Ushna

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Ancestry of Ushana

Ushna (उशना) Ushna (उशना) or Yat (याट) was a brave king in Yadavavansh born after three generations of Maharaja Shashabindu, who was born after six generations of Yadu.

YaduKroshtuVrijinavatSvahitaVisadguChitrarathaSasavinduPrithu SravasDharmaUsana

Adi Parva, Mahabharata/Mahabharata Book I Chapter 95 shloka 8 tells us that Yayati had two wives, viz., Devayani, the daughter of Usanas, and Sarmishtha the daughter of Vrishaparvan.

ययातेर दवे भार्ये बभूवतुः उशनसॊ दुहिता देव यानी वृषपर्वणश च दुहिता शर्मिष्ठा नाम अत्रानुवंशॊ भवति (I.90.8), (1.95)

Maharaja Ushna performed hundred Ashvamedha Yagyas and got the title of yat. According to the historian Ram Lal Hala, the word Jat is derived from word 'Yat' (याट). The king 'Yat'(Ushna) was in Chandravansh and was ancestor of Lord Krishna. The Jats are descendants of King Yat. 'Yat' later changed to 'Jat'.[1]

Yat is a Cyrillic alphabet

Yat or Jat (Ѣ, ѣ) is the name of the thirty-second letter of the old Cyrillic alphabet, or of the sound it represents. Its name in Old Church Slavonic is yět’ (ѣть) or yat’ (ıать), in Bulgarian yat (ят) or e dvoyno (е двойно, double e), in Russian and Ukrainian yat’ (ять), in Serbian yat (jat, јат), Croatian jat. In the common scientific Latin transliteration for old Slavic languages, the letter is represented by e with caron: ě (taken from Czech alphabet).

जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत

दलीप सिंह अहलावत[2] लिखते हैं कि यदु के पुत्र करोक्षत्री की शाखा में यदु की सातवीं पीढी में प्रथम चक्रवर्ती सम्राट् शशविन्दु हुए जिन्होंने विदर्भ देश पर शासन करते हुए अश्वमेध यज्ञ किया। इसकी पुत्री विन्दुमती का विवाह चक्रवर्ती सम्राट् मान्धाता से हुआ। इस सम्राट् ने अपने बड़े पुत्र पृथुश्रवा को ही सारा राज्य दे दिया। इस सम्राट् पृथुश्रवा के धर्म नामक पुत्र से सम्राट् उशना हुए। उसने 101 अश्वमेध यज्ञ किए। इस कारण उनको ‘याट’ की उपाधि मिली। कुछ ऐतिहासिक इस उशना याट से ही जाट जाति का प्रारम्भ मानते हैं जो कि अनेक वंशों से मिलकर बने हुए जट्ट संघ के लिए अयुक्तियुक्त मत है।[3]

इस यादव वंश में बड़े योद्धा राजे-महाराजे हुए और कईयों के नाम से जाटवंश चले, जिनका उचित स्थान पर वर्णन किया जायेगा। श्रीकृष्ण महाराज इसी यादव वंश में हुए जिन्होंने कई क्षत्रिय संघों को मिलाकर जाट संघ बनाया। वे स्वयं जाट थे। भगवान् श्रीकृष्ण ने क्षत्रियों का एक जाति संघ बनाय जो जाट कहलाया।[4]

Reference

  1. Ram Lal Hala: Jat Kshatriya Itihasa
  2. जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठ-187
  3. क्षत्रियों जातियों का उत्थान, पतन एवं जाटों का उत्कर्ष पृ० 283-84 लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री।
  4. पूरी जानकारी के लिए देखो द्वितीय अध्याय, (जाटवीरों की उत्पत्ति प्रकरण, जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत )

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