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ViewsPachairaFrom Jatland Wiki(Redirected from Pach'hara)
Pachaira (पचैरा) or Pachera (पचेरा) or Pach'hara (पचहरा) is a place in Bhind district in Madhya Pradesh. Pachera PIN Code-477557.
HistoryThe ancestor of Bamraulis Jagdeo Singh had come from Agra and stayed at Bhind which was ruled by Aniruddh Singh Bhadauria. There was war between Bamraulias and Bhadauria rulers at place called Pach'hara in which Bhadauria was defeated. This war was fought on bhado sudi 10 friday vikram samvat 1794 (1737 AD). 12000 soldiers of Bhadaurias and 7000 soldiers of Jats took part in this war. Bhim Singh Rana captured 11 elephants, nishans of nagaras, big canons and kept them at Chitora, Karwas, Gohad etc places in his state.[1] In 1739 AD Peshwa accepted the rights of Rana rulers on Gohad. [2][3] The Ranas kept their capital at Pach'hara for some time and later shifted the capital to Gohad. The brother of Gohad ruler Jagdeo Singh constructed a fort here in samvat 1680 (1623 AD). [4] After the Pachaira war there was no powerful ruler left on the south of Chambal River who could compete with Raja Bhim Singh.[5] सुजस प्रबंध में उल्लेखसुजस प्रबंध काव्य में कवि नथन ने पचैरा युद्ध का वर्णन किया है. छंद 63 से 68 तक में कवि राजा भीमसिंह के पचैरा युद्ध का वर्णन करते है. राजा भीमसिंह ने हाथी के कंधे पर बैठकर पचैरा का युद्ध किया था. जदुवंश के उस श्रेष्ठ राजा ने एक शूरवीर की भांति भली प्रकार पचैरा के क्षेत्र में उत्साहपूर्वक युद्ध किया. [6] यदुवंशियों की सेना आगे सामने की ओर चल रही थी और हरनाथ राजा की दाहिनी ओर का मोर्चा संभाल रहा था. गर्जना करते हुए तोपों के गोले सेना के बीच में गिर रहे थे. राजा के साथ लाल सिंह तथा चामुण्डराय जसे योद्धाओं का भी उल्लेख मिलता है.ये योद्धा शत्रु सेना के बीच घुस जाते थे. इस पर उनके साथ भयंकर युद्ध होने लगता था. इस युद्ध को बालि के साथ हुए युद्ध जैसा कहा जा सकता है. योद्धा लालसिंह कट कर मैदान में गिर गया. उसके साथ जितने शूरवीर थे, उन्होंने भी युद्ध भूमि में अपने शरीरों को समर्पित कर दिया. इन सब के बल पर राजा युद्ध में आया था और विजय प्राप्त की.[7] गोहद नरेश युद्ध भूमि में योद्धाओं को मारकर सुशोभित हुए. उन्होंने उदंड राजाओं को दण्डित करके नीति के तेज की रक्षा की. उनकी वीरता और नीति रक्षण की प्रकृति का यश, समुद्र पार के राजाओं तक भी पहुँच गया था. वे समझ गए थे कि गोहद नरेश दुर्बलों के प्रति सोचते हैं और सब के साथ नीति का पालन करते हैं. उनके सामने जो मैदान में खड़ा होता है उनके साथ संघर्ष करता है और जिस तरह पानी का बुलबुला थोडी देर में ख़त्म हो जाता है, उसी तरह रण भूमि में खड़ा होने वाला शत्रु का दल, थोडी देर में ख़त्म हो जाता है. ऐसे राजा समर भूमि में, शत्रु सेना का सफाया करके, एक बलशाली योद्धा की भांति गोहद लौट आए थे. [8] External linksReferences
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