Kishangarh

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Location of Kishangarh in Ajmer district

Kishangarh (किशनगढ़) is a city and a municipality in Ajmer district in Rajasthan. Its ancient name was Setholav (सेठोलाव).[1]

Location

It lies 18 miles north-west of Ajmer. It is well connected via Indian Railways and National Highway #8. It is the birth place of the Kishangarh style of painting. In recent years, Kishangarh has come to be known as the marble city of India. It is purported to be the only place in the world with a temple of nine planets.

Origin of name

Earlier its name was 'Nagaridas Ki Nagari' which was changed to Kishangarh by Jodhpur Rathore Ruler Kishan Singh son of Uday Singh (r.1569-1602 A.D.) in 1611 AD. Earlier ruler Sanwat Singh was popular as Nagari Das as he was a poet and wrote bhakti and shrangar literature in Brij language.[2]

According to James Tod[3] Kishan Singh, in S. 1669 (A.D. 1613), founded Kishangarh ; he had three sons, Shesmal, Jagmal, Bharmal, who had Hari Sing, who had Roop Sing, who founded Roopnagurh.

Villages in Kishangarh tahsil

Aau (आऊ), Almas (अल्मास), Amarpura (अमरपुरा), Ankauriya (आन्कौडिया), Arai (अराई), Bakarwaliya (बाकरवालिया), Balapura (बालापुरा), Balapura (बालापुरा), Bandar Seendri (बांदरसीन्दरी), Bansra (बांसड़ा), Bansra (Mehran) (बांसड़ा मेहरान), Bargaon (बड़गांव), Barna (बरना), Beenjarwara (बीन्जरवाडा), Beeti, Bhadoon, Bhambholao, Bharla, Bhawsa, Bhilawat, Bhogadeet, Bhojiyawas, Bhunwada, Brijpura, Buharoo, Chak Beer, Chak Peenglod, Cheeta Khera, Choondari, Chosla, Churli, Dadiya, Dang, Dardoond, Deendwara, Deopuri, Dhani Deomand, Dhani Purohitan, Dhani Purohitan, Dhani Rathoran, Dhasook, Dholpuriya, Dothli, Gagoonda, Gahalpur, Ganeshpura, Ghaslo Ki Dhani, Ghaswan Ki Dhani, Godiyana, Goli, Goojarwara, Goondli, Gopalpura, Gordhanpura, Gothiyana, Gudli, Gurha, Harmara, Indoli, Jajota, Jakholai, Jhadol, Jhak, Jheerota, Joonda, Jorawarpura, Jugalipura, Kachariya, Kadha, Kakalwara, Kakniyawas, Kalanada, Kali Doongri, Kalyanipura, Kalyanpura, Kalyanpura, Kardala, Karkeri Ajmer, Kathoda, Katsoora, Kebaniya, Keriya, Keriya Ki Dhani, Khajpura Bhairwai, Khandach, Khatoli, Khera, Khera Karmsotan, Kishangarh (M), Kishanpura, Kishnpura, Kotri, Kucheel, Lamba, Mala, Mandawariya, Mandawariya, Mandiyawad Kalan, Mandiyawad Khurd, Manpura, Mohan Pura, Mokhampura, Moondolao, Moondoti, Mordi, Mothi, Motipura, Motipura, Mundoti, Naloo, Narena, Nuwa, Naya Gaon, Nitooti, Nohariya, Nonandpura, Nonandpura, Nosal, Pacheenpala, Padanga, Palri Bhoptan, Palri Pathanan, Pandarwara, Paner, Parasoli, Patan, Pawaron Ki Dhani, Pedi Bhata, Peenglod, Phaloda, Raghunath Pura, Raghunathpura, Raheempura, Rajpura, Ralawatan, Ramgarh, Rampura, Rari, Rodawas, Roopangarh, Sagarmala, Salemabad, Sandoliya, Sanwatsar, Sar Gaon, Sarwar, Seel, Seengla, Silora, Singara, Sinodiya, Sinroj, Sursura, Thal, Tihari, Tikawara, Tiloniya, Tityari, Tokra, Tolamal, Tyod, Udaipur Kalan, Udaipur Khurd, Ujoli,

History

संत श्री कान्हाराम[4] ने लिखा है कि....[पृष्ठ-43]: श्री वीर तेजाजी के इतिहास को सही माने में समझने के लिए उनकी समकालीन तथा आगे-पीछे की धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा ऐतिहासिक परिस्थितियों को समझना अति आवश्यक है। उस समय की परिस्थितियों में जाए बिना हम तेजाजी के इतिहास को सम्यकरूप से नहीं समझ सकते हैं।

लोग जोधपुर व जोधपुर के राजदरबार एवं स्थानीय ठाकुरों के संदर्भ तथा उनकी राजनीतिक व्यवस्थाओं से जोड़कर तेजाजी के इतिहास को अनुमान के चश्मों से देखने की कोशिश करेते हैं। ठीक इसी प्रकार शहर पनेर के इतिहास को किशनगढ़ राजदरबार की व्यवस्थाओं से जोड़कर देखते हैं।

तेजाजी के बलिदान (1103 ई.) के 356 वर्ष बाद, राव जोधा ने जोधपुर की स्थापना की थी। किशनगढ़ की स्थापना 506 वर्ष बाद (1609 ई.) हुई। तेजाजी के समय तक राजस्थान में राठौड़ राजवंश का उदय नहीं हुआ था।

ईसा की 13वीं शताब्दी के मध्य (1243 ई.) नें उत्तर प्रदेश के कन्नौज से जयचंद राठोड का पौता रावसिहा ने नाडोल (पाली) क्षेत्र में आकर राठोड वंश की नींव डाली थी । राजस्थान में राठौड़ के मूल शासक रावसीहा की 8वीं पीढ़ी बाद के शासक राव जोधा ने 1459 ई. में जोधपुर की स्थापना की थी। इसके पूर्व राव जोधा के दादा राव चुंडा ने 1384-1428 ई. के बीच जोधपुर के पास प्रतिहारों की राजधानी मंडोर पर आधिपत्य जमा लिया था।

किशनगढ़ की स्थापना राव जोधा की 6 पीढ़ी बाद के शासक उदय सिंह के पुत्र किशनसिंह ने 1609 ई. में की थी। उन्हें यह किशनगढ़ अपने जीजा बादशाह जहांगीर द्वारा अपने भांजे खुर्रम (शाहजहां) के जन्म के उपलक्ष में उपहार स्वरूप मिला था।


[पृष्ठ-44]:तेजाजी का ससुराल शहर पनेर एवं वीरगति धाम सुरसुरा दोनों गाँव वर्तमान व्यवस्था के अनुसार किशनगढ़ तहसील में स्थित है। किशनगढ़ अजमेर जिले की एक तहसील है, जो अजमेर से 27 किमी दूर पूर्व दिशा में राष्ट्रिय राजमार्ग 8 पर बसा है। प्रशासनिक कार्य किशनगढ़ से होता है और कृषि उत्पादन एवं मार्बल की मंडी मदनगंज के नाम से लगती है। आज ये दोनों कस्बे एकाकार होकर एक बड़े नगर का रूप ले चुके हैं। इसे मदनगंज-किशनगढ़ के नाम से पुकारा जाता है।

तेजाजी की वीरगति स्थल समाधि धाम सुरसुरा किशनगढ़ से 16 किमी दूर उत्तर दिशा में हनुमानगढ़ मेगा हाईवे पर पड़ता है। शहर पनेर भी किशनगढ़ से 32 किमी दूर उत्तर दिशा में पड़ता है। अब यह केवल पनेर के नाम से पुकारा जाता है। पनेर मेगा हाईवे से 5 किमी उत्तर में नावां सिटी जाने वाले सड़क पर है।

रियासत काल में कुछ वर्ष तक किशनगढ़ की राजधानी रूपनगर रहा था, जो पनेर से 7-8 किमी दक्षिण-पूर्व दिशा में पड़ता है।


[पृष्ठ-45]: जहा पहले बबेरा नामक गाँव था तथा महाभारत काल में बहबलपुर के नाम से पुकारा जाता था। अब यह रूपनगढ तहसील बनने जा रहा है।

तेजाजी के जमाने (1074-1103 ई.) में राव महेशजी के पुत्र राव रायमलजी मुहता के अधीन यहाँ एक गणराज्य आबाद था, जो शहर पनेर के नाम से प्रसिद्ध था। उस जमाने के गणराज्यों की केंद्रीय सत्ता नागवंश की अग्निवंशी चौहान शाखा के नरपति गोविन्ददेव तृतीय (1053 ई.) के हाथ थी। तब गोविंददेव की राजधानी अहिछत्रपुर (नागौर) से शाकंभरी (सांभर) हो चुकी थी तथा बाद में अजयपाल के समय (1108-1132 ई.) चौहनों की राजधानी अजमेर स्थानांतरित हो गई थी। रूपनगढ़ क्षेत्र के गांवों में दर्जनों शिलालेख आज भी मौजूद हैं, जिन पर लिखा है विक्रम संवत 1086 गोविंददेव


[पृष्ठ-46]: किशनगढ़ के स्थान पर पहले सेठोलाव नामक नगर बसा था। जिसके भग्नावशेष तथा सेठोलाव के भैरुजी एवं बहुत पुरानी बावड़ी जीर्ण-शीर्ण अवस्था में आज भी मौजूद है। सेठोलाव गणराज्य के शासक नुवाद गोत्री जाट हुआ करते थे। ऐसा संकेत राव-भाटों की पोथियों व परम्पराओं में मिलता है। अकबर के समय यहाँ के विगत शासक जाट वंशी राव दूधाजी थे। गून्दोलाव झीलहमीर तालाब का निर्माण करवाने वाले शासक का नाम गून्दलराव था। यह शब्द अपभ्रंस होकर गून्दोलाव हो गया। हम्मीर राव ने हमीरिया तालाब का निर्माण करवाया था। सेठोजी राव ने सेठोलाव नगर की स्थापना की थी।

पुराने शासकों की पहचान को खत्म करने के लिए राजपूत शासकों द्वारा पूर्व के गांवों के नाम बदले गए थे। राठौड़ शासक किशनसिंह ने सेठोलाव का नाम बदलकर कृष्णगढ़ रख दिया। राव जोधा ने मंडोर का नाम बदलकर जोधपुर रख दिया। बीका ने रातीघाटी का नाम बदलकर बीकानेर रखा था। रूप सिंह ने गाँव बबेरा का नाम बदलकर रूपनगर रख दिया। शेखावतों ने नेहरा जाटों की नेहरावाटी का नाम बदलकर शेखावाटी कर दिया। गून्दोलाव का नाम नहीं बादला जा सका क्योंकि यह लोगों की जबान पर चढ़ गया था।


संत श्री कान्हाराम[5] ने लिखा है कि....[पृष्ठ-47]: 1192 ई. में पृथ्वीराज चौहान की हार के बाद मोहम्मद गौरी की जीत के साथ ही यहाँ मुस्लिम शासन की नींव पड़ चुकी थी। अजमेर तथा किशनगढ़ भी जाट वंशी शासकों व चौहानों के हाथ से निकालकर मुस्लिम सत्ता के अधीन हो चुके थे। यहाँ के शासक अलग-अलग जतियों में मिलकर अलग-अलग कार्य करने लगे। इसमें खास बात यह थी कि चौहान आदि शासक तथा इनकी किसान, गोपालक, मजदूर आदि शासित जातियाँ एक ही मूल वंश , नागवंश की शाखाओं से संबन्धित थी।अतः किसान आदि जतियों में शामिल होने में इन्हें कोई दिक्कत पेश नहीं आई।

बाद में यह क्षेत्र मुगल शासक अकबर (1556 ई.) के अधिकार में आ गया था। 1572 ई. में मेवाड़ को छोड़कर पूरा राजस्थान अकबर के अधिकार में आ गया था।

राव जोधा के 6 पीढ़ी बाद के वंशज उदय सिंह का नोवें नंबर का बेटा किशनसिंह राजनैतिक कारणों से जोधपुर छोडकर अकबर के पास चला गया। किशनसिंह की बहिन जोधाबाई जो अकबर के पुत्र सलीम को ब्याही थी, उसके पुत्र शाहजहाँ के जन्म की खुशी में किशन सिंह को श्रीनगर-सेठोलाव की जागीर उपहार में दी गई। जहां किशन सिंह ने 1609 ई. में किशनगढ़ बसाकर उसे राजधानी बनाया। बाद में किशन सिंह का जीजा सलीम जहाँगीर के नाम से दिल्ली का बादशाह बना, तब किशन सिंह ने अपने राज को 210 गांवों तक फैला दिया। पहले उसको हिंडोन का राज दिया था, किन्तु किशन सिंह ने मारवाड़ के नजदीक सेठोलाव की जगह पसंद आई। कुछ इतिहासकारों का यह लिखना सही नहीं है कि किशनसिंह ने यह क्षेत्र युद्ध में जीता था। उस समय किशनगढ़ और अजमेर बादशाह अकबर के अधीन था अतः किसी से जीतने का प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता।

औरंगजेब की नजर किशनगढ़ की रूपवान राजकुमारी चारुमति पर थी। वह हर हालत में उसे पाना चाहता था। रूपमती को यह मंजूर नहीं था। किशनगढ़ जैसी छोटी रियासत औरंगजेब का सामना नहीं कर सकती थी।


[पृष्ठ-48]:यह रास्ता निकाला गया कि चारुमति ने मेवाड़ के राणा राजसिंह (1658-1680 ई.) को पत्र लिख कर गुहार की कि मेरी इज्जत बचायें, मेरे साथ विवाह कर मुझे मेवाड़ ले चले। राणा राजसिंह ने प्रस्ताव स्वीकार किया। चारुमति तो बचगई परंतु उसकी बहिन का विवाह औरंगजेब के पुत्र मुअज्जम के साथ कर दिया गया (बक़ौल रोचक राजस्थान)

रूपमती के पिता रूपसिंह (1658-1706 ई.) ने बाबेरा नामक गाँव को रूपनगर (रूपनगढ़) का नाम देकर किशनगढ़ की राजधानी बनाया। इस वंश के सांवत सिंह (1748-1757 ई.) प्रसिद्ध कृष्ण भक्त हुये। वह नागरीदास कहलाए। नागरीदास के मित्र निहालचंद ने प्रसिद्ध बनी-ठणी चित्र बनाया।

Nirana (Kishangarh) inscription of Jewlia Jat 1054 AD

Kishangarh inscription in Devanagari script at village Nirana provides evidence of the rule of the Jewlia clan of Jats prior to the 10th century in Rajasthan. A Jewlia Jat chieftain had a chhatri constructed at Kishangarh. To the southwest of this chhatri is a victory pillar and a statue of a Jat chieftain of the Jewlia gotra, with an inscription of samvat 1111 (1054 AD). To the north of this chhatri, at a distance of 15 feet, there is an ancient masonry tank used to provide drinking water for cows, and a well, constructed from skilfully dressed and cut stones, demonstrating a high degree of talent in architecture. To the west of this chhatri is a huge pond spread over 50 bigha of land, also constructed by Jewlia Jat chieftains.

A gold coin was obtained in excavation near the above chhatri, engraved on one side with an image of the king with bow and arrow, and on the other side there with images of agni-kunda. The coin provides evidence for an ancestor of the present Jewlia clan being a king in the period prior to the 10th century.

जेवल्या की छतरी: नराना गांव

ठाकुर देशराज लिखते हैं कि किशनगढ़ में तीन छतरियां हमने देखीं - दो राजपूतों की और एक तीसरे वंश की छतरी देखी गई। यह छतरी बहुत ही पुरानी है और जेवल्या गोत के जाट सरदार की है। इसके पच्छिम-दक्षिण की ओर एक बड़ा भारी कीर्ति-स्तम्भ खड़ा है। इस पत्थर में मनुष्य की मूर्ति खुदी हुई है और संबत 1111 (1054 ई.) का लेख खुदा हुआ है। यह शिलालेख बहुत ही पुराना होने से घिस गया है इसलिए समूचा लेख साफ-साफ पढ़ने में नहीं आता। दूसरे दो राज-वंशों की छतरियों के पास ऐसे अक्षय पुण्यदान के चिन्ह देखने में नहीं आते जैसे जाट की छतरी के पास देखने में आ रहे हैं। छतरी से करीब दस हाथ उत्तर की ओर गौओं की प्यास के लिए कुआं बनाया गया है। इस कुएं की चुनाई अपनी प्राचीनता को बता रही है। पत्थरों को काटकर पूठियां खड़ी हुई हैं। जैसे गाड़ी के पहियों की पूठियां होती हैं, वैसी पूठियों को जोड़कर कुआं चुनाया गया है। इसलिए इस कुएं की मजबूती ऐसी है कि हजारों वर्ष तक रह सकता है। कुएं के पास गौओं को जल पीने के लिए खेली बनाई गई है। खेली की कारीगरी भी देखने योग्य है। पांच-पांच हाथ लम्बी और तीन-तीन हाथ चौड़ी पत्थर की शिलाओं को जमीन में गाड़कर खेली बांधी गई है, जिससे पत्थर की मरम्मत का सैकड़ों वर्षों तक भी काम न पड़ सके। लोगों से सुना गया है कि जिस जाट की कीर्ति को चिरकाल तक स्मरण रखने के लिए कुआं और छतरी बनाये थे, उसी महापुरुष का बनाया हुआ, उसकी छतरी के पश्चिम की ओर एक तालाब है जो गौओं के जल पीने के लिए खुदवाकर बनाया गया था। यह तालाब बड़ा भारी है। लगभग पचास बीघें में होगा। जाटों के खोजने से


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-725


थोड़े बहुत जो प्राचीन इतिहास के चिन्ह मिलते हैं वे प्रमाद, अत्याचार और दूसरों की बुराई के कभी नहीं मिलते। किन्तु संसार की भलाई, परोपकार, गोचर भूमि-दान, तालाब, कुआं और निर्बल की रक्षा करने के लिए वीरता, ये ही चिन्ह प्राचीन जाटवीरों के इतिहासों में मिलते हैं। नराना गांव के नीचे अठारह हजार बीघे जमीन है। अन्दाजन छः हजार बीघे जमीन जोती जाती है और करीब बारह हजार बीघों में गायें चरती है। इस गांव में गाय और भैंसों का झुंड देखकर सतयुग याद आता है। हर एक आदमी के घर में दूध दही के भण्डार भरे ही रहते हैं।

राजपूताने में जाटों के राज्यों के बाद कई राजवंशों के राज्य हो गए हैं। इसलिए जाटों के इतिहास खोजने के लिए सहसा कोई खड़ा नहीं होता। लोगों को ऐसा विश्वास नहीं होता कि राजपूताने में जाट सदा से हल जोतकर दूसरों को खिलाने वाले ही नहीं थे किन्तु जाट ही भूमिपति थे और अपनी भूमि की मालगुजारी जाट दूसरों से लेते थे।

Jat Gotras

Notable persons

Further reading

Kishangarh in Patiala

Kishangarh is also the name of a village in Patiala district of Punjab. This village falls under Patiala Tahsil.

Kishangarh in Delhi

Kishan Garh is also the name of a village in south west district of Delhi.

References

  1. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. pp. 43-46
  2. Dr. Raghavendra Singh Manohar:Rajasthan Ke Prachin Nagar Aur Kasbe, 2010, pp. 138
  3. James Tod: Annals of Marwar, Annals and Antiquities of Rajasthan, Volume II, p.32
  4. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. pp. 43-46
  5. Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. pp. 47-48

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