in remote villages. Apart from his village, he started to explaining to the villagers the importance of education among children, upliftment of villages and social services. On learning this, the big landlords became jealous of him and they succeeded in getting him transferred to Nagaur city, away from villages, by using their influence. There also, Ch. Mool Chand kept his mission alive and due to increased burden of social service, he ultimately resigned from postal service and devoted all his energies to the upliftment of poor sections of the society till the end of his life.


Public service through education


Ch. Mool Chand got the inspiration of public service through education from Jat School, Sangaria. Due to his efforts, on 4th April 1927, “Jat Boarding House, Jodhpur” was established in the house of Ch. Gullaram ji. Ch. Mool Chand desired to establish a Jat Student Hostel in his home town, Nagaur, where he kept some students in his own house and later, on 29 August 1930, the foundation of a new hostel was laid. The burden of expenses of this hostel was on the shoulders of Ch. Mool Chand himself.


With the cooperation of Jat leaders, he opened so many student hostels. In 1934, with the assistance of Ramdan Dookiya, a hostel was established in Barmer. In 1935, another one was opened at Merta. Among those hostels opened with the cooperation of Jat leaders, include (i) In Didwana (with the cooperation of Subedar Pannaram ji Dhingsara and Kisnaraam jee Roz Chhoti-khaatu) (ii) in Maroth (with the cooperation of Ishwar Ram ji of Maharajpura) (iii) Parbatsar (with the assistance of [[Bhinyaram Sihag) and (iv) Kheenvasar (with the assistance of Hetram ji). Apart from these hostels, he established a chain of Jat student hostels in Pipad, Kuchera, Ladnu, Rol, Jayal, Alai, Bilada and Ratkudiya. Due to these efforts, the Marwar Jats became self-reliant in the matter of education, leaving behind other Jats of Rajasthan in this field.


The founder of Marwar Jat Farmer Reforms Society


In 1937, the Jagirdar (Landlord) of Chatalia village attacked 7 mini-villages (dhanis) of Jats and did all sorts of inhuman treatments there. Ch. Mool Chand was greatly hurt on this and he felt the need of establishment of a strong organization for protection of Jats and to keep their voices loud. Ultimately on 22 August 1938, on the pious festival of Teja-Dashmi, at the time of cattle fair of Parbatsar, the organization named Marwar Jat Farmers' Reforms Society ("मारवाड़ जाट कृषक सुधारक सभा") was established. Mool Chand became its Secretary and Gullaram Ratkudiya got the Presidentship.


Seeing the progress of farmers, the Jagirdars of Marwar became furious. They intensified their attacks on farmers and starting exploiting in a more severe manner. This led the Jat leaders to think of a strong political organization. All the farmer leaders assembled in Jat Boarding House, Jodhpur on 22 June 1941, where it was decided that on 27 June 1941, there will be a meeting of Marwar farmers at Sumer School (Jodhpur), where the establishment of the organization will be announced. Accordingly, on that date, Marwar Jat Farmers' Reforms Society ("मारवाड़ जाट कृषक सुधारक सभा") came into existence. Mangal Singh Kachhwaha took charge as its President and Balkishan, as Secretary.


The first annual convocation of “Marwar Kisan Sabha” was held on 27-28 June 1941 in Jodhpur. The Kisan Sabha demanded abolition of excessive land-tax and “Lagbag” through several bulletins. Its second annual meet was held on 25-26 April 1943 under the Presidentship of Sir Chhotu Ram (another famous Jat leader of Haryana) in Jodhpur. Maharaja of Jodhpur also participated in this meet. It was indeed a historical event for the awareness and enlightenment of farmers. In this meet, the Maharaja of Jodhpur announced the beginning of land reforms in the areas under the influence of Jagirdars. The Marwar Kisan Sabha was perhaps the biggest achievement for Jats of Rajasthan.


The Writer of Jat History


In the year 1934, at the time of Jat Prajapati Mahayajna in Sikar, when Thakur Desraj got pubished “Jat History’, Ch. Mool Chand got the inspiration of publication of an authentic history of Marwar Jats, because ‘Jat History’ had very little content about Marwar Jats. From that time, he kept on requesting Thakur Desraj about it. In the end, his efforts brought fruit. From 1943 to 1953, Thakur Desraj toured extensively in Marwar region along with Ch. Mool Chand. They wandered in several villages and towns of the area, collected research material, managed necessary funds and in the year 1954, were successful in publishing “Marwar Jat History”. For the Jats of Marwar region, this was a valuable gift.


Ch. Moolchand was greatly interested in the publication and propagation of literature relating to Jat pride. He made a great contribution in publication and propagation of Thakur Desraj’s “Jat History”. Ch. Moolchand sold its copies by paying personal visits in villages. He also got published “Jat Veer Teja Bhajnavali” and “Veer Bhaktangana Ranabai”. Till that time, whatever literature could be made available, Ch. Moolchand collected it and established a library in the Nagaur Student Hostel. Now, this library is situated at “Kisan Kesari Baldev Ram Mirdha Memorial Trust Dharamsala”, Nagaur, entitled “Shri Chaudhari Mool Chand Sihag Memorial Jat Samaj Library”.


The Evaluation of Ch. Mool Chand


If we evaluate Ch. Mool Chand, he himself was a living institution, the organizations established by him are only his shadow. In other parts of India, he was famous as the Hero of Rajasthan. He donated his entire life term, till his last breath, for the upliftment of living conditions of farmers of Marwar region. On 17 January 1975, in a large public gathering Marwar’s farming community remembered him with a “Welcome-document” of “The Fore-runner of Farmer Enlightenment” and a “Dedicated Social Reformer”.


It is the greatness of Ch. Mool Chand Siyag that he worked in close coopertation with Sir Chhotu Ram, another great Jat leader from Haryana, who breathed his last in 1945. Due to the efforts of both these leaders, farmers all over north India got rid of the clutches of moneylenders and landlords and also from superstitious practices preached by Pope Brahmins.


Ch. Baldev Ram Mirdha used to say that Ch. Mool Chand Sihag was the sole entity from whom he got the inspiration of public service. Ch. Mool Chand Sihag, the great Jat leader, protector of farmers and a social reformer, breathed his last on 21 January 1978.


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Note: The translator of this Article in English - Dayanand Deswal

Reference

  1. लागबाग के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के कर सम्मिलित हैं. किसान की पैदावार का आधा भाग लगान के रूप में लिया जाता था. लगान के अलावा किसान पर अन्य लागें भी लगा रखी थी जैसे मलबा लाग, धुआं लाग, आंगा लाग, कांसा लाग, नाता लाग, हल लाग आदि
  2. लागबाग के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के कर सम्मिलित हैं. किसान की पैदावार का आधा भाग लगान के रूप में लिया जाता था. लगान के अलावा किसान पर अन्य लागें भी लगा रखी थी जैसे मलबा लाग, धुआं लाग, आंगा लाग, कांसा लाग, नाता लाग, हल लाग आदि

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