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  1. #61
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    ठाकुर देश राज द्वारा प्रस्तुत जाट इतिहास से सम्बंधित प्रमाण: शिलालेख आदि (जारी ---)

    महादानी भक्त चौधरी हर्षराम: आकोदा

    बहुत दिनों से सुनते आए हैं कि रियासत जोधपुर के आकोदा गांव ([Wiki]Akoda Nagaur[/Wiki]) में एक कुआं है। वह राजा सगर का बनाया हुआ सतयुग का है और जब तक पृथ्वी आकाश रहेंगे तब तक यह कुआं भी रहेगा। कोई कहता है कि कुआं देवताओं का बनाया हुआ है क्योकि ऐसे कुएं बनाने में मनुष्य की शक्ति काम नहीं कर सकती। इस कुएं को बनाने वाले हमारी ही जाट जाति के एक महान पुरुष थे। विक्रम संबत् 1000 के आरम्भ में हर्षरामजी नाम के एक बड़े भारी दानी ईश्वर भक्त फगोड़चा गोत्र के जाट भूमिपति हो गए हैं। यह प्रान्त जो चौरासी कहलाता है (जिसमें 84 गांव हैं) इन्हीं के शासन में था। सिवाय दिल्ली-पति सम्राट के ये दूसरे किसी को खिराज नहीं देते थे। करीब एक हजार वर्ष हुए इन्होंने अकोदा गांव बसाया था और गांव के उत्तर की तरफ 525 बीघे बीड़े के नाम से गोचर भूमि छोड़ी थी जिसमें दो तालाब हैं। यह बीड़ अभी तक मौजूद है जो फगोड़चा का बीड़ कहलाता है। इसी महापुरुष का बनाया हुआ अकोंदा का कुआं है जिसको देखकर यही कहना पड़ता है कि संसार में सात चीज आश्चर्य की बताते हैं यदि आठवीं चीज इस कुएं को भी मान लिया जाए तो भी अत्युक्ति नहीं समझनी चाहिए। चार-चार हाथ लम्बाई में, दस-दस हाथ भीतर पोल की गहराई में ढोलों की नाल का रद्दा एक हाथ चौड़ा है। आकार में समझ लीजिए पोल बांस की भोगली (नाल) वा चाम से बिना मंढा हुआ पोला ढोल दोनों तरफ खुला हुआ मुंह का, इस तरह से पत्थर के 16 ढोल बनाकर पानी के पैंदे से लेकर ऊपर तक कच्चे कुएं के बीच बैठा दिए गए हैं। जैसे चूड़ी पर चूड़ी रखने से चूड़ा बन जाता है वैसे ही ऊपर-ऊपर 16 ढोलों को रखने से 64 हाथ लम्बी कुएं की नाल बन गई है।

    [Wiki]जाट इतिहास:ठाकुर देशराज[/Wiki],पृष्ठान्त-726

    इन ढोलों का रंग लाल है। इससे अनुमान किया जाता है कि ये पत्थर खाटू के पहाड़ के हैं। इस कुएं से खाटू बारह कोस है। अचम्भे की बात यह है कि यदि खाटू से पत्थर लाकर अकोदा में ढोल बनाए गए हों तो एक-एक पत्थर में एक-एक हजार मन भार होगा इतने भारी पत्थर कैसे लाए गए और यदि खाटू में ही पत्थरों को भीतर से खुदवाकर बने बनाए, ढोल मंगवाए हो तो भी एक-एक ढोल में चार सौ मन से कम बोझा न होगा। ये भी कैसे लाए गए और इतने भारी ढोल कुएं में ऊपर नीचे कैसे जचाए गए। एक मन आध मन के तो पत्थर थे ही नहीं जो हाथों में रख दिए जाते। इतने भारी ढोल बराबर की मोटाई में कैसे काटे गए? किस औजार से ये ढोल 64 हाथ गहरे कुएं में पहुंचाए गए? गांव के राजपूत ठाकुर, वेश्य, जाट आदि को हमने इस कुएं की जांच के लिए पूछ-ताछ की। राजपूत तो बोले कि इस कुएं को राजा सगर ने बनाया था। बहुत काल के बाद यह कुआं जमीन में गड़ गया था और बहुत काल तक जमीन में ही गड़ा रहा। संबत् 1000 के आरम्भ में हर्षराम चौधरी से देवी प्रसन्न होकर बोली कि हे ईश्वर भक्त, गो सेवक, धर्म-मूर्ति महादानी चौ. हर्षराम! मैं तुम से बहुत प्रसन्न होकर आज्ञा देती हूं कि तू यहां गांव बसा और इस जगह राजा सागर का बनाया हुआ कुआं है इसको खुदवाकर जमीन से निकलवा ले। चौधरी हर्षराम ने जमीन खुदवाकर कुएं को ठीक किया। इस प्रकार की अनेक दन्त-कथाएं हैं। चौ. गंगाराम ने बताया कि हमारे पुरखा हर्षराम ने स्वयं इस कुएं को बनाया था। न तो देवी ने बताया और न राजा सगर या देवताओं का बनाया हुआ है। फिर लोगों में विवाद हुआ कि हर्षराम मनुष्य होकर ऐसा कुआं कैसे बना सकते थे? चौ. गंगारामजी ने कहा कि हमारे यहां कोई सौ वर्ष पहले की लिखी हुई पोथी मौजूद है जिसमें लिखा है कि चौधरी हर्षराम ने इस कुएं को खुद बनवाया था और इसका पूरा-पूरा विवरण कुएं के भीतर के ढोल में शिलालेख है उसको देख लें। भाट की पुस्तक को सब पंचों ने सही मानकर महापुरुष हर्षराम के पुरुषार्थ को याद करके सभी लोग आश्चर्य में मग्न हो गए।

    एक हजार वर्ष पहले जाट जाति में कैसी विद्या और पुरुषार्थ था कि जाटों के बनाए हुए कुओं को लोग देवताओं के बनाए बतलाते हैं क्योंकि लोगों की बुद्धि में नहीं जंचता कि मनुष्य होकर ऐसे कुएं बना सकते । लोगों का विचार ठीक ही है क्योंकि उस समय की जाट जाति में इतनी विद्या थी तभी इस जाति का गौरव सूर्य आकाश में तपा था। यदि आजकल के बड़े भारी इंजीनियर भी इस कुएं को देखें तो उनको भी आश्चर्य हुए बिना न रहे। यदि भारतवर्ष के प्राचीन शिल्पविद्या की मूर्ति का नमूना देखना हो तो चौ. हर्षराम के बनाए हुए हजार वर्ष के पुराने कुएं के दर्शन कर जाइए। यह जाट जाति के ही गौरव की चीज नहीं है वरन् हिन्दू जाति की प्राचीन विद्या के नमूना दिखने के लिए चौ. हर्षराम का

    [Wiki]जाट इतिहास:ठाकुर देशराज[/Wiki],पृष्ठान्त-727

    कुआं आदर्श वस्तु है। जिस जाति में अपने महापुरखाओं के इतिहास जब तक बने रहेंगे, तब तक वह जाति अमर रहेगी और जो जाति अपने महापुरखाओं के इतिहासों की कदर करेगी वह दीन-हीन दशा भोगकर भी फिर उन्नति के शिखर पर चढ़ेगी, क्योंकि गिरी हुई जाति को उठाने वाला अपने पुरखाओं का इतिहास ही है। महादानी राजर्षि हर्षराम की संक्षिप्त जीवनी जाति को समर्पण करके मैं अपना अहोभाग्य मानता हूं।
    Laxman Burdak

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  3. #62
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    ठाकुर देश राज द्वारा प्रस्तुत जाट इतिहास से सम्बंधित प्रमाण: शिलालेख आदि (जारी ---)

    उगम जाट कीर्ति-स्तम्भ: भादवा गांव ([Wiki]Bhadwa Phulera[/Wiki])

    राज्य श्री जयपुर के सांभर प्रान्त में करड़ और काकरा नाम के ग्रामों में 800 वर्ष के पुराने जो जादू के मन्दिर कहलाते हैं वे जाट भूमिपति के बनाए हुए हैं। इन मन्दिरों से तीन कोस दक्षिण की ओर भादवा गांव है। यहां एक बहुत पुरानी बावड़ी और एक कुआं है। बड़ी-बड़ी पत्थरों की शिलाओं को घड़कर पूठियों को जोड़-जोड़कर कुएं की नाल बनाई गई है। इस कुएं की मजबूती, सुन्दरता और प्राचीन शिल्प प्रशंसनीय है। इस कुएं से उत्तर की ओर एक बड़ा भारी नील पत्थर कीर्ति-स्तम्भ खड़ा है। कीर्ति-स्तम्भ के दक्षिण भाग में घुड़सवार सामने खड़े हुए दुश्मन पर दाहिने हाथ से तलवार का वार करते हुए वीर उगम जाट बाएं हाथ से घोड़े की लगान खींचे हुए अपनी इतिहास प्रसिद्ध जाति की स्वाभाविक वीरता दिखला रहे हैं। एक शत्रु कटा हुआ घोड़े के पैरों में पड़ा है और दूसरे के सिर के ऊपर उगम वीर की तलवार का वार हो रहा है। कीर्ति-स्तम्भ के उत्तर भाग में ऊपर शंख, चक्र, गदा, पद्म धारे हुए मस्तक पर मुकुट से सुशोभित भगवान कृष्णचन्द खड़े हैं। उनके चरणों के नीचे ऐसा शिलालेख खुदा हुआ है -

    उगम जाट भादवा का सं. 1116 वि. आषाढ़ सुदी 9 मंगलवार।

    यह अनुमान अच्छी तरह से किया जा सकता है कि उगम जाट कोई साधारण मनुष्य नहीं था। क्योंकि कई हजार रुपयों की लागत का कुआं और बावड़ी जिसने बनवाकर राजाओं के तुल्य अपना नाम चिरस्मरण रखने के लिए ऐसा विशाल कीति-स्तम्भ खड़ा किया था वह अवश्य कोई बड़ा भारी रईस था। और जो इतिहास लेखक भूल से लिख गए हैं कि वर्तमान देवनागरी अक्षर चार-पांच सौ वर्षों से प्रचलित हुए हैं यह लोगों का झूठा विश्वास नराना गांव के सं. 1111 के जेबल्या जाट के कीर्ति-स्तम्भ से अकोदा के हर्षराम चौ. के सं. 1000 के लेख से, और भादवा के उगम जाट के सं. 1116 के कीर्ति-स्तम्भ की नागरी लिपि और हिन्दी भाषा से, खंडित हो जाना चाहिए और जानना चाहिए कि एक हजार वर्ष पहले राजपूताने में नागरी लिपि और हिन्दी भाषा प्रचलित थीं और राजपूताने में बड़े भारी बुद्धिमान बसते थे। और यह भी जाना जाता है कि विक्रम संवत् 1111, और सं. 1116 में राजपूताने के जाटों की कीर्ति, गौरव, स्वतंत्रता, वीरता - ये सब उनके पास मौजूद थीं।
    ([Wiki]जाट इतिहास:ठाकुर देशराज[/Wiki],पृष्ठ-729)
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  5. #63
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    Quote Originally Posted by lrburdak View Post
    ठाकुर देश राज द्वारा प्रस्तुत जाट इतिहास से सम्बंधित प्रमाण: शिलालेख आदि (जारी ---)

    उगम जाट कीर्ति-स्तम्भ: भादवा गांव (Bhadwa Phulera)

    राज्य श्री जयपुर के सांभर प्रान्त में करड़ और काकरा नाम के ग्रामों में 800 वर्ष के पुराने जो जादू के मन्दिर कहलाते हैं वे जाट भूमिपति के बनाए हुए हैं। इन मन्दिरों से तीन कोस दक्षिण की ओर भादवा गांव है। यहां एक बहुत पुरानी बावड़ी और एक कुआं है। बड़ी-बड़ी पत्थरों की शिलाओं को घड़कर पूठियों को जोड़-जोड़कर कुएं की नाल बनाई गई है। इस कुएं की मजबूती, सुन्दरता और प्राचीन शिल्प प्रशंसनीय है। इस कुएं से उत्तर की ओर एक बड़ा भारी नील पत्थर कीर्ति-स्तम्भ खड़ा है। कीर्ति-स्तम्भ के दक्षिण भाग में घुड़सवार सामने खड़े हुए दुश्मन पर दाहिने हाथ से तलवार का वार करते हुए वीर उगम जाट बाएं हाथ से घोड़े की लगान खींचे हुए अपनी इतिहास प्रसिद्ध जाति की स्वाभाविक वीरता दिखला रहे हैं। एक शत्रु कटा हुआ घोड़े के पैरों में पड़ा है और दूसरे के सिर के ऊपर उगम वीर की तलवार का वार हो रहा है। कीर्ति-स्तम्भ के उत्तर भाग में ऊपर शंख, चक्र, गदा, पद्म धारे हुए मस्तक पर मुकुट से सुशोभित भगवान कृष्णचन्द खड़े हैं। उनके चरणों के नीचे ऐसा शिलालेख खुदा हुआ है -

    उगम जाट भादवा का सं. 1116 वि. आषाढ़ सुदी 9 मंगलवार।

    यह अनुमान अच्छी तरह से किया जा सकता है कि उगम जाट कोई साधारण मनुष्य नहीं था। क्योंकि कई हजार रुपयों की लागत का कुआं और बावड़ी जिसने बनवाकर राजाओं के तुल्य अपना नाम चिरस्मरण रखने के लिए ऐसा विशाल कीति-स्तम्भ खड़ा किया था वह अवश्य कोई बड़ा भारी रईस था। और जो इतिहास लेखक भूल से लिख गए हैं कि वर्तमान देवनागरी अक्षर चार-पांच सौ वर्षों से प्रचलित हुए हैं यह लोगों का झूठा विश्वास नराना गांव के सं. 1111 के जेबल्या जाट के कीर्ति-स्तम्भ से अकोदा के हर्षराम चौ. के सं. 1000 के लेख से, और भादवा के उगम जाट के सं. 1116 के कीर्ति-स्तम्भ की नागरी लिपि और हिन्दी भाषा से, खंडित हो जाना चाहिए और जानना चाहिए कि एक हजार वर्ष पहले राजपूताने में नागरी लिपि और हिन्दी भाषा प्रचलित थीं और राजपूताने में बड़े भारी बुद्धिमान बसते थे। और यह भी जाना जाता है कि विक्रम संवत् 1111, और सं. 1116 में राजपूताने के जाटों की कीर्ति, गौरव, स्वतंत्रता, वीरता - ये सब उनके पास मौजूद थीं।
    (जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठ-729)
    Kitane steek shabdon mein ek itihaskaar apani baat pathkon tak pahuncha sakata hai, yah bangi yahan dekhne aur samjhane layak hai. God grant peace to the departed Jat historian-Thakur Deshraj ji.

  6. #64

    Lightbulb Jats in Ukraine

    The search of Russian surnames as studied by Blitz in year 2002 on its Ethnic, Religious, and National Index, revealed a number of common surnames between Jats of India and the native population. For example, there is surname - Burdakov (Burdakoff).[1]

    Mr. Ivan Burdak is a prominent diplomat in Ukraine.[2] There are surnames in Ukraine such as BurdakOV meaning son of Burdak, and BurdakOVA meaning daughter of Burdak.[2]



    I. Sara, a Canadian barrister and solicitor has pointed out that the recent excavations in the Ukraine and Crimea provide visible links of Jats and Scythians.[1]

    Cap. Dalip Singh Ahalawat has reported in an article published in Jat Samaj Patrika (Oct./Nov. 1991), that Jats had ruled in Scythia and Central Asia. He has given a list of about 70 Jat gotras who have ruled over there.[1]



    B. S. Nijjar suggests:


    "The Jats are the descendants of Scythians, whose kingdom's capital was Scythia, in the present Ukraine (Ukrainian), Soviet Social Republic, is the constituent Republic of the European USSR (Population 49,757,000) in 1947. Now Ukraine's capital is Kiev, the third leading city in Russia. Before the invasion of the golden herd, 13th century B.C. Scythian, ancient kingdom of indeterminate boundaries, centered in the area north of the Black Sea."[3]



    References:

    (1) www.jatland.com/home/Ukraine

    (2) http://www.jatland.com/forums/showth...ats-in-Ukraine

    (3) Nijjar, B. S. (2008). Origins And History Of Jats And Other Allied Nomadic Tribes Of India. Atlantic Publishers & Dist. ISBN 8126909080, 9788126909087.

    Last edited by Moar; July 10th, 2012 at 05:27 PM.

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  8. #65

    Lightbulb

    Quote Originally Posted by Moar View Post
    The search of Russian surnames as studied by Blitz in year 2002 on its Ethnic, Religious, and National Index, revealed a number of common surnames between Jats of India and the native population. For example, there is surname - Burdakov (Burdakoff).[1]

    Mr. Ivan Burdak is a prominent diplomat in Ukraine.[2] There are surnames in Ukraine such as BurdakOV meaning son of Burdak, and BurdakOVA meaning daughter of Burdak.[2]



    I. Sara, a Canadian barrister and solicitor has pointed out that the recent excavations in the Ukraine and Crimea provide visible links of Jats and Scythians.[1]

    Cap. Dalip Singh Ahalawat has reported in an article published in Jat Samaj Patrika (Oct./Nov. 1991), that Jats had ruled in Scythia and Central Asia. He has given a list of about 70 Jat gotras who have ruled over there.[1]



    B. S. Nijjar suggests:


    "The Jats are the descendants of Scythians, whose kingdom's capital was Scythia, in the present Ukraine (Ukrainian), Soviet Social Republic, is the constituent Republic of the European USSR (Population 49,757,000) in 1947. Now Ukraine's capital is Kiev, the third leading city in Russia. Before the invasion of the golden herd, 13th century B.C. Scythian, ancient kingdom of indeterminate boundaries, centered in the area north of the Black Sea."[3]



    Reference:

    (1) www.jatland.com/home/Ukraine

    (2) http://www.jatland.com/forums/showth...ats-in-Ukraine

    (3) Nijjar, B. S. (2008). Origins And History Of Jats And Other Allied Nomadic Tribes Of India. Atlantic Publishers & Dist. ISBN 8126909080, 9788126909087.


    The Scythians who brought an end to the Greek rule first in Bactria and then in India, were originally Scythians of present Ukraine in Russia. Persians named them Sakas, who onwards began to be called Sakas, in India.
    [1]

    Herodotus expressly states that the term 'Sakas' was used by the Persians to denote Scythians generally; and this statement is certainly in accordance with the use of the word in the inscriptions of Darius, the king of Iran. In one of these, it occurs together with descriptions which show that it denotes certain Scythians in Europe as well as two branches of Scythians in Asia. These, we have reason to believe, are specimens merely of the innumerable swarms of nomads which had been finding their way during untold centuries from that great hive of humanity, China, to Western Asia and to Europe.
    [1]



    Reference:

    (1) Nijjar, B. S. (2008). Origins And History Of Jats And Other Allied Nomadic Tribes Of India. Atlantic Publishers & Dist. ISBN 8126909080, 9788126909087.
    Last edited by Moar; July 10th, 2012 at 06:39 PM.

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  10. #66

    Lightbulb Ethnologue report for language code: Jat


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  12. #67
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    In a laudable attempt to add to existing Gandhian Literature, G O I, Southeby's and the Sarid family have signed an agreement. According to this agreement GOI has bought for $1.28 million the entire lot of letters papers, photographs and other material related to Mahatma Gandhi. The collection belonged to German Jewish architect and body builder Hermann Kallenbach, a close friend of Gandhiji and the collection was slated to have been auctioned by Southeby's in London on 10th July.

    Could the example followed by the Jats to collect material connected with stalwarts of the community!

  13. #68

    Red face Delhi's oldest jat village

    My village Mundka situated in west Delhi has very historical story behind his name,
    In my childhood my grandfather told me how our village is named , he told that our village exists before the period of Mahabharta which is around 3500 to 5000 yrs ago story, he said before the well known fight between pandavas and kauravas , krishna cut the sisupal's head , villgers ceremonial that "mund" and village named "mundka" after that day and "shamshan" made their by villagers , which is still used .
    Villagers made a talab named "sishwala johad" on that place where mund falls and also established the "shivaling" near by place , all these historical places are still exits but not on good conditions .
    When i was teenager boy my grandfather also told me that our ancestors fought with "gore" jaati people who lived on that place before our ancestors came from ajmer and our gotra is Lakra-Chouhan , initially it is only chouhan but they came in lakdi ki gadi that's why people called us lakra,
    Is any jat bhandu can put some light on this story?
    Last edited by puneetlakra; July 11th, 2012 at 08:13 PM.

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  15. #69
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    Quote Originally Posted by puneetlakra View Post
    My village Mundka situated in west Delhi has very historical story behind his name,
    In my childhood my grandfather told me how our village is named , he told that our village exists before the period of Mahabharta which is around 3500 to 5000 yrs ago story, he said before the well known fight between pandavas and kauravas , krishna cut the sisupal's head , villgers ceremonial that "mund" and village named "mundka" after that day and "shamshan" made their by villagers , which is still used .
    Villagers made a talab named "sishwala johad" on that place where mund falls and also established the "shivaling" near by place , all these historical places are still exits but not on good conditions .
    When i was teenager boy my grandfather also told me that our ancestors fought with "gore" jaati people who lived on that place before our ancestors came from ajmer and our gotra is Lakra-Chouhan , initially it is only chouhan but they came in lakdi ki gadi that's why people called us lakra,
    Is any jat bhandu can put some light on this story?
    Shishupal, Krishana, and Mahabharata ok but Ajmer-Chohan and Lakra Chohan no reconciliation with the former. These may be clues juxtaposed and intermixed inextricably by the bards during late medieval periods when Rajputs came into existence and Jat power was lost to them in Rajasthan then known as Rajputana. The bards or bhats tried to link the Jats to one or the other ruling Rajput gotra and thus twisted the historical facts beyond recognition. This has created a problem with several ancient Jat gotras too! You being the original resident of your village, kindly try to further explore the folklore and history from the local people and put them here for further discussion please.

    Thanks

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  17. #70

    Jats & Jutes

    Chowdry Akbar Khan, in the book ' Echo of the Himalayas: a nationalist interpretation of India's history ', wrote:


    "The Jats of India belong to the same stock of Scythians whose section also the Jutes were."

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  19. #71

    Jats & Goths

    James Francis Hewitt also advocated the connection between Jats and Goths:




    "The Jats ... trace their descent to the land of Ghazni and Kandahar, watered by the mother-river of the Kushika race, the sacred Haetuman.t or Helmand. Their name connects them with the Getae of Thrace, and thence with the Gattons, said by Pytheas to live on the southern shores of the Baltic, the Gaettones placed by Ptolemy and Tacitus on the Vistula in the country of the Lithuanians, and the Goths of Gothland = Sweden. This Scandinavian descent is confirmed by their system of land-tenure, for the chief tenure of the Muttra district is that called Bhagadura, in which the members of the village brotherhood each hold as their family property a separate and defined area among the village lands, according to the customs of the Bratovos of the Balkan peninsula and the Hof-bauers of North-West {p.482} Germany .. The Getae of the Balkans are said by Herodotus to be the bravest and most just of the Thracians." (Hewitt 1894, p.481-482)




    Reference : Hewitt 1894: "The Ruling Races of Prehistoric Times in India, South-Western Asia and Southern Europe" by J.F.Hewitt, Archibald Constable & Co. , London 1894; reprint Oriental Publishers, 1488 Pataudi House, Daryaganj, Delhi-6, 1972, Rs. 50.
    Last edited by Moar; August 2nd, 2012 at 11:26 AM.

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  21. #72

    Great Jats / Ta-Yue-Che / Massagetae / Little Jats / Siao-Yue-Che / Thyssagetae

    Excerpts from http://www.iranian.com/History/2005/March/Gutians/ :




    "The Chinese were right in stating that the Hiung-nu were a part of the Yue-Che (reads as Guti ) people, and these Guti people had two divisions, the Ta-Yue-Che and the Siao-Yue-Che, exactly corresponding to the Massagetae and Thyssagetae of Herodotus (a classical Greek writer of fifth century BC), meaning the "Great-Jats" and the "Little-Jats" respectively. Almost every tribe of ancient Middle East (West Asia) and Central Asia, is represented among the present day Jats in India." (Dahiya 1980, p.23ff, cited in Dhillon 1994, p.10)




    References :


    (1) Bhim Singh Dahiya (1980): "Jats: The Ancient Rulers," by B. S. Dahiya (Indian Revenue Service), Sterling Publishers Pvt. Ltd, New Delhi, India, 1980.


    (2) Dhillon, Balbir Singh (1994). History and study of the Jats: with reference to Sikhs, Scythians, Alans, Sarmatians, Goths, and Jutes (illustrated ed.). Canada: Beta Publishers. ISBN 1895603021.
    Last edited by Moar; August 2nd, 2012 at 11:22 AM.

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  23. #73

    Map of Gutium (courtesy ~ Gary Fletcher)

    Map of Gutium (courtesy ~ Gary Fletcher) --




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  25. #74
    Quote Originally Posted by DrRajpalSingh View Post
    Shishupal, Krishana, and Mahabharata ok but Ajmer-Chohan and Lakra Chohan no reconciliation with the former. These may be clues juxtaposed and intermixed inextricably by the bards during late medieval periods when Rajputs came into existence and Jat power was lost to them in Rajasthan then known as Rajputana. The bards or bhats tried to link the Jats to one or the other ruling Rajput gotra and thus twisted the historical facts beyond recognition. This has created a problem with several ancient Jat gotras too! You being the original resident of your village, kindly try to further explore the folklore and history from the local people and put them here for further discussion please.

    Thanks

    If you work on time line ,then it is very easy to reconstruct the history. The Rajputs are late entrant.But historians must work without prejudice.

    |
    :rockwhen you found a key to success,some ideot change the lock,*******BREAK THE DOOR.
    हक़ मांगने से नहीं मिलता , छिना जाता हे |
    अहिंसा कमजोरों का हथियार हे |
    पगड़ी संभाल जट्टा |
    मौत नु आंगालियाँ पे नचांदे , ते आपां जाट कुहांदे |

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  27. #75
    * Weer Rajendra Rishi wrote: "Some of the Indian writers including Rahul Sankrityayan and Ujagar Singh Mahil in his book "Antiquity of Jat Race" say that Jats inhabiting the northern India are the descendants of Massagetae, or Malta (great) Getae or Jat."




    Reference:


    * Rishi, Weer Rajendra (1982). India & Russia: linguistic & cultural affinity. Roma Publications. p. 95.

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  29. #76
    Steven M. Collins also advocates that the Massagetaeans are none other than the "Great Jits or Jats" of Asia.




    Reference:


    * http://www.israelite.info/bookexcerp...ibestoday.html

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  31. #77

    Post >> George Rawlinson on Jat History <<

    Last edited by Moar; August 23rd, 2012 at 01:11 PM.

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    DrRajpalSingh (September 4th, 2012)

  33. #78

    Dionysus and Shiva

    Wendy Doniger O' Flaherty wrote:


    "That Śiva and Dionysus bear a striking resemblance to one another has been known for a long time. The ancient Greeks noticed it, referring to Śiva as Indian Dionysus, on the one hand, and to Dionysus as the god from the orient.... In recent times, scholars have pointed out numerous significant points of correspondence...."


    Source: http://www.jstor.org/discover/10.230...21101161734831
    Last edited by Moar; September 3rd, 2012 at 04:42 PM.

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  35. #79
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    Prachin Bharat ko Jat ki Dain
    प्राचीन भारत को जाट की देन
    यह शीर्षक है श्री कृष्ण चन्द्र दहिया द्वारा लिखित पुस्तक का जो वर्ष 2012 में प्रकाशित हुई है.
    पुस्तक का विवरण
    पुस्तक का विवरण निम्नानुसार है:
    नाम - प्राचीन भारत को जाट/जर्ट की देन
    लेखक - कृष्ण चन्द्र दहिया,
    संपर्क - फोन : 09310560410, 09968506574,
    Email:krishna.chander2010@gmail.com
    पृष्ठ संख्या - 544
    प्रकाशक - कृष्ण चन्द्र दहिया, द्वारा ओमप्रकाश दादा देव रोड , पालम दिल्ली-45
    मुद्रक - ख्वाजा प्रेस, 900 , जामा मस्जिद , दिल्ली-110006
    मूल्य - रू. 544/-
    ISBN 978-93-5067-887-9

    Review of the book is available on Jatland at - [Wiki]Prachin Bharat ko Jat ki Dain[/Wiki]
    Laxman Burdak

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  37. #80
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    Jathera
    History and study of the Jats. By Professor B.S Dhillon (p.113) explains about Jathera. Jats tend to continue to follow their ancient custom of worshipping their common ancestors. In the Punjabi language, it is called the "Jathera" worship. Usually, it is mandatory in rural areas for newly wed Jats to visit and worship the village "Jathera" shrine, erected in the fields, usually a day after their wedding day, with fanfare.

    Can somebody write a para on Jathera so as to add to Jatland Wiki.

    Why is Jathera tradition not found in Rajasthan Jats ?
    Laxman Burdak

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