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View Full Version : Agriculture in Haryana - the declining trend



dndeswal
July 1st, 2009, 06:06 PM
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The following article by D.R. Chaudhary presents a gloomy picture about status of agriculture in Haryana. This is a chapter of the book published in 2007 and is still relevant in all respects.



हरयाणा में कृषि संकट

Name of Book - हरयाणा की दुविधा - समस्यायें और संभावनायें (page 26-32)
Writer - D.R. Chaudhary
Published by - National Book Trust, India, A-5, Green Park, New Delhi-110016
Year - 2007

कृषि में संकट सारे देश में व्याप्त है, किसी खास राज्य का तो कहना ही क्या । जी.डी.पी. में कृषि का हिस्सा एक-चौथाई से नीचे हो गया है और इसकी वार्षिक विकास की दर मात्र 2 प्रतिशत से नीचे है, जो आबादी की बढ़ोतरी से काफी कम है । वर्ष 2007 में भारत ने विश्व में नए "डालर खरबपतियों" की दूसरी बड़ी संख्या सृजित की । अर्थव्यवस्था की वृद्धि 9% से अधिक हुई और स्टॉक मार्केट का सूचकांक अब तक का सबसे ऊंचा रहा जो अब भी चढ़ रहा है । सेन्सेक्स ने 11,000 का आंकड़ा मार्च 2006 के अन्तिम सप्ताह में पार कर लिया और महाराष्ट्र के विदर्भ में उसी सप्ताह कृषकों की आत्महत्या की वारदातें 400 से बढ़ गईं ।

किसानों के बारे में राष्ट्रीय आयोग के अध्यक्ष अम.एस. स्वामीनाथन के अनुसार हमारे 40 प्रतिशत किसान खेती को छोड़ रहे हैं । गांव में आधे गरीबी रेखा से नीचे हैं तथापि, स्वामीनाथन ने शोक प्रकट करते हुए कहा, "हम छलांगे मारते हुए सेंसक्स को विकास का संकेतक मानने की बात करते हैं । किसानों की ऋणग्रस्तता, किसानों की आत्महत्या का प्रमुख कारण, ने देशभर में भयप्रद आयाम छू लिए हैं ।"

पंजाब, जो कि हरित क्रांति में देशभर में पथ-प्रदर्शक है, में भी किसानों के ऋण की कुल देयता 24,000 करोड़ तक की हो गई है जबकि कृषि क्षेत्र की वार्षिक आय 7,200 करोड़ रुपये पर अटकी हुई है । पंजाब सरकार ने सन् 1988 से लेकर किसानों की आत्महत्या के 2,116 मामलों को स्वयं स्वीकार किया है । हरयाणा कृषक समाज द्वारा आयोजित एक सर्वेक्षण में हरयाणा, जो कि हरित क्रांति के लिए दूसरा राज्य माना जाता है, के नरवाणा सब-डिवीजन के तीन गांवों में कम से कम 72 किसानों ने आत्महत्याएं की थीं । हरयाणा के एक पत्रकार राजकुमार ने हरयाणा कृषि के अपने अध्ययन में हरयाणा के आत्महत्या करने वाले ऋणग्रस्त किसानों की संख्या की जिलावार सारणी तैयार की है और यह संख्या पिछले कुछ वर्षों में लगभग 200 के आंकड़े को छू गई है । उसने इस घटना को "आत्महत्या की खेती" की संज्ञा ठीक ही दी है । खेतीहर मजदूरों की स्थिति और भी खराब है । पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ के समाज विज्ञान विभाग के प्रो. मनजीत सिंह द्वारा आयोजित अध्ययन में उसने 3323 ग्रामीण मजदूर घरों के जो हरयाणा के छह जिलों में 200 से ज्यादा गांवों में फैले हुए थे, से जो आंकड़े एकत्र किए थे, उनसे पता चलता है कि 1.43 लाख लोग अत्यधिक ऋणग्रस्तता की हालत में हैं और बंधुआ मजदूरी प्रथा (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 का उल्लंधन करते हुए बंधुआ मजदूर के रूप में कार्य कर रहे हैं । अध्ययन से पता चलता है कि 88 प्रतिशत ग्रामीण मजदूर दलित हैं, 74 प्रतिशत अनपढ़ हैं, और आधे से ज्यादा एक दिन में 9-12 घंटों तक काम करते हैं । इस कमरतोड़ मेहनत के बावजूद 67 प्रतिशत 15,000/- रुपये प्रतिवर्ष से कम कमाते हैं । किसानों और खेतीहर मजदूरों की स्थिति आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में और भी भयावह है जहां कि आत्महत्या की घटनाएं महामारी का रूप धारण कर गई हैं ।

हरयाणा की लोक प्रसिद्ध छवि, जो कि खासतौर पर राज्य सरकार के प्रचार तंत्र के कर्मचारियों ने दी है, एक प्रगतिशील और आधुनिक राज्य की है जिसने विभिन्न क्षेत्रों में द्रुतगामी प्रगति की है । यहां हरित क्रांति हो चुकी है । इसकी बुनियादी संरचना (अर्थात् सड़कें, विद्युत, दूरसंचार, अस्पताल, शिक्षा संस्थान इत्यादि) अच्छी है । तथापि इस प्रसिद्ध छवि में उतना नहीं बताया जाता जितना कि इसमें छुपाया जाता है । संरचना टूट के कगार पर है । हरित क्रांति अपनी बुलंदी को पा चुकी है और हरयाणा में कृषि संकट की स्थिति में है । देश में विशेष आर्थिक जोन के युग के प्रवर्तन से पूर्व यहां पर औद्योगिक विकास के नाम पर कुछ नहीं था । औद्योगिक विकास के लिए पता लगा नया मंत्र हरयाणा में उत्तेजित स्थिति में पहुंच चुका है । इतनी जल्दी उसकी किस्मत की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती (हरयाणा में औद्योगिकरण के बारे में)। हरयाणा की लोक प्रसिद्ध छवि बड़े तेजी से अपनी चमक खो रही है । हरयाणा के खाद्य और आपूर्ति मंत्री ने विधान सभा में 14 मार्च 1997 को एक प्रश्न के उत्तर में बताया कि राज्य में 43.88 लाख लोग गरीबी रेखा के नीचे थे । इनमें से 36.56 लाख ग्रामीण क्षेत्रों में थे और 7.32 लाख शहरी क्षेत्रों में । नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकानॉमिक रिसर्च द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार हरयाणा की 27 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे रह रही है ।

हरयाणा में विकासात्मक संवेग न केवल रुक गया है बल्कि हर क्षेत्र में कमी होने के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं । हरयाणा में कृषि पर नजर डालें तो यह बात साबित हो जायेगी । हरयाणा मुख्यतः कृषीय राज्य है जहां कि लगभग 70 प्रतिशत जनसंख्या प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर कृषि पर निर्भर है । हरयाणा में हरित क्रांति की सफलता की एक बड़ी कहानी रही है और राज्य इसके लिए यथार्थ रूप में स्वाभिमान महसूस कर सकता है । हरयाणा को सन् 1966 में जब अलग राज्य का दर्जा मिला उस समय यहां खाद्यान्नों की कमी थी । इसे अधिशेष राज्य बनने में कुछ समय लगा जिसके लिए सुधरी हुई प्रौद्योगिकी को श्रेय जाता है । खाद्यान्नों की सन् 1966-67 के 25.92 लाख टन के मुकाबले सन् 2003-04 में बढ़ोतरी 131.93 लाख टन तक पहुंच गई अर्थात् चार गुणा वृद्धि हो गई । इसी अवधि के दौरान कृषि के अन्य क्षेत्रों में हुई वृद्धि हरित क्रान्ति की रणनीति की सफलता का बखान करती है । कपास की खेती 2.88 हजार गाठों से बढ़कर 14.07 हजार गांठें हो गईं । निवल सिंचित भूमि क्षेत्र 12.93 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 29.69 लाख हेक्टेयर हो गया । रसायन उर्वरकों का प्रयोग 13 हजार टन से बढ़कर 11.25 लाख टन तक पहुंच गया । कीटनाशकों का प्रयोग 27 टन के मुकाबले बढ़कर 4,700 टन हो गया । राज्य में ट्रैक्टरों की संख्या में भी वृद्धि हुई है जो 4,803 से बढकर 2,39,814 हो गए हैं । ट्यूबवैल और पंपिंग सेट 0.25 लाख से बढ़कर 6.12 लाख हो गए ।

इस दृश्य पर यदि गहराई से नजर डाली जाए तो यह पता चलेगा कि यह वृद्धि अत्यधिक विषम रही है । प्रथम दशक में खाद्यान्नों की बढ़ोतरी लगभग दुगुनी हुई अर्थात् 25.92 लाख से 50.40 लाख टन तक पहुंच गई जबकि अगले दशक में यह 67.5 प्रतिशत रही जो 54.40 से बढ़कर 84.46 लाख टन हो गई । नब्बे के तीसरे दशक में यथार्थ स्थिरता बनी रही जिसमें खाद्यान्न उत्पादन 100 टन के इर्द-गिर्द रहा । इसके पश्चात् कोई महत्वपूर्ण तेजी नहीं आई । यही प्रक्रिया कपास के उत्पादन के मामले में भी देखी जा सकती है । हरयाणा में कपास की फसल में अवसरिक खराबी का कारण अमेरिकी बाल कीड़ा है जो कीटनाशकों के प्रयोग से नहीं मरता है । इसने हरयाणा की कपास की खेती करने वाले किसानों की व्यथा को और बढ़ा दिया है । राज्य में कुल सिंचित भूमि अपनी अधिकतम सीमा तक पहुंच गई है । दक्षिण हरयाणा के लम्बे चौड़े क्षेत्र में सिंचाई की सुविधायें नहीं हैं । हरयाणा के राजनीतिज्ञों द्वारा इसके अंतिम हल के रूप में कभी-कभार सतलुज-यमुना लिंक को पूरा करने का वायदा दोहराया जाता है । तथापि पंजाब के शासकों द्वारा इस मामले पर अपने कड़े रवैए को ध्यान में रखते हुए यह कहा जा सकता है कि यह एक पाइप-ड्रीम है । पार्टी संबंधों का ध्यान किए बगैर पंजाब के राजनेताओं ने यह बार-बार पूर्णतया स्पष्ट कर दिया है कि पंजाब हरयाणा को एक बूंद भी पानी ज्यादा नहीं देगा ।

1990-91 में की गई राज्य की कृषीय गणना के अनुसार (इसके पश्चात् यह गणना नहीं हुई है) 37,11,215 हेक्टेयर भूमि क्षेत्र पर कुल भूमिदारों की संख्या 15,29.799 थी, 0.2 हेक्टयर से 10 हेक्टयर वालों की संख्या 14,83,714 थी जिनके पास कुल क्षेत्र 30,01,809 हेक्टेयर था । केवल 38,038 भूमिदार ऐसे थे जिनके पास 10 से 20 हेक्टेयर भूमि थी जिसका कुल क्षेत्र 4,76,677 हेक्टेयर था । बीस हेक्टेयर या उससे अधिक भूमिदारों की संख्या 7,927 थी जिसका कुल क्षेत्र 2,32,729 हेक्टेयर था । राज्य में और उपविभाजन हो जाने के कारण तब से लेकर स्थिति बहुत ही खराब हो चुकी है । इसलिए ज्यादातर खेती जोतने वाले सीमांतिक, लघु और मध्यम दर्जे के किसान हैं । हरयाणा की ज्यादातर खेती मालिक करते हैं । ये खेती करने वाले लोग थे - हरयाणा के बलिष्ठ किसान - जिन्होंने हरित क्रांति को बुलन्दियों पर पहुंचाया था । लेकिन अब वह अपने अधिकतम पर पहुंच चुकी है और उसके आगे बढ़ने की कोई गुंजाइश नहीं है । भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् की समिति द्वारा दी गई रिपोर्ट के अनुसार पंजाब और हरयाणा में हरित क्रांति का प्रभाव क्षीण हो रहा है ।

हरयाणा में कृषि का महत्त्वपूर्ण परिमाण किसानों की ऋणग्रस्तता है । कृषीय ऋण की समस्या का अध्ययन करने के लिए केंद्रीय सरकार द्वारा गठित उच्च स्तरीय समिति के अनुमानों के अनुसार हरयाणा में लगभग 45% किसान ब्याज की भारी दरों पर जो 24 से 36% के बीच है, अल्पावधि ऋणों के लिए उधार देने वालों पर अत्यधिक निर्भर होते हैं । इन उधार देने वालों में ज्यादातर कमीशन एजेंट होते हैं जो कृषीय उत्पादों को किसानों से खरीद लेते हैं और उन्हें निवेश के रूप में बीज, उर्वरक और कीटनाशक जैसी वस्तुएं देते हैं । इनमें दोनों तरह से धोखाधड़ी की गुंजाइश रहती है । रसायनों को बर्दाश्त करने वाले नए कीटों के बढ़ जाने से, जहरीले कीटनाशी जो बेईमान व्यापारियों द्वारा भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों से गठजोड़ करके बेचे जाते हैं, असर नहीं करते और इससे हरयाणा में फसल खराब होने के अवसर आम हो गए हैं ।

अवसरिक फसल बर्बाद होने के साथ-साथ भारी ऋणग्रस्तता के कारण देश के विभिन्न भागों में आत्महत्या की वारदातें हो रही हैं । किसानों को मार्केट की घटा-बढ़ी की जानकारी, खासतौर पर वैश्वीकरण की नीति से, उच्च लाभ कमाने की गर्ज से कैश क्रॉप पर निर्भरता, उधार देने वालों का शिकंजा, ये सभी तथ्य ऐसे हैं कि जब फसल खराब हो जाती है तो कुछ किसान अपना जीवन समाप्त कर लेते हैं - जो कि एक ऐसा कदम है जो मजबूर होकर उठाना पड़ता है क्योंकि बचने के लिए फसल बीमा अथवा कारगार राहत देने जैसा कोई रक्षात्मक उपाय है ही नहीं ।

.....continued

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dndeswal
July 1st, 2009, 06:10 PM
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...continued from previous post


हरयाणा की कृषि - हरित क्रांति का एक नमूना - एक अंधड़ में फंस गई है । ऐसा अचानक नहीं हुआ है । नई खेती की प्रौद्योगिकी में ऐसे खतरे अंतर्निहित थे । चूंकि उन्हें दूर करने के लिए जरूरी उपाय नहीं किए गए इसलिए विनाशकारी परिणाम निकलना स्वाभाविक था । भारत के एक अग्रणी कृषि वैज्ञानिक एम.एस. स्वामीनाथन ने 1968 में ही यह चेतावनी दे दी थी कि स्वार्थ-साधन की खेती को यदि वैज्ञानिक तरीके से किया जाए तो भारी संभावनाएं रहती हैं लेकिन तत्काल लाभ लेने के उद्देश्य से किए जाने के भारी खतरे हैं । भारत में स्वार्थ-साधन के लिए उभरते खेती करने वाले वर्ग को इसकी जानकारी होनी चाहिए । जमीन की उर्वरता के संरक्षण के बगैर भूमि पर गहन खेती और जमीन की संरचना अंततः उजाड़ की ओर धकेल देगी । जल निकासी और सिंचाई से जमीन क्षारीय और लवणमयी हो जाएगी । कीटनाशकों, फुंगीसाइड और हरबिसाइड का अंधाधुंध प्रयोग जीव-विज्ञान के संतुलन पर बुरा असर डाल सकता है एवं टोक्सिक अपशेष जो कि अनाज में तथा अन्य खाएय पदार्थों में मिला होगा, से कैंसर और अन्य बीमारियां होने की संभावनाओं में वृद्धि हो जाएगी । भूमिगत जल के अवैज्ञानिक दोहन से यह अद्*भुत पूंजी तेजी से समाप्*त हो जाएगी जो प्रकृति ने हमें सदियों से दी है । कई स्थानीय किस्मों को एक या दो उच्च उत्पादन वाली किस्मों से तेजी से बदलने पर साथ लगे बड़े क्षेत्र पर अधिक बोझ पड़ेगा जिसके परिणामस्वरूप फसल को लगने वाली गंभीर बीमारियां फैलेंगीं जो सारी फसल को तबाह करने में सक्षम होंगीं । अतः स्वार्थ-साधन की खेती को, पारंपरिक कृषि में लाए गए प्रत्येक परिवर्तन के विभिन्न परिणामों को समझे बगैर और इसे कायम रखने के लिए वैज्ञानिक और प्रशिक्षण आधार निर्मित किए बगैर आरंभ करने से, भविष्य में हमारे लिए कृषि संबन्धी घोर विपत्ति आ सकती है कृषि संबन्धी समृद्धि आने के बजाय ।

स्वामीनाथन की टिप्पणी का महत्व बाद के वर्षों में काफी हद तक सच हुआ है । हरित क्रांति के क्षेत्रों में कृषि, नाशीजीवी और बीमारियों से, मिट्टी के निम्नीकरण और भूमिगत जल के सूखने से बुरी तरह से प्रभावित हुई है । एक अन्य कृषि विज्ञानी आर.एस. परोदा ने जोर देकर कहा है अब हम प्रथम हरित क्रान्ति की द्वितीय समस्याओं का सामना कर रहे हैं जैसे मिट्टी की उर्वरक शक्ति और जल संसाधनों की समाप्ति, लावण्य और जलाक्रांति का सृजन, नाशी जीवों और बीमारियों का पुनरुत्थान, बढ़ता हुआ पर्यावरणीय प्रदूषण, उपादान उत्पादकता में कमी इत्यादि ।

नई फार्म प्रौद्योगिकी हरयाणा सहित देश में हरित क्रांति के क्षेत्रों में गतिरोध की स्थिति में पहुंच गई है । इस सन्दर्भ में क्रांति से कई ऐसी क्रांति-विरोधी प्रवृत्तियां विकसित हो गई हैं जिनसे कृषक के भाग्य पर खतरा मंडराने लगा है । इस संकट के असर को न्यूनतम करने के लिए रणनीति तैयार की जा सकती थी । इस स्थिति से निपटने के लिए संबंधित क्षेत्रों जैसे डेरी उद्योग, मुर्गीपालन, मत्स्य पालन, बागवानी, कृषि उद्योग इत्यादि को बढ़ावा देकर कृषि को नानाविध क्षेत्रों में बांटने की योजना तैयार की जा सकती थी । इस संबंध में हरयाणा में लघु जोतें आदर्श सिद्ध हो सकतीं थीं । तथापि ऐसा कुछ भी नहीं किया गया जिसके परिणामस्वरूप राज्य में लघु पैमाने पर खेती अंतिम छोर पर पहुंच चुकी है ।

कृषि और डेरी उत्पादों के लिए दिल्ली बहुत बड़ा मार्केट है । हरयाणा ने महानगरी को तीन ओर से घेर रखा है लेकिन इस निकटता का कोई कल्पना प्रसूत प्रयोग नहीं किया गया है । दिल्ली को प्रतिदिन दूध की सप्लाई बड़ी मात्रा में राजस्थान में बीकानेर और जैसलमेर जैसे दूरस्थ स्थानों से होती है लेकिन हरयाणा का भाग केवल टपकन मात्र है । हरयाणा अपने दुधारू पशुओं की सर्वश्रेष्ठ नस्ल के लिए प्रसिद्ध है और गुजरात की तरह सफेद क्रांति लाने की यहां अपार संभावनाएं हैं । गुजरात में दुग्ध सहकरिताओं ने इन लघु और सीमांत किसानों की बड़ी संख्या को नियमित आय प्रदान की है जो ऑप्रेशन फ्लड के प्रमुख लाभभोगी हैं । यह हरयाणा में दोहराया जा सकता था । तथापि इस दिशा में कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया है ।

पशुपालन और डेरी उद्योग के संवर्द्धन की हरयाणा में बहुत गुंजाइश है लेकिन इस क्षेत्र की बहुत अनदेखी हुई है । हरयाणा में पशुधन की नियमित जनगणना नहीं हुई है । सरकार से उपलब्ध आंकड़ों से यह पता चलता है कि वर्ष 2003 में पशुओं की कुल संख्या 99,471 थी । हरयाणा परम्परा से पशुधन में समृद्ध रहा है परन्तु इसकी संभाल का कोई समुचित प्रबंध नहीं है । सन् 1966 में हरयाणा में केवल 115 पशु शल्य-चिकित्सक थे । सन् 2004-2005 में उनकी संख्या में 752 तक वृद्धि हुई है । राज्य में सात हजार के लगभग गांवों और सौ से अधिक कस्बों में पशुधन के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए यह संख्या कितनी आश्चर्यजनक है !

हरयाणा के लोकगीतों में दुग्ध और दुग्ध उत्पादों का महत्त्वपूर्ण स्थान है । "देशां में देश हरयाणा, जित दूध दही का खाणा" राज्य में लोक प्रसिद्ध कहावत है । वैदिक युग से गाय को आदर की वस्तु माना जाता है । हरयाणा का भीतरी भाग अखाड़ों से भरा पड़ा और दूध और घी पहलवानों की शक्ति और पराक्रम का प्रमुख स्रोत रहा है । तथापि "प्रगतिशील" राज्य हरयाणा अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रयोग करने में असफल रहा है और इसने डेरी उद्योग के मामले में आपराधिक अनदेखी की है ।

हरयाणा में दुग्ध संयंत्रों की संख्या पिछले तीन दशकों से पांच पर ही स्थिर है । वर्ष 1966 में दूध का अनुमानित उत्पादन 10.89 लाख टन था । यह वर्ष 2004-05 में 52.20 लाख टन तक पहुंच गया । दूध प्रापण जो वर्ष 1978-79 में 293.5 लाख लीटर था, वह वर्ष 2004-05 में 1331.8 लाख लीटर तक पहुंच गया । हरयाणा में प्रति व्यक्ति, प्रतिदिन दूध की उपलब्धता 352 ग्राम थी जो 2003-04 में बढ़कर 600 ग्राम हो गई । इस सम्बन्ध में राज्य के निष्पादन के बारे में आंकड़े पर्याप्*त रोशनी डालते हैं । यदि इस क्षेत्र में हरयाणा अपनी क्षमता को समुचित रूप से प्रदर्शित करता तो उसके चमत्कारिक परिणाम निकल सकते थे ।

हरयाणा दिल्ली को सब्जियों और फलों की काफी बड़ी मात्रा सप्लाई कर सकता है लेकिन राज्य में बागवानी की शोचनीय अनदेखी की गई है । वर्ष 2003-04 में हरयाणा में फलों और सब्जियों की खेती केवल 59,574 हेक्टेयर क्षेत्रफल पर होती थी । यह अल्पमात्रा है । सोनीपत जिले के एक गांव के उद्यमशील किसानों ने मशरूम की खेती शुरू की और उसकी मार्केटिंग दिल्ली में करते हैं । उन्होंने उल्लेखनीय कार्य किया है । दिल्ली में स्थानीय प्रयोग और निर्यात के लिए फूलों की बड़ी मांग है । तथापि फूलों की खेती के अधीन हरयाणा में वर्ष 1990-91 में मात्र 50 हेक्टेयर क्षेत्रफल था । वर्ष 1995-96 में वह बढ़कर लगभग 1800 हो गया । इस क्षेत्र में बढ़ोतरी की भारी गुंजाइश है । तथापि गेहूं, धान, कपास और गन्ने की खेती करने की नीरस पद्धति अभी भी अक्षुण्ण चली आ रही है ।

हरयाणा में उत्तरोत्तर सरकारें कृषि क्षेत्र में होने वाले इस संकट से उदासीन रहीं हैं और इस तथ्य का राज्य में आत्महत्या संबंधी संकट पैदा करने में भारी योगदान रहा है । अब हरयाणा सरकार खास तौर पर मार्च 2005 के विधान सभा चुनावों के पश्चात् इस निष्कर्ष पर पहुंच गई लगती है कि कृषि क्षेत्र का मर्ज इलाज से परे है । हरयाणा में, खास तौर पर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में कृषि की समृद्ध भूमि को, जो राज्य में कृषि योग्य भूमि का बहुत बड़ा टुकड़ा है, विशेष आर्थिक जोन प्लानरों, बिल्डरों और प्रापर्टी डीलरों को बेचने के लिए छोड़ दिया गया है । चूंकि गुड़गांव में विस्तार संतृप्ति की स्थिति में पहुंच गया है और दिल्ली को अपनी बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए भूमि चाहिए इसलिए दिल्ली के गिर्द हरयाणा की भूमि हथियाने के लिए भू-माफिया, स्थावर संपदा सट्टेबाज और भू-संपत्ति दलाल तैयार बैठे हैं । आने वाले समय में इसके सामाजिक परिणाम क्या होंगे, सरकार में इस बात पर गौर करने की कोई जरूरत नहीं समझता ।


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anilsangwan
July 1st, 2009, 06:27 PM
खूड तो रहे कोणी..... हल के टांट पे चला दें किसान?..... खेती तो ख़तम होनी स अंकल जी ...... रिलायंस आले ले गए धरती ने......suncity, Chdcity, TDI city er bera na kaun kaun Jeem gya dharti..... उनकी मजदूरी करो एब हरियाणा आले ....नंबर वन हरियाणा होवन लाग रा स..... खेती की के जरुरत स??........देखते जाओ....... बिहार के चावल एर एमपी का गेहू नहीं खुवाया सब तें तो देख लियो...इस ने कहय करें विकास......एर नंबर वन हरियाणा........



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NKharub
July 1st, 2009, 06:36 PM
sahi kah raha hai bhai.......ar j agle 5 saal bhi yo hooda CM aaga to bhai rohtak or jhajhar aale k to saare khud bech dega....ye kati gurgaon aale ki dhaal khali ho jaange....

NKharub
July 1st, 2009, 06:41 PM
ar yo kh lo 1 bhi dekh lo 1 bar

http://www.youtube.com/watch?v=U1ZW5LU8--w

deepika
July 1st, 2009, 07:31 PM
I dont understand why you always try to target and blame present Govt!!!!!!!!!kya yeh aapke bataye gaye so called"Vikas kaarya" aap jis ka samarthan karo ho uss sarkaar ke under nahi hoya kuch....yeh Sun city phun city ibbe aaye hai ke?arr rahi baat in companiya ke jimman ki...toh bhatere laalchi log hai jinn nai apni dada laahi zameen croro rupiyo ke laalach mai bech khayi....arr ibb kehvai sai akk reservation de dyo mhare khudd koni issliye kamayi ka saadhan konya.....mufat mai toh nahi di kisse nai zameen inn companiya tai....Rahi baat kheti ki toh jib nai dharti tai pyar hai vai ibb bhi karai hai....mere Papa Bank Manager ki post tai retire ho liye(7 saal pehle) arr abb kheti karvavai hai mhari zameen pai....ibb ronn nai toh aadmi kisse baat pai roo de par kaaran aadmi aap e ho sai apne naas ka...bas pher ungli kisse aur kaan kar dyo jee akk iss nai naas kar diya mhara toh na tai hum aaj bera na kitt hote



खूड तो रहे कोणी..... हल के टांट पे चला दें किसान?..... खेती तो ख़तम होनी स अंकल जी ...... रिलायंस आले ले गए धरती ने......suncity, Chdcity, TDI city er bera na kaun kaun Jeem gya dharti..... उनकी मजदूरी करो एब हरियाणा आले ....नंबर वन हरियाणा होवन लाग रा स..... खेती की के जरुरत स??........देखते जाओ....... बिहार के चावल एर एमपी का गेहू नहीं खुवाया सब तें तो देख लियो...इस ने कहय करें विकास......एर नंबर वन हरियाणा........



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VJ
July 1st, 2009, 08:03 PM
I dont understand why you always try to target and blame present Govt!!!!!!!!!kya yeh aapke bataye gaye so called"Vikas kaarya" aap jis ka samarthan karo ho uss sarkaar ke under nahi hoya kuch....yeh Sun city phun city ibbe aaye hai ke?arr rahi baat in companiya ke jimman ki...toh bhatere laalchi log hai jinn nai apni dada laahi zameen croro rupiyo ke laalach mai bech khayi....arr ibb kehvai sai akk reservation de dyo mhare khudd koni issliye kamayi ka saadhan konya.....mufat mai toh nahi di kisse nai zameen inn companiya tai....Rahi baat kheti ki toh jib nai dharti tai pyar hai vai ibb bhi karai hai....mere Papa Bank Manager ki post tai retire ho liye(7 saal pehle) arr abb kheti karvavai hai mhari zameen pai....ibb ronn nai toh aadmi kisse baat pai roo de par kaaran aadmi aap e ho sai apne naas ka...bas pher ungli kisse aur kaan kar dyo jee akk iss nai naas kar diya mhara toh na tai hum aaj bera na kitt hote

Deepika didi is right....no need to blame govt....they are not forcing anyone regarding acquisition of land.....सच्ची बात त या सै.....किस्से का जी ना करे खेती करन ने जिब करोड़ रूपये मिलन लग रहे सो...अर्र बिज़नस करन आले त उडे मुनाफा कमान ताहि बैठे सै....वे भी कोशिश त करेंगे....जमीन लेन की....all govt can do is just provide better and promising facilities to farmers...and good rates for their crops....and any provision to reduce cost of input like electricity...pesticides...water...etc.. would be very encouraging...

I think this can put farmer's mind into a positive frame...and they can start seeing agri activities as a profitable activities :)

anilsangwan
July 1st, 2009, 09:07 PM
Aap ke samajh mein naa aawein meri likhi od post to aap kripya ignore kar diya karo......Ho sakta hai ki meri saari ki saari post galat hon...... lekin woh mera sochney ka dhang hai Deepika ji............

meri fursat koni ji seeng fasaawan ki ....er vaad vivaad karan ki aap ke gail...........Vinamra dhang se mein Kshama chahunga .........no more replies from my side....... Ram Ram...


I dont understand why you always try to target and blame present Govt!!!!!!!!!kya yeh aapke bataye gaye so called"Vikas kaarya" aap jis ka samarthan karo ho uss sarkaar ke under nahi hoya kuch....yeh Sun city phun city ibbe aaye hai ke?arr rahi baat in companiya ke jimman ki...toh bhatere laalchi log hai jinn nai apni dada laahi zameen croro rupiyo ke laalach mai bech khayi....arr ibb kehvai sai akk reservation de dyo mhare khudd koni issliye kamayi ka saadhan konya.....mufat mai toh nahi di kisse nai zameen inn companiya tai....Rahi baat kheti ki toh jib nai dharti tai pyar hai vai ibb bhi karai hai....mere Papa Bank Manager ki post tai retire ho liye(7 saal pehle) arr abb kheti karvavai hai mhari zameen pai....ibb ronn nai toh aadmi kisse baat pai roo de par kaaran aadmi aap e ho sai apne naas ka...bas pher ungli kisse aur kaan kar dyo jee akk iss nai naas kar diya mhara toh na tai hum aaj bera na kitt hote

deepika
July 2nd, 2009, 02:27 AM
Cahlo jee jisi aapki iccha...manne bhi aapki baat galat si e laagi jibbe reply karya...waise do addmi ki soch galat na ho sakti:DChalo jee koi na akele lade jao maidan mai talwaar gail :)

Aap ke samajh mein naa aawein meri likhi od post to aap kripya ignore kar diya karo......Ho sakta hai ki meri saari ki saari post galat hon...... lekin woh mera sochney ka dhang hai Deepika ji............

meri fursat koni ji seeng fasaawan ki ....er vaad vivaad karan ki aap ke gail...........Vinamra dhang se mein Kshama chahunga .........no more replies from my side....... Ram Ram...

navdeepbudhwar
July 2nd, 2009, 03:45 AM
Deepika didi is right....no need to blame govt....they are not forcing anyone regarding acquisition of land.....सच्ची बात त या सै.....किस्से का जी ना करे खेती करन ने जिब करोड़ रूपये मिलन लग रहे सो...अर्र बिज़नस करन आले त उडे मुनाफा कमान ताहि बैठे सै....वे भी कोशिश त करेंगे....जमीन लेन की

bhai bilkul sahi....koi bhi nai karna chahta ib kheti.......aak kal to gaon ke choore YANKY banan ke chakkar mai bappu te kave ak bapu safari le de.........
ib baapu bhi bechara ke karee,,,bapu ne bhi bechni pade hai zameen....choore/choori ka rishta naa ho to becho 2-4 kilee arr feer dekhoo......
kuch aaj kal kheti mai risk jada ho gaya.......
1- kabhi barish bahut jada,,,arr kabhi ek bund bhi nai...
2-barish naa ho to electricity bhi nai,,,ferr tubewell kiss kam ke,,,arr kadi lite aa bhi jaa hai te dim aave hai,,,iste tubewell ki motor kharab ho jave hai,,,,maari motor har garmiyaa mai 3-4 baari kharab ho chuki hai.
3-jonsi fasal lagao use ke rate kam ho jave,,,jo ziri ki mausam mai tudak(it's a variety of rice) lagao to basmati ke rate jada....arr agar basmati lagaoo to tudak ke jada....
4-gaane(sugarcane) ki fasal ne kida kha ja hai....arr uski dawai bhi bahut mahngi pade hai......

inhi sab karno karke ibb kisaan kheti mai risk maante hai........
arr isi liye apni zameene bech rahe hai...

aryasatyadev
July 2nd, 2009, 07:12 AM
The reason for decline is rightly mentioned by Sangwan bhaiji, but here I differ with him on one point that is no one (even govt) is pressurising farmers to sell their land to MNCs and other housing companies..... I had seen in the past how farmers were selling there land and migrating to other states including Chhattisgarh and MP, it is because the rate of agriland were considerably lower there compared to Haryana.
One more reason that I fathom out of the new social structure of the villages is that now all farmers are doing farming on their own they are not getting help from their relatives and also their neighbours.... which was not the case in the past hence they are proving to be failures.... another reason is increase in population which is resulting in less agriland per farmer...... Hence, it is always benefecial for them to sell that small patch of land and seek greener pasrures.

ajit2009
July 2nd, 2009, 08:23 AM
I dont understand why you always try to target and blame present Govt!!!!!!!!!kya yeh aapke bataye gaye so called"Vikas kaarya" aap jis ka samarthan karo ho uss sarkaar ke under nahi hoya kuch....yeh Sun city phun city ibbe aaye hai ke?arr rahi baat in companiya ke jimman ki...toh bhatere laalchi log hai jinn nai apni dada laahi zameen croro rupiyo ke laalach mai bech khayi....arr ibb kehvai sai akk reservation de dyo mhare khudd koni issliye kamayi ka saadhan konya.....mufat mai toh nahi di kisse nai zameen inn companiya tai....Rahi baat kheti ki toh jib nai dharti tai pyar hai vai ibb bhi karai hai....mere Papa Bank Manager ki post tai retire ho liye(7 saal pehle) arr abb kheti karvavai hai mhari zameen pai....ibb ronn nai toh aadmi kisse baat pai roo de par kaaran aadmi aap e ho sai apne naas ka...bas pher ungli kisse aur kaan kar dyo jee akk iss nai naas kar diya mhara toh na tai hum aaj bera na kitt hote
:boxing
govt. ki bat chodo deepika ji ,ye to chahe kisi ki ho kisan ka bhala koi nahi kar sakti , uska bhala sirf wo khud ya fir bhagwan kar sakta hai , rahi bat jamin kharid ya bech ki ye to har ek apne fayde anusar karta hai ,kyunki bap na bhaiya sabse bada rupiya ..... kalyug hai na ,
...............sabse badi bat to ye hai ki jinke pas jamin hai wo kisan nahi hai,wo hai jamindar , wo to apne ghar baitha sukh ki roti kha raha hai , paisa byaj par deta hai ,why ...........? because asli kisan wo hai jo jamin se kamata hai jamin par lagata hai aur apna kam chalata hai tote nafe me ,pata nahi kaise log kisan par bat ched dete hai ,jinhe malunm nahi badha kya chal raha hai ,badhe me kya competetion hai ,log jamin tote me bhi kyo badhe par lete hai ,khet me jane par kya mahnat hai ,jiw janttu kya adchan hai ,kya mehnga sasta hai.............kisan ke liye mehnga , khad ,bij dawa ,tel ,pani ,kuch nahi hai agar mahnga hai to uska sadapan ,mehnga hai to samajik dabaw ,mahanga hai to adhati ki mar,mahangi hai to kudrat ki mar , mahangi hai to fasal ki dagabaji ,........................
.......................aur sabse mehnga hai kisan ke wiswas ka tutana......
batoo ko sunkar kahna ,asan hai .......practical karke batao :tab dekho ji , ki kisan ki bat ate hi ek alag si tissssssssssssssss ubhar jati hai dilo dimag me .....yahi hai kisan ,jiska bhart des mahan ....... krishi pardhan desh.
jai kisan sab hai . 0. par karam mahan.......tu narak-sawarg se anjan.......
............................tu hai barahmand saman....................

dahiya1683
July 2nd, 2009, 06:17 PM
I dont understand why you always try to target and blame present Govt!!!!!!!!!kya yeh aapke bataye gaye so called"Vikas kaarya" aap jis ka samarthan karo ho uss sarkaar ke under nahi hoya kuch....yeh Sun city phun city ibbe aaye hai ke?arr rahi baat in companiya ke jimman ki...toh bhatere laalchi log hai jinn nai apni dada laahi zameen croro rupiyo ke laalach mai bech khayi....arr ibb kehvai sai akk reservation de dyo mhare khudd koni issliye kamayi ka saadhan konya.....mufat mai toh nahi di kisse nai zameen inn companiya tai....Rahi baat kheti ki toh jib nai dharti tai pyar hai vai ibb bhi karai hai....mere Papa Bank Manager ki post tai retire ho liye(7 saal pehle) arr abb kheti karvavai hai mhari zameen pai....ibb ronn nai toh aadmi kisse baat pai roo de par kaaran aadmi aap e ho sai apne naas ka...bas pher ungli kisse aur kaan kar dyo jee akk iss nai naas kar diya mhara toh na tai hum aaj bera na kitt hote



Deepika ji... Government as well as people both are responsible for this... Government is using agricultural land for industrial purpose... It shouldn't be there... "Mewat ki side me itni zameen banzar padi hai, govt. ko wo zameen use karni chahiye... " A proper system should be there for land acquistion.. At least fertile land should not be used for industrial purpose... We have seen that on national highways whole land has been acquired by the industries... paisa dekh kar logo lo lalach to aayega hi... For the growth of industries govt should provide facilities in areas like Mewat etc.. Isse dono fayde ho jayenge... Industries bhi lagegi or agricultural land bhi bach jayegi... yani Saanp bhi mar jaga or lathi bhi na tootegi... Jahan tak baat aapke papa ji ki hai to I appreciate his efforts but har aadmi un jaisa to ni sochta... Jo thode lalchi hain unko sudharne ke liye koi system to banana hi padega....

deepika
July 3rd, 2009, 01:38 AM
I appreciate your views...Especially your idea that unfertile land should be used for setting up industries....but trust me even if Government dont acquire land(people feel happy when their land is acquired),do u think people still be invovled in agriculture?Your theory may work for some people but not all....But its very interesting and useful thought you have shared.May this happen...Moreover even agriculture is going to be commercialized soon.The reason is now farmer are not growing wheat and paddy but are trying to grow such flowers,fruits,plants etc which help them make lot of money.Ofcourse its human nature to think of earning more money but i think it may also disturb the old agricultural crop cycle that existed.We have to be focussed on the growth of wheat and paddy as these are the essentials for us.Jab gehu na hoga toh roti kaha se hogi,aur jab roti hi na hui toh phir khayenge kya?So i hope such schemes should be implemented which encourages the farmers to grow wheat and paddy.



Deepika ji... Government as well as people both are responsible for this... Government is using agricultural land for industrial purpose... It shouldn't be there... "Mewat ki side me itni zameen banzar padi hai, govt. ko wo zameen use karni chahiye... " A proper system should be there for land acquistion.. At least fertile land should not be used for industrial purpose... We have seen that on national highways whole land has been acquired by the industries... paisa dekh kar logo lo lalach to aayega hi... For the growth of industries govt should provide facilities in areas like Mewat etc.. Isse dono fayde ho jayenge... Industries bhi lagegi or agricultural land bhi bach jayegi... yani Saanp bhi mar jaga or lathi bhi na tootegi... Jahan tak baat aapke papa ji ki hai to I appreciate his efforts but har aadmi un jaisa to ni sochta... Jo thode lalchi hain unko sudharne ke liye koi system to banana hi padega....

deepika
July 3rd, 2009, 01:49 AM
Aapki beat se mai sehmat hai...desh ka kisaan hi sabse jyada mehnat karta hai aur yehi kisan kisi bhi bade enterpreneur se jyada risk leta hai,kyunki industrialist toh apna nafa nuksan croro me sochta hai par kisan sirf yeh sochta hai ki 2 time ki roti purre saal mile aur ghar me paise ki tangi na ho....sabse jyada mehnat karke ke baad bhi uska yeh chota sa sapna bhi dher saare risk pe nirbhar hai....baarish ka hona na hona,pesticides ka hona na hona aur na jaane kya kya...aur apne dada,pita ko aise jhujhte hue dekh ke shayad nayi peedi apni iss zimmedaari se muh chura rahi hai.Jo galat bhi hai aur ek tarike se sahi bhi.Har sikke ke do pehlu hote hai.Bas abb yehi aasha hai ki phir se "Harit Kranti" jaisa koi chamatkaar ho jaaye.



:boxing
govt. ki bat chodo deepika ji ,ye to chahe kisi ki ho kisan ka bhala koi nahi kar sakti , uska bhala sirf wo khud ya fir bhagwan kar sakta hai , rahi bat jamin kharid ya bech ki ye to har ek apne fayde anusar karta hai ,kyunki bap na bhaiya sabse bada rupiya ..... kalyug hai na ,
...............sabse badi bat to ye hai ki jinke pas jamin hai wo kisan nahi hai,wo hai jamindar , wo to apne ghar baitha sukh ki roti kha raha hai , paisa byaj par deta hai ,why ...........? because asli kisan wo hai jo jamin se kamata hai jamin par lagata hai aur apna kam chalata hai tote nafe me ,pata nahi kaise log kisan par bat ched dete hai ,jinhe malunm nahi badha kya chal raha hai ,badhe me kya competetion hai ,log jamin tote me bhi kyo badhe par lete hai ,khet me jane par kya mahnat hai ,jiw janttu kya adchan hai ,kya mehnga sasta hai.............kisan ke liye mehnga , khad ,bij dawa ,tel ,pani ,kuch nahi hai agar mahnga hai to uska sadapan ,mehnga hai to samajik dabaw ,mahanga hai to adhati ki mar,mahangi hai to kudrat ki mar , mahangi hai to fasal ki dagabaji ,........................
.......................aur sabse mehnga hai kisan ke wiswas ka tutana......
batoo ko sunkar kahna ,asan hai .......practical karke batao :tab dekho ji , ki kisan ki bat ate hi ek alag si tissssssssssssssss ubhar jati hai dilo dimag me .....yahi hai kisan ,jiska bhart des mahan ....... krishi pardhan desh.
jai kisan sab hai . 0. par karam mahan.......tu narak-sawarg se anjan.......
............................tu hai barahmand saman....................

ajit2009
July 3rd, 2009, 05:59 PM
.Bas abb yehi aasha hai ki phir se "Harit Kranti" jaisa koi chamatkaar ho jaaye.[/QUOTE]


................:eek:ham apse bas bilkul ulte hai mam:eek:..................................

.............ab "Harit Kranti" nahi 2-3 sal ka akal chahiye in india jis se pata chalega kisan ki mehnat aur amandani ka , tabhi jakar logo me paise ki bajaye anaj ki kimmat banegi ,aur jab anaj ki kimat hogi tab kisan ki value hogi .................ye din to ek din ana hai kyunki har chij ka waqt hota hai .
..................i pray to god every day ,for akal not for "Harit Kranti" ..........
:rock

aryasatyadev
July 3rd, 2009, 07:47 PM
Ajit Ji, I also pray to god but that prayer is contrary to yours, have you imagined that the first casualty of your beloved AKAL will be farmers itself....
So dear, decline in agriculture is another thing and asking akaal for farmers is another......
May your wish (in this regard) never comes true:mad::mad:

skadian123
July 3rd, 2009, 08:56 PM
Dear Deshwal ji,

As pointed out by my fellow members in their replies, there is hardly any land going to be left for agriculture.

For agriculture, you certainly need land, but we in our rat races are hell bent on converting our open spaces into glass and concrete jungles in the name of so called development.

The food security achieved through the green revolution is a thing of the past and so conveniently ignored and forgotton by our political class and policy and decision makers. It's anybody's guess as to how long we would see the green fields that provide us with sustenance.

Punjab and Haryana earlier known as the breadbasket of India would soon be the concrete jungle hub of India. Really unfortunate that the ever scarce arable and fertile land is being mindlessly destroyed by the policy makers with no checks and controls especially in light of the fact that there are millions of poor empty stomachs to be fed.

aryasatyadev
July 3rd, 2009, 10:19 PM
Please consider this:
What a farmer will get if he sells land:
Rate of one acre of land :: 30 lacs
Interest earned in a year by putting money in FD (@8%pa) :: 2.4 lacs.

Now what he gets if he retains it:
Total harvests per year :: 2
Yield (Rabi) :: 1.5 lacs
Yield (Kharif) :: 2 lacs
Total yield :: 3.5 lacs
Direct investment for this yield :: minimum 01 lac
other investment i.e. manpower etc. :: min. 01 lacs also add the other natural calamities, because there is no insurance of crop.
Total earning :: 1.5 lacs

Here my point is when it is the fundamental right of every person to seek better evenues for his livelihood, then if a farmer is selling his piece of land for his betterment it should be OK...... however the farmers of present age are smart enough to invest the money obtained from Haryana or Punjab by selling their lands, for purchasing the lands in MP and Chattisgarh, where the land is cheap and labourforce is cheaper......

mann123
July 3rd, 2009, 11:28 PM
You are correct in your calcuations Bhai Satya but these calculation are good when they are abide by baniya ethics and farmers make some disinvestment.

What if we go beyond this calculations or 30 years down the line? i feel there won't be any land to cultivate hence no food and in economics term deflation/depression. In that case farmers will be the first one to suffer not only them but the whole country will be sufferer and I feel these builders are more than a convict. Remember the 2nd pakistan war when we were trying to import the wheat and everybody was denying us(though we got some with congress ghas), it was Aadrniye Sh Lal bahadur shastri who takled the problem with honesty and courage bringin green revolution.

I think the logic of the post put by the DND jee is whether sensex or rising income level is the only parameter of the progress.

I personally don't want to see concrete jungle's all over Haryana and still look forward to the natural jungle with sustained growth.

aryasatyadev
July 4th, 2009, 02:58 AM
Virender bhai, who doesn't want greenery around him..... and offcourse sensex is not the only parameter of prgress but it is also the fact that decline in agricultural land has by no means reduced the annual crop yield of India..... the crux of the matter is agriculture base is shifting away from Haryana, and that is bound to happen, that is the price Haryana has to pay because of it's proximity to National Capital

dahiya1683
July 6th, 2009, 06:39 PM
I appreciate your views...Especially your idea that unfertile land should be used for setting up industries....but trust me even if Government dont acquire land(people feel happy when their land is acquired),do u think people still be invovled in agriculture?Your theory may work for some people but not all....But its very interesting and useful thought you have shared.May this happen...Moreover even agriculture is going to be commercialized soon.The reason is now farmer are not growing wheat and paddy but are trying to grow such flowers,fruits,plants etc which help them make lot of money.Ofcourse its human nature to think of earning more money but i think it may also disturb the old agricultural crop cycle that existed.We have to be focussed on the growth of wheat and paddy as these are the essentials for us.Jab gehu na hoga toh roti kaha se hogi,aur jab roti hi na hui toh phir khayenge kya?So i hope such schemes should be implemented which encourages the farmers to grow wheat and paddy.



I agree with you Deepika Jee... Every coin has two facets. The commercialization of agriculture has its own advantages and disadvantages. We have seen that as most of the land has been acquired, Now people (especially younger generation) is not interested in farming because they don't get expected "return of investment". "Jab Kisaan ko kheti se kuchh milega hi ni to wo isme haath pair kyun marna chahega, wo to chahega hi ki uski land acquire ho jaye." Actually government should inspire farmers and it can be done by introducing a proper system. "Ab logo ke pass zammene kam rah gayi hain... thodi zameen par irrigation ka kharcha karne ke baad bhi return kuchh khas ni milta hai... Bada zamindara to lagbhag khatam hi ho gaya hai... Agar chakbandi ki tarah hi koi scheme laga kar sari land ko ek saath irrigation ke liye use kiya ja sake then it will be a better idea, because in that case 'roi' will be more. saath me govt ko wheat ki kharid value bhi badha deni chahiye... isse kisaan ko jyada paisa milega or kheti karne ke liye inspire hoga..... isse do fayde honge.. ek to log wheat bhi ugana pasand karenge or saath me unke pass option bhi hogi ki wo agar koi or crop lagana chahe to wo bhi laga sakte hain (like fruits, plants which u have mentioned earlier) ... Jab tak wheat ugane me unko profit ni milega tab tak wo uski taraf inspire ni honge after all money matters.. and this can be done by govt after increasing the purchase price of wheat...