Shekhawati Jat Kisan Panchayat

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Author of this article is Laxman Burdak लक्ष्मण बुरड़क

Shekhawati Jat Kisan Panchayat (शेखावाटी जाट किसान पंचायत) was a leading organization of Jats in Shekhawati farmers movement in Shekhawati region of Rajasthan to fight against the Jagirdars. It was also written as Shekhawati Jat Kisan Panchayat, Shekhawati Kisan Jat Panchayat, Sikarwati Jat Kisan Panchayat, Sikarwati Kisan Jat Panchayat etc.

शेखावाटी जाट किसान पंचायत का गठन

सीकरवाटी किसान जाट पंचायत - शेखावाटी के किसान संगठनों की श्रंखला में अंतिम कड़ी सन 1934 के जनवरी महीने में सीकर में संपन्न 'जाट प्रजापति महायज्ञ' के दौरान जुडी जो 'सीकरवाटी किसान जाट पंचायत' के रूप में सामने आई. इस संगठन ने सीकर ठिकाने के विरुद्ध सिंहनाद किया और एक जबरदस्त आन्दोलन को जन्म दिया. इस संस्था की स्थापना सीकर ठिकाने के किसान आन्दोलन के इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी जिसने एक नवयुग के आगमन की घोषणा की. कालांतर में यह 'शेखावाटी जाट किसान पंचायत' बन गयी. जिसका नेतृत्व सरदार हरलाल सिंह ने संभाला.

1934 में सीकर यज्ञ के बाद का आन्दोलन

वर्ष 1934 में सीकर में यज्ञ के सफल आयोजन से सीकर और दूसरे ठिकानेदार बौखला उठे थे. यज्ञ के बाद दस दिन तक अपनी तकलीफों का विश्लेषण किया. महायज्ञ के समय हाथी को भगवा देने तथा हाथी पर बैठकर सभापति का जुलुस न निकालने देने से जाट सीकर रावराजा से नाराज थे. उन्होंने वहीँ यज्ञ की समाप्ति के बाद एक तम्बू में बैठकर ठाकुर देशराज की अध्यक्षता में यह निर्णय लिया की अब किसानों व ठिकानेदारों के अधिकारों का खुलासा करने के लिए पहले सीकर ठिकाने के सवाल को ही उठाया जय तथा उसके बाद छोटे ठिकानेदारों द्वारा होने वाली मनमानियों का खात्मा हो तथा निरंतर बढ़ने वाला शोषण समाप्त हो. इसके लिए सीकर जाट किसान पंचायत की स्थापना की गयी. सीकर के प्रमुख लोगों को इसमें लिया गया और दफ्तरी काम के लिए तथा अन्य काम में अनुभव होने से ठाकुर देवसिंह बोचल्या को इसका जनरल सेक्रेटरी नियुक्त किया. ठाकुर देशराज ने इस पूरे काम की देखरेख तथा बाहरी लोकमत बनाने में प्रचार प्रसार का काम हाथ में लिया. [1]

23 अगस्त 1934 ई. को किसानों व ठिकानेदारों के बीच समझौता

किसान 23 अगस्त 1934 के समझौते से संतुष्ट हो गए और अपने काम धंधे लग गए. किसानों की सफलता से ठिकाने के अधिकारी और राजपूत जागीरदार नाराज थे. वे समझौते खो ख़त्म करने के लिए षडयंत्र रचने लगे. अधिकारी कभी गोचर भूमि पर लगान लगाने की बात करते तो कभी घी , तम्बाकू पर जो कस्टम माफ़ हो गया था, उसे फिर लगाने की बात करते. ठिकाने के अधिकारियों ने बेईमानी करना शुरू कर दी. चैनपुरा के चौधरी के पास लगान चुकाने की रशीद थी फिर भी लगान दुबारा माँगा गया. जिन खेतों को किसानों ने कभी जोता नहीं था और जिनमें ठिकाने ने ही घास पैदा करवाई थी, उन खेतों का लगान भी माँगा जाने लगा. ये छोटी बातें तो किसानों ने बर्दास्त कर ली लेकिन ठिकाने ने फसल ख़राब हालत देखते हुए भी समझौते के खिलाफ सीकर जाट पंचायत से राय लिए बिना लगान ज्यादा तय कर दिया तो चौधरियों ने इसका प्रतिरोध किया. किसान संगठित होने लगे और और लगान की वसूली बिलकुल बंद हो गयी. [2]

देवीसिंह बोचल्या की गिरफ़्तारी पर विचार करने के लिए शेखावाटी के प्राय: प्रमुख व्यक्ति सीकर पहुंचे. ठाकुर देशराज भी सीकर पहुँच गए. सब लोगों ने सीकर के पास भैरूपुरा में बैठक की. इसमें देवी सिंह की गिरफ़्तारी का विरोध किया गया तथा किसान पंचायत ने गोरुसिंह कटराथल को मंत्री नियुक्त कर उन्हें पूरा अधिकार दिया गया कि वे अपने स्तर पर कुछ भी निर्णय ले सकते हैं. सीकर में इकट्ठे होने वाले जाटों की संख्या को देख कर सीकर के अधिकारी घबरा गए. उन्होंने पंचों को गेस्ट हाऊस में बुलाया और अपनी तकलीफें बताने को कहा. पञ्च लोग अधिकारियों से मिले. अफसरों द्वारा साम-दाम-दण्ड-भेद की नीति अपनाई गयी पर स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ. अंत में विवश होकर मि. वेब ने फिर समझौते की बातचीत चलाई. कुंवर रतन सिंह, ठाकुर झम्मन सिंह एडवोकेट एवं मंत्री अखिल भारतीय जाट महासभा, विजयसिंह पथिक आदि के सहयोग से 23 अगस्त 1934 ई. को किसानों व ठिकानेदारों के बीच समझौता हो गया. ठिकाने की और से ए.डब्ल्यू. टी.वेब, प्रशासक सीकर, दीवान बालाबक्ष रेवेन्यु अफसर, मेजर मलिक मोहम्मद हुसैन खान अफसर इंचार्ज पुलिस आदि तथा किसानों की और से हरीसिंह बुरड़क पलथाना, अध्यक्ष सीकरवाटी जाट पंचायत, गोरुसिंह कटराथल, उपमंत्री जाट किसान पंचायत, पृथ्वी सिंह गोठड़ा, ईश्वरसिंह भैरूपुरा तथा पन्नेसिंह बाटड ने समझौते पर हस्ताक्षर किये. [3]

किसानों के लिए भारी सफलता

इस समझौते के अनुसार मास्टर चंद्रभानसिंह तथा देवासिंह को रिहा कर दिया गया. समझौते में संवत सन 1933 का लगान एक माह के भीतर देना था. सन 1934 में लगान नहीं बढेगा. फसल ख़राब हुई तो लगान कम किया जायेगा. सन 1934 के पश्चात् लगान एक निश्चित समय के लिए तय किया जायेगा. इसके लिए किसान पंचायत से सलाह-मशविरा किया जायेगा. यथाशीघ्र भूमि का बंदोबस्त किया जायेगा. प्रत्येक तहसील में दो-दो किसान प्रतिनिधि चुने जायेंगे जो किसानों की समस्याओं बाबत मि . वेब से बातचीत करते रहेंगे. समस्त लाग-बाग़ समाप्त की जाएँगी. जयपुर रियासत के कानून के अनुसार जमीन पर किसान का मौरूसी अधिकार होगा. किसान पंचायत द्वारा सुझाये पांच गाँवों में सीकर ठिकाने द्वारा स्कूलें खोली जाएँगी. गोचर भूमि सबके उपयोग के लिए रहेगी. जाटों को भी सरकारी नौकरी में रखा जायेगा. ठिकाने की सीमाओं में माल लाने-ले जाने में जकात नहीं ली जाएगी. इस समझौते में बेगार, नजराना, चिकित्सा आदि के बारे में उचित आदेश दिए गए. [4]

यह समझौता किसानों के लिए भारी सफलता थी क्योंकि इसमें ठिकाने से अनेक रियायतें व सुविधाएँ किसानों को प्राप्त हुई थीं. यह किसानों की सामंती शक्ति के खिलाफ न केवल भारी विजय थी बल्कि किसानों की संस्था सीकरवाटी जाट किसान पंचायत को भी मान्यता दी गयी थी जो किसानों के हितों के लिए संघर्ष कर रही थी. इस समझौते द्वारा किसानों की अधिकांश मांगे मान ली गयी थी. [5]

15 मार्च 1935 का समझौता

जब यह देखा गया कि राजस्व वसूली नहीं हो रही है, कानून व्यवस्था उत्तरोत्तर ख़राब होती जा रही है , सीकर के सीनियर अफसर वेब ने ठिकाने में चलने वाले इस संकट को ख़त्म करने हेतु सीकरवाटी जाट किसान पंचायत के प्रतिनिधियों को वार्ता के लिए फिर आमंत्रित किया. पंचायत ने अपनी और से दो प्रतिनिधि सर छोटूराम और कुंवर रतनसिंह भरतपुर को वार्ता करने हेतु नियुक्त किया. अंत में 10 मार्च 1935 ई. को मि. वेब से एक समझौता हो गया. समझौते के अनुसार रावराजा सीकर ने 15 मार्च 1935 को पिछली रियायतों के अलावा निम्न सहूलियतें और देने की घोषणा की- शीघ्र लगान अदा करने वालों को छूट, यूरोपीय अनुभवी सेटलमेंट आफिसर नियुक्त करना, जाट आफिसरों को उच्च पदों पर नियुक्त करना, जाटों द्वारा हाथी पर सवारी पर कोई रोक न लगाना, लगान में मतभेद होने पर उचित जाँच करना, जेल गए जाटों को छोड़ना, सात बीघा का एक प्लाट उपयुक्त जगह पर 'जाट बोर्डिंग हाऊस' हेतु निशुल्क आवंटित करना.[6]


सन्दर्भ

  1. डॉ पेमाराम: शेखावाटी किसान आन्दोलन का इतिहास, 1990, p.90
  2. डॉ पेमाराम: शेखावाटी किसान आन्दोलन का इतिहास, 1990, p.111-112
  3. डॉ पेमाराम: शेखावाटी किसान आन्दोलन का इतिहास, 1990, p.108
  4. राजेन्द्र कसवा: मेरा गाँव मेरा देश (वाया शेखावाटी), जयपुर, 2012, ISBN 978-81-89681-21-0, P. 126
  5. डॉ पेमाराम: शेखावाटी किसान आन्दोलन का इतिहास, 1990, p.110
  6. डॉ पेमाराम: शेखावाटी किसान आन्दोलन का इतिहास, 1990, p.114-115

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