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Humorous Jokes in Haryanavi/पंडित जी, ज्योतिषी आदि

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दीवा

एक जाट के बाळक ना होवैं थे । एक दिन एक भाठ आ-ग्या अर जाटणी नै आपणा रोणा रो दिया । बाहमण बोल्या - बेटी, रोवै मतना, मैं परसों बद्रीनाथ जाऊँ सूँ, ऊड़ै तेरे नाम का दीवा जळा दूंगा - अर भगवान सब भली करैंगे, चिन्ता ना करियो ।


वो बाहमण दस साल पाच्छै उस जाट कै घरां आया, तै देख्या अक ऊड़ै आठ-नौ बाळक हांडैं थे । उसनै पड़ौसी तैं बूझी अक ये बाळक किसके सैं ? पड़ौसी बोल्या अक महाराज ये उस्सै के सैं जिसका तू दस साल पहल्यां बद्रीनाथ में दीवा बाळ-कै आया था ।


बाहमण बोल्या - रै, यो जाट कित सै ?


पड़ौसी बोल्या - महाराज, वो तै कल बद्रीनाथ चल्या गया - तेरे दीवे नै बुझावण !!!


बूझे आळा पंडित

गाम कै बाहर भीड़ लाग रही थी, ताऊ आया खेत म्हां तैं, लाम्बा लठ ले रहया अर बोल्या - अरै के हो रहया सै ?

एक जणा बोल्या - ताऊ, यो बाहमण आगे की बतावै सै । ताऊ फेर बोल्या - हाटियो भाई मन्नै भी देखण दो के रोळा सै ।

ताऊ बाहमण तैं बोल्या - हां भाई, तू आगे की बतावै सै ?

बाहमण - हां जी ।

ताऊ नै लठ ऊपर नै ठाया अर बोल्या - "आंच्छ्या तै, बाहमण, तू न्यूं बता यो लठ तेरे सिर में लागैगा अक गोड्यां पै ?"

बाहमण नै सोच्या, जै सिर में कहया तै यो तेरे गोड्यां नै तोड़ैगा अर अगर गोड्यां पै कहया तै यो सिर नै फोड़ैगा !

बाहमण हाथ जोड़-कै खड़या हो-ग्या अर बोल्या - "चौधरी साहब, मैं कुछ ना जानता आगे-पाच्छे की, मन्नै माफ कर दे ।"


पंडित की परेशानी

एक चौधराईन पड़ौसी गांव में एक पंडित के पास गई - वो पंडित हाथ देखकर "बूझा काढ़ण" का काम करता था ।


जब चौधराइन ने अपनी हथेली उसके आगे की तो पंडित की नजर उसके हाथ की कलाई पर पड़ी । कलाई सूनी पड़ी थी और चौधराइन ने कोई जेवर या चूड़ी नहीं पहन रखी थी । पंडित ने सोचा कि चौधराइन तो नई-नई विधवा बनी होगी और अच्छा दान-पुण्य करेगी । पंडित बोल्या "तेरा हाथ आर पतरा पाछै देखूंगा, पहल्यां पाँच रुपय्ये और (मृतक) चौधरी के पाचों कपड़े दान कर दे"।


चौधराइन ने जवाब दिया - "पंडित जी चौधरी तै घरां बैठ्या सै, वो आपणे कपड़े मन्नै क्यूं देगा?"


पंडित झुंझळा कर बोला - "ये जाटणी आ खड़ी हों सैं न्यूं-ऐं - हाथां मैं तै चूड़ी बी कोनी, आर बाहमणां की जात* देखती फिरैं सैं" !!!


(जात - जाति/ नीयत)

जाट-पंडित संवाद

चौधरी एक पंडित के पास पहुंचा - "बूझा कढ़वावण" । पंडित ने उसका हाथ देखकर एक पोथी निकाली और एक कागज पर कुछ आडी-टेढी लकीर निकाल कर बोला - "तेरै तै शनीचर चढ़ रहया सै" ।


जाट - पंडित जी, इसका कोई उपाय कर ।

पंडित - पूजा-पाठ करना पड़ैगा, 21 रुपय्ये और एक शाल दान करना पड़ैगा ।

जाट - पंडित जी, शाल तै घणा महंगा आवैगा, इतने पईसे कोनी ।

पंडित - चल ठीक सै, 21 रुपय्ये निकाल ।

जाट - ना पंडित जी, 21 तै कोनी ।

पंडित - चल, 11 दे दे ।

जाट - पंडित जी, इतणा ब्यौंत बी कोनी ।

पंडित - 5 रुपय्ये का ब्यौंत तै होगा ?

जाट - पंडित जी, साची बात तै या सै अक मेरा तै सवा रुपय्ये का ब्यौंत सै ।

पंडित - चल, ठीक सै, सवा रुपय्या निकाल ।

जाट (जेब में हाथ डालकर) - ओहो, पंडित जी, ईब तै गोझ खाली पड़ी सै - तड़कै दे दूंगा ।

पंडित - जब तेरै धोरै सवा रुपय्या बी कोनी, तै शनीचर के तेरी पूंछड़ पाड़ैगा ? चढ्या राहण दे उसनै !!








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