Porus

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King Porus

King Porus (पौरुष), the Greek version of the Indian names Puru, Pururava, or Parvata, was the ruler of a Kingdom in Punjab located between the Jhelum and the Chenab (in Greek, the Hydaspes and the Acesines) rivers in the Punjab. Its capital may have been near the current city of Lahore [1]. He had 600 small republics under him, which were ruled by Jats. Porus was most powerful of them.[2]

Unlike his neighbour, Ambhi (in Greek: Omphius), the King of Taxila, Porus chose to fight Alexander the Greek invader in order to defend his kingdom and honour of the people.

Porus fought the battle of the Hydaspes River with Alexander in 326 BC. After he was defeated by Alexander, in a famous meeting with Porus - who had suffered many arrow wounds in the battle and had lost his sons, who all chose death in battle rather than surrender - Alexander reportedly asked him, "how he should treat him". Porus replied, "the way one king treats another". Alexander the Great was so impressed by the brave response of King Porus that he restored his captured Kingdom back to him and gave addition lands of a neighbouring area whose ruler had fled[3]

Porus was said to be "5 cubits tall", either the implausible 7½ ft (2.3 m) assuming an 18-inch cubit, or the more likely 6 ft (1.8 m) if a 14-inch Macedonian cubit was meant.

पुरु-पौरव का इतिहास

दलीप सिंह अहलावत[4] लिखते हैं कि सम्राट् ययाति के आज्ञाकारी उत्तराधिकारी लघुपुत्र पुरु से ही इस जाटवंश का प्रचलन हुआ। महाभारत आदिपर्व, अध्याय 85वां, श्लोक 35, के लेख अनुसार -

पूरोस्तु पौरवो वंशो यत्र जातोसि पार्थिव ।
इदं वर्षसहस्राणि राज्यं कारयितुं वशी ॥35॥

पुरु से पौरववंश चला है। इस चन्द्रवंशी पुरुवंश में बड़े-बड़े महान् शक्तिशाली सम्राट् हुए जैसे - वीरभद्र, दुष्यन्त, चक्रवर्ती भरत (सम्राट चक्रवर्ती भरत के नाम पर आर्यावर्त देश का नाम भारतवर्ष पड़ा), हस्ती (जिसने हस्तिनापुर नगर बसाया), कुरु (जिसने धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र स्थापित किया), शान्तनु, भीष्म, कौरव पाण्डव आदि। इसी पुरुवंश की राजधानी हरद्वार, हस्तिनापुर, इन्द्रप्रस्थ तथा देहली रही।

इसी पुरुवंश में 326 ईस्वी पूर्व जाट राजा पोरस अत्यधिक प्रसिद्ध सम्राट् हुआ। इनका राज्य जेहलम और चनाव नदियों के बीच के क्षेत्र पर था। “परन्तु इनके अधीन अन्य 600 राज्य थे तथा इन्होंने अपना राजदूत कई वर्ष ईस्वी पूर्व रोम (इटली) के राजा अगस्तटस (Augustus) के पास भेजा था।” (यूनानी प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्ट्रेबो का यह लेख है। [5]। स्ट्रेबो का यह लेख ठीक ही प्रतीत होता है क्योंकि सम्राट् पोरस के समय भारत व आज के अरब देशों पर एक सम्राट् न था। परन्तु छोटे-छोटे क्षेत्रों पर अलग-अलग राजा राज करते थे। इनमें अधिकतर जाट राज्य थे, जिनका उचित स्थान पर वर्णन किया जायेगा। सम्राट् पोरस उन राजाओं से अधिक शक्तिशाली था।


1. आधार पुस्तक; जाटों का उत्कर्ष पृ० 297-299 लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-192


यूनानी शक्तिशाली सम्राट सिकन्दर ने 326 ई० पूर्व भारतवर्ष पर आक्रमण किया। सिकन्दर की सेना ने रात्रि में जेहलम नदी पार कर ली। जब पोरस को यह समाचार मिला तो अपनी सेना से यूनानी सेना के साथ युद्ध शुरु कर दिया। दोनों के बीच घोर युद्ध हुआ। सिकन्दर के साथ यूनानी सेना तथा कई हजार जाट सैनिक थे, जिनको अपने साथ सीथिया तथा सोग्डियाना से लाया था, जहां पर इन जाटों का राज्य था। पोरस की जाट सेना ने सिकन्दर की सेना के दांत खट्टे कर दिए।

पोरस की हार लिखने वालों का खण्डन करते हुए “एनेबेसिस् ऑफ अलेक्जेण्डर” पुस्तक का लेखक, पांचवें खण्ड के 18वें अध्याय में लिखता है कि “इस युद्ध में पूरी विजय किसी की नहीं हुई। सिकन्दर थककर विश्राम करने चला गया। उसने पोरस को बुलाने के लिए एक दूत भेजा। पोरस निर्भय होकर सिकन्दर के स्थान पर ही मिला और सम्मानपूर्वक संधि हो गई।” सिकन्दर अत्यन्त उच्चाकांक्षी था सही किन्तु इस साढे-छः फुट ऊँचे पोरस जैसा कर्मठ और शूरवीर न था। सिकन्दर उसकी इस विशेषता से परिचित था, उसी से प्रेरित होकर उसने भिम्बर व राजौरी (कश्मीर में) पोरस को देकर अपनी मैत्री स्थिर कर ली। पोरस का अपना राज्य तो स्वाधीन था ही। अतः पोरस की पराजय की घटना नितांत कल्पित और अत्युक्ति मात्र है1

सिकन्दर चनाब नदी पार के छोटे पुरु राज्य में पहुंचा। यह बड़े पुरु का (पोरस का) रिश्तेदार था। इसके अतिरिक्त रावी के साथ एक लड़ाका जाति अगलासाई के नाम से प्रसिद्ध थी, इनको सिकन्दर ने जीत लिया। छोटे पुरु का राज्य भी सिकन्दर ने बड़े पुरु को दे दिया। रावी व व्यास के नीचे वाले क्षेत्र में कठ गोत्र के जाटों का अधिकार था। इनका यूनानी सेना से युद्ध हुआ। इन जाट वीरों ने यूनानी सेना को मुंहतोड़ जवाब दिया और आगे बढ़ने से रोक दिया। सिकन्दर ने पोरस से 5000 सैनिक मंगवाये। तब बड़ी कठिनाई के व्यास नदी तक पहुंचा। इससे आगे यूनानी सेना ने बढने से इन्कार कर दिया। इसका बड़ा कारण यह था - व्यास के आगे यौधेय गोत्र के जाटों का राज्य था। उनका शक्तिशाली यौधेय गणराज्य एक विशाल प्रदेश पर था। पूर्व में सहारनपुर से लेकर पश्चिम में बहावलपुर तक और उत्तर-पश्चिम में लुधियाना से लेकर दक्षिण-पूर्व में दिल्ली-आगरा तक उनका राज्य फैला हुआ था। ये लोग अत्यन्त वीर और युद्धप्रिय थे। इनकी वीरता और साधनों के विषय में सुनकर ही यूनानी सैनिकों की हिम्मत टूट गई और उन्होंने आगे बढ़ने से इन्कार कर दिया। ऐसी परिस्थिति में सिकन्दर को व्यास नदी से ही वापिस लौटना पड़ा। वापसी में सिकन्दर की सेना का मद्र, मालव, क्षुद्रक और शिव गोत्र के जाटों ने बड़ी वीरता से मुकाबला किया और सिकन्दर को घायल कर दिया। 323 ई० पू० सिकन्दर बिलोचिस्तान होता हुआ बैबीलोन पहुंचा, जहां पर 33 वर्ष की आयु में उसका देहान्त हो गया2

सिकन्दर की सेना का यूनान से चलकर भारतवर्ष पर आक्रमण और उसकी वापसी तक, जहां-जहां जाट वीरों ने उससे युद्ध तथा साथ दिया, का विस्तार से वर्णन अगले अध्याय में किया जाएगा।


1. क्षत्रिय जातियों का उत्थान, पतन एवं जाटों का उत्कर्ष पृ० 309 लेखक कविराज योगेन्द्रपाल शास्त्री।
2. भारत का इतिहास पृ० 47, हरयाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड, भिवानी।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-193


सम्राट् पुरु (पोरस) के राजवंश का शासन 140 वर्ष तक रहा।[6] धौलपुर जाट राजवंश भी पुरुवंशज था। राजा वीरभद्र पुरुवंशज थे। उनके पुत्र-पौत्रों से कई जाट गोत्र चले। (देखो वंशावली प्रथम अध्याय)। इस पुरुवंश के जाट पुरुवाल, पोरसवाल, फ़लसवाल पौडिया भी कहलाते हैं। पुरु-पोरव-पोरस जाट गोत्र एक ही है2। पुरुगोत्र (वंश) के जाट आजकल उत्तरप्रदेश, हरयाणा, पंजाब तथा देहली में हैं परन्तु इनकी संख्या कम है। फलसवाल जाट गांव भदानी जिला रोहतक और पहाड़ीधीरज देहली में हैं।

Death

Indian sources record that Parvata was killed by mistake by the Indian ruler Rakshasa, who was trying to assassinate Chandragupta instead.

Greek tradition however records that he was assassinated, sometime between 321 and 315 BC, by the Thracian general Eudemus (general), who had remained in charge of the Macedonian armies in the Punjab:

"From India came Eudamus, with 500 horsemen, 300 footmen, and 120 elephants. These beasts he had secured after the death of Alexander, by treacherously slaying King Porus" Diodorus Siculus XIX-14

After his assassination, his son Malayketu ascended the throne with the help of Eudemus. However, Malayketu was killed in the Battle of Gabiene in 317 BC.

Jat Gotras from Porus

Notes

  1. www.livius.org
  2. Dr Mahendra Singh Arya, Dharmpal Singh Dudi, Kishan Singh Faujdar & Vijendra Singh Narwar: Ādhunik Jat Itihasa (The modern history of Jats), Agra 1998 (Page 290)
  3. History of Porus, Patiala, Dr Buddha Parkash.
  4. जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठ.192-194
  5. Strabo, Geography bk, xv, Ch. 1, P 73
  6. मसूदी की लिखित पुस्तक ‘गोल्डन मीडोज’, का संकेत देकर, बी० एस० दहिया ने जाट्स दी एन्शन्ट रूलर्स पृ० 315 में लिखा है।

References

  • Arrian, The Campaigns of Alexander, book 5.
  • History of Porus, Patiala, Dr Buddha Parkash.
  • Lendring, Jona. Alexander de Grote - De ondergang van het Perzische rijk (Alexander the Great. The demise of the Persian empire),Amsterdam:Athenaeum - Polak & Van Gennep, 2004.
  • Holt, Frank L. Alexander the Great and the Mystery of the Elephant Medallions, California: University of California Press, 2003, 217pgs. ISBN 0-520-24483-4

External links


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