एक खानाबदोश जाट कबीला ...

दस बारह साल पहले टाइम्स ऑफ़ इंडिया या हिंदुस्तान टाइम्स , अख़बार का नाम ठीक से ध्यान नहीं , में एक आर्टिकल पढ़ा था | जिसका शीर्षक फकिरानी जाट से शुरू था | जब जाट शब्द देखा तो आर्टिकल पढने में दिलचस्पी बढ़ी | मुझे फ़िलहाल पूरा आर्टिकल ठीक से याद नहीं | आर्टिकल गुजरात के फकिरानी जाट कबीले पर था , जोकि आज भी खानाबदोश जीवन जीते हैं | उसमें बताया गया था कि यह जाट कबीला आज से पांच सो साल पहले ईरान के हलफ़ इलाके से सिंध और गुजरात आया | इस कबीले में आज भी कोई बदलाव नहीं आया , ये लोग आज भी अपने पुराने रिवाजों से रह रहें हैं | ईरान से आने वाला ये जाट कबीला , जो कच्छ में रहता है , ये भी तीन हिस्सों में बंटा हुआ है , धनेताह / गरासिया / फकिरानी | इनमें गरासिया जाट काश्तकारी करते हैं |

उस आर्टिकल को पढने के बाद मेरी इस खानाबदोश जाट कबीले के बारे में जानने की जिज्ञासा हुई | मैं जब भी किसी गुजराती से मिलता तो इन फकिरानी जाटों के बारे में जरुर पूछता , पर किसी को इनके बारे में कोई ख़ास जानकारी नहीं , बस यही जवाब देते कि कच्छ तरफ रहते हैं , पशुपालन और गाना बजाना उनका काम है | अब जब जाट खानाबदोश ही हो गए तो अपने आप को चौधरी कहने वाले चाहे हिन्दू जाट हों या मुस्लिम जाट वह क्यों इनकी सुध लेंगे ?