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View Full Version : जाट, एकता के बारे में क्या करते है !!



shivamchaudhary
December 24th, 2014, 09:07 AM
हम अपना उपनाम (surname) क्या लगते है या रखते है उसमे थोड़े विचारो की झलक तो मिल ही जाती है !!

यादव समुदाय को मैंने हमेशा यादव उपनाम लगाते देखा-पढ़ा है ! हो सकता है इसका भी अपवाद हो.
जब भी कोई अधिकारी अपने समुदाय, भाई बंधुओ, आदि का कुछ भला करना चाहता है (जैसा की भारत में बहुतायत में होता है, और होना नहीं चाहिए, फिर भी ....) तो उसको यह पता लगाने की जरूरत नहीं होती की फलां व्यक्ति किस जाति का है...

लेकिन यही बात जब किसी जाट अधिकारी या पहुँच वाले व्यक्ति पर आती है तो पहले उसे जाटो के गोत्रो का अध्ययन करना पड़ता है !! और इतने हजारो का रिकॉर्ड अपने माथे याद रखना होता है !! आखिरी में उसे पूछना ही पड़ता होगा की भाई तू जाट है या कोई और ... ऐसा करना (पूछना) उसकी नोकरी पर भारी पड सकता है !!

(उप्पर लिखी बातें व्यंग-कथन (sarcasm), है पढ़ने वाला इन्हें सीधा ना समझे !)
(नीचे लिखी बातें सीरियस है !)

तो आखिर ऐसा क्यूँ होता है, एक जाति में हम एक उपनाम क्यों नहीं रखते !
क्यूँ हम अपनों में ही अलग दिखना चाहते है !!
मैंने कई बुजुर्गो से ये भी सुना है की जाटों में भी कुछ गोत्र ऊँचे है और कुछ नीचे !! मतलब जाट भी बंटे हुए है !!
जबकि मुझे ये लगता है की सभी जाट गोत्रो के पास सत्ता नहीं थी, और जो सत्ता में थे शायद ये बुजुर्ग इन्ही सत्ता वालो गोत्रो को बड़े बता रहे होंगे !!

एक किस्सा राजस्थान विधान सभा का लो.. 25+ MLA जाटों के होते हुए भी, जाट मुख्यमंत्री नहीं ... और तो और एक अकेले गहलोत माली ने .. भावी कांग्रेसी जाट मुख्यमंत्री (मदेरणा) को जेल में डलवा दिया !!

तो आखिर हम बात एकता की करते है, और काम पता नहीं क्यूँ अलग खड़ा होने का करते है !
और अलग खड़ा होने, या हमारे जाति भाई-बहन कही हमसे आगे न निकल जाये, इस सोच में हम उनकी मदद भी नहीं करते !
(एक वाक्या तो मेरे पिताजी के साथ ही हुआ था.)

मैं यह नहीं कह रहा की सभी जाट ऐसे है, बहुत से जाट तो अपनी जाति से बाहर निकल कर सभी की हरसंभव मदद करते है ! बहुतेरे अपनी जाति की मदद करते है , लेकिन मेरे अनुसार, ये अभी भी बहुमत में नहीं है !

हम अपनों से जब तक अलग खड़े होने, अलग दिखने (नाम, ताकत, पहुँच, सत्ता...आदि ) की कोशिश और जद्दोजहद करते रहेंगे.. हमारी एकता की बातें एक मजाक ही समझी जाएँगी !!

krishdel
December 27th, 2014, 04:34 PM
Jats have always been vocal and do not fear to revolt anything wrong in society and because of this reason Jats have always faced the opposition from Brahmins , Rajputs and Mughals . Now it has become trend in Indian Society to oppose the Jats. Some Jats also then become part of Non Jats to get some favour or to show that they are advance.

Only solution is that we should
1.Help each other in getting good education
2.Help in getting Jobs
3.Do not speak too much politics in office
4.Unite among all the relegions
5.Learn the art of doing business




हम अपना उपनाम (surname) क्या लगते है या रखते है उसमे थोड़े विचारो की झलक तो मिल ही जाती है !!

यादव समुदाय को मैंने हमेशा यादव उपनाम लगाते देखा-पढ़ा है ! हो सकता है इसका भी अपवाद हो.
जब भी कोई अधिकारी अपने समुदाय, भाई बंधुओ, आदि का कुछ भला करना चाहता है (जैसा की भारत में बहुतायत में होता है, और होना नहीं चाहिए, फिर भी ....) तो उसको यह पता लगाने की जरूरत नहीं होती की फलां व्यक्ति किस जाति का है...

लेकिन यही बात जब किसी जाट अधिकारी या पहुँच वाले व्यक्ति पर आती है तो पहले उसे जाटो के गोत्रो का अध्ययन करना पड़ता है !! और इतने हजारो का रिकॉर्ड अपने माथे याद रखना होता है !! आखिरी में उसे पूछना ही पड़ता होगा की भाई तू जाट है या कोई और ... ऐसा करना (पूछना) उसकी नोकरी पर भारी पड सकता है !!

(उप्पर लिखी बातें व्यंग-कथन (sarcasm), है पढ़ने वाला इन्हें सीधा ना समझे !)
(नीचे लिखी बातें सीरियस है !)

तो आखिर ऐसा क्यूँ होता है, एक जाति में हम एक उपनाम क्यों नहीं रखते !
क्यूँ हम अपनों में ही अलग दिखना चाहते है !!
मैंने कई बुजुर्गो से ये भी सुना है की जाटों में भी कुछ गोत्र ऊँचे है और कुछ नीचे !! मतलब जाट भी बंटे हुए है !!
जबकि मुझे ये लगता है की सभी जाट गोत्रो के पास सत्ता नहीं थी, और जो सत्ता में थे शायद ये बुजुर्ग इन्ही सत्ता वालो गोत्रो को बड़े बता रहे होंगे !!

एक किस्सा राजस्थान विधान सभा का लो.. 25+ MLA जाटों के होते हुए भी, जाट मुख्यमंत्री नहीं ... और तो और एक अकेले गहलोत माली ने .. भावी कांग्रेसी जाट मुख्यमंत्री (मदेरणा) को जेल में डलवा दिया !!

तो आखिर हम बात एकता की करते है, और काम पता नहीं क्यूँ अलग खड़ा होने का करते है !
और अलग खड़ा होने, या हमारे जाति भाई-बहन कही हमसे आगे न निकल जाये, इस सोच में हम उनकी मदद भी नहीं करते !
(एक वाक्या तो मेरे पिताजी के साथ ही हुआ था.)

मैं यह नहीं कह रहा की सभी जाट ऐसे है, बहुत से जाट तो अपनी जाति से बाहर निकल कर सभी की हरसंभव मदद करते है ! बहुतेरे अपनी जाति की मदद करते है , लेकिन मेरे अनुसार, ये अभी भी बहुमत में नहीं है !

हम अपनों से जब तक अलग खड़े होने, अलग दिखने (नाम, ताकत, पहुँच, सत्ता...आदि ) की कोशिश और जद्दोजहद करते रहेंगे.. हमारी एकता की बातें एक मजाक ही समझी जाएँगी !!

sanjeev_balyan
December 28th, 2014, 09:14 AM
आज के नवभारत टाइम्स में जाट पर एक स्पेशल स्टोरी छपी है




संडे नवभारत टाइम्स । नई दिल्ली। 28 दिसंबर 2014
कोई एक जिद किसी कम्युनिटी को ऊंचाइयों तक ले जाती है तो कोई दूसरी जिद या लत उसके पांवों में बेड़ी बन जाती है। हमारे मुल्क में हर कम्युिनटी की अपनी कुछ खासियतें हैं और कुछ खामियां भी। 'मेरी जमीन मेरा आसमान' सीरीज़ में हम कुछ समुदायों से जुड़े रुझानों और खासियतों से आपको रूबरू कराएंगे। पेश है इस सीरीज़ की चौथी कड़ी।

जस्ट अपने टाइप
जाट एक नस्ल है, कोई जाति नहीं
हर जाट गांव सम-गोत्रीय वंश के लोगों का छोटा-सा रिपब्लिक रहा है, जो एक-दूसरे को बिल्कुल बराबर, लेकिन दूसरी जाति के लोगों से खुद को ऊंचा मानते हैं। दिल्ली में ऐसे तकरीबन 360 शहरी गांव हैं, जिनका एक प्रधान है। इन गांवों में सेजवाल, सहरावत, डबास और पंवार गोत्र बहुतायत में हैं। पुराने समय से दिल्ली में उनकी अपनी अच्छी-खासी जमीनें हैं। शहर में होने के बावजूद इन परिवारों में खुद को दबंग देहाती कहलाने का चाव है। साथ ही ज्यादातर परिवार अब भी कुटुंब व्यवस्था में विश्वास रखते हैं। बुजुर्गों को आदतन सम्मान देते हैं। जाटों में अपने बड़े भाई की विधवा से विवाह करने का चलन है, लेकिन सेम गोत्र में शादी करने के लिए बिल्कुल भी नहीं।





जाटों को लेकर हमारे समाज में आम राय यह है कि वे बेबात उलझने वाले और अक्खड़ होते हैं। उन्हें बातें जल्दी चुभ जाती हैं। जुगाड़ में माहिर होते हैं और अपनी गाड़ियों के पीछे जाट, जट्ट दी गड्डी या फिर इसी टाइप का कोई स्टिकर जरूर लगाते हैं। '...जो होगा देखा जाएगा' उनका मूलमंत्र माना जाता है। किसी काम के लिए अगर कह दिया तो उसे वे नुकसान उठाकर भी कर गुजरेंगे। हालांकि, काफी लोग अक्खड़ बोली बोलने वालों को जाट समझते हैं, जबकि ऐसा नहीं है। जाटों के असल मिजाज, आदतों, अच्छाइयों और बुराइयों के बारे में बता रहे हैं प्रशांत चाहल :• आदित्य चौधरी



उत्तरी भारत में आठ महीने की गर्भवती महिला अगर खेत में काम करती दिखे तो इस बात की संभावना बहुत ज्यादा है कि वह जाटनी होगी। अगर देश की सीमा पर कोई सुगठित कद-काठी का सिपाही डटा हुआ दिखाई दे तो भी उसके जाट होने की बात ही दिमाग में आती है, भले ही वह जाट न हो। साहस और शारीरिक श्रम करना जाट का सहज गुण है, इसलिए जाट मूलत: खेती करनेवाला और योग्य सिपाही है। शायद इसी कारण माना जाता है कि जाट सामान्य तौर पर ज्यादा बुद्धिमान नस्ल नहीं है। मैंने जाति के स्थान पर नस्ल शब्द का प्रयोग किया है, जिसकी चर्चा आगे करेंगे।

भारत पर विदेशी हमलावरों के हमले होते रहे हैं। अपनी जमीन की लड़ाई जाटों ने अपनी जान की बाजी लगाकर लड़ी है। इस लड़ाई में जाटनियों का सहयोग केवल घायलों के मरहम-पट्टी करना नहीं रहा, बल्कि पति-पत्नी एक ही कमरबंध से अपने आप को पीठ के बल बांधकर युद्ध करते थे। सामने के वार पति बचाता था और पीछे के पत्नी। इतिहास गवाह है कि जाट के जीवन-मरण में महिला का योगदान बराबरी का नहीं तो उससे कम भी नहीं रहा। लेकिन इसके बावजूद भी जाटों के लिए आज यह शर्म की बात है कि जाट बाहुल्य क्षेत्रों में पुरुषों के मुकाबले में स्त्री कम होती जा रही हैं। यह लिंग-भेद जाटों के गौरव में सबसे बड़ा कलंक है। यह मुद्दा यहीं पर खत्म नहीं होता बल्कि ‘सगोत्र प्रेम विवाह’ के जानकारी में आने पर तो ऑनर किलिंग जैसी शर्मनाक वारदातें सामने आती रहती हैं।

जाटों को भारतीय पौराणिक ग्रंथों में वर्णित चारों वर्णों में कोई स्थान नहीं मिला इसलिए ये एक अलग ही पहचान रखते हैं। इनकी चेहरे की बनावट, शारीरिक बनावट और क्षमता और शारीरिक हाव-भाव ही इनके इतिहास का ब्यौरा देने के लिए काफी हैं। जीन्स और डीएनए के आधार पर जाटों को दक्षिणी रूस से लेकर ईरान-ईराक तक परिभाषित किया जा सकता है। इसलिए जाट एक नस्ल है, जाति नहीं। जाटों की उत्पत्ति और इतिहास पर कालिका रंजन कानूनगो, उपेंद्र नाथ शर्मा, जदुनाथ सरकार, नत्थन सिंह और कुंवर नटवर सिंह ने काफी लिखा है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण कालिका रंजन की किताब है। वह जाटों का चरित्र विश्लेषण करते हुए लिखते हैं कि जाट मरते वक्त अपने उत्तराधिकारी को यह बता कर मरता है कि किस-किसका कितना कर्जा चुकाना है। महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने जाटों को भारत की रीढ़ कहा है। जाटों में अभिव्यक्ति की भारी कमी है। कह सकते हैं कि जाट में बुद्धि तो होती है लेकिन सयानेपन की कमी होती है। साथ ही जाटों से जुड़ी एक कहावत मशहूर है कि 'आगे सोचे दुनिया और पीछे सोचे जाट' यानी दुनिया के दूसरे लोग तो करने से पहले सोचते हैं लेकिन जाट करने के बाद सोचता है। यह जाटों की सबसे बड़ी खामियों में से एक है, जिसे अब दूर करना चाहिए।

(लेखक भारत कोश वेबसाइट के संस्थापक/संपादक हैं।)




जट्ट और जाट में अंतर

ज्यादातर विद्वान जाटों के आर्यवंशी होने पर एकमत हैं। चेहरे-मोहरे से जाट, खांटी राजपूतों और क्षत्रियों से काफी मिलते-जुलते हैं। यह हट्टी-कट्टी कौम है, जिसका विस्तार सिंधु नदी के तट से लेकर पंजाब, राजपूताना के उत्तरी राज्यों और ऊपरी यमुना घाटी में होता हुआ चंबल के पार ग्वालियर तक फैला है। इस विस्तृत क्षेत्र में बदलती भाषा के आधार पर जाटों को दो हिस्सों में बांटा गया है। खड़ी हिंदी बोलने वाले जाट हैं तो पंजाबी बोलने वाले जट्ट। दिल्ली में जाट, जट्ट आबादी के मुकाबले ज्यादा हैं। दोनों में थोड़ा अंतर सोच का भी है। पंजाब से वास्ता रखने वाले जाट ज्यादा आजाद ख्याल हैं और लंबरदारी खून में है। जबकि दिल्ली में बसे हरियाणा, सहारनपुर, मुज्जफरनगर और मेरठ साइड के जाटों में जनजातीय बंधन मजबूत रहे। इन्हीं इलाकों में खाप पंचायतों की व्यवस्था थी और आज तक बनी हुई है। इनके पास अपनी खेती की जमीनें थीं, पर साथ में उनसे जुड़े विवाद भी थे।

बहुतेरे हैं ग्लोबल सिटिजन

जानकारों के अनुसार, जाटों की करीब 3 करोड़ आबादी का एक-तिहाई हिस्सा मुसलमान, पांचवां हिस्सा सिख और बाकी हिंदू हैं। लेकिन मजहब से इतर वे सबसे पहले खुद को एक जाट के तौर पर इंट्रोड्यूस करना पसंद करते हैं। पंजाब, सिंध, राजस्थान और गंगा नदी के दोआब से पश्चिम में जाट खेती करनेवाले समुदाय की रीढ़ रहे हैं। लेकिन ग्लोबल इकोनॉमी में भी इनका योगदान भरपूर है। पहले इंडो-कनेडियन अरबपति बने प्रॉपर्टी बिजनेसमैन बॉब सिंह ढिल्लों जाट हैं। सफल व सबसे यंग बिजनेसमैन में से एक गुरबक्श चाहल जट्ट हैं। साथ ही 20 अरब डॉलर (करीब 12.6 खरब रुपये) की कंपनी बनाने वाले कुशल पाल सिंह (के. पी. नाम से मशहूर) भी जाट हैं, जिन्हें फॉर्ब्स ने दुनिया के सबसे रईस लोगों की लिस्ट में शामिल किया है। कम्युनिटी में ऐसे उदाहरण सेट होने से नए लोगों में काम के लिए क्षेत्रीय सीमाएं तोड़ने का कॉन्फिडेंस बढ़ा है। बीते सालों में बतौर रिसर्च स्कॉलर विदेश गए जाट स्टूडेंट्स की संख्या भी बढ़ी है।



साफ है कॉमन एजेंडा

जाटों के बारे में कहा जाता है कि उनमें कल्पना की कमी है। वे भावनाओं को एक्सप्रेस करने में कमजोर हैं। पर दृढ़ता, व्यावहारिक बुद्धि के इस्तेमाल और हाड़-तोड़ मेहनत करने की बेजोड़ क्षमता रखते हैं। वे जीवनयापन के लिए कठिन परिश्रम में विश्वास करने वाले लोग हैं। इनमें काफी लोग आर्यसमाजी हैं। जाट बहादुर किसान हैं, जो हल और तलवार, दोनों चलाना जानते हैं। चूंकि दिल्ली को दो तरफ से छूने वाली जाट बेल्ट में एक-एक एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी है, तो वहां से एग्रीकल्चर की पढ़ाई करके आए ज्यादातर जाट स्टूडेंट दिल्ली में एग्रीकल्चर रिसर्चर हैं। या फिर दिल्ली में हॉर्टिकल्चर विभाग के सरकारी पदों पर काबिज हैं। इस कम्युनिटी में फौज से जुड़ने का भी ट्रेंड रहा है। दिल्ली में डीटीसी, पुलिस और डीडीए महकमे में सबसे ज्यादा जाट अफसर हैं। वहीं दिल्ली सरकार में तकरीबन 25 फीसदी जाट प्राइमरी टीचर भी काम कर रहे हैं। हालांकि पिछले 15 बरसों में खेती और सरकारी नौकरियों के अलावा जाटों ने इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट सेक्टर में भी हाथ आजमाए हैं।



कई समस्याएं भी हैं

इतिहास में जाटों को बेहद कम जगह मिली। माना जाता है कि मुस्लिम इतिहासकारों को जाट नापसंद थे। वहीं ब्राह्मण और कायस्थ लेखक उनके बारे में लिखने से कतराते रहे, पर इसमें दोष जाटों का ही है क्योंकि जाटों का कोई इतिहासकार नहीं हुआ। इसीलिए काफी लोग अपने इतिहास को लेकर ही कन्फ्यूज्ड हैं। गौरतलब है कि जाटों ने प्रतिद्वंद्वी लोगों से अपनी जमीन के मेढ़ों को लेकर काफी कोर्ट-कचहरी की है। पर इस पीढ़ी के वे लोग जो शहरों की ओर चले आए थे, अब अपने ही रिश्तेदारों से पुश्तैनी जमीन की लड़ाई लड़ रहे हैं। यह समस्या जाटों में इस वक्त सबसे बड़ी है क्योंकि गांव में खेती कर रहा उनके घर-परिवार के बच्चे उनके हिस्से की जमीनें छोड़ने को राजी नहीं हैं। बीते समय में इससे काफी परिवार टूटे हैं। अखिल भारतीय जाट महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता तारा चंद मोर का कहना है कि जाट सच्चे, सपाट और दूसरों के काम आने वाले लोग रहे हैं। लेकिन हठी हैं और इन लोगों में नशा एक बड़ी समस्या बन गया है। आपस में छोटी-मोटी बात पर विवाद कर लेने की आदत इनकी कमजोरी है और समाज के लिए खराब स्थिति भी। एक और समस्या है, जाटों के राजनैतिक नेतृत्व का खोना। यह एक पॉलिटिकल इश्यू है। लेकिन पॉलिटिकल चर्चा के अलावा लोग पारिवारिक राजनीति का खूब रस लेते हैं और एक-दूसरे की जड़ें काटते हैं।

ज्यादातर जाट एथलीट बॉडी और खेल में तालमेल बैठाने के लिहाज से खरे हैं। वे खूब मेहनत से नहीं कतराते। दूसरी चीज यह कि सभी प्लेयर्स मानते हैं कि वे देश के लिए खेल रहे हैं और उनकी जीत या हार का असर देश के सम्मान पर दिखेगा, इसलिए ज्यादा जोश से खेलते हैं। मेरा तजुर्बा है कि खेलों से जुड़े सभी लोग मिलनसार हैं और आपस में एकता रखते हैं। बाकी रही बात कॉमनवेल्थ खेलों की तो कुल मेडल संख्या का बड़ा हिस्सा जाट एथलीट जीतकर लाए थे। ये लोग देश का गौरव हैं।

-सुशील कुमार, वर्ल्ड चैंपियन रेसलर


जाट समाज ने इस बात को समझने में औरों से ज्यादा वक्त लगाया कि लड़कों की तरह लड़कियों को भी एक्सपोजर की जरूरत है। मुझे याद है कि 1995 में नैशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में पढ़ने पहुंची मैं पहली जाट लड़की थी और आज तक वहां के पासआउट स्टूडेंट्स मैं अकेली जाट लड़की हूं। इसका कारण है कि जाटों में बच्चों को कल्चरल वैल्यूज की फीडिंग करने का रुझान बेहद कम रहा है। इस वजह से बच्चों को मेनस्ट्रीम में आकर औरों से ज्यादा स्ट्रगल करना पड़ता है।

-मेघना मलिक, एक्ट्रेस और टीवी आर्टिस्ट



आप भी हिस्सा बनें•bt.mzma@gmail.com
आप भी इस बहस का हिस्सा बन सकते हैं। आज हमने जाटों के बारे में बातें की हैं। अगर आपके पास भी इस समुदाय से जुड़ी कोई दिलचस्प दास्तां या जानकारी है तो हमें हिंदी या इंग्लिश में बुधवार तक मेल करें :
सब्जेक्ट में jat लिखें। चुनींदा विचारों को हम अखबार में जगह देंगे।

Fateh
January 21st, 2015, 03:48 PM
jat are doing every thing to break unity and doing nothing for unity

NikhilNehra
January 30th, 2015, 10:12 PM
My all Jat brothers..I was reading an e-book on our Jatland wiki, which is written by respectable Mr. Hawa Singh Sangwan....."Ch.Chotu Ram ka hatyara kaun". Its a great work done by the writter. Some unknown facts and untold truth and hidden history about Jats and our encient Jat kings unlocked by him..........somebody will tell me from where I can buy this book in Delhi OR Noida. I want to distribute it to my family members, relatives and my dear Jat brothers who know nothing about their great history which is full of velour, courage and will power of our Jat race....please help me for buying this book.

rskankara
January 31st, 2015, 04:37 AM
May I add
- अपनी वास्तविक औकात पहचाने/ हकीकत समझे और छद्म अहंकार को छोडकर कमाई और पढ़ाई पर जोर दे


Jats have always been vocal and do not fear to revolt anything wrong in society and because of this reason Jats have always faced the opposition from Brahmins , Rajputs and Mughals . Now it has become trend in Indian Society to oppose the Jats. Some Jats also then become part of Non Jats to get some favour or to show that they are advance.

Only solution is that we should
1.Help each other in getting good education
2.Help in getting Jobs
3.Do not speak too much politics in office
4.Unite among all the relegions
5.Learn the art of doing business