Hinglajgarh

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Author: Laxman Burdak लक्ष्मण बुरड़क
Location of Hinglajgarh in Mandsaur district
The Hinglaj Goddess
Hinglaj Fort Fatehburj
Hinglaj Fort Darbar Hall
Hinglaj Fort Surajkund
Hinglaj Fort surrounded by Deep Forests
Hinglaj Fort Rani Mahal
Hinglajgarh Tirtham

Hinglajgarh (हिंगलाजगढ़) or Hinglaj Fort is an ancient fort situated near village Navali in Bhanpura tehsil of Mandsaur district in Madhya Pradesh. Hingara clan in Afghanistan may be connected with the Hinglaj shrine. [1]

Location

Its coordinates are Latitude 25°30' N and Longitude 65°31' E. It is situated at a distance of 165 km from Mandsaur town and 26 km from Bhanpura town in Madhya Pradesh. [2] This fort has been at its peak of grandeur during Parmara rule. [3]

Monuments and Treasure of Sculptures

There are many artistic sculptures of various periods in this fort. The Nandi and Uma-Maheshwar sculptures were sent from here to France and Washington for display in India festivals and left a mark at International levels. [4] The Hinglajgarh had been centre of excellence in craftmanship of sculptures for about 800 years. The statues recovered from this fort are from Guptas period to Parmara period. The most ancient statues are from 4-5th century AD. [5]

Origin of name

Hinglajgarh gets name after the goddess Hinglaj, the kuldevi of Kshatriyas. Hinglaj Mata temple is situated in the Hinglajgarh. [6] Originally Hinglaj (Urdu: ﮨنگلاج ) is an important Hindu pilgrimage place in Balochistan, Pakistan. It is situated in Balochistan province about 250km north-west of Karachi[7]. The Kshatriyas in ancient times had movements between Baluchistan and India. Thakur Deshraj writes that the Jats of Braj area traditionally sing songs of Hinglaj devi and it is very likely that the jats constructed the temple of Hinglaj Mata at Balochistan. During mauryan period kulut was capital of this country and Chitra Varma was the ruler. Jats have Baloch Gotra. [8] According to Usha Agarwal, The Mauri rulers founded the temple of Hinglaj Mata in Mandsaur district as she was their kuladevi. Initially this area was known as 'Hinglaj Tekri' but later the Mauri rulers built a fort here and this came to be known as Hinglajgarh or Hinglaj Fort. [9][10]

History

The ancient inscriptions in the Pali Buddhist character have been discovered in various parts of Rajasthan of the race of Taxak or Tak, relating to the tribe Mori and Parmara are their descendants. Taxak Mori was the lord of Chittor from very early period. [11][12]

The Huna Kingdom of Sialkot (of Mihir Kula 515-540 AD), destroyed by Yashodharman, was subsequently seized by a new dynasty of kshatriyas called Tak or Taxaka. The Taxak Mori as being lords of Chittor from very early period and few generations after the Guhilots supplanted the Moris, this palladium of Hindu liberty was assailed by the arms of Islam. (725-35) we find amongst the numerous defenders who appear to have considered the cause of Chittor their own the Tak from Asirgarh. This race appears to have retained possession of Asirgarh for at least two centuries after this event as its chieftain was one of the most conspicuous leaders in the array of Prithvi Raj. In the poems of Chandar he is called the "Standard, bearer, Tak of Asir." [13]

Hinglaj Fort became very strategic during the Parmara rule and they strengthened it. In 1281 the Hada ruler halu occupied it, and later it came under Chandrawat rulers. Mention of Haveli of Gopal Singh, a Chandrawat ruler, is found in the patnama of Chandrawats. [14] In 1773 the Holkar Queen Ahilya Bai defeated Laxman Singh Chandrawat and occupied it. The fort was renovated during Holkar rule along with Hinglaj Mata Temple, Rama Temple, and Shiva Temple. Though various dynasties occupied the fort but it was never used as a permanent capital. It was mainly used as a shelter by various rulers. This is the reason why there are not many palaces here. [15]

The Hinglaj Fort has four gates namely Patanpol, Surajpol, Katrapol and Mandaleshwaripol. The first three gates (pol) are east facing where as last , Mandaleshwaripol, is west facing. There is storage of water in a grand tank known as Surajkund. Local tradtion goes that Gotri Bhil was killed here, therefor the smarak built here is worshiped by Bhils. [16]

In the southern part of the Hinglaj Fort is situated Hinglaj Mata temple, Rama-Hanuman Temple, Darbar Kaksha (Kachhari), Rani Mahal and Shiva Temple. There is a big Burj here known as Fateh Burj. [17]There are also two towers called Tirtham, which used to be used as means of communication with distant places through light.

Mantra for Devi Hinglaj by Dadhichi

The mantra or incantation for Devi Hinglaj is attributed to Saint Dadhichi, an important saint in Hindu mythology. The mantra is :

ॐ हिंगले परम हिंगले अमृतरुपिनी तनु शक्ति मनः शिवे श्री हिंगलै नमः स्वाहा
om hingule param hingule amrutrupini tanu shakti manah shive shree hingulai namah swaha

Translation : "Oh Hingula Devi, she who holds nectar in her self and is power incarnate. She who is one with Lord Shiva, to her we pay our respects and make this offering (swaha)"


जनसम्पर्क विभाग मध्यप्रदेश का एक लेख

मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले में सुदृढ़ जंगलों में एक ऐसी जगह है जहां पत्थरों में भी प्राण बसे हैं । यह है एतिहासिक हिंगलाजगढ़ जहां कदम-कदम पर प्राचीन मूर्तियां सैलानियों से बाते करती सी लगती हैं । पश्चिम मालवा की भानपुरा तहसील के ग्राम नामली से 14 कि.मी. दूर स्थित हिंगलाजगढ़ से प्राप्त पाषाण कला कृतियाँ प्रदेश के संग्रहालयों में ही नहीं अपितु विदेशों में आयोजित भारत महोत्सव में अपनी कला की अमिट छाप छोड़ चुकी हैं। यहाँ से प्राप्त कला कृतियाँ गुप्त काल से लेकर 14 ई. के मध्य की होकर अपनी पृथक पहचान रखती है। हिंगलाजगढ़ दुर्ग परमार कला की गतिविधियों के अतिरिक्त ऐतिहासिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण रहा है। यह प्रामाणिक रूप से नहीं कहा जा सकता हिंगलाजगढ़ दुर्ग कितना प्राचीन है क्योंकि इसके ऐतिहासिक व अभिलेखीय साक्ष्य प्राप्त नहीं हो सके हैं। प्रतिमा शास्त्र के आधार पर यहाँ से प्राप्त प्राचीनतम प्रतिमायें 5-6वीं शताब्दी की हैं।

राज्य संरक्षित हिंगलाजगढ़ किला प्रदेश का महत्वपूर्ण पुरा-स्मारक है। यह भानपुरा से लगभग 30 कि.मी. वन क्षेत्र में है। यहाँ अभयारण्य क्षेत्र से होकर पहुँचना पड़ता है। मन्दसौर जिले के इस ऐतिहासिक किले और यहाँ के अद्भुत पाषण शिल्पों के अवलोकन के लिए बड़ी संख्या में इतिहास प्रेमी और पर्यटक आते रहते हैं। संचालनालय पुरातत्व अभिलेखागार एवं संग्रहालय मध्यप्रदेश द्वारा हिंगलाजगढ़ के ऐतिहासिक किले की क्षतिग्रस्त दीवारों और किले के महत्वपूर्ण हिस्सों की मरम्मत का कार्य किया जा रहा है। यहाँ पर्यटकों के विश्राम, पेयजल जैसी आवश्यक सुविधाओं का इंतजाम भी कराया जा रहा है। किले में स्थित कचहरी महल, सूरजपोल, कटारापोल, पाटनपोल, मन्डेश्वरी गेट व सूरजकुण्ड के अनुरक्षण, सुरक्षा आवश्यक विकास कार्य कराए जा रहे हैं।

रामपुरा के चन्द्रावत राजाओं के पाटनामें में 1688 ईस्वी में इसका उल्लेख एक हवेली के रूप में किया गया है। सत्ता संघर्ष 1520-1752 तक हिंगलाजगढ़ निर्वासित राजाओं की राजधानी रहा। 18वीं शताब्दी के 8वें दशक में मराठों के कब्जे में आया व इसका जीर्णोद्धार किया गया। उनके काल में दुर्ग की दीवारों का जीर्णोद्धार, हिंगलाज माता मंदिर, राम मंदिर, शिव मंदिर, कचहरी, बारा दरी रानी महल आदि का निर्माण कराया गया, जो आज हमारे कला वैभव की अमिट थाती है। हिंगलाजगढ़ का किला मध्यप्रदेश व राजस्थान की सीमा पर स्थित है। लगभग 300 फीट गहरी व 10 किलोमीटर अर्द्धवृत्ताकार खाई से घिरा हुआ है। इस क्षेत्र में सर्वत्र प्राचीन मंदिरों, मठों, बस्तियों व शिल्प के अवशेष प्राप्त होते हैं। जिससे स्पष्ट है कि किसी समय यह स्थान एक महत्वपूर्ण शिल्पकला का केन्द्र था। यहां चारों ओर बिखरी प्रतिमाओं के अध्ययन व एकत्रीकरण से यह महत्वपूर्ण पुरा स्थल प्राचीन शिल्प कला की अपनी विशिष्टता के लिए विश्व विख्यात हो चुका है।

हिंगलाजगढ़ मूलत: शक्ति पीठ है। यहाँ से प्राप्त देवी प्रतिमायें शक्ति के विविध स्वरूपों को दर्शाती हैं। यहाँ से प्राप्त देवी प्रतिमाओं में गौरी प्रतिमाओं की बाहुल्यता है। गौरी के जितने रूप इस कला केन्द्र से प्राप्त हुये हैं अन्यत्र समकालीन किसी भी कला केन्द्र से प्राप्त नहीं हुये हैं। यहाँ से सप्तमातृकाओं की एकाकी प्रतिमायें भी प्राप्त हुई हैं। इसके साथ ही जब शकित मान्यताओं में तान्त्रिक पूजा का समावेश हुआ तो हिंगजालगढ़ में योगिनी प्रतिमायें भी कलाकार द्वारा निर्मित की गयी। जिसके फलस्वरूप हमें हिंगलाजगढ़ क्षेत्र में अपराजित, वैनायकी, काव्यायनी, भुवनेश्वरी, बगलामुखी आदि देवियों की प्रतिमायें प्राप्त हुई।

शैव धर्म की विविध मान्यतायें इस काल में शिव के विविध रूपों के अंकन में सहायक रही जो कलाकार की प्रेरणा का स्त्रोत्र रहीं। जिसके प्रतिफल में हमें यहाँ से शिव के विभिन्न स्वरूपों की प्रतिमायें प्राप्त होती हैं। यथा अर्ध्द नारीश्वर, शिव, लकुलीश, वैद्यनाथ, सदाशिव, वीणाधर, नटराज आदि।

वैष्णव प्रतिमाओं में विष्णु के विविध स्वरूपों की प्रतिमाऐं भी हिंगलाजगढ़ क्षेत्र से प्राप्त हुई हैं। इनमें लक्ष्मीनारायण, योग नारायण, गरूड़ासीन विष्णु, वामन, नृसिंह आदि प्रमुख हैं। विविध सम्प्रदायों की आपसी प्रतिस्पर्धा से मध्यम मार्ग की कल्पना के संयुक्त स्वरूपों की कल्पना हुई जिसके कारण कलाकार ने भी अपनी कला में इन विचारों की अभिव्यक्ति प्रतिमाओं के माध्यम से की। यथा हरिहर, हरिहरार्क, हरिहरार्क पितामह आदि। यहाँ से सूर्य तथा आदि अनेक देवी-देवताओं की प्रतिमायें भी यथेष्ठ मात्रा में प्राप्त हुई हैं। जो कलाकार की विशाल मानसिकता की परिचायक हैं जिनें अष्टदि्कपाल कार्तिकेय, गणेश आदि प्रमुख हैं।

जैन धर्म का अपना स्वतन्त्र पक्ष है। हिंगलाजगढ़ की कला में इस धर्म को यथेष्ठ स्थान मिला यहाँ से प्राप्त जैन तीर्थकर प्रतिमाओं में शांतिनाथ, परश्वनाथ, सुपरश्वनाथ, चन्द्रप्रभु आदि की प्रतिमायें प्रमुख हैं। शास्त्रय व अभिवियों की प्रतिमाओं में गो मेद अम्बिका की प्रतिमा महत्वपूर्ण है।[18]


External links

References

  1. An Inquiry Into the Ethnography of Afghanistan By H. W. Bellew, The Oriental University Institute, Woking, 1891, p.182
  2. Rajendra Verma:Mandsaur District Gazetteer, p. 289
  3. Ramlal Kanwal:Prachin Malwa mein Vastukala, p. 185
  4. Usha Agarwal:Mandsaur Zile Ke Puratatvik samarakon ki paryatan ki drishti se sansadhaniyata - Ek Adhyayan, Chirag Prakashan Udaipur, 2007, p. 38
  5. Usha Agarwal:Mandsaur Zile Ke Puratatvik samarakon ki paryatan ki drishti se sansadhaniyata - Ek Adhyayan, Chirag Prakashan Udaipur, 2007, p. 42
  6. L.D.Dhariwal (Ed): Indore State Gazetteer, Vol. 2, p. 24
  7. Hindus in Pakistan - BBC News
  8. Thakur Deshraj Jat Itihas, 1992, p. 177
  9. Usha Agarwal:Mandsaur Zile Ke Puratatvik samarakon ki paryatan ki drishti se sansadhaniyata - Ek Adhyayan, Chirag Prakashan Udaipur, 2007, p. 38
  10. Puran Sahgal:Dashpur Janapad mein Arawali ke Sudrarh Durg Prachir, Shodh Patra, Sangoshthi, Mandsaur, 1991, p. 104
  11. James Tod, Annals and Antiquities of Rajasthan, p.126
  12. Dr Naval Viyogi: Nagas – The Ancient Rulers of India, p.171
  13. Dr Naval Viyogi: Nagas – The Ancient Rulers of India, p.148
  14. News Letter Published by Intec No. 1, Nimach Hinglajgarh Chapter, March April 1991, p. 10
  15. Usha Agarwal:Mandsaur Zile Ke Puratatvik samarakon ki paryatan ki drishti se sansadhaniyata - Ek Adhyayan, Chirag Prakashan Udaipur, 2007, p. 39
  16. Usha Agarwal:Mandsaur Zile Ke Puratatvik samarakon ki paryatan ki drishti se sansadhaniyata - Ek Adhyayan, Chirag Prakashan Udaipur, 2007, p. 39
  17. Usha Agarwal:Mandsaur Zile Ke Puratatvik samarakon ki paryatan ki drishti se sansadhaniyata - Ek Adhyayan, Chirag Prakashan Udaipur, 2007, p. 40
  18. जनसम्पर्क विभाग मध्यप्रदेश का एक लेख

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