Results 1 to 11 of 11

Thread: Surajmal, Marathas and Third Battle of Panipat

  1. #1

    Surajmal, Marathas and Third Battle of Panipat

    Surajmal, Marathas and Third Battle of Panipat
    (This article by Nihalsingh Arya was published long ago – reproduced for the benefit of all)

    सूरजमल बाल्यकाल से ही उत्साही वीर थे । उन्हें ये संस्कार अपने पूर्वजों से विरासत में मिले थे । उन्होंने अपने वीर पिता बदन सिंह के सामने ही सन् 1755 ईस्वी तक कई युद्धों में शत्रुओं को पराजित कर विजयश्री का सुन्दर कीर्तिमान स्थापित किया था । इनके पूर्वज गोकुलदेव, राजाराम और चूड़ामन भी क्रान्तिकारी, वीर्यवान, स्वाधीनता-प्रिय सेनानी थे जिन्होंने मुगलों के छठे बादशाह औरंगजेब के शासन के प्रजापीड़न, शोषण एवं दमनचक्र के विरुद्ध निरन्तर बीसों वर्ष तक सफल संघर्ष करके अन्याय का निवारण किया था । यहां पर व्रजराज वीर गोकुलदेव के अमर बलिदान की अमर गाथा का कीर्तन करना प्रासंगिक ही है जो प्राचीन विशाल हरयाणा की सर्वखाप पंचायत के इतिहास में इस प्रकार है ।

    मुगल खानदान के छठे बादशाह औरंगजेब ने धर्मान्ध होकर जब सारे भारत में हिंसा, अन्याय और धर्म के दमन का चक्र चलाया तो सारी जनता त्राहि-त्राहि कर उठी । तब शिवाजी के गुरु समर्थ रामदास ने सारे भारत में विद्रोह का प्रबल प्रचार किया । बुन्देले राजा छत्रसाल के गुरु स्वामी प्राणनाथ और गुरु गोविन्दसिंह भी उनके सहयोगी प्रचारक थे । गुरु समर्थराम ने दिल्ली के चारों ओर तथा गंगा-जमना के तीर्थ मेलों और सारे विशाल हरयाणा में भी वि. सं. १७२३ से १७२५ तक सर्वत्र प्रचार किया और गढ़मुक्तेश्वर गंगा के मेले में १७२५ वि. में एक तलवार और पान का बीड़ा धारण किया । कार्तिक की पूर्णमासी को तिलपत ग्राम के ५४ धड़ी भार के मल्ल योद्धा गोकुलदेव ने वह पान का बीड़ा चबा लिया और हरयाणा के पांच हजार मल्लों सहित गंगाजल में खड़े होकर देश और धर्म रक्षा की प्रतिज्ञा की । मथुरा के शासकों द्वारा कुछ हिन्दू लड़कियों का अपमान करने पर बीस हजार मल्लों सहित गोकुलदेव ने आक्रमण करके मई 1669 ईस्वी को मथुरा के हाकिम अब्दुल नबी खां को मार दिया और लगातार पांच मोर्चों पर लड़ाई जीत ली । अत्याचारों के विरुद्ध यह योद्धा सारे भारत का सर्वप्रथम विद्रोही नेता था जो देशद्रोही विश्वासघातियों के षड्यंत्र से पकड़ा गया । आगरा लाल किले के दक्षिणी पक्ष में एक कुऐं के पास ऊंचे टीले पर उसके अंग-अंग काटने पर भी भारत मां का वीर सपूत देश-धर्म की जय के उदघोष के साथ हंसता ही रहा और गीता के उपदेश "हतो वा प्राप्यसि स्वर्गं" के अनुसार स्वर्गारोहण के अमर पद को प्राप्त हुआ । श्रद्धालु जनता के सहस्रों देशभक्त रोते रह गए परन्तु उस नेता का बलिदान अपने पीछे विद्रोही संघर्ष की सतत श्रंखला का संकलन कर गया जिसे आगे चलकर राजाराम और चूड़ामन ने निरन्तर चालू रखा । सन् 1683 ईस्वी के पश्चात् मराठों ने भी लड़ाई छेड़ दी । मराठी सेना को झपट्टा मार युद्ध का प्रशिक्षण हरयाणा के मल्लों ने ही दिया था जिन्हें कुरड़ी नांगल (छपरौली) के टीले के मल्ल सेना प्रदर्शन में से गुरु समर्थराम दास ही अपने साथ ले गए थे । उनमें तीन मुख्य मल्ल मोहनचन्द्र जाट, हरिराम राजपूत और कलीराम अहीर थे । तब से ही वीर शिवाजी ने मराठा मण्डल का वीर संगठन खड़ा किया था ।

    महाराजा सूरजमल की धमनियों में पैतृक देन से क्रमशः गोकुलदेव से बदनसिंह तक का अदम्य स्वाभिमानी विशुद्ध रक्त संचार कर रहा था । जनक और जन्य समान संस्कारी होते हैं और उत्तम दादा पिता के संतान भी उत्तम होते हैं । अतः सूरजमल को आत्मविश्वास, स्वाधीनता, धर्मध्रुवता, उदारता, प्रजावात्सल्य, सौहार्द और सजगता आदि गुण इन्हीं पूर्वजों से मिले थे ।

    एक विख्यात दुर्दान्त योद्धा, सफल राजनीतिज्ञ. सहिष्णु तथा धर्मवीर राजा होने के कारण सूरजमल भारत के इतिहास में उन्नत प्रतिष्ठा सहित उच्चासन रखते हैं , अतः इतिहासकारों की लेखनी के प्रशंसा पात्र बने हैं । यहां पाठकों के लिए सर्वखाप पंचायत के अभिलेखागार में से सन् 1761 ईस्वी के पानीपत के युद्ध में मराठे, राजा सूरजमल और पंचायती मल्लों का अछूता प्रसंग संक्षेप से प्रस्तुत किया जाता है जिसे ध्यानपूर्वक पढ़कर इतिहास लेखक अपनी भ्रान्तियां दूर करके तथ्यों का उचित मूल्यांकन कर अपनी मान्यता, स्मृति और लेखों को स्थायी अंग बनायेंगे ।

    महाराजा सूरजमल के समय भारत की निर्बलता

    उस समय मुगल शासन के पैर लड़खड़ा रहे थे । बादशाह इतने चरित्रहीन हो गए थे कि खौफजदा होकर कभी किसी का सहारा पकड़ते कभी किसी का । इसी दौड़ में मुगल दरबार में कत्ले-आम मच रहा था । आज किसी पर शक हुआ तो कल उसे किसी बहाने से मरवा डाला या जहर तक देने की नौबत आ जाती । इस रस्साकशी में मुगल बादशाही के घर की यह हालत थी तो उनका खयाल मुल्क की बिगड़ी हुई हालत को सुधारने में कैसे जाता ? मुगल खानदान का हर बच्चा और बूढ़ा या तो बादशाह या वजीर बनना चाहता था । ये सब इसी गुटबाजी में फंसे थे । मुगल राज्य की हड्डियों का ढ़ांचा जरूर खड़ा था मगर उसमें खून, मांस और चमड़ा सब गल चुका था । अब उस मसनुयी ढ़ांचे को एक धक्का मारकर गिराने से हड्डी अलग-अलग होकर बिखर सकती थी ।

    उस वक्त भारत पर नादिरशाह और अब्दाली के दो हमले हुए थे । इन दोनों हमलावरों को मुगल दरबार के सरदारों और दरबारियों ने ही न्यौता देकर बुलवाया था । अहमदशाह अब्दाली को सन् 1760 ईस्वी में नजीब खां ने बुलवाया । पानीपत के मैदान में अब्दाली ढ़ाई लाख सेना सहित आ डटा । वह भारत की बिखरी हुई हालत को जानकर पहले भी कई आक्रमण कर चुका था । पानीपत के मैदान में उसके मुकाबले के लिए प्रमुख मराठा सेना थी जिसे पेशवा का भाई सदाशिवराव भाऊ लेकर आया था । आगरा, मथुरा और दिल्ली में सूरजमल और भाऊ की भेंट हुई थी । भाऊ अपनी सेना के साथ हजारों स्त्रियों को श्रंगार कर लाया था और आक्रमण से बहुत दिन पहले ही उसकी सेना आ चुकी थी । महीनों तक शत्रु की तथा भाऊ की सेना आमने-सामने मैदान में डंटी रही । भाऊ की मराठा सेना आस-पास के ग्रामों की जनता को भी पीटा करती और लूट लेती थी ।

    सेनापति भाऊ को राजा सूरजमल के उत्तम सुझाव

    सूरजमल राजनीति में बहुत प्रवीण थे । उन्होंने देश की सारी परिस्थितियों को देखकर सदाशिवराव भाऊ को बहुत अनुभवपूर्ण विजयकारी सुझाव दिए थे ।

    1. अब्दाली की सेना पर अभी आक्रमण मत करो । अभी सर्दी है । गर्मी को ये लोग सहन नहीं कर सकते, अतः हम गर्मी में ही हमला करेंगे ।

    2. कई हजार स्त्रियों और बच्चों को युद्ध में साथ लिए-लिए मत फिरो क्योंकि हमारा ध्यान इनकी सुरक्षा में बंट जाएगा । अतः इन्हें हमारे डीग के किले में सुरक्षित रखो ताकि हम निश्चिन्त होकर लड़ सकें ।

    3. शत्रु की सेना पर सीधा आक्रमण नहीं करना चाहिए, क्योंकि इनकी सेना बहुत अधिक है और भारत के बहुत मुस्लिम भी इनके पक्ष में हैं । अतः इनसे झपट्टा मार लड़ाई करके छापे मारो । (यह गुरिल्ला युद्ध ही था जो प्राचीन काल से ही हरयाणा के यौधेयगण और पंचायती मल्ल करते आ रहे थे और सारे भारत को सिखाया था । मनुस्मृति में भी इसका विधान है ।)

    4. लालकिले की सम्पत्ति मत लूटो नहीं तो मुस्लिम शासक सरदार रुष्ट होकर अब्दाली के पक्ष में हमारा विरोध करेंगे । हम भरतपुर कोष से मराठा सेनाओं का वेतन भी दे देंगे ।

    5. किसी मुगल सरदार की अध्यक्षता में एक दरबार लगाकर स्वदेश रक्षा और युद्ध योजना निश्चित करो ताकि भारत के मुसलमान भी सन्तुष्ट होकर हमारे सहयोगी बने रहें ।

    6. जनता को मत लूटो और खड़ी फसलों को मत जलाओ । हम सारे भोजन पदार्थों का प्रबन्ध कर देंगे ।

    7. शत्रु की खाद्य टुकड़ी को काटने की योजना बनाओ ।

    8. गर्मी आते ही मिलकर शत्रु सेना पर हमला कर देंगे । अब्दाली को भारत के बाहर ही रोकना चाहिए था ।

    भाऊ तगड़ा जवान और घमंडी था । उसने महाराजा के इन उत्तम सुझावों को भी उपेक्षा सहित ठुकरा दिया । वह अल्पायु और अनुभवहीन था । उसने महाराजा का अपमान भी किया । इस पर सूरजमल और इन्दौर के राजा ने भाऊ का साथ छोड़ दिया परन्तु सूरजमल ने फिर भी मराठों की सहायतार्थ अपनी आठ हजार सेना लड़ाई में भेजी थी और मराठों को भोजन, चारे और वस्त्रों की भी सहायता दी थी क्योंकि बहुत पहले से आई हुई सेना भूखी मरने लगी थी । भाऊ ने इन सुझावों के विपरीत बड़ी भारी भूल की । उसने लाल किले की दीवाने-खास की चांदी की छत को तोड़ कर 36 लाख रुपये के सिक्के ढ़लवा लिए और अपने भतीजे विश्वासराय की अध्यक्षता में एक सभा की जिससे भारत के अधिकांश मुसलमान नाराज होकर अहमदशाह अब्दाली के साथ हो लिए । भाऊ ने किसानों की खड़ी खेती को भी जला दिया, अपनी स्त्री-बच्चों को भी युद्धस्थल में साथ रखा और शरद् ऋतु जनवरी 1761 में गर्मी से पहले ही अफगान सेना पर सीधा आक्रमण कर दिया ।

    पानीपत युद्ध में भाऊ और सर्वखाप पंचायत के मल्ल

    सदाशिवराव भाऊ ने अब्दाली के युद्ध में सहायतार्थ हरयाणा की सर्वखाप पंचायत शौरम को चैत शुदी तीज संवत् १८१६ विक्रमी (1759 ई०) को एक पत्र भेजा था जिस पर विचारार्थ शिशौली ग्राम में चौ. दानतराय की अध्यक्षता में एक सभा ज्येष्ष्ट शुदी नवमी को हुई और पांच प्रस्ताव पारित करके भाऊ की सहायता के लिए बीस हजार पैदल मल्ल सेना और दो हजार घुड़सवार भेजने का निश्चय किया । इनके सेनापति सौरम के चौ. श्योलाल और उपसेनापति रामकला तथा पं० कान्हाराय बनाये गए । सौरम के पं० कान्हाराय का महाराजा सूरजमल से घनिष्ठ सम्बन्ध बताना भी आवश्यक है ।

    पं० कान्हाराय सर्वखाप पंचायत के सहयोगी प्रचारक प्रशिक्षक मल्ल योद्धा थे । राजस्थान के राजाओं, महाराष्ट्र के सरदारों तथा सूरजमल के दरबार में इनका पर्याप्त सम्मान था । ये आठ भाषाओं के विद्वान थे । पंचायत इन्हें सारा खर्चा देती थी । ये पंचायत के युद्ध, तोड़-फोड़ के पटु नेता थे और 24 धड़ी की जोड़ी मोगरी को फिराते थे । पंचायती पाठशालाओं और मल्ल अखाड़ों के निरीक्षक थे । इन्होंने पंचायती संगठन को सुदृढ़ बनाकर उन्नत किया था । ये सम्मानपूर्वक मुगल दरबार में भी जाते थे । राजा सूरजमल भी इनको हर वर्ष अपने हाथी पर बिठाकर बुलाते थे और दरबार में बहुत सम्मान करते थे । इनको १०१ रुपये तथा सब ऋतुओं के गरम, सरद वस्त्र और पगड़ी देते थे और पांच-छः दिन तक इनको स्वादिष्ट, रुचिकर भोजन खिलाते थे ।

    .....continued

    .
    Last edited by dndeswal; August 31st, 2010 at 12:11 PM. Reason: Minor editing
    तमसो मा ज्योतिर्गमय

  2. The Following 2 Users Say Thank You to dndeswal For This Useful Post:

    thukrela (October 20th, 2011), vishalsunsunwal (October 28th, 2011)

  3. #2

    Surajmal....Part-II

    .

    ....continued from previous post


    मराठा सेना की हार के कारण

    पंचायती उपसेनापति पं० कान्हाराय ने जमना नदी के ऊंचे इस्सोपुर टीले पर अपनी सेना चौकी स्थापित की थी, जहां से पानीपत का सारा युद्धक्षेत्र स्पष्ट दिखाई देता था । बीस हजार पंचायती पैदल मल्ल तथा दो हजार घुड़सवार मराठा सेना के साथ पानीपत के पास कुंजपुरा के मैदान में लड़े थे । एक हजार मल्ल अपनी तथा मराठा सेना को इसी टीले से तीन मार्गों से भोजन सामग्री पहुंचाते थे । यह टीला संस्कृत भाषा, देश-प्रेम, सैनिक शिक्षा का प्राचीन स्थान है । भाऊ ने पंचायत के तीनों सेनापतियों तथा सैनिकों का बहुत आदर किया और जमना के जल में प्रवेश कर स्वदेश रक्षा की प्रतिज्ञा की और कुंजपुरे के मैदान में शत्रु की सेना पर जनवरी 1761 मास में धावा बोल दिया । बहुत घमासान युद्ध हुआ । दोपहर तक अफगानों के 50 सरदार और 50 हजार सैनिक मार गिराये । दोपहर के पश्चात् भाऊ के तोपखानों और घुड़सवारों की मार से इब्राहीम गार्दी घायल होकर पकड़ा गया । फिर भाऊ के भतीजे विश्वासराय के हाथी के हौदे में तोप का गोला गिरा । यह सुनकर भाऊ वहां पहुंचा । इतने में अफगानों ने भाऊ के मरने की झूठी खबर फैला दी जिसे सुनकर मराठों का साहस टूट गया । इस युद्ध में चार हजार पंचायती मल्ल भी बलिदान हुए । मराठों की बहुत सी स्त्रियां मारी गईं । कुछ पकड़ी गईं, कुछ यहीं रह गईं । बहुत स्त्री-बच्चे और सैनिक भरतपुर के डीग दुर्ग में पहुंचाये जहां महाराजा सूरजमल मे उनका भरपूर स्वागत सम्मान और भोजन वस्त्र का प्रबंध किया । सैंकड़ों स्त्रियों सहित भाऊ की धर्मपत्नी पार्वती को जमना के पूर्व में एलम ग्राम में एक मास तक सम्मानपूर्वक रखकर डीग किले में भेज दिया और वहां से पूना भेज दिया । वहां जाकर पार्वती देवी ने हरयाणा के आतिथ्य, सम्मान और शिष्टाचार की बहुत प्रशंसा की थी । भाऊ की सेनाओं के साथ उसके बहुत घोड़े और खच्चर अशर्फियों और अथाह धन से लदे हुए थे । वे युद्ध के उपरान्त सारे इधर-उधर भाग गए थे जो जनता ने लूट लिए । यह घटना भाऊ की लूट के नाम से प्रसिद्ध है ।

    पंचायती उपसेनापति पं० कान्हाराय ने इस युद्ध का वास्तविक वर्णन तथा हार के कारणों पर बहुत सुन्दर प्रकाश डाला है जो ध्यानपूर्वक पढ़ना और समझना आवश्यक है ।

    1. महाराष्ट्र मंडल के सरदारों में असन्तोष और परस्पर द्वेष था ।

    2. सदाशिवराव भाऊ बड़ा वीर होते हुए भी अल्पायु, नीतिहीन तथा घमण्डी था ।

    3. भाऊ ने जवानी के जोश में भरतपुर के महाराज सूरजमल की नीति योजना को टाल दिया जो हानिकारक सिद्ध हुई क्योंकि उससे महाराज सूरजमल सर्व शिरोमणि नीति निपुण नेता, शूरवीर सेनापति थे । राजस्थान के सारे सेनापति उनको गुरु मानते थे । अतः सूरजमल को भाऊ से अलग होना पड़ा ।

    4. राजस्थान के राजाओं ने महाराणा प्रताप का आदर्श छोड़ दिया और मुगलों की पराधीनता का विष पीकर भाऊ का साथ नहीं दिया ।

    5. 14 जनवरी 1761 को दोपहर पश्चात भाऊ के मरने की झूठी सूचना से ही मराठों का साहस टूटा था ।

    6. मुगल शासकों, हैदराबाद और लखनऊ के नवाबों ने अब्दाली से मिल कर मराठों का भोजन मार्ग रोक लिया तो पंचायती सेना ने ही रातों-रात मराठा सेना को तीन मार्गों से रसद पहुंचाई थी । एक रात को जब अब्दाली ने मराठों पर आक्रमण किया तो आठ हजार पंचायती वीरों ने, बीस हजार मराठे और ग्यारह हजार भरतपुर के सैनिकों ने बीच में पहुंचकर उन्हें रोक कर बलपूर्वक आक्रमण विफल कर दिया । इस हमले में 8000 सैनिक और सरदार मारे गये ।

    7. भाऊ की जो 4000 मुस्लिम सेना अब्दाली सेना से रूठ रही थी, वह इब्राहीम गार्दी के पकड़े जाने पर इस्लाम के नाम पर धोखा देकर अब्दाली से मिल गई । फिर भाऊ भी मैदान से हट गया और मराठों की हार हो गई ।

    एक स्थान पर लिखा है - जब मराठा सेना ने पानीपत जाते समय एक दिन छपरौली के पास पड़ाव डाला तो उनके साथ राजा सूरजमल के भी सैनिक थे । इस बात का पता लगने पर छपरौली खाप के लोगों ने इन सबका बहुत आदर स्वागत किया और अपने भी 500 जवान इनके साथ युद्ध में भेजे । एक स्थान पर ऐसा लेख है कि अब्दाली के इस पानीपत युद्ध के पूर्व ही भारत आगमन से पहले ही राजा सूरजमल ने कहा था कि हमें अब्दाली को सिन्ध में ही रोक देना चाहिए ।

    युद्ध के पश्चात् सदाशिवराव भाऊ और पं० कान्हाराय

    इस युद्ध में हार कर भाऊ ने साधु बनकर भवानीराम नाम रखा और पहले 11 वर्ष तक तो रोहतक के पास सांघी ग्राम में चौ० सभाचन्द के पास रहे । फिर हरद्वार में अपनी हवेली बनाई जो अब भी है और उनके दो और नाम श्रवणनाथ तथा भवानन्द पुकारे गए थे । वे तीर्थस्थानों तथा मेले उत्सवों में प्रसिद्ध क्षत्रिय कुलों, वीर पुरुषों तथा नेताओं से मिलते रहे । इस्सोपुर के टीले पर आकर सन्त देवानन्द (पं० कान्हाराय का सन्यस्त नाम) से भी मिलते रहते थे । हरयाणा के कई वृद्ध पुरुषों ने उन्हें देखा था । भाऊ ने 32 वर्ष तक शेष सारा जीवन हरयाणा में ही साधु-सन्तों में व्यतीत किया था । पं० कान्हाराय ने संन्यासी बनकर देवानन्द नाम धारण किया और शेष सारा जीवन इस्सोपुर के टीले पर ईश्वर भक्ति उपदेश तथा यज्ञ में ही लगाया । इन्होंने 119 वर्ष की आयु में शरीर छोड़ा था । दाह संस्कार में चार हजार पाँच सौ पुरुष-स्त्रियों ने शामिल होकर कई मन घी सामग्री लगाई थी ।

    भाऊ की विचारहीनता एवं अहंकार के कारण ही सूरजमल को इस युद्ध में तटस्थ रहना पड़ा । यदि ऐसे अप्रतिम योद्धा की नीति मान कर इनके नेतृत्व में संगठित होकर देश के सारे राजा सरदार लड़ते तो अब्दाली बच कर नहीं जा सकता था और भारत माता को ये दुर्दिन नहीं देखने पड़ते ।

    1761 की गर्मी में सूरजमल ने आगरा भी जीत लिया । इनका सुपुत्र वीर जवाहरसिंह भी इनके अनुरूप ही था । दिल्ली की ओर किसी ने मुख नहीं किया था जिसे सूरजमल और जवाहरसिंह ने ही जीता था । सन् 1763 की सर्दी में सूरजमल ने शाहदरे में मोर्चा लगा कर तीन-चार दिन के युद्ध में देशद्रोही नजीब खां की सेना को लालकिले में छुपने के लिए बाध्य कर दिया । परन्तु 25 दिसम्बर को भ्रमण करते समय एक देशद्रोही पूर्वी ब्राह्मण की जासूसी सूचना से घेर लिए गए और लड़ कर बलिदान हो गए जहां आजकल उनकी समाधि बनी हुई हुई है ।

    वृन्दावन की पंचायत के सभापति राजा सूरजमल


    सन् 1754 ईस्वी में भादों बदि अष्टमी अर्थात् श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर एक बड़ी पंचायत वृन्दावन के तीर्थ पर 205 खापों, पालों के पंचों की पंचायत हुई थी । महाराजा सूरज सुजान अर्थात् भरतपुर नरेश महाराजा सूरजमल इसके सभापति बनाए गए थे । कारण यह था कि कुछ लोगों ने शादी विवाहों में झगड़े करने आरम्भ कर दिए थे । इस पंचायत में सारे विशाल हरयाणा प्रदेश में खापवार पंचों के विचारों की बात सर्वसम्मति से मानी गई थी और ये तीन प्रस्ताव माने गए थे ।

    1. कोई लड़के वाला लड़की वाले से दहेज न मांगे । पुत्र बेचना महापाप है और लड़की वाला भी लड़की पर किसी से रुपए न मांगे क्योंकि बेचना हजार पापों का पाप है । लड़की का बाप गरीब हो तो शादी में लड़के वाला सादा भोजन खाकर या पानी पीकर लड़की ब्याह ले जाए । उसकी इज्जत करो । किसी का गोत्र जबरदस्ती न बदलवाओ ।

    2. यदि किसी खाप या गोत्र का आदमी दूसरी खाप में जाकर बसे तो उसे अपने गोत्र के साथ उस खाप या गांव का गोत्र भी बराबर मानना पड़ेगा ।

    3. किसी की बहू बेटी को भगा लेना या छीनाझपटी करना सबसे बड़ा दोष है तथा बहू-बेटी को कष्ट देना बड़ा जुर्म है । इससे अच्छा तो उसको उसके बाप के घर छोड़ दो और उसका खर्चा भी दो वर्ना उसको इज्जत से अपने घर ले आओ । किसी का गोत्र नहीं बदला जाता । उसका सम्बन्ध खून से है ।

    यह लेख हरिप्रकाश भाट की पोथी का है जो उसने किसी दूसरे लेखक की पोथी से लिखा था । इस भाट को सन् 1940 में बाल्याण खाप के प्रधान ग्राम शिषौली में बुला कर पगड़ी और 250 रुपये से उसका सम्मान किया था ।


    ________
    उद्धरण (Excerpts from): “सर्वखाप पंचायत का राष्ट्रीय पराक्रम”
    पृष्ठ - 289-299
    लेखक - निहालसिंह आर्य



    .
    तमसो मा ज्योतिर्गमय

  4. The Following 2 Users Say Thank You to dndeswal For This Useful Post:

    thukrela (October 20th, 2011), vishalsunsunwal (October 28th, 2011)

  5. #3
    Uncle Ji, aapne sari batein sach likhi hai...aesi batein jo itihas ki kitabon main nahi milengi......maine ek book padi thi..."Bharatpur: A Saga of Invincible Courage" by CS Verma. usmein iss ghatna ka smpooran vyakhyaan kiya hua hai......ek ek baat ki sachaai ko parmanit kiya hua hai.....agar marathe maharaja surajmal ki baat maan lete to harte nahi..........iss book main ek baat aur thi....abdali mathura tak pahuch gya thaa aur usne maharaja surajmal se kaafi paise maange they, phale to maharaja surajmal ne usko kam paise dene ki baat ki taaki yudh ko tala jaa sake, but abdali nahi mana...uske baad maharaja surajmal ne mana kar diya & ek baat boli thi....wo puri tarah se yaad nahi ahi abhi, but kutchh iss type se thi..."hum abdali ko ek paisa bhi nahi denge....hum yudh ke liye taiyar hai.....agar himmat hai to abdali aakrman kare......puri dunia dekhegi aur itihas yaad rakhega ki kis tarah se ek jamindar raja ne ek naa harne wale afgaan shashak ko haraya".... abdali ne bharatpur par hamla nahi kiya...uski sena main heje ki bimari ho gayi...aur wo mathura se hi wapis bhag gya......uss kitab main bahut acchi batein thi..jo sari yahan pe batayi nahi ja sakti....magar ek baat sach hai ki itihas ne beshak maharaja surajmal ko yaad naa rakha ho...magar uss samay akele wahi they jo mathaon, muglon, angrejo & rajputon de dat kar lade they aur inn sabko dhool chatai thi....wo ek bahut hi badiya shashak they.
    Last edited by bhupindersingh; August 31st, 2010 at 11:15 PM.
    "Life is what we make it, not what we take it."

  6. The Following User Says Thank You to bhupindersingh For This Useful Post:

    thukrela (October 20th, 2011)

  7. #4
    when we indians got divided in the name of languages - INDIA WAS INVADED & BECAME A SLAVE
    when we Indians divided in the name of Religion- INDIA WAS PARTITIONED LIKE 1947
    When we Indians got divided in the name of castes- INDIA BECAME WORSE THAN HELL

  8. #5
    Quote Originally Posted by bhupindersingh View Post
    Uncle Ji, aapne sari batein sach likhi hai...aesi batein jo itihas ki kitabon main nahi milengi......maine ek book padi thi..."Bharatpur: A Saga of Invincible Courage" by CS Verma. usmein iss ghatna ka smpooran vyakhyaan kiya hua hai......ek ek baat ki sachaai ko parmanit kiya hua hai.....agar marathe maharaja surajmal ki baat maan lete to harte nahi..........iss book main ek baat aur thi....

    I have a paper clipping with me. Perhaps this is from the book by CS Verma. The text of it is reproduced below.


    On March 26, Abdali sent Qalandar Khan to Delhi to inform Alamgir II that he was calling off his campaign against Suraj Mal and returning to Delhi. Simultaneously, he sent two envoys with a threatening letter to warn Suraj Mal of the dire consequences that would follow if he continued to evade payment of tribute. Suraj Mal had ‘promised’ to pay five lakh rupees to Abdali and a gift of two lakhs to his Minister. A small price to pay, but the cholera epidemic made sure that even this money would never be paid. Abdali had rather rashly hinted in his letter that the forts of Bharatpur, Deeg and Kumher would be razed to the ground.

    Suraj Mal’s reply is a splendid example of epistolary art. It combines subtlelty with firmness, teasing candour with undisputed courage, humility with pride and, in addition, it is a document of great serenity. This devastating letter must have made Abdali realize that Suraj Mal was no supine prince. Raja Suraj Mal wrote:

    “I have no important position and power in the empire of Hindustan. I am one of the zamindars living in the desert, and on account of my worthlessness, not one of the emperors of the age thought it worthy of him to interfere with my affairs. Now that a powerful emperor like Your Majesty, determines on meeting and opposing me face to face in the field of battle, would draw his armies against this insignificant person, that action alone would be discreditable to the dignity and greatness of theShah and would help in the elevation of my position (in the public estimation) and would be a matter of pride for my humble self. The world would say that the Emperor of Iran and Turan had, out of extreme fear, marched his armies upon a penniless nomad. These words alone would be a matter of great shame for Your Majesty, the bestower of crowns. Moreover, the ultimate result is not altogether free from uncertainty. If, with all this power and equipage, you succeed in destroying a weakling like myself, what credit will there be gained? About me, they will only say – wjhat power and position had that poor man ? But if by divine decree, which is not known to anyone, the affair takes a different turn, what will it lead to? All this power and preponderance brought about by Your Majesty’s gallant soldiers during a period of eleven years will vanish in a moment.

    “It is a surprise that your large-hearted Majesty has not given thought to this small point, and with all this congregation and huge multitude, has taken upon yourself the trouble of this simple and insignificant expedition. As to the threatening and violent order issued for the slaughter and devastation of myself and my country, warriors have no fear on that score. It is well known that no intelligent man has any faith in this transient life. As for myself, I have already crossed fifty of the stages of life and know nothing about the remaining. There shall be no greater blessing than that I should drink the draught of martyrdom, that has to be taken sooner or later in the arena of warriors and in the field of battle with valiant soldiers, and leave my name, and that of my ancestors, on the pages of the book of the age to be remembered that a powerless peasant breathed equality with such a great and powerful emperor as had reduced mighty kings to subjection, and that he fell fighting. And the same virtuous intention lies at the heart of any faithful followers and companions. Even if I wish to make up my mind to attend at the threshold of your angelic court, the honour of my friends does not permit me to do so. Under such circumstances, if Your Majesty, the fountain of justice, forgive me, who is weak as a straw and turn your attention to expeditions of greater importance, no harm shall come to your dignity or glory. The truth about the three forts (Bharatpur, Deeg and Kumher) belonging to me, the objects of your wrath, which have been regarded by Your Majesty’s Chiefs as weak as a spider’s web, shall be tested only after an actual contest. God willing, they shall be as invincible as Alexandar’s Rampart”.



    Hindi translation of above is as under:

    जब अब्दाली मथुरा के उत्तर में लगभग 19 मील पर शेरगढ़ पहुंचा तो उसने सूरजमल से जो कुछ भी प्राप्त हो सके, लेने का अन्तिम प्रयास किया । उसने बंगाल के सेठ जुगलकिशोर और एक अफगान अधिकारी को एक धमकी भरे पत्र के साथ सूरजमल के पास भेजा कि अगर उसने नजराना पेश करने में निरन्तर टालमटोल की तो डीग, कुम्हेर और भरतपुर के उसके तीनों दुर्ग भूमिसात् करके धूल में मिला दिए जाएंगे और उसके प्रदेश की जो भी दुर्गति होगी, उसकी पूरी जिम्मेदारी उसी की होगी । किन्तु जाट राजा भयभीत नहीं हुआ । उसने कूटनीतिक शब्दों में उत्तर भेजकर अपने साहस और सूझबूझ का परिचय दिया । सूरजमल ने लिखा -

    "हिन्दुस्तान के साम्राज्य में मेरी कोई महत्वपूर्ण स्थिति एवं शक्ति नहीं है । मैं रेगिस्तान में रहने वाले जमींदारों में से एक हूँ और मेरी इस महत्वहीनता की वजह से, इस युग के एक भी सम्राट ने मेरे मामलों में हस्तक्षेप करना उपयोगी नहीं समझा । अब आपके समान एक शक्तिशाली सम्राट ने मुझ से युद्ध के मैदान में आमने सामने मिलने एवं विरोध करने का निश्चय किया है । अपनी सेनाओं को एक मामूली व्यक्ति के विरुद्ध लाना, यह अकेला कार्य ही शाह की महानता एवं प्रतिष्ठा के लिए अपयशकारी होगा और (लोकानुमान में) मेरी प्रतिष्ठा को बढ़ाने में सहायक होगा तथा स्वयं मेरे लिए गर्व का विषय होगा । दुनियाँ यही कहेगी कि अत्यधिक भयग्रस्त होकर ईरान व तूरान के सम्राट ने एक अपने मामूली जमींदार के विरुद्ध अपनी सेनाओं का प्रयाण किया । अकेले ये शब्द ही ताज प्रदान करने वाले आप महामहिम के लिए लज्जा का विषय होंगे । इससे भी बढ़कर प्रश्न यह है कि अन्तिम परिणाम अनिश्चितता से पूर्णतया मुक्त नहीं होगा । अगर इस सारी शक्ति एवं सामग्री के साथ आप मुझ जैसे कमजोर व्यक्ति को नष्ट करने में सफल हो जाते हैं, तो आपको क्या यश प्राप्त होगा ? (मेरे बारे में) वे केवल यही कहेंगे कि उस दुर्बल व्यक्ति की क्या शक्ति और स्थिति थी" । किन्तु अगर दैवी निर्णय से, जो किसी को भी ज्ञात नहीं है, अगर घटनायें दूसरा मोड़ ले लेती हैं, तब क्या होगा ? आप महामहिम के बहादुर सैनिकों ने ग्यारह वर्षों के दौरान जो शक्ति और गुरुता हासिल की है, वह के क्षण में लुप्त हो जायेगी ।

    "यह आश्चर्य का विषय है कि आप जैसे विशाल हृदय महामहिम ने इस छोटी सी संभावना पर विचार नहीं किया और इस सारी मण्डली तथा विशाल सेना के साथ आपने इस साधारण एवं महत्वहीन अभियान पर कष्ट उठाया । जहाँ तक कत्लेआम और मेरे तथा मेरे प्रदेश के विनाश के लिए जारी किए गए हिंसा एवं धमकी भरे आदेश का प्रश्न है, योद्धाओं को उस हिसाब पर कोई भय नहीं है । यह भलीभाँति ज्ञात है कि कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति इस क्षणभंगुर जीवन में विश्वास नहीं रखता है । जहाँ तक मेरा सवाल है, मैं जीवन की पचास सीढ़ियाँ पार कर चुका हूँ और शेष के लिए कुछ भी नहीं जानता हूँ । इससे बड़ा कोई आशीर्वाद नहीं हो सकता कि मैं शहादत के घूंट का पान करूं, जो जल्दी या देर से बहादुर सैनिकों को योद्धाओं की कर्मभूमि में करना है, और यादगार के रूप में युग के इतिहास-पृष्ठों पर मेरा तथा मेरे पूर्वजों का नाम रह जायेगा कि एक साधारण किसान इतने बड़े शक्तिशाली सम्राट से, जिसने शक्तिशाली राजाओं को आधीन बनाया, बराबरी से लड़ा और लड़ते हुए मारा गया । और ऐसा ही दृढ़निश्चय मेरे विश्वसनीय साथियों और अनुयायियों के हृदय-पटल पर अंकित है । फिर भी अगर मैं आपके दैवी दरबार की दहलीज पर उपस्थित होने का निश्चय करूँ तो मेरे मित्रों का सम्मान मुझे ऐसा करने की अनुमति नहीं देता । इन परिस्थितियों में न्याय के स्रोत आप महामहिम अगर मुझे क्षमा कर दें, जो एक तृण के समान ही कमजोर है, और अपना ध्यान अधिक महत्व के अभियान की ओर परिवर्तित करें तो आपके गौरव एवं प्रतिष्ठा को कोई नुकसान नहीं होगा ।

    "आपके क्रोध का कारण मेरे तीन किलों, जो आप महामना के सरदारों के द्वारा मकड़ी के जाले की भांति कमजोर माने गए हैं, के बारे में सच्चाई का पता तो वास्तविक संघर्ष के बाद ही चलेगा । ईश्वर कृपा से वे सिकन्दर के परकोटे की तरह अपराजित सिद्ध होंगे ।"


    .
    तमसो मा ज्योतिर्गमय

  9. The Following 2 Users Say Thank You to dndeswal For This Useful Post:

    DrRajpalSingh (November 27th, 2011), vishalsunsunwal (October 28th, 2011)

  10. #6
    Uncle Ji, this is not from the book by CS Verma, might be from other book.

    Quote Originally Posted by dndeswal View Post
    I have a paper clipping with me. Perhaps this is from the book by CS Verma. The text of it is reproduced below.


    On March 26, Abdali sent Qalandar Khan to Delhi to inform Alamgir II that he was calling off his campaign against Suraj Mal and returning to Delhi. Simultaneously, he sent two envoys with a threatening letter to warn Suraj Mal of the dire consequences that would follow if he continued to evade payment of tribute. Suraj Mal had ‘promised’ to pay five lakh rupees to Abdali and a gift of two lakhs to his Minister. A small price to pay, but the cholera epidemic made sure that even this money would never be paid. Abdali had rather rashly hinted in his letter that the forts of Bharatpur, Deeg and Kumher would be razed to the ground.

    Suraj Mal’s reply is a splendid example of epistolary art. It combines subtlelty with firmness, teasing candour with undisputed courage, humility with pride and, in addition, it is a document of great serenity. This devastating letter must have made Abdali realize that Suraj Mal was no supine prince. Raja Suraj Mal wrote:

    “I have no important position and power in the empire of Hindustan. I am one of the zamindars living in the desert, and on account of my worthlessness, not one of the emperors of the age thought it worthy of him to interfere with my affairs. Now that a powerful emperor like Your Majesty, determines on meeting and opposing me face to face in the field of battle, would draw his armies against this insignificant person, that action alone would be discreditable to the dignity and greatness of theShah and would help in the elevation of my position (in the public estimation) and would be a matter of pride for my humble self. The world would say that the Emperor of Iran and Turan had, out of extreme fear, marched his armies upon a penniless nomad. These words alone would be a matter of great shame for Your Majesty, the bestower of crowns. Moreover, the ultimate result is not altogether free from uncertainty. If, with all this power and equipage, you succeed in destroying a weakling like myself, what credit will there be gained? About me, they will only say – wjhat power and position had that poor man ? But if by divine decree, which is not known to anyone, the affair takes a different turn, what will it lead to? All this power and preponderance brought about by Your Majesty’s gallant soldiers during a period of eleven years will vanish in a moment.

    “It is a surprise that your large-hearted Majesty has not given thought to this small point, and with all this congregation and huge multitude, has taken upon yourself the trouble of this simple and insignificant expedition. As to the threatening and violent order issued for the slaughter and devastation of myself and my country, warriors have no fear on that score. It is well known that no intelligent man has any faith in this transient life. As for myself, I have already crossed fifty of the stages of life and know nothing about the remaining. There shall be no greater blessing than that I should drink the draught of martyrdom, that has to be taken sooner or later in the arena of warriors and in the field of battle with valiant soldiers, and leave my name, and that of my ancestors, on the pages of the book of the age to be remembered that a powerless peasant breathed equality with such a great and powerful emperor as had reduced mighty kings to subjection, and that he fell fighting. And the same virtuous intention lies at the heart of any faithful followers and companions. Even if I wish to make up my mind to attend at the threshold of your angelic court, the honour of my friends does not permit me to do so. Under such circumstances, if Your Majesty, the fountain of justice, forgive me, who is weak as a straw and turn your attention to expeditions of greater importance, no harm shall come to your dignity or glory. The truth about the three forts (Bharatpur, Deeg and Kumher) belonging to me, the objects of your wrath, which have been regarded by Your Majesty’s Chiefs as weak as a spider’s web, shall be tested only after an actual contest. God willing, they shall be as invincible as Alexandar’s Rampart”.



    Hindi translation of above is as under:

    जब अब्दाली मथुरा के उत्तर में लगभग 19 मील पर शेरगढ़ पहुंचा तो उसने सूरजमल से जो कुछ भी प्राप्त हो सके, लेने का अन्तिम प्रयास किया । उसने बंगाल के सेठ जुगलकिशोर और एक अफगान अधिकारी को एक धमकी भरे पत्र के साथ सूरजमल के पास भेजा कि अगर उसने नजराना पेश करने में निरन्तर टालमटोल की तो डीग, कुम्हेर और भरतपुर के उसके तीनों दुर्ग भूमिसात् करके धूल में मिला दिए जाएंगे और उसके प्रदेश की जो भी दुर्गति होगी, उसकी पूरी जिम्मेदारी उसी की होगी । किन्तु जाट राजा भयभीत नहीं हुआ । उसने कूटनीतिक शब्दों में उत्तर भेजकर अपने साहस और सूझबूझ का परिचय दिया । सूरजमल ने लिखा -

    "हिन्दुस्तान के साम्राज्य में मेरी कोई महत्वपूर्ण स्थिति एवं शक्ति नहीं है । मैं रेगिस्तान में रहने वाले जमींदारों में से एक हूँ और मेरी इस महत्वहीनता की वजह से, इस युग के एक भी सम्राट ने मेरे मामलों में हस्तक्षेप करना उपयोगी नहीं समझा । अब आपके समान एक शक्तिशाली सम्राट ने मुझ से युद्ध के मैदान में आमने सामने मिलने एवं विरोध करने का निश्चय किया है । अपनी सेनाओं को एक मामूली व्यक्ति के विरुद्ध लाना, यह अकेला कार्य ही शाह की महानता एवं प्रतिष्ठा के लिए अपयशकारी होगा और (लोकानुमान में) मेरी प्रतिष्ठा को बढ़ाने में सहायक होगा तथा स्वयं मेरे लिए गर्व का विषय होगा । दुनियाँ यही कहेगी कि अत्यधिक भयग्रस्त होकर ईरान व तूरान के सम्राट ने एक अपने मामूली जमींदार के विरुद्ध अपनी सेनाओं का प्रयाण किया । अकेले ये शब्द ही ताज प्रदान करने वाले आप महामहिम के लिए लज्जा का विषय होंगे । इससे भी बढ़कर प्रश्न यह है कि अन्तिम परिणाम अनिश्चितता से पूर्णतया मुक्त नहीं होगा । अगर इस सारी शक्ति एवं सामग्री के साथ आप मुझ जैसे कमजोर व्यक्ति को नष्ट करने में सफल हो जाते हैं, तो आपको क्या यश प्राप्त होगा ? (मेरे बारे में) वे केवल यही कहेंगे कि उस दुर्बल व्यक्ति की क्या शक्ति और स्थिति थी" । किन्तु अगर दैवी निर्णय से, जो किसी को भी ज्ञात नहीं है, अगर घटनायें दूसरा मोड़ ले लेती हैं, तब क्या होगा ? आप महामहिम के बहादुर सैनिकों ने ग्यारह वर्षों के दौरान जो शक्ति और गुरुता हासिल की है, वह के क्षण में लुप्त हो जायेगी ।

    "यह आश्चर्य का विषय है कि आप जैसे विशाल हृदय महामहिम ने इस छोटी सी संभावना पर विचार नहीं किया और इस सारी मण्डली तथा विशाल सेना के साथ आपने इस साधारण एवं महत्वहीन अभियान पर कष्ट उठाया । जहाँ तक कत्लेआम और मेरे तथा मेरे प्रदेश के विनाश के लिए जारी किए गए हिंसा एवं धमकी भरे आदेश का प्रश्न है, योद्धाओं को उस हिसाब पर कोई भय नहीं है । यह भलीभाँति ज्ञात है कि कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति इस क्षणभंगुर जीवन में विश्वास नहीं रखता है । जहाँ तक मेरा सवाल है, मैं जीवन की पचास सीढ़ियाँ पार कर चुका हूँ और शेष के लिए कुछ भी नहीं जानता हूँ । इससे बड़ा कोई आशीर्वाद नहीं हो सकता कि मैं शहादत के घूंट का पान करूं, जो जल्दी या देर से बहादुर सैनिकों को योद्धाओं की कर्मभूमि में करना है, और यादगार के रूप में युग के इतिहास-पृष्ठों पर मेरा तथा मेरे पूर्वजों का नाम रह जायेगा कि एक साधारण किसान इतने बड़े शक्तिशाली सम्राट से, जिसने शक्तिशाली राजाओं को आधीन बनाया, बराबरी से लड़ा और लड़ते हुए मारा गया । और ऐसा ही दृढ़निश्चय मेरे विश्वसनीय साथियों और अनुयायियों के हृदय-पटल पर अंकित है । फिर भी अगर मैं आपके दैवी दरबार की दहलीज पर उपस्थित होने का निश्चय करूँ तो मेरे मित्रों का सम्मान मुझे ऐसा करने की अनुमति नहीं देता । इन परिस्थितियों में न्याय के स्रोत आप महामहिम अगर मुझे क्षमा कर दें, जो एक तृण के समान ही कमजोर है, और अपना ध्यान अधिक महत्व के अभियान की ओर परिवर्तित करें तो आपके गौरव एवं प्रतिष्ठा को कोई नुकसान नहीं होगा ।

    "आपके क्रोध का कारण मेरे तीन किलों, जो आप महामना के सरदारों के द्वारा मकड़ी के जाले की भांति कमजोर माने गए हैं, के बारे में सच्चाई का पता तो वास्तविक संघर्ष के बाद ही चलेगा । ईश्वर कृपा से वे सिकन्दर के परकोटे की तरह अपराजित सिद्ध होंगे ।"


    .
    "Life is what we make it, not what we take it."

  11. #7
    Father F.X. Wendel, a French missionary who was actually engaged by the British for spying in norther India in the guise of a religious preacher, had stayed in areas near Bharatpur for more than a year. He wrote some features in French (English title : “Wendel’s Memoirs on the Origin, Growth and Present State of Jat Power in Hindustan – 1768”). Although not all the findings of Wendel are true (due to his poor knowledge of Indian society), nevertheless, his papers highlight some important facts. Dr. Vir Singh has translated some of these in Hindi and has published it in the book “HINDUSTAN MEIN JAT SATTA (हिन्दुस्तान में जाट सत्ता) which was published by Surajmal Sansthan, Janakpuri, New Delhi, in 2001.

    Reproduced below are a few paragraphs from the above book, on the happenings just before the Third Battle of Panipat, depicting the greatness and farsightedness of Maharaja Surajmal.

    (Page 151 to 154)
    सदाशिव भाऊ का अभियान (1760)

    उसी समय दक्षिण से प्रख्यात भाऊजी के सेनापतित्व में आ रही मराठों की विशाल सेना निकट आ पहुंची और शाह को स्वयं अपने बचाव की चिन्ता पड़ गई । उसे जाटों की ओर ध्यान देने की अधिक फुरसत ही न रही; उसे तब मराठों का डर था, जो आक्रमण के लिए दृढ़संकल्प से भरे आ रहे थे और वस्तुतः जिनके पास इतनी सैन्यशक्ति थी कि यदि सारा काम ठीक ढंग से किया जाता, तो शाह को हराने के लिए यथेष्ठ थी । बड़े उपयुक्त समय पर मराठों के इस आगमन से जाटों का संकट कुछ समय के लिए टल गया, परन्तु वह समाप्त नहीं हुआ, जैसा कि हम शीघ्र ही देखेंगे । जब से मराठों ने हिन्दुस्तान (उत्तर भारत) में पांव रखा था (LX), तब से वे कभी भी न तो इतनी बड़ी संख्या में आए थे और न इतने शक्तिशाली रहे थे जितने कि अब आ रहे थे । भाऊ अपनी बहुत शक्तिशाली सेना का नेतृत्व इस संकल्प के साथ करने आया था कि वह अब्दालियों को न केवल इस देश से, जिस पर उन्होंने चढ़ाई की है, अपितु स्वयं उनके अपने देश से भी खदेड़कर बाहर कर देगा । यह भी दिखाई पड़ता है कि यद्यपि उसका यह सैनिक अभियान जनकोजी और दत्ताजी पटेल की पराजय का बदला लेने के लिए हुआ था, परन्तु उसके इरादे इसके अतिरिक्त कुछ और भी थे । क्योंकि शाह दुर्रानी ने सब बड़े मुसलमान सरदारों का संगठित हो जाने के लिए आह्वान किया था, इसलिए भाऊ ने खुले तौर पर उन्हें धमकी दी कि पठानों का काम तमाम करने के बाद वह उनमें से भी किसी को माफ नहीं करेगा । पठानों की पराजय को तो वह सुनिश्चित ही मानता था । सूरजमल को जितना भय अब्दालियों से था, उससे कुछ कम जोखिम मराठों से नहीं था । इसलिए संभव था कि वह इस संशय में पड़ जाता कि वह किस पक्ष का साथ दे और इस प्रकार की संकटपूर्ण स्थिति को किस प्रकार पार करे । परन्तु भाऊ ने इसका अवसर ही नहीं दिया ।

    साथ देने के लिए भाऊ का सूरजमल को निमंत्रण

    ज्यों ही उसकी सेना जाट-राज्य क्षेत्र की सीमा पर पहुंची, त्यों ही उसने दो टूक शब्दों में सूरजमल को संदेश भेजा कि वह मराठों के पक्ष में सम्मिलित होने की घोषणा में विलम्ब न करे और अपनी सारी सेना साथ लेकर तत्काल आगे आए और इस आयोजित सैनिक अभियान में उसके साथ चले । उसके सम्मुख दुविधा में पड़े रहने या मुंहतोड़ उत्तर देने का भी कोई उपाय नहीं था । भाऊ बहुत अभिमानी था और साथ ही शक्तिशाली भी, इसलिए उसका सम्मान किए बिना भी गुजारा नहीं था । इसके अतिरिक्त, इतनी विशाल सेना यदि जाटों के राज्य क्षेत्र के बीच में होकर गुजरने ही लगती, तो केवल उतने से ही इतनी भारी और अपूरणीय क्षति हो जाती कि उससे बचाव के लिए जाटों को विवश होकर कुछ प्रयत्न करना ही पड़ता ।

    सूरजमल भाऊ के साथ दिल्ली तक गया (जुलाई 1760)

    इसलिए सूरजमल ने भाऊ के साथ चल पड़ने में तनिक भी आनाकानी नहीं की । उसने कूच करती हुई सेना के लिए प्रचुर मात्रा में रसद दी और अपनी 6000 से 7000 तक सेना लेकर स्वयं उसके साथ दिल्ली तक गया । इससे कुछ ही समय पहले शाह दिल्ली को छोड़कर पीछे हट गया था और वहां से चालीस कोस दूर पानीपत पहुंचकर मराठों के आगमन की प्रतीक्षा में था, जो तेजी से उसका पीछा करते आ रहे थे । यह काम मराठों ने सूरजमल के बुद्दिमत्तापूर्ण परामर्श के प्रतिकूल किया । उसने भाऊ को सलाह दी थी कि वह युद्ध के लिए दिल्ली को अपना आधार केन्द्र (जहां सेना की आवश्यक सामग्री तथा अन्य सुविधायें रहती हैं) बनाए और शक्तिशाली शत्रु द्वारा रक्षित देहाती क्षेत्र में बहुत अधिक आगे बढ़ने का दुःसाहस करके इस आधार केन्द्र से अधिक दूर न जाए । इस रीति से सेना को उसकी आवश्यकता की सब वस्तुएं उसके पीछे स्थित जाट-देश से प्राप्त होती रह सकेंगी और यदि कभी आवश्यकता पड़ ही जाए, तो दिल्ली एक निकटस्थ विश्रामस्थल का काम भी दे सकती है । परन्तु मराठा सरदार को अपने सैन्य बल पर इतना अधिक विश्वास (LXI) था कि वह इस जाट की बुद्धिमत्तापूर्ण सलाह को मान नहीं सकता था । उधर सूरजमल को मालूम था कि ये जो मराठे अब दक्षिण से आए हैं, वे उनसे संख्या में भले ही अधिक हों, परन्तु अधिक वीर नहीं हैं, जो पिछले वर्ष आए थे और जानकोजी के नेतृत्व में पठानों से पराजित हुए थे ।

    उसे अनुभव से यह भी पता था कि इस प्रकार के दुर्भाग्य का सामान्यतया इस देश में जहां अब्दाली का अत्यधिक प्रताप है, सैनिकों पर कैसा प्रभाव पड़ता है । उसे भाऊ के उपक्रम के सफल होने की कोई विशेष आशा नहीं थी और उसे यह भय था कि वह उस उपक्रम में भाग लेकर किसी कष्टप्रद झंझट में न फंस जाए, इसलिए उसने समय रहते इससे अलग हो जाने का यत्न किया । यदि वह भाऊ के साथ आया ही न होता, तब बात और थी, किन्तु अब पीछे की ओर कदम उठाना उसकी अपेक्षा अधिक कठिन था । भाऊ जाटों को लौटने देने के लिए कभी सहमत न होता; न वह सूरजमल को ही वापस जाने देता; और सूरजमल के इस चर्चा को छेड़ते ही वह तत्क्षण उसे कैद कर लेता ।

    ...Continued
    तमसो मा ज्योतिर्गमय

  12. #8
    ...continued from previous post

    सूरजमल ने भाऊ का साथ छोड़ा (4 अगस्त 1760)

    जाट सरदार ने निश्चय कर लिया कि वह स्वयं अपने लोगों और देश को त्यागने से पहले मराठों को त्याग देना पसन्द करेगा । शनैः-शनैः अपने अधिकांश सैनिकों को इस प्रकार चलता किया कि भाऊ को इसका पता ही न चला; उसके बाद वह स्वयं भी एक रात भाग निकला और इससे पहले कि मराठे उसे रोक या पकड़ पाने का समय या अवसर पा सकें, वह डीग जा पहुंचा । भाऊ क्रोध से कांपने लगा और उसने प्रण किया कि ज्यों ही उसे फुरसत मिलेगी, त्यों ही वह जाटों का ऐसा विनाश करके रहेगा कि केवल उनकी याद ही बाकी रह जाएगी ।

    पानीपत में मराठों की पराजय (14 जनवरी 1761)

    चाहे उसने कितना ही क्रोध क्यों न जताया हो और कितनी ही धमकियां क्यों न दीं हों, परन्तु हर कोई जानता है कि स्वयं उसका लगभग वैसा ही अन्त हुआ, जैसा कि सूरजमल को ही आभास हो गया था । पानीपत की प्रसिद्ध लड़ाई के बाद 100,000 से अधिक मराठा भगोड़े सैनिकों में से केवल मुट्ठी-भर ही पठानों से बचकर निकल पाए । उन्हें जाटों के प्रदेश में से होकर भागना पड़ा और वहां उन्हें यथेष्ट दया और सहायता प्राप्त हुई, जबकि यदि सूरजमल चाहता तो उनमें से एक भी बचकर दक्षिण तक नहीं जा सकता था ।

    सूरजमल की निपुणता

    शायद कोई कहे कि उसके सभी उद्यमों में इस जाट के सौभाग्य का अत्यधिक हाथ रहा और ऐसा भी प्रतीत होता हो कि भाग्य उस पर असाधारण रूप से प्रसन्न था । इस बात से मैं अंशतः सहमत हूं, फिर भी इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि उसमें विकट से विकट परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रखने की क्षमता थी, और एक तरह की बुद्धिमत्ता भी । किस प्रकार की, मैं नहीं जानता । यद्यपि उसने शासन की कला की शिक्षा नहीं पाई थी, फिर भी इसमें वह अपने समय के बड़े-से-बड़े व्यक्तियों के बराबर था; और मैं तो यहां तक कहने का साहस करूंगा कि वह उनमें अधिकांश से बढ़कर ही था । उस काल में, जब हिन्दुस्तान के नवाब तथा अन्य शक्तिशाली मुसलमान अब्दाली के विशाल सैनिक अभियानों में अपने खर्च पर स्वयं अपने ही देश को लूटने और उजाड़ने के लिए सम्मिलित होने को बाध्य हुए थे, और उन्हें उसके पराक्रमों को सफल बनाने के लिए धन देना पड़ता था, तब भी सूरजमल अपने प्रदेश में ऐसे प्रबल शत्रुओं की आक्रामक योजनाओं से अपने राज्यक्षेत्र की रक्षा करने में समर्थ रहा था । वह उन सब अशान्तियों के बीच में रहकर भी, जिनमें उसके सभी पड़ौसी कुछ कम या अधिक फंसे थे, शान्ति का आनन्द लेता था । जिस समय अन्य लोग गिर रहे थे, उस समय वह अपनी शक्ति बढ़ा रहा था । संक्षेप में वह उस समय उन्नति कर रहा था जिस समय साम्राज्य सर्वसामान्य अवनति की ओर जा रहा था । जिस प्रकार वह भाऊ और मराठों को अहमदशाह और उसके पठानों के विरुद्ध लड़ने के लिए ले गया, जिस प्रकार वह उनमें से एक को साधनों के बिना ही जीत सका और उसके बाद दूसरे के द्वारा पीछा किया जाने से बचा रहा, वह भी इतने कम जोखिम और कम खर्च पर, यह काम जितनी निपुणता से सूरजमल कर सका, उतनी निपुणता से कर सकने वाला सारे इन्दुस्तान में मुझे और कोई दिखाई नहीं देता । कौन यह नहीं सोच सकता था कि मराठों की इतनी बड़ी पराजय के तुरन्त बाद अहमदशाह, जो विजयी था और इसकी बाद अजेय माना जाने लगा था, जाटों पर आधिपत्य नहीं जमा लेता, कम से कम इसीलिए कि सूरजमल को वह धनराशि देने के लिए विवश किया जाए, जो उसे पांच-छः वर्ष पहले ही देनी थी ? फिर भी, इस बार भी वह इस विकट परिस्थिति से बच ही निकला, यद्यपि इसमें अब्दाली की असाधारण उदासीनता ही कारण रही । सौभाग्यवश जीती गई उस लड़ाई के बाद थकान उतारने के लिए शाह दिल्ली में व्यर्थ की मंत्रणाओं, उत्सवों और विवाहों द्वारा अपना मनोरंजन करने में व्यस्त हो गया । उसने कुछ किया नहीं और लड़ाई के लिए उपयुक्त ऋतु यूं ही गुजर गई । उसी समय सिक्खों (LXIII) ने लाहौर के पास लूटमार शुरू कर दी, इसलिए आगे और किन्हीं साहसिक अभियानों का विचार किए बिना ही उसे एक बार फिर हिन्दुस्तान छोड़कर लौटकर जाना पड़ा । यह सब ऐसे ढ़ंग से हुआ कि सूरजमल को शाह के कारण आगे के लिए मराठों से मुक्ति मिल गई और शाह की वापसी के कारण स्वयं शाह से उसका भय दिनोंदिन कम होता गया और उसने अपनी शक्ति को और उन्नत करने के लिए एक योजना बनाई, क्योंकि अब उसका एक शत्रु कम हो गया था, जिसके छल-कपट से उसे डरना पड़ता था, या जो उसे नीचा दिखा सकता था ।

    वे कारण, जिनसे अब्दाली जाटों को अछूता छोड़ देने को विवश हुआ

    यह जानने की इच्छा होनी स्वाभाविक है कि ठीक-ठाक वे कारण क्या थे जिनसे अब्दाली को सूरजमल और जाटों को इस सीमा तक अछूता छोड़ देना पड़ा, अर्थात् दो बार उन्हें होश में लाने की स्थिति में होते हुए और उसके इतना निकट पहुंच कर भी उसने इसके लिए और भी प्रभावी प्रयत्न क्यों नहीं किया ? इसलिए और भी, क्योंकि उसे बता दिया गया था कि यह अकेला पराक्रम ही उसके अभियानों में हुए सब कष्टों की भरपाई के लिए यथेष्ट रहेगा, और इसे पूर्णता तक पहुंचाना उसके बस में था । इस विषय पर विचार करते हुए इस तथ्य पर ध्यान देना उचित होगा कि हिन्दुस्तान को विजय करने के विषय में आज भी वही बात सत्य है, जो अब से कई शताब्दियों पहले सत्य थी । जब सर्वप्रथम पठानों ने इसे अपने अधीन करके अपने प्रभाव में लाने की इच्छा करना शुरु किया था; अर्थात् देश का विपुल विस्तार और उनके देश से इसकी अत्यधिक दूरी, जिसके कारण उनके लिए यह गुंजाइश नहीं थी कि वे इस देश पर अधिकार कर लें और साथ ही अपने देश पर भी कब्जा बनाए रखें ।

    * * * *
    तमसो मा ज्योतिर्गमय

  13. The Following User Says Thank You to dndeswal For This Useful Post:

    vishalsunsunwal (October 28th, 2011)

  14. #9
    Quote Originally Posted by

    [B
    युद्ध के पश्चात् सदाशिवराव भाऊ और पं० कान्हाराय[/B]

    इस युद्ध में हार कर भाऊ ने साधु बनकर भवानीराम नाम रखा और पहले 11 वर्ष तक तो रोहतक के पास सांघी ग्राम में चौ० सभाचन्द के पास रहे । फिर हरद्वार में अपनी हवेली बनाई जो अब भी है
    और उनके दो और नाम श्रवणनाथ तथा भवानन्द पुकारे गए थे । वे तीर्थस्थानों तथा मेले उत्सवों में प्रसिद्ध क्षत्रिय कुलों, वीर पुरुषों तथा नेताओं से मिलते रहे । इस्सोपुर के टीले पर आकर सन्त
    देवानन्द (पं० कान्हाराय का सन्यस्त नाम) से भी मिलते रहते थे । हरयाणा के कई वृद्ध पुरुषों ने उन्हें देखा था । भाऊ ने 32 वर्ष तक शेष सारा जीवन हरयाणा में ही साधु-सन्तों में व्यतीत
    किया था । पं० कान्हाराय ने संन्यासी बनकर देवानन्द नाम धारण किया और शेष सारा जीवन इस्सोपुर के टीले पर ईश्वर भक्ति उपदेश तथा यज्ञ में ही लगाया । इन्होंने 119 वर्ष की आयु में शरीर
    छोड़ा था । दाह संस्कार में चार हजार पाँच सौ पुरुष-स्त्रियों ने शामिल होकर कई मन घी सामग्री लगाई थी ।






    वृन्दावन की पंचायत के सभापति राजा सूरजमल





    .
    uncle ji,maine tau history ki jyadater kitabo mae ye pada hae ki bhau yudh mae mara gaya tha

  15. #10
    Wiki Moderator
    Points: 46,470, Level: 94
    Level completed: 87%, Points required for next Level: 130
    Overall activity: 14.0%
    Achievements:
    Social Referral First Class Veteran Created Album pictures 25000 Experience Points
    Awards:
    Overall Award
    Login to view details.
    Suraj Mal's conquest of the imperial fort of Agra in 1761

    For full three years after Panipat [Wiki]Maharaja Suraj Mal [/Wiki] was the strongest Indian ruler....

    We may now take up Suraj Mal's military activities during the rest of his career. Remaining quiet during the first few months of 1761, he turned to conquer the imperial fort of Agra (middle of May, 1761). .....


    Finding it opportune, now Suraj Mal despatched a big army (said to be consisting of the incredible figure of 50,000 horses and 1,00,000 foot), under Balram, while he himself stayed on at Mathura. The city and the nearby areas were taken over easily. ....

    Thus, a Jat became the master of Agra, the first Capital of the Great Mughals.....

    For readers who are interested in history of Jats, We have digitized [Wiki]The Jats - Their Role in the Mughal Empire/Chapter XIII[/Wiki] from the book by Dr Girish Chandra Dwivedi, Edited by Dr Vir Singh 2003. You may read there. Above points are some excerpts from this chapter.

    Regards,
    Last edited by lrburdak; October 27th, 2011 at 04:32 PM.
    Laxman Burdak

  16. The Following 6 Users Say Thank You to lrburdak For This Useful Post:

    DrRajpalSingh (November 19th, 2011), Moar (November 28th, 2011), ravinderjeet (October 27th, 2011), saurabhjaglan (October 27th, 2011), vijaykajla1 (October 27th, 2011), vishalsunsunwal (October 28th, 2011)

  17. #11
    Wiki Moderator
    Points: 39,159, Level: 86
    Level completed: 96%, Points required for next Level: 41
    Overall activity: 22.0%
    Achievements:
    Social Created Album pictures Veteran Referral First Class 25000 Experience Points
    Awards:
    Community Award
    Login to view details.
    Friends,

    In the Pre-Panipat 1761 preparations, Suraj Mal's cooperation was solicited by both the warring groups, but the Jat Raja preferred to join the Marathas. Hence he carried out diplomatic parleys with his counterpart. Permit me to reproduce here what transpired in the meeting between Sadashiv Rao Bhao and Maharaja Surajmal in the meeting held on 14th July 1760 in which strategy to face the invading forces of Ahmad Shah Abdali were discussed. On that day long consultations were held between them and ultimately Maharaja Suraj Mal expressed his opinion in very humble words as follows:

    "I am a mere Zamindar, and your Holiness (Bhao) is a great prince; every man forms his plan according to his capacity. Whatever appears advisable in my opinion, I shall submit to you. This is a war against a great emperor, assisted by all the chiefs of Islam (in India). Though Abdali is a sojourner in Hindustan, his adherents are all inhabitants of this country and lords of large estates. if you are clever, the enemy is cleverer...Undoubtedly, it is proper that you should act with great caution and reflection in conducting this war. If the breeze of victory breathes upon the cow's tail it should be considered as written by the pen of destiny your auspicious forehead. but war is a game of chance, holding out two alternatives...it is wise to be confident and rest in too much tranquility.

    "It seems proper that your ladies, the unnecessary baggage, and large canons which will be of little use in this war should be sent off beyond Chambal, to the fort of Jhansi or Gwalior, and you yourself with light armed war like troops meet the forces of the Shah. If victory is won, much booty would come to our hands; if the case is the reverse, we shall have our legs to flee away on. If you are opposed to the idea of sending them to such a distance or consider it impracticable, I shall vacate any one of my four iron-like forts according to your choice where you may keep in safety your women and baggage, stocking it well with provisions; so that the moment of decisive action your heart may not be weighed down and your hands fettered by anxiety about the honour of your ladies." He went to add: "And in the time of famine the road for the supply of grain must be kept open, so that scarcity of grain may not cause hardships to the army. I shall wait upon your stirrup with my troops......" for details See ImaadulMulk cited by Raj Pal Singh In Rise of the Jat Power (1988), Delhi, pp.119-121

    But Bhao did not agree to this sagacious words of the Plato of the Jats and the result of this audacity on the part of Bhao are part of the History known to one and all.
    Regards,

    Dr. Raj Pal Singh

  18. The Following 2 Users Say Thank You to DrRajpalSingh For This Useful Post:

    deshi-jat (November 27th, 2011), dndeswal (June 26th, 2012)

Posting Permissions

  • You may not post new threads
  • You may not post replies
  • You may not post attachments
  • You may not edit your posts
  •