PDA

View Full Version : हरियाणा योद्धेय संस्कृति और औरत:



phoolkumar
November 11th, 2014, 05:36 AM
1) योद्धेयों के यहां औरत का पुनर्विवाह, विधवाविवाह दोनों होते आये, जबकि जो योद्धेयों को उनके एंटी-बताते हैं वो औरत को विधवा होने पर विधवा आश्रमों में भेजते हैं| हरिद्वार से शुरू हो जाईये और हुगली तक चले जाईये, शायद ही कोई शहर गंगा के घाटों पे ऐसा मिले जहां विधवा आश्रम ना हों| लेकिन योद्धेयों की धरती ऐसी धरती है जिस पर वृन्दावन को छोड़कर कहीं भी कोई विधवा आश्रम नहीं मिलता| हरियाणा योद्धेय संघ तो इस मत का है कि यह जो एक मात्र विधवा आश्रम प्राचीन ...हरियाणा की धरती पर है इसको भी बंद करवा के इसमें रहने वाली विधवाओं को उनके पतियों की सम्पत्ति का मालिकाना हक़ दे के उनको उनके अधिकार वापिस दिलवाए जाएँ|

2) योद्धेयों की धरती हरियाणा ही ऐसी धरती रही जहाँ योद्धेयों ने देवदासी जैसी कुप्रथा को कभी पाँव नहीं पसारने दिए| एक तरफ जहां आज भी दक्षिण भारत में येल्लमा तो कहीं देवदासी नाम से देवदासियां मिलती हैं, वहीँ योद्धेयों ने हरियाणा की धरती पर कभी भी औरत के साथ इस स्तर का घिनौना कुकृत्य नहीं होने दिया, अपितु ऐसे पाखंडियों और फंडियों के डेरे तक उखाड़ फेंकने का गौरवशाली इतिहास संजोये है यह मेरी योद्धेयों की प्राचीन हरियाणा की धरती|

3) योद्धेयों की धरती ने कभी सतीप्रथा को पनाह नहीं दी| जहां मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में आज भी इस प्रथा के होने की ख़बरें आती रहती हैं, वहीं मेरे हरियाणा की धरती के सूरवीर योद्धेयों ने कभी अपनी औरतों को सति होने का समर्थन नहीं किया और यही कारण है कि यहां सति-प्रथा का प्रभाव भी नगण्य रहा| एक तरफ जहां योद्धेयों के एंटी लोगों के बनाये राजाओं-महाराजाओं के यहां अधिकतर औरतें शाक्के और जौहर किया करती थी, वहीँ योद्धेयों की योद्धेयायें हजारों की संख्या में सेना की टुकड़ियां बना, दुश्मनों के दांत खट्टे करके मरना और मारना ज्यादा पसंद करती थी| और ये मीडिया के अधज्ञानी लोग कह देते हैं कि हमें बताओ हरियाणा में औरतों को कब इतिहास ने बराबरी का दर्जा दिया|

4) जहां देश का क़ानून तलाकशुदा औरतों के अधिकार के लिए आज 21वीं सदी में आके जाग रहा है, वहीँ मेरे हरियाणा के योद्धेय युगों पहले इतने आत्मीयता वाले थे कि तलाकशुदा औरत तक की आजीविका का क़ानून बना रखा था| जिसके तहत उसको साल में 9 मन अनाज, 2 जोड़ी जूती, कपडे और रहन-सहन का सारा खर्च उसका पहला पति उठाता था| पहले पति से हुए बच्चे/बच्चों का और उन बच्चों का माँ के पास रहने की सूरत में लालन-पालन से ले शिक्षा तक का सारा खर्च पहले पति की कमाई से आता था|

जरा बताओ इन मीडिया वालों को जो हरियाणा में औरतों के मान-सम्मान को ढूंढते फिरते हैं वो देखें हरियाणा के मूल-निवासी योद्धेयों के यहां औरत का जो सम्मान रहा है, क्या दिखा देंगे ऐसा देश की किसी और प्रजाति के यहां? या उनके खुद के समाजों में ही दिखा दें?

हरियाणा के योद्धेयो सतर्क हो जाओ, विधवाओं को पुनर्विवाह की इजाजत की जगह विधवा-आश्रमों में भेजने वाले और देवदासियों को पालने वाली मति के लोग अब आपकी धरती में प्रवेश कर रहे हैं| ध्यान रहे कि यह लोग सिर्फ आजीविका कमाएं और शांति से रहें, लेकिन यह इनकी औरत के प्रति उपर्लिखित घिनौनी और गंदी मानसिकता को यहां ना फैलाने पाएं| औरत के मामले में हमें हमारे बुजुर्गों-पुरखों से भी स्वछंद मति का बनना है ना कि इनके प्रभाव में आके ऐसे बन जाएँ कि हमारे बुजुर्ग भी हमपे लज्जा करें|

shivamchaudhary
November 11th, 2014, 09:05 AM
आपने इतिहास के कुछ अच्छे पन्ने उठा लिए... किताबो में अच्छी बात ढूँढना अच्छी बात है.

समय के साथ हरयाणा समाज में भी उतार-चढाव आये है.

आज दोनों ही चीज़े है, अच्छी भी और बुरी भी. हम बुराई हटाने के साथ साथ अच्छाई को प्रोत्साहन दे तो कामयाबी जल्दी मिल सकती है.

जैसे:
१. खाप पंचायत ... इनमे औरतो को शामिल करना चाहिए. (मैंने कुछ ही खाप पंचायतो का सम्मलेन देखा है, सबमे औरते नदारद.)(लाडो मूवी बनी है राष्ट्रीय पुरुस्कार प्राप्त ).

२. ग्रामपंचायत .... इसमें यदि सरपच अगर महिला हो तो भी सारा काम-काज उनका पति ही देखता है, और बाकायदा उसके पति को ही सरपंच बुलाया जाता है.... और शायद वो महिला (वास्तविक) सरपंच गाय-भैंसों की डवाल करती नज़र आये, और पंचायतो की मीटिंग में शामिल ही नाहो. यहाँ तक की उसका पति उसके sign की नक़ल करके (खुद sign करके ) काम करता हो.

३. जब औरते मर्दों के साथ लड़ती थी तो, आज औरतो का हरयाणा घूँघट में क्यों छिपा हुआ है... आज ६०+ की महिला भी राम-राम (सुबह की नमस्कार ) जैसा सम्मान भी घूँघट की वजह से नहीं प्राप्त कर सकती. जब भतीजे-कम उम्र के लोग उसके पति (ताऊ) को राम राम कर जाते है तो क्या उस महिला का भी मन नहीं करता राम-राम सुन-ने का...... और वो चाह कर भी कुछ करने से डरती है क्यूंकि सामाजिक नियम पुरुष बनाते है, और वो सास के जिन्दा रहने तक पति के साथ बैठ भी नहीं सकती ....

हम महिलाओ को उनका इतिहास सुनकर उनको प्रताड़ित करने के अलावा कुछ नहीं कर रहे. हम उनसे इतिहास की महिलाओ की तरह बन-ने की अपेक्षा तो रखते है. लेकिन ना उनको माहोल देते, ना उनको विचार देते, ना योग्यता पैदा करने की शिक्षा देते.

कुछ उदाहरणों को छोड़ दे तो हम उनके खाने का ध्यान नहीं रखते. न खेलने और शारिरिक रूप से मजबूत होने के लिए आधार प्रदान करते. ना उनके विचार सुनते.... और तो और हम उनको पैदा होने से पहले और बाद में मारने तक की सोचते है.....

साफ़ है... पतन के रास्ते पर है ... तभी तो इतिहास को याद करते है.. अन्यथा वर्तमान की गाथाये गाते :)

ओलंपिक्स में हरयाणा की बच्चियों ने बहुत नाम कमाया है... उनके परिवार ने क्या -क्या किया वो हमें लिखना-पढ़ना चाहिए.. शायद हम भी वो जल्दी अपने घर में लागू कर पाए... :)

phoolkumar
November 11th, 2014, 12:10 PM
Very good points, but points only not any kind of proposed solution Shivam.

Would be better for all of us, if you could suggest some points on eradication of these issues?

Rest aapke hi jaise bahut se points ko uthata mera yah article ek baar jaroor padhiyega time nikaal ke, is post pe counter response karne se pahle, title hai: "तालिबानी कौन" - link: http://www.nidanaheights.com/choupalhn-taliban.html




आपने इतिहास के कुछ अच्छे पन्ने उठा लिए... किताबो में अच्छी बात ढूँढना अच्छी बात है.

समय के साथ हरयाणा समाज में भी उतार-चढाव आये है.

आज दोनों ही चीज़े है, अच्छी भी और बुरी भी. हम बुराई हटाने के साथ साथ अच्छाई को प्रोत्साहन दे तो कामयाबी जल्दी मिल सकती है.

जैसे:
१. खाप पंचायत ... इनमे औरतो को शामिल करना चाहिए. (मैंने कुछ ही खाप पंचायतो का सम्मलेन देखा है, सबमे औरते नदारद.)(लाडो मूवी बनी है राष्ट्रीय पुरुस्कार प्राप्त ).

२. ग्रामपंचायत .... इसमें यदि सरपच अगर महिला हो तो भी सारा काम-काज उनका पति ही देखता है, और बाकायदा उसके पति को ही सरपंच बुलाया जाता है.... और शायद वो महिला (वास्तविक) सरपंच गाय-भैंसों की डवाल करती नज़र आये, और पंचायतो की मीटिंग में शामिल ही नाहो. यहाँ तक की उसका पति उसके sign की नक़ल करके (खुद sign करके ) काम करता हो.

३. जब औरते मर्दों के साथ लड़ती थी तो, आज औरतो का हरयाणा घूँघट में क्यों छिपा हुआ है... आज ६०+ की महिला भी राम-राम (सुबह की नमस्कार ) जैसा सम्मान भी घूँघट की वजह से नहीं प्राप्त कर सकती. जब भतीजे-कम उम्र के लोग उसके पति (ताऊ) को राम राम कर जाते है तो क्या उस महिला का भी मन नहीं करता राम-राम सुन-ने का...... और वो चाह कर भी कुछ करने से डरती है क्यूंकि सामाजिक नियम पुरुष बनाते है, और वो सास के जिन्दा रहने तक पति के साथ बैठ भी नहीं सकती ....

हम महिलाओ को उनका इतिहास सुनकर उनको प्रताड़ित करने के अलावा कुछ नहीं कर रहे. हम उनसे इतिहास की महिलाओ की तरह बन-ने की अपेक्षा तो रखते है. लेकिन ना उनको माहोल देते, ना उनको विचार देते, ना योग्यता पैदा करने की शिक्षा देते.

कुछ उदाहरणों को छोड़ दे तो हम उनके खाने का ध्यान नहीं रखते. न खेलने और शारिरिक रूप से मजबूत होने के लिए आधार प्रदान करते. ना उनके विचार सुनते.... और तो और हम उनको पैदा होने से पहले और बाद में मारने तक की सोचते है.....

साफ़ है... पतन के रास्ते पर है ... तभी तो इतिहास को याद करते है.. अन्यथा वर्तमान की गाथाये गाते :)

ओलंपिक्स में हरयाणा की बच्चियों ने बहुत नाम कमाया है... उनके परिवार ने क्या -क्या किया वो हमें लिखना-पढ़ना चाहिए.. शायद हम भी वो जल्दी अपने घर में लागू कर पाए... :)

skharb
November 11th, 2014, 07:47 PM
jatto m 90 % gharra m ajj bhi lugaieia ki choddar s ............................lakin media ka k kara arr ye sahri paploo jat apni maa bahan se bhi andaja laga sakte h :)
lakin tv news arr private naukri n inkha deemag gulam kar diya ..................soch na sakte real world m !

shivamchaudhary
November 11th, 2014, 07:52 PM
Would be better for all of us, if you could suggest some points on eradication of these issues?

Only doing (actions/implementations) can change something in society. Now-a-days bad people are doing more then good people.

Lets do what we feel right (on moral grounds), rest will follow (at least they will have a choice to follow)... I too believe that expecting someone to change will always go in vain. But if you have to say anyway, say good things only :) (thats changing yourself.)

shivamchaudhary
November 11th, 2014, 07:59 PM
jatto m 90 % gharra m ajj bhi lugaieia ki choddar s...

और इसी की वजह से आज औरतो का हाल बुरा है..... सास बहु पर राज करना चाहती है.. और बहु सास बन-ने पर वही भावना पाल लेती है .. ना क्षमा, और ना ही इस रीत को बदलना..

और आज के समय में तो, tit-for-tat होना चाहिए.. अगर सास कुछ बुरा करती है और बहु बदला लेना चाहती है तो वो सास से ले ... अपनी आगे की बहु से क्यूँ......

जैसे कॉलेज में रैगिंग हमेशा १स्त इयर वालो की ही होती है...... इसमें पुराने स्टूडेंट बदला ज्यादा निकालते है ....

skharb
November 11th, 2014, 08:02 PM
haryane m kum se kum jitne jatt apni ghar ki maa bahan arr gharwali ko ijjat dete h sab caste s jyda h ............lakin few bad pepole/sahri paploo jin ko kuch nahi pata wo log
jat samaj k dusman h e.g ...............ek syana nu kah s ki ladkiyu ko freedom nahi h ............lakin sabse jayda medal haryane ki ladki lay kar atti h.
joo bhi bhai jiskoo patta na hoo jyda culture ka apne expert comment na kare pizza/burger kha kha kay:)

skharb
November 11th, 2014, 08:20 PM
और इसी की वजह से आज औरतो का हाल बुरा है..... सास बहु पर राज करना चाहती है.. और बहु सास बन-ने पर वही भावना पाल लेती है .. ना क्षमा, और ना ही इस रीत को बदलना..

और आज के समय में तो, tit-for-tat होना चाहिए.. अगर सास कुछ बुरा करती है और बहु बदला लेना चाहती है तो वो सास से ले ... अपनी आगे की बहु से क्यूँ......

जैसे कॉलेज में रैगिंग हमेशा १स्त इयर वालो की ही होती है...... इसमें पुराने स्टूडेंट बदला ज्यादा निकालते है ....

shiva bhai ......................ekta kapoor k serial ghanney mat dekhya kro ..............ya sas bahu sre ho s na ki jatta m :)

bhu123
August 8th, 2015, 03:06 PM
Completely agree with Shiv. These old sayings are just a hypocracey. In today's Jat society is too tough with female. Some families where Said to be " Aurton ka Raaj" is raaj by saas only. No rights for women. Even too much educated and professional gls feeling this on daily basis. In Jaat , Saas always tell his son to rule over women not to consider her a life partner.
I wonder ki educated boys bhi apna brain apply kyon nhi kerty . They are the best person to maintain a balance relationship with wife and mother. Why they leave the responsiblity toward their wife just to show their love for mother.
Agree parents are always at a respectable place but still show some courage to take responsibility for the wife also.

Fateh
August 10th, 2015, 10:04 AM
We in our kharb khanp respect ladies most and no discrimination, I say khanps are not against ladies but some individuals/families, being jats how come you people are away from trueth about khanps

drssrana2003
August 10th, 2015, 04:08 PM
jatto m 90 % gharra m ajj bhi lugaieia ki choddar s ............................lakin media ka k kara arr ye sahri paploo jat apni maa bahan se bhi andaja laga sakte h :)lakin tv news arr private naukri n inkha deemag gulam kar diya ..................soch na sakte real world m !One could not agree more with Kharab Saheb. Most of the media people take he Haryanavi Samaj as a monolith. They betray an utter sense of lack of understanding of the different strata of society in Haryana or for that matter in the most part of north and north west India. The rural communities in general, and the Jats in particular have a very just and consultative sytem at all levels - from the micro level to the macro level of decision making. The urban set, irrespective of caste, has to be taken as entirely a new development and is to be considered separately. The two sets are like oranges and apples. The city bred won't be inclined or would not be able to understand the dynamics of social customs and behaviours in rural areas. Purdah, for example, is to be understood more in the context of the needs and desirability of interpersonal relationships of a whole gamut of hierarchy, kinship and family. Calling it a sign of backwardness is crass ignorance of the real purpose of its prevalence. Separation of sexes is not prima-facie a bad thing. The context decides these things to take society forward. Society any where is not monolith. Nor can we forge one as such.