Rupchand Chaudhary

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रूपचंद चौधरी

रूपचंद चौधरी तरड (Rupchand Chaudhary) का जन्म राजस्थान के बाड़मेर नगर में प्रसिद्ध समाजसेवी एवं रेल पथ निरीक्षक भीखमचंद तरड के यहाँ 4 जुलाई 1925 को भीखी देवी के कोख से हुआ. चौधरी भीखमचंद के रेलवे में नौकरी करने औए समाज सुधारक के रूप में किसानों को शिक्षित करने के लिए छात्रावास चलने की वजह से इनकी शिक्षा के प्रति विशेष रूचि रही. रूपचंद ने बाड़मेर में मेट्रिक तक शिक्षा प्राप्त की.

भारतीय रेलवे में सेवा

रूपचंद चौधरी का चयन भारतीय रेलवे में 18 अगस्त 1941 में गैंगमेन के रूप में हुआ और बनिया साधा स्टेसन पर नौकरी प्रारंभ की. पांच वर्ष बाद पदोन्नत होकर रेल पथ निरीक्षक बन गए. रेलवे में नौकरी करते हुए जोधपुर, मेड़ता, डीडवाना, सुजानगढ़, लोहावट, उम्मेद, बालोतरा, बायतू, बाड़मेर तथा गडरारोड़ में पदस्थ रह कर बड़ी निष्ठां तथा वफादारी से कार्य किया. जिसके कारण आपको सितम्बर 1967 , 15 अगस्त 1971 , 26 जनवरी 1974 , 16 अप्रेल 1975 , 15 अगस्त 1975 को उत्तर रेलवे ने नगद पुरष्कार से सम्मानित किया.

शौर्य चक्र से सम्मानित

सन 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान दुश्मन ने बमबारी कर मुनाबाव रेलवे स्टेसन और पाक के खोखरापार रेलवे स्टेसन के बीच भारत के सैनिक सप्लाई के रेल मार्ग को तोड़ दिया. यहीं से युद्ध मोर्चे पर लड़ रही भारतीय सेना के लिए सैन्य व खाद्य सामग्री पहुँचती थी. इसका सीमा पर युद्धरत भारतीय सैनिकों पर बुरा प्रभाव पड़ा. रूपचंद चौधरी के नेतृत्व में पाक बमबारी से क्षतिग्रस्त रेल लाइन की पटरी दिनांक 6 व 7 दिसम्बर 1971 को मौत की परवाह किये बिना पाक की निरन्तर एवं भारी बमबारी के बीच राष्ट्रीयता से औत-प्रोत हो कर रेल पटरी को ठीक कर दिया. रूपचंद चौधरी के दल ने एक नई रेल लाइन बिछाकर राष्ट्र-भक्ति का परिचय दिया. इससे सीमा पर लड़ रहे सैनिकों की सैनिक सप्लाई बहाल हो पाई. रूपचंद चौधरी की हिम्मत, दिलेरी, निष्ठां, कार्य कुशलता, बुलंद होसले एवं सफल नेतृत्व के कारण सीमा पर लड़ रहे भारतीय सैनिकों के खाद्य व सैन्य सामग्री के साथ पीने का पानी पहुँचाने में कामयाब रहे. इस कार्य से खुश होकर भारत सरकार ने उत्तरी रेलवे के इस रेल पथ निरीक्षक को 3 अप्रेल 1973 को शौर्य चक्र से सम्मानित किया. रेल मंत्रालय ने नकद पुरष्कार देकर सम्मानित किया.

शौर्य चक्र मिलाने के पश्चात् राजस्थान सरकार ने आपके परिवार को सम्मान स्वरुप दो हजार रूपये नकद तथा पच्चीस बीघा जमीन दी.

समाज सेवा

समाज सेवा से आपके परिवार के सदस्य हमेशा जुड़े रहे. शिक्षा के प्रसार में विशेष काम किया. किसान छात्रावास अपने प्रारंभिक दौर में इनके माकन में चलाई गयी थी. देश सेवा के लिए तत्पर रहने वाले इस मनीषी का 17 मार्च 1978 को स्वर्ग वास हुआ .

सन्दर्भ

  • जोगाराम सारण: बाड़मेर के जाट गौरव, खेमा बाबा प्रकाशन, गरल (बाड़मेर), 2009 , पृ. 128-129

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