Page 1 of 3 1 2 3 LastLast
Results 1 to 20 of 46

Thread: इससे पहले कि जेंडर सेंसिटिविटी और इक्वलिट

  1. #1

    इससे पहले कि जेंडर सेंसिटिविटी और इक्वलिट

    इससे पहले कि जेंडर सेंसिटिविटी और इक्वलिटी का कुछ और अर्थ बन जाए, सावधान:

    कहीं इन दो टैग्स की आड़ में फंडी-मीडिया-एन.जी.ओ. आपके घर में मंडी के जरिये पाड़ तो नहीं लगाए हुए हैं?

    ज्यादा नहीं आज से डेड-दो दशक पहले तक भी हरयाणा (वर्तमान हरयाणा, वेस्ट यूपी, दिल्ली) के हर एक गाँव में कुनबे-ठोळे के बुजुर्ग लोग पाखंड-ढोंग-आडंबर से अपने घरों के संस्कार और धन दोनों सुरक्षित रखने हेतु अपने घर की औरतों की पाक्षिक अथवा मासिक काउंसलिंग किया करते थे| इन काउंसलिंग में चर्चा के साथ निर्देश भी होते थे कि धर्म के नाम पर आडंबर फैलाने वालों से कैसे और क्यों के बचे रहना है| सतसंग-कीर्तन में नहीं जाना है क्योंकि यह पाखंडी वर्ग द्वारा घर के पिछले दरवाजे से फंडी और व्यापारी दोनों का धन कमाने के जरिये से फ़ालतू कोई प्रसाधन नहीं|
    आजकल मर्द, गाँव की बैठक-चौपालों में या शहर के चाक-चौराहों-धर्मशालाओं में बैठते तो हैं परन्तु इन बातों पर विरले ही चर्चा करके, अपनी औरतों से इन मुद्दों पर एक स्थाई कम्युनिकेशन बनाये रखे हुए हैं| जबकि मंडी-फंडी समुदाय अपनी औरतों को इस बात पर पूरी तरह ट्रैंड करता है कि कैसे किसान-ओबीसी-दलित की औरतों को शीशे में उतारना है और उनके यहां यह पाखंड (डर-ईर्ष्या-द्वेष-लालच) नाम की तमाम उम्र दूध देने वाली दुधारू गाय बाँध के आनी है| इन समुदायों (किसान-ओबीसी-दलित) की शहरी हो या ग्रामीण, दोनों वर्गों की औरतों की सोच में पाखंड के झांसे में आने के मामले में रत्तीभर भी फर्क नहीं; बल्कि शहरी तो ग्रामीण से ज्यादा झांसे में आई बैठी हैं| क्योंकि गाँव के मर्द तो आज भी अपनी औरत को टोकते हुए इतने नहीं कतराते, परन्तु ऐसा लगता है कि शहरियों ने तो यह चेक्स करने ही छोड़ रखे हैं|
    और इसका सारा श्रेय जाता है समाज के प्रति खुद का ठोर-ठिकाना ना रखने वाले फंडी-मीडिया-एन.जी.ओ. को| इन तीनों की तरफ से इस शील्ड को तोड़ने की एक बड़ी सिलसिलेवार तीन तरफ़ा शुरुवात हुई|
    हमारे यहाँ जो कोई भी गाँव की बहु-बेटी को छेड़ता-बदतमीजी करता उसको पब्लिक हियरिंग के जरिये सार्वजनिक दंड दिया जाता था, जिनको सबसे पहले इन एनजीओ वालों ने मानवाधिकार का मुद्दा बनाते हुए, बैन करवाने का सिलसिला शुरू किया| फिर एनजीओ वाले खुद तो देखते ही क्यों, कि जिस महिला-औरत से छेड़खानी हुई है उसके भी कुछ मानवाधिकार होते हैं| और ना ही यह पहलु ग्रामीण उठा पाये, जबकि इसको उठाने से इन एनजीओ वालों को बड़े अच्छे से टैकल किया जा सकता था| इससे हुआ यह कि गाँव में बुजुर्गों का आत्मबल और विश्वास मंद पड़ा और उन्होंने इन कार्यों में रुचि लेनी बंद कर दी और साथ ही औरतों की क्रमिक काउंसलिंग भी बंद होती चली गई|
    फिर रोल आया फंडी का, हर गाँव में दो-चार ऐसी औरतें होती हैं जो 'घर बिगाड़ू और घुमन्तु' श्रेणी में आती है या यूँ कह लो कि जिनके यहां सिर्फ उनकी चलती है| अब सतसंग-पाखंड-कीर्तन-जगराते वालों ने इन औरतों से सम्पर्क साध इनको उकसाना शुरू किया और ऐसे हमारे गाँवों में इनकी एंट्री होनी शुरू हुई| शहर में तो खैर गाँव से मॉडर्न दिखने और इसी को शहरीपन मानने की अंधी लत में जो भी ग्रामीण हरयाणवी औरत शहर निकलती गई वो इनमें धंसती चली गई| और यह इसकी भी एक बड़ी वजह है कि क्यों आज शहरी हरयाणवी खुद को हरयाणवी कहने में भी शर्मिंदा महसूस करते हुए पाये जाते हैं|
    तीसरा किरदार आया मीडिया का, इसने इस जेंडर सेंसिटिविटी और इक्वलिटी के मुद्दे पे ऐसे ललित निबंध टाइप के कार्यक्रम किये, कि मर्द भी बावले हो गए|
    और यहां सफल हुआ इन तीनों यानी फंडी-मीडिया-एनजीओ का षड्यंत्र, और इसको फाइनेंस कौन देता था या आज भी देता है, वो दो हैं एक आपका घर और दूसरा मंडी|
    सफलता यह हुई कि आपको थोथी जेंडर सेंसिटिविटी और इक्वलिटी के नाम पर बौरा दिया गया और आपने अपनी औरतों को टोकना बंद कर दिया| यानि इन तीनों की वह साजिस कामयाब हुई जिसके तहत इनको आपकी औरतों को आपके नियंत्रण कह लो या डायलॉग से छींटकना था| ताकि इनकी बातें घर की औरतें आपको ना बताएं और आप इनको टोकें ना| यानि आपके मुंह पे टैबू लगा दिया गया "जेंडर सेंसिटिविटी और इक्वलिटी" का|
    दूसरा औरतों ने पुरुषप्रधान समाज में अपना औचित्य और अस्तित्व सिद्ध करने हेतु अपने घरों में इतने अंधाधुंध मोडे-आडंबर-पाखंड-कीर्तन-जगराते-भंडारे घुसा लिए कि आज हर दूसरे घर में खड़ताल बजती हैं| और इसमें जिस चीज ने और अच्छे से हेल्प करी वो है औरतों का कोमल और भावुक हृदय, जिसको डराना, परिवार के हित या पड़ोसन से जलन के चलते वश में करना इन पाखंडियों के दायें हाथ का खेल है|
    देखा है ना कमाल, अगर इनको जेंडर सेंसिटिविटी और इक्वलिटी से कुछ लेना-देना होता तो उस औरत के भी मानवाधिकार इनको दीखते, जिसको छेड़ने वालों को आप सार्वजनिक सजा दिया करते थे?
    अब चिंतनीय बात है कि इन चारों मंडी-फंडी-मीडिया-एनजीओ को जेंडर सेंसिटिविटी और इक्वलिटी से कुछ लेना-देना होता तो ना ही तो आज कोख में बेटियां मर रही होती, ना हॉनर किलिंग हो रही होती, ना दहेज़ उत्पीड़न हो रहे होते| और अगर हरयाणा से बाहर की धरती पर निकल के चलो तो इन मुद्दों के साथ-साथ वहां ना विधवाएं पतियों की प्रॉपर्टी से बेदखल कर आश्रमों में बिठाई जा रही होती, ना देवदासियां मंदिरों में बिठाई जा रही होती, ना बहु-पति प्रथा होती, ना सतीप्रथा होती, ना पहली दफा व्रजस्ला होने पर लड़की का मंदिरों में सामूहिक भोग लग रहा होता| दुकानों-मकानों-फैक्ट्रियों-शॉपिंग माल्स-मंदिरों-ट्रस्टों आदि में आधा हिस्सा औरतों को देते|
    इसलिए कृपया जेंडर सेंसिटिविटी और इक्वलिटी के इस वाले झांसे में मत फंसिए जो सिर्फ इसको कहने वालों की जेबें भरे और आपके घरों में किसी जहाज की तली में फूटे हुए छेद की भांति आपके घर को आर्थिक और आध्यात्मिक तौर पर इतना खोखला कर दे कि वो गोते खाने लग जाए या फिर एक दिन डूब ही जाए|
    आगे बढ़िए और अपनी औरतों को समझाईये और रोकिये कि तुझे जेंडर इक्वलिटी और सेंसिटिविटी के नाम पर फ्रीडम चाहिए तो जा नौकरी कर ले, अपना कारोबार कर ले, जितना चाहे उतना पढ़ ले, या आगे बढ़ के समाज की सड़क-गली को इतनी सुरक्षित करने हेतु संगठन बना ले कि कोई भी लड़की दिन ढलते ही घर से निकलते हुए घबराये ना|
    यह होगी असली वाली जेंडर सेंसिटिविटी और इक्वलिटी| इसलिए आज के समाज के मर्द अपने घरों के यह तामसिक बैक-डोर एंट्री बंद करवाएं और फ्रंट-डोर खोल के अपनी औरतों को सात्विक जेंडर सेंसिटिविटी और इक्वलिटी पर आगे बढ़ने में को प्रेरित करें|
    वर्ना इतना समझ लेना अगर आप यूँ ही इस झूठी जेंडर सेंसिटिविटी और इक्वलिटी के नाम पर अपने घरों में औरतों को हर उल-जुलूल पाखंड को घुसाने की मौन भरी चुप्पी दिए रखे तो इन चारों (मंडी-फंडी-मीडिया-एनजीओ) ने तो आपके घर की ना सिर्फ आर्थिक हैसियत वरन आध्यात्मिक और बौद्धिक हैसियत भी उस कंगाली और दिवालियेपन के स्तर तक ले जाने की ठानी हुई है, जहां आप सिर्फ इनके इशारों मात्र पे एक दुम हिलाने वाले पालतू से ज्यादा कुछ नहीं रह जाओगे|
    जय यौद्धेय! - फूल मलिक
    One who doesn't know own roots and culture, their social identity is like a letter without address and they are culturally slave to philosophies of others.

    Reunion of Haryana state of pre-1857 is the best way possible to get Jats united.

    Phool Kumar Malik - Gathwala Khap - Nidana Heights

  2. The Following 4 Users Say Thank You to phoolkumar For This Useful Post:

    AryanPoonia (December 31st, 2015), op1955 (December 27th, 2015), sukhbirhooda (December 28th, 2015), vijaypooniya (December 27th, 2015)

  3. #2
    कैसे औरत को दोयम दर्जा, उसकी भावुकता और कोमलता बन जाती हैं समाज में पाखंड और आडंबरों के फैलने की सबसे बड़ी वजह:

    भारतीय समाज और हिन्दू धर्म में औरत को दोयम दर्जा और औरत का कोमल और भावनाओं में बह जाने वाला स्वभाव, यह ऐसे कारक है जिसके कारण हम आज धर्म के नाम पर सिर्फ 10% धर्म और 90% पाखंड ढो रहे हैं| दोयम दर्जा हमेशा औरत को ऐसा करने के लिए उकसाता रहता है जिससे वो खुद को पुरुष के आगे साबित कर सके| घर में अपना अस्तित्व सिद्ध और कायम करने हेतु अपनी कोमलता और भावनात्मकता के चलते पाखंडियों और ढोंगियों की लालची और डरावनी चालों में फंस के जो धन पुरुष या वो खुद भी घर में घर के अगले दरवाजे से लाते है, उसी नेक-कमाई को घर के पिछले दरवाजे से इन मुस्टंडों के पेटों में उतारती रहती हैं|

    और इसमें क्या अशिक्षित औरत और क्या पढ़ी लिखी; पढ़ी लिखी भी सिर्फ कोई घरेलू वाली नहीं अपितु ऐसी तक भी जो मल्टीनेशनल्स (multinationals) में कार्यरत हैं, उनको मैंने ढोल-ताबीज-टूना-टोटका वालों के चक्करों में भटकते देखा तो माथा ठनक गया|
    और नतीजा यह हुआ कि मेरी ग्रेजुएशन के वक्त की एक सखी से उस वक्त की दोस्ती टूट गई, जब उसने मुझे एक दिन कहा कि फूल प्लीज मुझे इतने पैसे दे दे, मुझे मेरे पति और घर पर पड़े बुरी आत्माओं के सायों को काबू करने के लिए फलाने बाबा को 60000 रूपये देने हैं| मैंने कहा तू खुद महीने के एक लाख कमा रही है तो भी मेरे से मांग रही है? बोलती है कि तू समझता नहीं है, मेरा और मेरे पति का जॉइंट अकाउंट है, उससे निकाला तो वो और मेरी सास मुझे घर से निकाल देंगे|
    मैं हैरत में था कि यह कैसी घर की ओवेरकरिंग कि जिसके लिए पैसे भी घर और पति से चोरी छुपे देने पड़ते हैं और फिर अंत में घर से निकाले जाने का डर वो अलग से?
    एक बार तो मैं तैयार हो गया, क्योंकि पुरानी दोस्ती थी| पर फिर मैं संभला और उसको भी समझाने की कोशिश करी और उसको बोला कि इन चक्करों में मत पड़| तो बोली कि यार अब बीच में नहीं छोड़ सकती, बाबा ने तीन महीने से इलाज शुरू कर रखा है और अब पूरा करना ही होगा| मैंने कहा अब से पहले कितने दे चुकी है? बोलती है एक 60000 की इन्सटॉलमेंट (installment) पहले से दे चुकी हूँ| और मैं हतप्रभ रह गया|
    एक पल को सोचा कि हम एमबीए, इंजीनियरिंग, डॉक्टर्स की डिग्री ले-ले के वैसे ही चौड़े हुए फिरते हैं| यह देखो बाबा का बिज़नेस एक क्लाइंट (client) से 120000 वो भी मात्र तीन महीनों में| बाबा के एक टाइम में ऐसे तीन क्लाइंट भी रहते होंगे तो बाबा तो बैठे-बिठाए महीने में एक MNC के मैनेजर से ज्यादा फोड़ लेता है| दोस्त मान नहीं रही थी तो मैंने थोड़ी देर सोचने के बाद कहा कि एक काम कर बाबा से 'सर्विस गारंटी पेपर' ले आ, तब तक मैं तेरे लिए पैसा अरेंज करता हूँ| बोली कि, "फूल तू समझेगा नहीं, छोड़"|
    मैंने कहा ठीक है तो जा किसी ऐसे के पास इलाज करवा जो "सर्विस गारंटी" का पेपर देता हो| तो बोली कि ऐसा तो कोई नहीं| तो मैंने कहा कि फिर जा पहले गवर्नमेंट को बोल कि इन बाबाओं में से सिर्फ उसी को यह कार्य करने दिया जाए, जो "सर्विस गारंटी" का पेपर साथ देवें| यह सुन दोस्त बोली तू भाड़ में जा, एक हेल्प मांगी थी, उसके लिए इतनी चिक-चिक|
    मैंने आगे कहा अभी तक कुछ फर्क पड़ा तेरे घर की स्थिति में? तो बोली कि नहीं| मैंने आखिरी बार यही कहा कि पड़ेगा भी नहीं| और फिर कहा कि बावली, क्यों जिंदगी खो रही है इस मोड्डे के चक्कर में? परन्तु उसको तो उस पाखंड की खाई से नहीं निकाल पाया, हाँ इस चक्कर में मेरी और उसकी दोस्ती और खट्टी पड़ गई| उस दिन से गाँठ बांध ली कि किसी भी दोस्त के घर में यह अघोरी-पाखंडी चाहे दिन-दहाड़े धुआं-धाणी करते रहो, मैं नहीं इस तरफ ध्यान देने वाला|
    लेकिन बाद में विचार करता रहा कि सॉफ्टवेयर एग्जीक्यूटिव स्तर (software executive level) पर पहुँच कर भी अगर हमारे समाज की महिला इतनी जकड़ी और रुकी हुई सोच की रह जाती है तो इसके कारण क्या हैं? मर्म और धरातलीय सच्चाई पे जा के सोचा तो यही पाया जो ऊपर पहले पहरे में कहा|
    एक विचार और आया कि भारत की राजनीति के गन्दा होने का दोष हम तथाकथित संभ्रांत पढ़े-लिखे वर्ग वाले बेकार ही भारत के गरीब-गुरबे तबके को बड़ी बेगैरत से यह कहते हुए दे देते हैं कि "जहां एक बोतल और चंद सिक्कों के लिए वोट बिकते हों, वहाँ तुम और कैसी राजनीति की अपेक्षा करोगे?" परन्तु नहीं जनाब उनके पास तो बिकने की वजह मजबूरी या अज्ञान है परन्तु आप और हम तो उससे भी घातक बीमारी डर और किसी को काबू में करने की लालसा से ग्रस्त हैं| और मेरी दोस्त जैसा महिलावर्ग तो घर में अपना अस्तित्व ही साबित करने के लिए इन बिमारियों से ग्रसित है, जो कि लगभग हर दूसरे भारतीय घर की सच्चाई है|
    मुझे वो जमाना याद आता है जब मेरे गाँव में घर पे बड़े बुजुर्ग अपने कुनबों की औरतों के साथ पाक्षिक या मासिक सर पर सामूहिक काउंसलिंग (group counselling) किया करते थे और हर औरत को आगाह किया करते थे कि किसी भी ढोंगी-पाखंडी को घर की दहलीज पे कदम मत रखने देना| चलो वो पुरुषप्रधान थे, परन्तु अपनी पुरुषप्रधानी ढंके की चोट पर निभाते तो थे, यह आजकल वाले तो घर में आँखों के सामने भी इनकी औरतें इन प्रपंचों में पड़ती हैं तो टोक तक नहीं पाते| शायद इन लोगों ने जेंडर सेंसिटिविटी (gender sensitivity) और जेंडर इक्वलिटी (gender equality) का कुछ और ही अर्थ निकाल लिया है|
    उद्धघोषणा: प्राकृतिक सी बात है, दोस्त की अपनी प्राइवेसी हेतु दोस्त का नाम तो बताऊंगा नहीं, परन्तु यह वाकया मेरी सॉफ्टवेयर एग्जीक्यूटिव दोस्त की जिंदगी का वास्तविक वाकया है|
    One who doesn't know own roots and culture, their social identity is like a letter without address and they are culturally slave to philosophies of others.

    Reunion of Haryana state of pre-1857 is the best way possible to get Jats united.

    Phool Kumar Malik - Gathwala Khap - Nidana Heights

  4. The Following 4 Users Say Thank You to phoolkumar For This Useful Post:

    hrdhaka (December 27th, 2015), op1955 (December 27th, 2015), sukhbirhooda (December 28th, 2015), vijaypooniya (December 27th, 2015)

  5. #3
    फूल जी,

    आपकी पोस्ट इतनी बड़ी होती है क़ि आखिर तक पहुँचते-पहुँचते यह भी याद रखना मुश्किल हो जाता है कि यह शुरू किस चीज़ के लिए हुई थी।


    कईँ बार तो ऐसा लगता है कि जाना था जापान पहुँच गए चीन।


    खैर मुझे जो इतनी लंबी पोस्ट पढ़कर समझ आया कि आप कहना चाहते कि आजकल की महिलाये अंधविश्वास वाली चीज़ों में कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी ले रही है। वहीँ मर्द उन्हें रोकने के बजाय हाथ पर हाथ धरे बैठे है। इस डर से कि कही उनपे महिला विरोधी होने का ठप्पा न लग जाये।

    यह शहरो में ज्यादा हो रहा है जहाँ महिलाओ के एक समान अधिकारो को लेकर ज्यादा हाय-तौबा मचती है। इस चक्कर में बेचारे शहरी मर्द महिलाओ के सामने अपनी जुबान खोलने में कतराने लगे है। भले ही वो गलत कर रही हो।

    वैसे क्या आपको लगता है। इन सबका महिलाओं के अधिकारो से कुछ लेना देना है। अंधविश्वासी तो कोई भी हो सकता है। फिर वो चाहे महिला हो या पुरुष, ग्रामीण हो या शहरी। यह तो उस व्यक्ति के व्यक्तित्व पर निर्भर करता है कि वह क्यों उन सब चीज़ों में यकीन कर रहा है जिन्हें हम अंधविश्वास या पाखंड बोलते है।

    मुझे नहीं लगता आज कल की जागरूक महिलाओ को अभी भी पुरुषो की सलाह की जरूरत है। यह वहां ही जरूरी है जहाँ महिलाये आत्मनिर्भर नहीं है या पर्याप्त शिक्षित नहीं है।
    I have a fine sense of the ridiculous, but no sense of humor.

  6. The Following 4 Users Say Thank You to ayushkadyan For This Useful Post:

    amitbudhwar (December 27th, 2015), hrdhaka (December 27th, 2015), ndalal (December 26th, 2015), vijaypooniya (December 27th, 2015)

  7. #4
    इस धागे को पढ़कर जेंडर सेंसिटिविटी और इक्वलिटी का अर्थ भूल गयी हूँ....
    मौत और मौह्बत्त तो बस नाम से बदनाम है।।
    वरना तकलीफ तो ये पढाई भी कम नही देतीं।।।

  8. The Following 3 Users Say Thank You to ndalal For This Useful Post:

    ayushkadyan (December 26th, 2015), hrdhaka (December 27th, 2015), vijaypooniya (December 27th, 2015)

  9. #5
    Meri post ki problem yah hoti hai ki main usko scope ki limitation mein baandh ke nahin rakhta, kyonki usko every possible factual dimension dene ki koshish karta hun, taaki psychologically cheej detail se explain ho.

    Maine us cheej pe chot ki hai jo aapko "gender equality aur sensitivity" ke name pe chal rahe gorakh dhandhe ko ujagar karti hai, uske parde ke peechhe ke game of describe karti hai. Fir us parde ke peechhe ke game se panpi psychology se hote hue end result tak le ke aati hai. yah to hai is thread ki post number 1.

    Second post mein yah bataya hai ki education doesn't change ur attitude until ur society remains gender biased.

    I don't think ki koi badi vidha chahiye in posts ko samjhne ke liye except and until u don't read it with psychological reasoning and approach.

    Quote Originally Posted by ayushkadyan View Post
    फूल जी,

    आपकी पोस्ट इतनी बड़ी होती है क़ि आखिर तक पहुँचते-पहुँचते यह भी याद रखना मुश्किल हो जाता है कि यह शुरू किस चीज़ के लिए हुई थी।


    कईँ बार तो ऐसा लगता है कि जाना था जापान पहुँच गए चीन।


    खैर मुझे जो इतनी लंबी पोस्ट पढ़कर समझ आया कि आप कहना चाहते कि आजकल की महिलाये अंधविश्वास वाली चीज़ों में कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी ले रही है। वहीँ मर्द उन्हें रोकने के बजाय हाथ पर हाथ धरे बैठे है। इस डर से कि कही उनपे महिला विरोधी होने का ठप्पा न लग जाये।
    One who doesn't know own roots and culture, their social identity is like a letter without address and they are culturally slave to philosophies of others.

    Reunion of Haryana state of pre-1857 is the best way possible to get Jats united.

    Phool Kumar Malik - Gathwala Khap - Nidana Heights

  10. The Following User Says Thank You to phoolkumar For This Useful Post:

    AryanPoonia (December 31st, 2015)

  11. #6
    aapke anusar kya arth hota hai "जेंडर सेंसिटिविटी और इक्वलिटी" ka Neelam Ji; main isko fir usi mein fit karke bata deta hu!
    Quote Originally Posted by ndalal View Post
    इस धागे को पढ़कर जेंडर सेंसिटिविटी और इक्वलिटी का अर्थ भूल गयी हूँ....
    One who doesn't know own roots and culture, their social identity is like a letter without address and they are culturally slave to philosophies of others.

    Reunion of Haryana state of pre-1857 is the best way possible to get Jats united.

    Phool Kumar Malik - Gathwala Khap - Nidana Heights

  12. #7
    Quote Originally Posted by phoolkumar View Post
    aapke anusar kya arth hota hai "जेंडर सेंसिटिविटी और इक्वलिटी" ka Neelam Ji; main isko fir usi mein fit karke bata deta hu!
    It does mean we have to read a marathon post again to understand the meaning of Gender Sensitivity and Equality. Spare us, we got it.
    I have a fine sense of the ridiculous, but no sense of humor.

  13. #8
    Quote Originally Posted by phoolkumar View Post
    I don't think ki koi badi vidha chahiye in posts ko samjhne ke liye except and until u don't read it with psychological reasoning and approach.
    Things that are required to understand your post, Lots of patience, Time and A good memory so that you can recall from where you started, that's it.
    I have a fine sense of the ridiculous, but no sense of humor.

  14. #9
    Dear Phool Kumar ji ,

    Best part about your posts , all subjects directly or in directly related to daily life . Coz of which many can relate .

    Worst part ( you also admit ) - scope has to be defined and restricted .

    No matter how hard I want to read your posts , but lengthy and so original Hindi I do not understand ( just me only - about others can't say ) .

    Now on Thread - I could not relate subject and content ( I am sure its my bad )

    That ur frnd thing make me think - its the desperation to fix things which matter for her most . Some incident happen in my home town where lady is a surgeon has 2 sons who she want to excel in academics ( like any other mother ) . One of them is not as bright as other , so that #$@%$@#$% mother out of desperation under influence of some Baba ji tried to transfer blood from her smart son to less smarter one . With that less smart one can become smart like his brother .

    Imagine what happened - that baba ji stolen some stuff and went off , her one son got hospitalized ( he survived or not I did not have heart to check ).

    That mother is a qualified MBBS & MD .

    I do not know if this relate to your subject or content but people irrespective of men or women do all that superstition stuff only out of Desperation .

  15. #10
    If so is ur remark then there won't be as stupid as u, who spent so much time in digging these posts with own wish and above that asking me to spare. O bhai please u are automatically spared just ignore my threads and posts. I know what impact, how and on whom I have to put, don't need ur derogatory and sarcasitic comments.

    Quote Originally Posted by ayushkadyan View Post
    It does mean we have to read a marathon post again to understand the meaning of Gender Sensitivity and Equality. Spare us, we got it.
    One who doesn't know own roots and culture, their social identity is like a letter without address and they are culturally slave to philosophies of others.

    Reunion of Haryana state of pre-1857 is the best way possible to get Jats united.

    Phool Kumar Malik - Gathwala Khap - Nidana Heights

  16. #11
    Rekha Ji, I have tried to limelight the reason behind such desperations. Secondary status to women in our society (as happened with my friend), her soft and emotional heart (as given in ur example) are the core root reason behind such steps, which lead ladies to get trapped by these babas. In the example put by you, it was due to emotionality of that lady, which led her to desperation. So here you go, you see the desperation but I see one more point deeper to that reason i.e. the reason which made her desparate was her being too emotional or say over-caring.

    In more than 95% of such engagements with any ashram or baba, its the ladies of house who take their husbands to them. Especially in a society like ours. Jat men hardly at their own go to such dhongies, its ladies of our homes who as a agent of babas work on their men and get them ready to bow before those dhongies. And believe me or not, they do it by taking it on proving themselves in front of their men.

    Quote Originally Posted by rekhasmriti View Post
    Dear Phool Kumar ji ,

    Best part about your posts , all subjects directly or in directly related to daily life . Coz of which many can relate .

    Worst part ( you also admit ) - scope has to be defined and restricted .

    No matter how hard I want to read your posts , but lengthy and so original Hindi I do not understand ( just me only - about others can't say ) .

    Now on Thread - I could not relate subject and content ( I am sure its my bad )

    That ur frnd thing make me think - its the desperation to fix things which matter for her most . Some incident happen in my home town where lady is a surgeon has 2 sons who she want to excel in academics ( like any other mother ) . One of them is not as bright as other , so that #$@%$@#$% mother out of desperation under influence of some Baba ji tried to transfer blood from her smart son to less smarter one . With that less smart one can become smart like his brother .

    Imagine what happened - that baba ji stolen some stuff and went off , her one son got hospitalized ( he survived or not I did not have heart to check ).

    That mother is a qualified MBBS & MD .

    I do not know if this relate to your subject or content but people irrespective of men or women do all that superstition stuff only out of Desperation .
    One who doesn't know own roots and culture, their social identity is like a letter without address and they are culturally slave to philosophies of others.

    Reunion of Haryana state of pre-1857 is the best way possible to get Jats united.

    Phool Kumar Malik - Gathwala Khap - Nidana Heights

  17. The Following 3 Users Say Thank You to phoolkumar For This Useful Post:

    AryanPoonia (December 31st, 2015), rekhasmriti (December 27th, 2015), sukhbirhooda (December 28th, 2015)

  18. #12
    Quote Originally Posted by phoolkumar View Post
    If so is ur remark then there won't be as stupid as u, who spent so much time in digging these posts with own wish and above that asking me to spare. O bhai please u are automatically spared just ignore my threads and posts. I know what impact, how and on whom I have to put, don't need ur derogatory and sarcasitic comments.
    Chill Phool ji,

    You may continue with your contribution. We appreciate your enlightened theories. The only problem was scrolling too much to read your posts. Now I have installed a mouse. Things are butter smooth now except the content of post.
    I have a fine sense of the ridiculous, but no sense of humor.

  19. #13
    **********
    Last edited by amitbudhwar; February 18th, 2016 at 03:54 PM.

  20. The Following User Says Thank You to amitbudhwar For This Useful Post:

    phoolkumar (December 27th, 2015)

  21. #14
    Wiki Moderator
    Points: 30,045, Level: 75
    Level completed: 99%, Points required for next Level: 5
    Overall activity: 60.0%
    Achievements:
    Social Referral Second Class Veteran Created Album pictures Tagger Second Class
    Login to view details.
    Phool, you write very well. Perhaps the sense of the post loose its essence in its length as well as in your over-inclination towards getting radical. I had mentioned it earlier as well that despite very deep content you don't get much audiences. Brevity is the soul of the wit, my friend. Think about it.
    "All I am trying to do is bridge the gap between Jats and Rest of World"

    As I shall imagine, so shall I become.

  22. The Following 3 Users Say Thank You to Samarkadian For This Useful Post:

    ayushkadyan (December 27th, 2015), phoolkumar (December 27th, 2015), sukhbirhooda (December 28th, 2015)

  23. #15
    **********
    Last edited by amitbudhwar; February 18th, 2016 at 03:54 PM.

  24. The Following 3 Users Say Thank You to amitbudhwar For This Useful Post:

    ayushkadyan (December 27th, 2015), phoolkumar (December 27th, 2015), sukhbirhooda (December 28th, 2015)

  25. #16
    Brother, as you know well, length of a topic or article varies as per its context. Rest I keep your point always in mind.

    Quote Originally Posted by Samarkadian View Post
    Phool, you write very well. Perhaps the sense of the post loose its essence in its length as well as in your over-inclination towards getting radical. I had mentioned it earlier as well that despite very deep content you don't get much audiences. Brevity is the soul of the wit, my friend. Think about it.
    One who doesn't know own roots and culture, their social identity is like a letter without address and they are culturally slave to philosophies of others.

    Reunion of Haryana state of pre-1857 is the best way possible to get Jats united.

    Phool Kumar Malik - Gathwala Khap - Nidana Heights

  26. #17
    Quote Originally Posted by phoolkumar View Post
    If so is ur remark then there won't be as stupid as u, who spent so much time in digging these posts with own wish and above that asking me to spare. O bhai please u are automatically spared just ignore my threads and posts. I know what impact, how and on whom I have to put, don't need ur derogatory and sarcasitic comments.

    Mera thread, meri marzee ---Fantastic reply indeed !!!!!!
    History is best when created, better when re-constructed and worst when invented.

  27. The Following User Says Thank You to DrRajpalSingh For This Useful Post:

    ayushkadyan (December 27th, 2015)

  28. #18
    Thanks for the post

  29. The Following User Says Thank You to hrdhaka For This Useful Post:

    phoolkumar (December 27th, 2015)

  30. #19
    Phoolophobia se grasit hain aap already, ab ispe aur kya kahun? warna aap yah bhi dekh lete ki jisko yah response diya, uska kya remark tha? And please give me some air, "mera thread, meri marji wala to at least ismen kuchh nahin". Sachchi sir Phoolophobia badi lailaaj bimari hai, kuchh parhej-wrej rakh ke dekh lo, shayad pind chhoot jaaye, hahahahahahahaha!

    Bata topic se related koi post nahin!

    Quote Originally Posted by DrRajpalSingh View Post
    Mera thread, meri marzee ---Fantastic reply indeed !!!!!!
    One who doesn't know own roots and culture, their social identity is like a letter without address and they are culturally slave to philosophies of others.

    Reunion of Haryana state of pre-1857 is the best way possible to get Jats united.

    Phool Kumar Malik - Gathwala Khap - Nidana Heights

  31. #20
    Thanks brother!

    Quote Originally Posted by hrdhaka View Post
    Thanks for the post
    One who doesn't know own roots and culture, their social identity is like a letter without address and they are culturally slave to philosophies of others.

    Reunion of Haryana state of pre-1857 is the best way possible to get Jats united.

    Phool Kumar Malik - Gathwala Khap - Nidana Heights

Posting Permissions

  • You may not post new threads
  • You may not post replies
  • You may not post attachments
  • You may not edit your posts
  •