Gusainji

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Gusainji Temple Junjala
Footprint at Gusainji Temple Junjala

Gusainji (गुसांईजी) is kuladevata of many communities in India and Pakistan. Gusainji temple is situated at village Junjala (जुन्जाला) in Nagaur district in Rajasthan on Merta-Nagaur road about 40 km from Nagaur.

The Ancient temple

This temple is very ancient and of historical importance. Fairs are organized here twice on chaitra sudi 1-2 and Ashwin sudi 1-2. Followers come from Rajasthan, Punjab, Haryana, Gujarat, Madhya Pradesh and Uttar Pradesh. Both Hindu and Muslims come for worship here. Hindus call the deity as Gusainji Maharaj and Muslims call as Baba Kadam Rasool.[1]

Gusainji as Vithalnathji is mentioned in Hindu scriptures - Agni Purana, in a chapter titled "Bhavishiyotar" (Future Avatar), God himself professed that: "In future I will come as son of Shree Vallabhacharya and I will be known as Shree Vithal."

How to reach Junjala

Location of Junjala in Nagaur District

Junjala is situated at a distance of 40 km from Nagaur in the south direction on Nagaur - Merta Road. One can reach from Nagaur or Merta by road. Nearest railway station is also Mundwa or Nagaur.

Junjala in Muslim records

Dr. Ziyaud-Din Abdul-Hayy Desai (b. 18 May 1925) has provided the most important but sadly neglected source-material for medieval history in his book "Arabic, Persian and Urdu Inscriptions of West India". The book has inscriptional information about Junjala at S.No. 121. [2]

The oral tradition tells us that a certain Ransi, whose family adhered Pir Satgur, also became a disciple of Pir Shams. His son, Ajmal (or Ajay Singh), the father of Ramdeo, continued to revere Pir Shams. After visiting Junjala, Jaitgarh and Karel, Pir Shams proceeded to Bichun and Sakhun in Jaipur-Ajmer region. After having initiated Khiwan and Ransi, he went back to Multan. [3]

Mythological account in English

Raja Bali was the king from the line of Diti, a deity in the Rigveda. Bali is the descendant of this line. The real name of Bali is Indrasena.[4]

Bali was the son of Veerochana and Devamba, and the grandson of Prahlada. He grew up under the tutelage of his grandfather who instilled in him a sense of righteousness and Bhakthi. Following his grandfather, Bali became the king of Asuras. There was peace and prosperity everywhere during his reign. He expanded his kingdom and usurped the heaven. The vanquished Devas then complained to their protector Vishnu, who assured them that he himself would restore the authority of Devas. Bali, at the behest of his Guru Sukracharya decided to conduct the Ashwamedha Yagam. During the Yagam, Vishnu, in the guise of a small Brahmin boy (Vamana), appeared before Bali and asked for three paces of land. Bali, who had vowed not to refuse anyone, promptly granted the wish, even ignoring the warnings of his guru. Vamana measured all the worlds and the sky with two paces. Then, Bali offered himself for the third pace and was thus banished to the Patala.[5]

It is believed that the first pace of Vishnu was at Makka-Madina where Muslims perform worship and go for Haj. Second pace was at Kurukshetra and third pace was at Rama Sarovar in Junjala. [6]

Mythological account in Hindi

एक समय राजा बलि इस धरती पर राज करता था. राजा बलि ने अश्वमेघ यग्य और अग्नि होम किए. उसने इस तरह ९९ यज्ञ संपन्न कर दिए. राजा बलि का यश चारों और फैलने लगा और वह इन्द्रलोक का राजा बनने की सोचने लगा. राजा बलि ने १०० वें यज्ञ का आयोजन रखा और इसके लिए निमंन्त्रण भेजे. सारी नगरी को इस अवसर के अनुरूप सजाया गया. सारी नगरी को न्योता दिया गया. [7]

भगवान ने सोचा कि राजा बलि घमंड में आकर कहीं इन्द्र का राज न लेले. भगवान ने बावन अवतार का रूप धारण किया. अपना शरीर ५२ अंगुल के बराबर लंबा किया और राजा बलि की नगरी के समीप धूना जमा लिया. राजा बलि ने यज्ञ शुरू किया और मंत्रियों को हुक्म दिया कि नगरी के आस पास कोई भी मनुष्य यहाँ आए बिना न रहे. मंत्रियों ने छानबीन की तो पता चला कि भगवान रूप बावन अपनी जगह बैठा है. मंत्रियों के कहने पर वह नहीं आए. तब राजा बलि ने ख़ुद जाकर महाराज से निवेदन किया. महाराज ने राजा से कहा कि मैं आपके नगर में तब प्रवेश करुँ जब मेरे पास कम से कम तीन पांवडा (कदम) जमीन मेरे घर की हो. इस पर राजा बलि को हँसी आ गई और कहा की शर्त मंजूर है.[8]

राजा बलि का वचन पाकर भगवान ने अपनी देह को इतना लंबा किया कि पूरी पृथ्वी को दो पांवडा (कदम) में ही नाप लिया. और पूछा कि तीसरा कदम कहाँ रखू. इस पर राजा बलि घबरा गए और थर-थर कांपने लगे. राजा बलि ने कहा कि यह तीसरा कदम मेरे सर पर रखें. इस पर भगवान ने तीसरा पैर राजा बलि के सर पर रख कर उसको पाताल भेज दिया. [9]

कहते हैं कि जब भगवान ने वामन अवतार धारण कर पृथ्वी का नाप किया तो पहला कदम मक्का मदीना में रखा गया था. जहाँ अभी मुसलमान पूजा करते हैं और हज करते हैं. दूसरा कदम कुरुक्षेत्र में रखा था जहां अभी पवित्र नहाने का सरोवर है. तीसरा पैर ग्राम जुन्जाला के राम सरोवर के पास रखा जहाँ आज मन्दिर है. तीर्थ राम सरोवर में हिंदू और मुसलमान दोनों धर्मों के लोग आते हैं. हिंदू इसे गुसांईजी महाराज कहते हैं तो मुसलमान इसे बाबा कदम रसूल बोलते हैं. [10]

यह मन्दिर एतिहासिक दृष्टि से बहुत पुराना है. यहाँ पर हर साल एक तो नव रात्रा के पहले दिन चैत्र सुदी १ व २ को तथा दूसरा आसोज सुदी १ व २ को मेला लगता है. यहाँ राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश आदि राज्यों से यात्री आते हैं. [11]

बाबा रामदेवजी के परिवार वाले भी यहाँ अपनी जात का जडूला चढाने जुन्जाला आया करते थे. यहाँ मन्दिर में एक पुराना जाल का पेड़ है जिसके नीचे बाबा रामदेवजी का जडूला उतरा हुआ है. इसलिए जो लोग रामदेवरा जाते थे वह सब यात्री जुंजाला आने पर ही उनकी यात्रा पूरी मानी जाती है. इसलिए भादवा और माघ के महीने में मेला लग जाता है. [12]

References

  1. प्रहलाद नाथ: श्री गुसांईजी महाराज के भजन व रचना, p.5
  2. Arabic Persian and Urdu Inscriptions of West India by Dr.Z.A. Desai, ISBN : 8175740515, Edition : 1st Edition Place : New Delhi, 1999
  3. Golden Jubilee Darbar Visits 2007-2008 - Shia Imami Nizari Ismaili ...
  4. Śrīmad Bhāgavatam 8.22.33
  5. http://en.wikipedia.org/wiki/Bali_(Daitya)
  6. प्रहलाद नाथ: श्री गुसांईजी महाराज के भजन व रचना, p.5
  7. प्रहलाद नाथ: श्री गुसांईजी महाराज के भजन व रचना, p.2
  8. प्रहलाद नाथ: श्री गुसांईजी महाराज के भजन व रचना, p.3
  9. प्रहलाद नाथ: श्री गुसांईजी महाराज के भजन व रचना, p.4
  10. प्रहलाद नाथ: श्री गुसांईजी महाराज के भजन व रचना, p.5
  11. प्रहलाद नाथ: श्री गुसांईजी महाराज के भजन व रचना, p.5
  12. प्रहलाद नाथ: श्री गुसांईजी महाराज के भजन व रचना, p.6

External links


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