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View Full Version : kangali ka bhesh mera!



spdeshwal
May 3rd, 2008, 05:07 AM
Kangali ka bhesh mera kon paisa dhella dede ga
Darbarran mein kangle ne koe nue dhakella de de ga!

Bade gharan mein chhote ka , dhekhe bade gharran mein
chhote ka kati aaw na aadhar huya kare..............





A very melodious ragni from a singer from an area otherwise known for brij geets and Krishan lila. At least I am listening this singer first time but i am already his fan. Here is the link, hope all the lover of ragnis would enjoy this:

http://www.youtube.com/watch?v=FqYO9R_PbD4




Cheers!

VirenderNarwal
June 12th, 2008, 12:21 AM
"बक्त के बोल"

देशवाल जी राम राम

आपके द्वारा दिये लिंक को सुण कै जी सा आ गया....एक-एक बोल बहुत मूल्यवान है।

पहले रागनियां समझ ना आया करैं थीं.....लेकिन मेरे एक मैनेजर नै (भला करै राम उसका) मेरे भी चस्का चढा दिया.....अच्छी रागनियों का एक-एक बोल सवा लाख का है....गूढ... देहाती शब्दों में इतना अर्थ छुपा हुआ है...जो उस जमाने में लख्मीचन्द जैसे महान पुरुष कह गये आज इस नये जमाने में जमा न्यू की न्यू होण लाग री है...?

आपकी ओर दूसरे सद्स्यों की सहयता के लिये ये गाणा देवन्गीरि में लिख रहा हूँ !!!

कगांली का भेष मेरा कौण रै पैसा धेल्ला दे दे गा
दरबारा में कंगले नै कोइ न्युए धकेला दे दे गा..

बडे घरां में छौटे का कदै आव न आदर होया करै
विद्दवानों में मूर्ख का दिखे न्युए निरादर होया करै
हंसों के जोडे में कागा बिना बिरादर होया करै
उतने एक पैर फ़ैलाने चाहिये जितने एक चादर होया करै
घर में ना माहरे साग चढे कौन कच्चे चेला दे दे गा
दरबारा में कंगले नै कोइ न्युए धकेला दे दे गा..

मन्जिल दूर बदन निर्बल मेरे पै ना जाया जावै गा
सब एक सार महल दिखे मनै घर तक भी ना पावै गा
डोडीवान पता भूजै गा ना बतलाया जावै गा
गुरु भाई कृष्ण मेरा ना हाथ फ़ैलाया जावै गा
भुखा-नगां समझ मनै कोइ कपडा मैल्ला दे दे गा
दरबारा में कंगले नै कोइ न्युए धकेला दे दे गा.

गैर पुरुष पैसे आलै नै रिस्तेदार बताया करैं
चढी बात पै मूर्ख कै भी गोद्दी चार बताया करैं
कंगाली में घर आलै नै गैर का यार बताया करैं
चतुर आदमी नै माडे पणं में कत्ती गवांर बताया करैं
मनै जाण भिखारी चून मिलै कौण भर कै थैला दे दे गा
दरबारा में कंगले नै कोइ न्युए धकेला दे दे गा.

कृष्ण यार खास मेरा सै किस्स तै जा सुनाऊंगा
धोत्ती फ़टी बदन नगां मैं कैसे मूंह दिखाऊंगा
कैसे आया कढे तै आया के जा कै बतलाऊंगा
घर जाये की होये भेंट मैं के जा कै पकडाऊंगा
घोडी तक मेरे पास नही के रवी का चेल्ला दे दे गा
दरबारा में कंगले नै कोइ न्युए धकेला दे दे गा.

कगांली का भेष मेरा कौण रै पैसा धेल्ला दे दे गा
दरबारा में कंगले नै कोइ न्युए धकेला दे दे गा..

कोई ओर भी बढिया सी शब्दावली में रागनी का लिंक हो तै आण दयो जी...:)

spdeshwal
June 13th, 2008, 04:49 PM
छोटे भाई बहुत -२ धन्यवाद !
आप ने बिल्कुल सच कहा है , बहुत सुंदर रागनी है

गरीबी में आदमी की मन:स्तिथि कैसी हो जाती है , कि सुदामा कृष्ण जैसे मित्र पर भी भरोसा नही कर पाता
इस रागनी में इस अहसास का बखूबी चित्रण किया है

खुश रहो !

spdeshwal
June 14th, 2008, 03:54 AM
Thanks Virender for editing my post. Actually the font I use is very easy in its use but has limitations with its vowels and some letters like the sound of (chhoti e ki matra ,s, sh ss , d dh ,dd etc.) or may be I am not able to make proper use. Otherwise I would hate to put you under this extra burden . Anyways thanks again! I use:
http://www.google.com/transliterate/indic




cheers!