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Thread: Sir Chhoturam

  1. #1

    Sir Chhoturam

    (चौधरी मुहम्मद हुसैन शादीवाल , गुजराल ,पंजाब की कलम से चौधरी सर छोटूराम को श्रद्धांजली )

    तेरी मौत कौम की मौत है
    इक हूक सी दिल में उठती है इक दर्द सा दिल से होता है ,
    मैं रात को उठ कर रोता हूँ , जब सारा आलम सोता है

    मेरे जीवन की पूंजी , गरीब जाट कौम के सच्चे संरक्षक , मजबूर लोगों के दुःख हरने वाले , प्रताड़ित लोगों के हमदर्द एवं अभिभावक चौधरी सर छोटूराम स्वर्गवासी हो गए | तेरी मौत की अचानक खबर ने कमर तोड़ दी , प्रत्येक जाट घर में शोक की लहर दौड़ गयी | तेरी मौत सचमुच कौम की मौत है | तुझ-सा इरादों का पक्का , तुझ-सा अपनी कौम-अपनी कौम का दर्द समझने वाला सभवतः कोई पैदा नहीं हुआ होगा | मेरी जीवन-पूंजी इस समय मेरी भावनाएं और हार्दिक अवस्थाएँ हैं उन्हें किन दर्द भरे शब्दों में व्यक्त करें , ताकि वह मेरे आंसू रुलाने वाले अर्थ की सच्ची तर्जुमानी कर सकें ? तमाम गरीब जाट कौम के लोगों को तेरे दामन से सच्ची श्रद्धा और आस्था थी लेकिन जो आकृष्टि और प्रेम मुझ से था , वह मेरा दिल ही जानता है | तूने कौम की डूबती नाव सुरक्षित किनारे लगाई | तू न होता तो आज तक खुदा मालूम तेरी प्यारी कौम के गरीब वर्ग की क्या से क्या हालत हो जाती | तूने इसे दुनिया में दोबारा जिन्दा कर के पेट भर कर खाने और इज्जत के साथ जिन्दगी गुजारने के योग्य बना दिया | यह तेरी कूटनीति थी कि धर्म एवं कौम से परे सम्पूर्ण जाट कौम को एक प्लेटफोर्म पर एक कर दिखाया | ईसाई , मुस्लिम , सिख , हिन्दू जाटों में संगठन तेरे ही दम से हुआ | मंत्रिमंडल के महल की बुनियाद तू ही था | तेरे सिद्धांतवादी और नेक-नियत का दुश्मन से दुश्मन को भी विश्वास है | तेरा आज कोई दुश्मन नहीं | सबको तेरे दुनिया से जाने का अफ़सोस है , इसलिए कि तू न किसी का दुश्मन था | दुनिया में धंधे-बखेड़े , खींचतान करा दिया करते हैं | ऐसा तेरा ही व्यक्तित्व था , जो साम्प्रदायिक एकता का जबरदस्त समर्थक था | तेरे मंत्रित्व का भार सँभालने वाले बहुत , लेकिन तेरे दिलों दिमाग का इन्सान चिराग लेकर ढूढने से नहीं मिलेगा | तेरा प्रताप और दबदबा बला का था | जो लाजवाब और ठोस भाषण और लेखन सुनने और पढने से कौम हमेशा के लिए वंचित हो गई है | जितना तू गरीब कौम का , जाट कौम का प्रिय था , मेरी आँखों ने आजतक किसी को नहीं देखा | तेरी जयंती दृश्य की लाजवाब अवस्था मेरी आँखों के सामने है | मैं चाहता हूँ हरियाणा भूमि के नैतिकतापूर्ण दिलों दिमाग उसी भव्यता से तेरी मौत का दिन भी मनायें | जीतें जी एक बार फिर कौम का लाजवाब ... इन आँखों से देख लूँ | लेकिन समय की कमी न हो | कम से कम दो-तीन दिन हो | तेरा परवाना दिल खोल कर बोले | मेरे और तेरे बीच एक वादा था , जिसकी तूने अपनी जिन्दगी में मुझे व्यक्त करने की इजाजत न दी हुई थी | अब मैं उसे कौम के सामने वाले और वर्णन करने से नहीं भाग सकता | किसी दुसरे समय के लिए रखता हूँ | रात को सारी दुनिया आराम से सोयी | खुदा जानता है न नींद है न आराम | आराम दिलाने वाला आराम साथ ही ले गया | अतः मैं हूँ पर मेरा दुखित मन , मेरी आंखे और आसूं | जाट का बच्चा-बच्चा तेरी मौत से रो रहा है | तेरी वह नेकियाँ जो इस कौम में कर गया है , भूलने वाली नहीं और नहीं भूलेंगी | तुझे मालूम है , मैं एक गरीब जाट हूँ | तूने इस प्रकार ठोक-बजा कर फैसला किया हुआ था कि मैं कौम का सच्चा सेवक और नौकर हूँ | जिस विषय पर कलम उठाया , सम्पूर्ण लिखा | आज न कुछ लिखना आता है , न बोलना | तेरे मातम में शादिवाला क़स्बा में याद रहने वाला जलसा कहाँ है ? इससे तेरे आरंभिक जीवन से लेकर जयंती के समय तक हालात बताएँगे | तेरे बचपन के कारनामे , कौमी हमदर्दी के जोश सुन-सुन कर उपस्थितगण भौंचक रह गए कि कुदरत ने यह गुण .... ने हर घर में रोने-धोने का माहौल बना दिया है , - तेरी पैदाईश के समय ही रख दिए थे |

    जुनुने शौक ऐ काश ! इतना आलमगीर हो जाये ,
    कि जिस शै पर नजर डालूं , तेरी तस्वीर हो जाये

    ( जुनुने शौक - अभिलाषा का उन्माद , आलमगीर - विश्व व्यापी , शै - वस्तु)

    ( जाट गजट , 24 जनवरी 1945 , पृ-6 )

    " जाट हारा नहीं कभी रण में तीर तोप तलवारों से ,
    जाट तो हारा हैं , गद्दारों से दरबारों से
    |"

    " इस कौम का ईलाही दुखड़ा किसे सुनाऊ ?
    डर हैं के इसके गम में घुल घुल के न मर जाऊँ || "
    ...........................चौ.छोटूराम ओहल्याण

  2. #2
    चौधरी छोटूराम का एक ख़त
    8 जुलाई , 1936 को चौधरी छोटूराम ने देहात के तमाम अफसरों को एक ख़त लिखा था
    प्रिय ,
    आपको यह ख़त मैं सरकारी हैसियत से लिख रहा हूँ | यदि आप में ये दोष न हों , जिनका जिक्र इस ख़त में हैं , तो बुरा न मानना |

    किसान कौम को मैं दिल से प्यार करता हूँ , लेकिन मुझे अफ़सोस है कि इस समाचार को सुनने के कि देहात के लोग जो उच्च पदों पर हैं उनमें से कुछ शराब पीने , रिश्वत लेने आदि जैसे दुर्गुणों में फंसते जा रहें हैं | उनके इन गलत कामों से सारी कौम बदनाम हो जाएगी | मैं यह तो चाहता हूँ कि आप लोग अच्छा खायें , अच्छा पहनें , किन्तु यह कतई नहीं चाहता कि फैशन और चाट में पैसे बरबाद करें | मैं आपको यह याद दिलाना चाहता हूँ कि हम उन लोगों की संतान हैं , जो बेझड़ ज्वार-बाजरे की रोटी दही व प्याज से खाते थे और हमसे अधिक तंदुरुस्त थे | मनोरंजन भी कोई बुरी चीज नहीं है | किन्तु जिस मनोरंजन से चरित्र बिगड़ता है उसे मैं पसंद नहीं करता हूँ |
    शराब पीना एक ऐसा दुर्व्यसन है जिसने बड़ी-बड़ी सल्तनतों व मालिकों को नष्ट कर दिया |कोई भी धर्म शराब पीने के पक्ष में नहीं है , न कोई नीतिशास्त्र ही शराब पीने को अच्छा मानता है | साधारण समझ के लोग भी इसकी निंदा करते हैं | अनुभवी लोगों ने इसके दुष्परिणामों से हमेशा सचेत किया |
    चरित्र में जरा सी ढिलाई से जीवन पतन की ओर ढलने लगता है | दुर्व्यसनों में एक बार फंसने पर उनसे निकलना कठिन हो जाता है | भोगो को भोगने से कभी भी तृप्ति नहीं होती है | स्वयं ही उच्च चरित्र को कायम रखता है |
    रिश्वत के सम्बन्ध में क्या हमें यह नहीं दिखता है कि जिनसे रिश्वत ले रहें हैं , उनकी सामर्थ्य तो इतनी भी नहीं है कि भली प्रकार से बाल-बच्चों का पोषण कर सकें | प्रायः ऐसे ही लोगों से रिश्वत ली जाती है | क्या हम बेदिल है कि यह तथ्य हमारी आँखों से ओझल हो जाता है ?
    ख़ास शख्शियतों एवं अधिकारियों की गोष्ठियों में मैं जब सुनता हूँ कि जाट मुलाजिम भी इन दुर्गुणों की ओर बहने लगे हैं तो मेरा सिर शर्म से झुक जाता है | किसी आदमी के चरित्र से पूरी कौम के चरित्र की जांच होती है \ उच्च जाति में ये गुण होने आवश्यक है
    सादा जीवन , उच्च विचार अच्छा चरित्र , ईमानदारी और पारस्परिक एकता |

    आपका
    छोटूराम

    " जाट हारा नहीं कभी रण में तीर तोप तलवारों से ,
    जाट तो हारा हैं , गद्दारों से दरबारों से
    |"

    " इस कौम का ईलाही दुखड़ा किसे सुनाऊ ?
    डर हैं के इसके गम में घुल घुल के न मर जाऊँ || "
    ...........................चौ.छोटूराम ओहल्याण

  3. #3
    सर छोटूराम की जयंती बसंत पंचमी को क्यों मनाई जाती है ?
    मेरी जयंती बसंत पंचमी के दिन ही मनाई जाए
    सर छोटूराम की यह ख़्वाहिश थी कि उन्हें बसंत पंचमी पर ही याद किया जाए। इसी दिन उनकी जयंती मनाई जाए। दरअसल, इसके पीछे भी एक कहानी है।

    बात 1942 की है। जब देश में सांप्रदायिक दंगे फैलने लगे और बेचैनी बढ़ने लगी तो बसंत पंचमी को बेगम शाहनवाज ने इसे सद्भावना दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। उस समय पंजाब के प्रीमियर सर सिकंदर हयात खां मिस्र के फ्रंट पर सैनिकों का हौसला बढ़ाने गए हुए थे और उनकी गैरहाजिरी में वजीरे आजम (प्रधानमंत्री) की जिम्मेदारी छोटूराम निभा रहे थे। तब बसंत पंचमी पर पहले सद्भावना दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में सर छोटूराम को आमंत्रित किया गया। तब सर छोटूराम ने लाहौर की पंजाब यूनिवर्सिटी के हॉल में हुए समारोह में भावुक होते हुए कहा था कि बसंत पंचमी बहुत ही प्यारा दिन है। यह ऋतुओं की रानी का दिन है। मेरी इच्छा है बसंत पंचमी को ही मेरी जयंती मानी जाए।
    " जाट हारा नहीं कभी रण में तीर तोप तलवारों से ,
    जाट तो हारा हैं , गद्दारों से दरबारों से
    |"

    " इस कौम का ईलाही दुखड़ा किसे सुनाऊ ?
    डर हैं के इसके गम में घुल घुल के न मर जाऊँ || "
    ...........................चौ.छोटूराम ओहल्याण

  4. #4
    जब सन 1927 मे पंजाब गवर्नर व हिंदू महासभाइयों की साजिश से सर छोटूराम को मंत्रिमंडल मे शामिल नहीं किया गया सर फैजले हुसैन को बड़ा दुःख हुआ | पार्टी के मुसलमानों को भी दुख हुआ किन्तु जब फिरोज खान नून को गवर्नर ने मिनिस्टर बना दिया तो मेम्बर शांत हो गए |
    कौंसिल के प्रथम अधिवेशन में उनके विरोधी और मित्र उन्हें देखते ही चकित रह गए जब स्वाभाविक रूप में मुस्कराते हुए और प्रसन्न मुख चौधरी छोटूराम को सदस्य की कुर्सी पर बैठते देखा | वे सोचते थे कि छोटूराम का चेहरा मुरझा गया होगा | कल का मंत्री आज साधारण सदस्य की चाल कैसे चलेगा ?
    सरदार बहादुर जोगेन्द्र सिंह अपने पर संयम न रख सके और चौधरी साहब के पास जाकर बोले , भाई मैंने तुम्हारे जैसा व्यक्ति नहीं देखा जिसे मंत्रित्व जाने का तनिक भर भी अफसोस नहीं है और ऐसा दिखता है कि मानो कोई रंज-गम करने लायक घटना ही नहीं हुई है | मैं तुम्हें तुम्हारी हिम्मत पर बधाई देता हूँ |

    चौधरी साहब ने उसी धीर-गंभीर वाणी में कहा , सरदार जी मिनिस्ट्री अपनी जाति अथवा गोत तो नहीं है जिससे वंचित होने पर दुःखी हों |
    सरदार जोगेन्द्र सिंह जब चौधरी साहब से बातें कर रहे थे तभी टपके सरदार लाल सिंह , ये खत्री थे | हिंदूमहासभाई दल मे येँ तोड़-फोड़ करने वालों में चतुर व्यक्ति माने जाते थे | इन्होंने देखा कि चौधरी छोटूराम से बातें करने का यह उपयुक्त अवसर है | मंत्रिपद न मिलने से उन्हें दुःख भी होगा | इस समय की सहानुभूति कुछ कीमत रखती है | नमस्ते करके वे चौधरी साहब के पास बैठ गए |
    शहरी नेता अपने इस पूर्व नियोजित षड्यंत्र में तो सफल हो गए कि चौधरी छोटूराम को उन्होने मिनिस्टर नहीं बनने दिया | किन्तु इतने से वे निश्चित नहीं थे , वे चाहते थे कि चौधरी साहब हमारे साथ आ जाएँ तो हमारी शक्ति बढ़ जाएगी | इसलिए उन्होने सरदार लाल सिंह को उनके पास भेजा | संदेश यह था कि चौधरी साहब हमारे साथ आ जाएँ और कौंसिल की अध्यक्षता के लिए खड़ें हो जाएँ , हम पूरी शक्ति उन्हें सफल बना देने मे लगा देंगे |
    जब सरदार लाल सिंह ने कहा कि चौधरी साहब ! हम लोगों को आपके मिनिस्टर न होने का बड़ा दुःख है , तो चौधरी साहब ने हँसते हुए कहा , मैं इस सद्भावना के लिए अतीव कृतज्ञ हूँ , क्या इस दुःख को प्रसन्नता में बदलने के लिए आप लाला मनोहर लाल से मंत्रित्व का त्यागपत्र दिला रहें हैं ? मैं आपके प्रयोजन को भली-भांति समझता हूँ |
    सरदार लाल सिंह इस उत्तर से सकपका गए और बोले , अभी तो हम आपको कौंसिल का अध्यक्ष बनाना चाहते हैं | चौधरी साहब बोले , किन्तु मैं अध्यक्षपद का उम्मीदवार नहीं , उसके उम्मीदवार तो मेरे भाई शहाबुद्दीन (मुस्लिम जाट ) हैं | सरदार लाल सिंह ने कहा , चौधरी साहब आप तो इनके हितों का इतना ख्याल रखते हैं , यह भी कुछ ख्याल आपका रखते हैं ? हम तो समझते जब फिरोज खान नून यह कह देते कि मेरी जगह चौधरी छोटूराम को मिनिस्टर बना दो | चौधरी साहब ने हँसकर जवाब दिया , सरदार साहब ! एक यूनियनिस्ट की हैसियत से तो वह ऐसा कह सकते थे किन्तु एक मुसलमान की हैसियत से ऐसा वे नहीं कह सकते थे , क्योंकि वह सीट एक मुसलमान थी | आपकी पार्टी तो एक हिन्दू की सीट पर भी मुझे बर्दाश्त नहीं कर सकी | मैं जानता हूँ यूनियनिस्ट पार्टी में भी अभी लोग विशुद्ध यूनियनिस्ट नहीं हैं , किन्तु मैं अबके मंत्री नहीं बना तो न सही | मेरे जो सिद्धान्त हैं उनके प्रचार के लिए मुझे अब और अधिक वक़्त मिलेगा |
    चौधरी साहब के इस स्पष्ट उत्तर को सुनकर सरदार साहब खाली हाथ वापिस हो गए | कहते है कि इसके बाद पंजाब के हिन्दू लीडरों ने सर सेठ छाज्जूराम को पत्र लिखा था कि आप छोटूराम को समझाकर हमारे साथ मिला दें | सेठ छाज्जूराम को चौधरी छोटूराम अपना धर्म पिता कहा करते थे , क्योंकि पढ़ने के समय से लेकर सेठ जी ने सदा ही चौधरी छोटूराम कि भरपूर मदद की और अपना वरदस्त उनके ऊपर रखा | इसी कारण प्रायः यह समझा जाता था कि सेठ जी की बात को चौधरी छोटूराम कभी इंकार नहीं कर सकेंगे | किन्तु हिन्दू नेताओं की उनके दरबार मे भी सुनवाई नहीं हुई | यह पत्र लेकर रायबहादुर बलवीर सिंह सेठ जी के पास गए | सेठ जी ने स्पष्ट कह दिया कि मैं राजनैतिक मामलों में कुछ अनुभव या ज्ञान नहीं रखता , जो चौधरी छोटूराम करते हैं , मैं उसी को ठीक मानता हूँ |
    " जाट हारा नहीं कभी रण में तीर तोप तलवारों से ,
    जाट तो हारा हैं , गद्दारों से दरबारों से
    |"

    " इस कौम का ईलाही दुखड़ा किसे सुनाऊ ?
    डर हैं के इसके गम में घुल घुल के न मर जाऊँ || "
    ...........................चौ.छोटूराम ओहल्याण

  5. #5
    सर छोटूराम ने देखा कि किसानों की पैदावार के भाव काफ़ी गिर गए हैं और उनकी ख़ूब लुटाई हो रही है जिससे उनकी आर्थिक स्थिति काफ़ी कमज़ोर हो गई है तथा वे बहुत दुर्गति का जीवन व्यतीत कर रहें हैं । तब उन्होंने किसानों की इस बिगड़ी स्थिति को सुधारने के कार्य आरम्भ किए । इसके लिए उन्होंने जाट गजट तथा ज़मींदार लीग का उपयोग किया । चौधरी छोटूराम के इस कार्य के विषय में रोहतक के डी॰सी॰ जमाँ मेहंदीखान मलिक ( 1929-31) ने एक पत्र लिखा -
    " मैं आपको वास्तविक स्थिति की सूचना देता हूँ । जैसे कि आप सचेत होंगे , चौधरी छोटूराम की ज़मींदार लीग और कांग्रेस में अब थोड़ा ही अंतर है । उनका 'जाट गजट’ अंग्रेज़ सरकार के विरुद्ध ऐसा ही प्रचार कर रहा है जैसा की कांग्रेस । “

    (Confidential Files from the Deputy Commissioner’s Office Rohtak 11/29 , See letter 21 Sept. 1931).
    " जाट हारा नहीं कभी रण में तीर तोप तलवारों से ,
    जाट तो हारा हैं , गद्दारों से दरबारों से
    |"

    " इस कौम का ईलाही दुखड़ा किसे सुनाऊ ?
    डर हैं के इसके गम में घुल घुल के न मर जाऊँ || "
    ...........................चौ.छोटूराम ओहल्याण

  6. #6
    पाकिस्तान पूंजीवादी मुसलमानों की मांग है |
    जब जिन्ना ने पंजाब में ' इस्लाम खतरे में है ' के नारे का जोर शोर से प्रचार शुरू कर आम मुस्लमान को बहकाना शुरू किया तो उसके इस प्रोपगंडा के काट में कोई आगे नहीं आया , न कांग्रेस और न हिन्दू महासभा (संघ की पोलिटिकल विंग) | कांग्रेस मुस्लिम लीग के आगे आत्मसमर्पण कर चुकी थी तो संघ ने पंजाब के शहरी इलाके में हिन्दुओं को भड़काना शुरू कर दिया | सिर्फ सर छोटूराम एक अकेला ऐसा राष्ट्रवादी था जो जिन्नाह को टक्कर देने के लिए पंजाब के गाँव गाँव घूम रहा था | पंजाब के आम देहाती मुस्लमान को जिन्नाह के प्रोपगंडा के बारे में समझा रहा था | उन्होंने गाँव गाँव और कस्बे-कस्बे में जाकर मुसलमानों को पाकिस्तान की हानियाँ बताना आरंभ कर दिया | उन्हें बताया कि आज गुलामी की हालत में और हिन्दुओं के साथ रहते हुए भी जब तास्सुबी मुल्ला यह कहते हैं कि शिया सच्चे मुस्लमान नहीं , कादियानी काफ़िर हैं , आगाखानी गुमराह हैं ; तब हिन्दू विहीन पाकिस्तान में और सिर-फुटौवल आरंभ हो जाएगी और पाकिस्तान पूंजीवादी मुसलमानों की मांग है |
    " जाट हारा नहीं कभी रण में तीर तोप तलवारों से ,
    जाट तो हारा हैं , गद्दारों से दरबारों से
    |"

    " इस कौम का ईलाही दुखड़ा किसे सुनाऊ ?
    डर हैं के इसके गम में घुल घुल के न मर जाऊँ || "
    ...........................चौ.छोटूराम ओहल्याण

  7. #7
    Aapke pass bdi bhetar jankari h sir choturam ki,
    Jaat ko us vichardhara ko dobara jgane ki jarurt h
    Siddharth dalal

  8. #8
    (Sir Chhoturam : Writing & Speeches (जाट गजट) , Vol.IV , पृ. 156)
    हंटर कमेटी की रिपोर्ट
    (जाट गजट , 23 जून , 1920 , पृ.3)

    हंटर कमेटी की रिपोर्ट कुछ ऐसे अशुभ लग्न में कायम हुई कि उसको लेकर के पहले ही दिन से नाराजगी का प्रदर्शन होता रहा है | हिंदुस्तान की जनता की मांग थी कि पंजाब के बवाल के कारण मार्शल लॉ के जारी करने और इतने समय तक उसको कायम रखने के उचित या अनुचित मार्शल लॉ के ज़माने में कुछ अधिकारियों के आतंक और पंजाब सरकार की जिम्मेदारी के मामले में छानबीन करने और इस छानबीन के बाद ना कबीले क्षमा गुनाहों के बदले में मुजरिम दोषी अधिकारियों के लिए उचित सजा देने के लिए एक आजाद और खुले दिल के लोगों की एक रायल कमीशन बनाया जाए और वह कमीशन ब्रिटेन सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपें और हिंदुस्तान की सरकार इस रिपोर्ट पर उचित कार्यवाई का अनुरोध सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट की सेवा में करे | हिन्दुस्तानियों का माथा तो उस समय ठनका था कि हिंदुस्तान की सरकार की पालिसी और जिम्मेदारी के प्रश्न पर छानबीन की जरुरत थी |
    हन्टर कमेटी की नियुक्ति से जनता में नाराजगी
    इस कमेटी को वियुक्त करे और यह कमेटी की रिपोर्ट हिंदुस्तान की सरकार की सेवा में पेश हो | हिंदुस्तान की जनता इस बात से बहुत नाराज थी कि हिंदुस्तान की सरकार को जिसकी हैसियत एक गुनाहगार की थी यह अधिकार प्राप्त हो कि वह कमेटी को नियुक्त करे | फिर उसके जो अंग्रेज सदस्य नियुक्त हुए उनमें लार्ड हंटर के सिवाए कोई आदमी ऐसा नहीं था जो मकामी असर और मकामी पक्षपात से खाली हो , हिन्दुस्तानी सदस्य जो नियुक्त किये गए उनमें दो की आज़ादी को लेकर चर्चा होने की सम्भावना थी मगर यह सब कुछ तो हो गया | उसके बाद गैर सरकारी और सरकारी गवाही लेने के सम्बन्ध में जो व्यव्हार कमेटी की तरफ से अपनाया गया वह निंदनीय था | जहाँ एक पार्टी यानी सरकारी पक्ष को हर तरह की सुविधाएँ हासिल थी और दूसरी तरफ गैर सरकारी लोगों को जिनकी गवाही बहुत जरुरी थी थोड़े समय के लिए भी जेल से नहीं छोड़ा गया | इस कारण से कांग्रेस सब कमेटी ने आत्मसम्मान के लिए पंजाब के मामले में कोई गैर सरकारी गवाही पेश नहीं की | रिपोर्ट एक ज़माने बाद छापी गई और जब छापी गई तो ऐसी सूरत में छापी गई कि हिन्दुस्तानी जनता को बहुत हैरानी और अफ़सोस हुआ | हमारी राय में शायद ही कोई हिन्दुस्तानी ऐसा होगा जो केवल चापलूसी का टट्टू न हो और यह एहसास न करता ही कि हंटर कमेतीं पर क्यों इतना रुपया खर्चा किया गया ? इससे तो हजार बार अच्छा यह था कि कोई कमेटी ही न नियुक्त की गई होती | इसमें संदेह नहीं कि हिन्दुस्तानी जनता ने जो रिपोर्ट राय की कमी की लिखी है वह आमतौर पर हिन्दुस्तानी जनता को पसंद है और हिन्दुस्तानी सदस्यों की बहादुरी और आज़ादी पर जिसके बारे में आरंभ में ही कुछ संदेह था दलालत करती है | मगर राय की अधिकता की जो रिपोर्ट है वह हमारे उस भरोसे को जो सैंकड़ों असहज निराशियों के बावजूद जो ब्रिटेन के न्याय पसंदी पर था एक धक्का लगाती है और उस भरोसे को दोबारा कायम होने के लिए एक ज़माने की आवश्यकता होगी | अंग्रेजी अख़बारों जैसे पायनियर और सिविल मिलट्री गजट हिन्दुस्तानियों से यह निवेदन करते हैं कि हंटर कमेटी पर फतवा देने से पहले हमें उन खतरनाक और गैर मामूली समय पर विचार करना चाहिए जिनके अंदर पंजाब सरकार अंग्रेजी अधिकारी और हिन्दुतान सरकार ने काम किया | अमृतसर में कई अंग्रेज मारे जा चुके थे | सरकारी भवनों और अंग्रेजों के घरों और इबारत की जगहों तक को जला दिया गया था | कहीं रेल की पटरी उखाड़े जाने की खबर आ रही थी और कहीं डाकखाने और तार जलाए जा रहे थे , कहीं पुल तोड़े जा रहे थे . फौज की संख्या ना काफी थी बागी सोच का जंगी आबादी में फ़ैल जाने का डर था | उधर उत्तर-पश्चिमी सीमा के वहशियों और काबुल के अमीर की शरारतों का डर लगा हुआ था | ऐसी परिस्थिति में शांति और सुकून के पैमाने पर अधिकारियों के कामों को जांचना न्याय नहीं है यह मिसाले काफी है और मामूली गलतियों और मामूली सख्तियों की भरपाई करने के लिए काफी है मगर हमें तस्वीर के दुसरे भाग को अनदेखा नहीं करना चाहिए | अमृतसर के वाकये से पहले कहीं ऐसे हालात नहीं दिखे जिनसे डर पैदा हो अमृतसर में फायर होने से पहले अंग्रेजों की तरफ आम लोगों आम लोगों का बर्ताव बिलकुल ठीक था हिन्दुस्तानियों के पास कोई ऐसे साधन नहीं थे जिससे फ़ौज को कोई डर हो | 11-12 अप्रैल को शहर अमृतसर की हालत हर तरह से ठीक थी जहाँ कुछ जगहों पर गैर जिम्मेदार भीड़ों से गड़बड़ी हुई थी | हाँ उसके मुकाबले में पुरे पंजाब में हर तरह से शांति और सुकून था और किसी तरह की अमली खराबी न होती थी सीमा के वहशियों और काबुल के अमीर की शरारतों की जानकारी उस समय लोगों को नहीं थी | इन तमाम बातों के बावजूद एक निहत्थी भीड़ पर , जिसके अंदर हर उम्र और हर तरह के लोग शामिल थे और जिसमें एक बड़ी संख्या ऐसे लोगों की थी , जिनकों कोई जानकारी जनरल डायर के आदेश की नहीं थी | इस बेदर्दी के साथ फायर करना एक ऐसा काम था , जिस पर हर तरह से लानत भेजना जरुरी था | जनरल डायर की ... अपनी शहादत चिल्ला चिल्ला कर कह रही है कि उसने कैसी बेदर्दी और बेरहमी के साथ काम किया | जानवरों की तरह उसने देश की जनता पर गोलियों की बौछार कर दी |

    कमेटी ने जनरल डायर के कारनामों पर लीपापोती का काम किया
    जनरल डायर जैसे जिम्मेदार आदमी का एक निहत्थी भीड़ पर फायर करना , भगदड़ आरंभ होने के बाद भी फायर जारी रखना , भागते हुए लोगों को मौत का निशाना बनाना , रुक-रुक कर उन जगहों पर खासतौर पर फायर का रुख फेरना , जहाँ भीड़ सबसे ज्यादा थी , बारूद के समाप्त होने तक बराबर फायर जाती रखना | जब सैंकड़ों को मार डाला और हजारों को जख्मी हालत में बिना पानी के सिसकते हुए जख्मियों को छोड़कर चला आना , यह कार्य ऐसे कठोर दिल होने की गवाही देते हैं , जिस पर इंसानियत का कलेजा फटता है और सभ्यता का दिल काँप उठता है | ऐसे इन्सान को निर्दोष कहना हिन्दुस्तानियों के घायल दिल पर नमक छिडकना है | अफ़सोस की बात है कि हंटर कमेटी के अंग्रेज सदस्यों ने एक सामूहिक राय से जनरल डायर के काले कारनामों पर सफेदी पौतने का प्रयास किया है | एक ऐसी गली थी जिसमें हिन्दुस्तानियों को गुजरने की बिलकुल मनाही थी सिवाए इसके कि पूरी गली को कोई आदमी पेट के बल चलकर पार करे | पेट के बल चलने के आदेश पर कई आदमियों से अमल कराया गया | हिन्दुस्तानी कैदियों की कुछ संख्या इस रास्ते से गुजरी उसको भी पेट के बल चलाया गया | इस आदेश के सिवाए इसके कुछ मतलब नहीं हो सकता कि हिन्दुस्तानियों की बेज्जती हो और उनकी बेबसी का एक खतरनाक दृश्य उनकी आँखों के सामने खिंचा जाए |
    अमृतसर के अलावा भी और जगहों पर भी ज्यादती और अन्याय देखने में आए हैं जो अमृतसर के रंगों से कम मगर काफी वहशियाना रंग में रंगें हुए थे | सर माईकल जनरल डायर के काम को पसंद किया | गैर जरुरी तौर पर मार्शल ला का एलान कर दिया , बिना जरुरत एक जमाना तक मार्शल लॉ को जारी रखा | उसकी पालिसी और उसके मंशा के अनुसार ख़ास अदालतें कायम हुई , जिसमें इंसाफ का खून हुआ | ऐसी आदमी को हंटर कमेटी के सदस्यों की तरफ से अच्छाई का प्रमाण पत्र दिया गया | जिस ज़माने में अमृतसर की ज़मीन बेगुनाहों के खून से रंगी जा रही थी और मार्शल लॉ के द्वारा इज्जतदारों की इज्जत बिगाड़ी जा रही थी और बेगुनाहों को उनकी आज़ादी से वंचित किया जा रहा था और बेगुनाहों को उनके अपनों से अलग करके जेलों में भरा जा रहा था | हिन्दुस्तानियों को जानवरों की तरह लोहे की जंजीरों से बाँधा जाता था और सैंकड़ों तरह की परेशानियाँ सबसे वफादार राज्य की प्रजा को दी जा रही थी | तब लार्ड चेम्सफोर्ड शिमला की ठंडी हवा खा रहे थे | उनके दिल में कभी यह ख्याल न आया कि मैं पहाड़ से उतर कर पंजाब की जनता की दर्द भरी कहानी सुनूँ और जब कौंसिल के अंदर दर्द भरी कहानी पंडित मदन मोहन मालवीय ने सुनाई तो हमारे बादशाह के उत्तराधिकारी ने बहुत ही बेइज्जत कर देने वाला तरीका अपनाया | ऐसे वायसराय को तमाम जिम्मेदारी से बरी करना हंटर कमेटी की राय की बहुलता का ही काम है | ऐसी रिपोर्ट के लिए हिन्दुस्तानियों से अच्छाई कि आशा रखना उनके दिल , दिमाग और आत्मसम्मान को बेइज्जत करना है |
    " जाट हारा नहीं कभी रण में तीर तोप तलवारों से ,
    जाट तो हारा हैं , गद्दारों से दरबारों से
    |"

    " इस कौम का ईलाही दुखड़ा किसे सुनाऊ ?
    डर हैं के इसके गम में घुल घुल के न मर जाऊँ || "
    ...........................चौ.छोटूराम ओहल्याण

  9. #9
    सन 1942 में गांधी जी ने अंग्रेज़ो को बिना कोई देरी किये भारत छोड़ चले जाने के लिए कह दिया था | सर छोटूराम ने गांधीवादी निष्क्रिय प्रतिरोध की योजना के विकल्प के रूप में अपनी ही सक्रिय प्रतिरोध की योजना बना ली थी और इस को गंभीर स्वरूप प्रदान करने तथा अर्थपूर्ण बनाने , महत्व देने के लिए 29 नवंबर 1942 को तीस हजारी (दिल्ली) के मैदान पर अखिल भारत जाट महासभा के तत्वावधान में भरतपुर राज्य के महाराजा सवाई बृजेन्द्र सिंह की अध्यक्षता में एक विशाल जाट-सम्मेलन का आयोजन किया गया था | इस सम्मेलन में एक प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित एवं स्वीकृत किया गया , जिसकी मुख्य बाते ये थी :-
    1. जाट चाहते हैं कि भारत को जल्द से जल्द आज़ाद कर दिया जाए | प्रस्ताव में कहा गया कि देश के दूसरे लोगो की ही तरह जाट का विश्वास भी ब्रिटिश वायदों पर से उठ गया हैं | प्रस्ताव में ब्रिटिश सरकार से कहा गया कि वह अपनी नियत स्पष्ट करे | आगे ज़ोर देकर कहा गया कि जाट अंग्रेजों की ' फूट डालो राज करो ' की नीति के पूरी तरह विरोधी हैं , जिसका मकसद विभिन्न जातियों , वर्गों एवं धर्मों के लोगो के बीच सांप्रदायिकता की भावना को भड़काना हैं ताकि भारत में अंग्रेज़ो का शासन चलता रहे | प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रेसीडैंट से मध्यस्ता करने की प्रार्थना की जाए ताकि आज़ाद भारत के लिए संविधान निर्माण का कार्य प्रारम्भ किया जा सके और युद्ध -समाप्ति के फौरन बाद भारत आज़ाद हो सके |
    2. यह मान लेना पक्के तौर पर गलत हैं कि सारे मुसलमान मुस्लिम लीग के साथ हैं , या कि सारे हिन्दू कांग्रेस के साथ हैं , या सारे सिख अकाली दल के साथ जुड़े हुए हैं | उदाहरण के लिए पंजाब में जमींदार लीग में हिन्दू मुसलमान और सिख तीनों हैं | जाट एक संप्रदाए निरपेक्ष कौम हैं और इस लिए उसकी आवाज़ जाति अथवा धर्म कि संकीर्णताओं से परे , यानि सभी तरह के धार्मिक और जातीय बंधनो से ऊपर हैं |
    3. युद्ध के बाद ब्रिटिश साम्राज्यवाद का अंत हो जाएगा , और भारत एक आज़ाद राष्ट्र होगा | ब्रिटिश शासकों को चाहिए कि वे अलगाववादी प्रवृति को प्रोत्साहन न दें और इसकी जगह सरकार की बागडोर राष्ट्रवादी तत्वों के हाथों मे सौंप दें जो स्वस्थ आर्थिक और धर्म निरपेक्ष विचारधारा के आधार पर देश की आर्थिक समस्याओं को हल करने की कोशिश करेंगे तथा सभी धर्मों को सम्मान और समानता का दर्जा प्रदान करेंगे |
    मुख्य प्रस्ताव लाहौर के एक मुसलमान जाट बैरिस्टर सर हबीबुल्ला ने पेश किया और अजमेर के ईसाई जाट मिस्टर श्री नाथ ने इस का अनुमोदन किया |
    विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए सर छोटूराम ने कहा था " जाट अपनी मातृ - भूमि के लिए बड़े से बड़ा बलिदान देने में कभी पीछे नहीं रहे हैं और जब भी भारत माता की सेवा के लिए उनकी आवश्यकता पड़ेगी वे ऐसा करने में बिलकुल नहीं झिझकेंगे | मुझे जाट होने का गर्व हैं और इस कौम में जन्म लेने के कारण मुझ पर आई जिम्मेवारियों को मैं अच्छी तरह समझता हूँ | हम सांप्रदायिकता के विरुद्ध लड़ेंगे और अपने देश की एकता और अखंडता के लिए अपने प्राण तक न्योछावर कर देंगे | हम भारत में किसान-मजदूर राज की स्थापना के लिए कार्य करेंगे | युद्ध में अपने प्राणों की आहुती देकर जो बलिदान हम दे रहे हैं वह व्यर्थ नहीं जाएगा | हम कभी अंग्रेजों के समर्थक नहीं रहे और हमने उन्हे हमारे साथ मनमाना व्यवहार करने की इजाजत भी कभी नहीं दी | जाट कौम के भिन्न भिन्न नाम , धर्म , वर्ग हो सकते हैं | बहुतों ने धर्म परिवर्तन कर लिया होगा परंतु उन सबों की नसों में एक ही खून बह रहा हैं | "
    सर छोटूराम ने पुनः कहा , " धर्म में परिवर्तन का अर्थ खून में परिवर्तन हो जाना नहीं हैं | समय की जरूरत हैं कि जाट कौम के विभिन्न रूप संगठित हो जाएँ - एक हो जाएँ | जाट चाहे हिन्दू , मुसलमान , सिख या ईसाई , जो भी हों , उनके मन में किसी के प्रति विरोध अथवा द्वेष कभी नहीं रहा , अपने शत्रुओं के प्रति भी नहीं | इसलिए ये ही देश की एकता और अखंडता को सुनिश्चित बनाने को पर्याप्त सक्षम हैं | वे बहादुर हैं , निष्ठावान हैं , और सबसे बड़ी बात यह हैं कि वे हृदय से धर्म निरपेक्ष हैं | जब अंग्रेजों को यह विश्वास हो जाएगा कि जाटों और दूसरी क्षत्रिय जातियों ने उनके विरुद्ध सिर जोड़ लिया हैं और अपनी आज़ादी , जो इस धरती पर जन्मे सब मनुष्यों का जन्म सिद्ध अधिकार हैं , के लिए लड़ने को बाहर निकल आए हैं , तो उन्हे भारत छोड़ कर जाना ही पड़ेगा | अंग्रेजों को यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि जाटों ने यदि एक बार लट्ठ उठा लिए तो उन्हे अपना काम करने से कोई नहीं रोक सकता | इसलिए अंग्रेजों को शीघ्र ही अपना मन बना लेना चाहिए और प्रशासन की डोर राष्ट्रवादी शक्तियों को सौंप देनी चाहिए | रक्त-पात , मार-काट और विनाश के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए | "
    अपने एक घंटे की अवधि के भाषण के अंत में सर छोटूराम ने दूसरी क्षत्रिय जातियों - राजपूत , अहीर , गुज्जर को जाट कौम के साथ सहयोग करने और आज़ादी की लड़ाई में बराबर के भागीदार बनने के लिए आह्वान किया | " वस्तुतः अपने देश की आज़ादी के लिए लड़ना व्यक्ति का न केवल फर्ज हैं बल्कि पुण्य का कार्य हैं | किसी भी मात्रा में और किसी भी तरह से यह पुण्य कमाने का सही समय हैं " | इसके साथ ही सर छोटूराम ने अपना भाषण समाप्त किया , जिसका अथाह जन-समूह ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ अनुमोदन एवं अभिवादन किया |
    " जाट हारा नहीं कभी रण में तीर तोप तलवारों से ,
    जाट तो हारा हैं , गद्दारों से दरबारों से
    |"

    " इस कौम का ईलाही दुखड़ा किसे सुनाऊ ?
    डर हैं के इसके गम में घुल घुल के न मर जाऊँ || "
    ...........................चौ.छोटूराम ओहल्याण

  10. #10
    चौधरी सर छोटूराम द्वारा मियां सर फैज़ले हुसैन को लिखे एक ख़त के आखिर में नोट में उन्होंने श्री दीपचंद वर्मा जी के बारे में बताया है कि वर्मा जी हिन्दू सभा के शिक्षकों से पढ़ें हैं परन्तु अब वे पूरी तरह से हमारी विचारधारा में परिवर्तित हो चुके हैं | सर छोटूराम जिस विचारधारा की बात कर रहें हैं यही वह विचारधारा जिसकों हमें समझने व जानने की आवश्यकता है |
    " मैं श्री दिपचंद वर्मा द्वारा "पार्टी राजनीति" पर एक लेख संलग्न कर रहा हूं। वह रोहतक जिले का एक जाट है। इन्होनें अपनी शिक्षा हिन्दू (सभा) संस्था में हिन्दू सभा के शिक्षकों से प्राप्त की थी । वह कहता है कि वह अब हमारे विचारों में पूरी तरह से परिवर्तित है। वह रॉय के साप्ताहिक हिंदुस्तान टाइम्स, और अन्य पत्रों में योगदान दे रहा है । यदि उन्हें पार्टी के साहित्य की आपूर्ति की जाती है तो वे उपयोगी योगदान दे सकते हैं | "

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    " जाट हारा नहीं कभी रण में तीर तोप तलवारों से ,
    जाट तो हारा हैं , गद्दारों से दरबारों से
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    " इस कौम का ईलाही दुखड़ा किसे सुनाऊ ?
    डर हैं के इसके गम में घुल घुल के न मर जाऊँ || "
    ...........................चौ.छोटूराम ओहल्याण

  11. #11
    जब सन 1927 मे पंजाब गवर्नर व हिंदू महासभाइयों की साजिश से सर छोटूराम को मंत्रिमंडल मे शामिल नहीं किया गया सर फैजले हुसैन को बड़ा दुःख हुआ | पार्टी के मुसलमानों को भी दुख हुआ किन्तु जब फिरोज खान नून को गवर्नर ने मिनिस्टर बना दिया तो मेम्बर शांत हो गए |
    कौंसिल के प्रथम अधिवेशन में उनके विरोधी और मित्र उन्हें देखते ही चकित रह गए जब स्वाभाविक रूप में मुस्कराते हुए और प्रसन्न मुख चौधरी छोटूराम को सदस्य की कुर्सी पर बैठते देखा | वे सोचते थे कि छोटूराम का चेहरा मुरझा गया होगा | कल का मंत्री आज साधारण सदस्य की चाल कैसे चलेगा ?
    सरदार बहादुर जोगेन्द्र सिंह अपने पर संयम न रख सके और चौधरी साहब के पास जाकर बोले , भाई मैंने तुम्हारे जैसा व्यक्ति नहीं देखा जिसे मंत्रित्व जाने का तनिक भर भी अफसोस नहीं है और ऐसा दिखता है कि मानो कोई रंज-गम करने लायक घटना ही नहीं हुई है | मैं तुम्हें तुम्हारी हिम्मत पर बधाई देता हूँ |

    चौधरी साहब ने उसी धीर-गंभीर वाणी में कहा , सरदार जी मिनिस्ट्री अपनी जाति अथवा गोत तो नहीं है जिससे वंचित होने पर दुःखी हों |
    सरदार जोगेन्द्र सिंह जब चौधरी साहब से बातें कर रहे थे तभी टपके सरदार लाल सिंह , ये खत्री थे | हिंदूमहासभाई दल मे येँ तोड़-फोड़ करने वालों में चतुर व्यक्ति माने जाते थे | इन्होंने देखा कि चौधरी छोटूराम से बातें करने का यह उपयुक्त अवसर है | मंत्रिपद न मिलने से उन्हें दुःख भी होगा | इस समय की सहानुभूति कुछ कीमत रखती है | नमस्ते करके वे चौधरी साहब के पास बैठ गए |
    शहरी नेता अपने इस पूर्व नियोजित षड्यंत्र में तो सफल हो गए कि चौधरी छोटूराम को उन्होने मिनिस्टर नहीं बनने दिया | किन्तु इतने से वे निश्चित नहीं थे , वे चाहते थे कि चौधरी साहब हमारे साथ आ जाएँ तो हमारी शक्ति बढ़ जाएगी | इसलिए उन्होने सरदार लाल सिंह को उनके पास भेजा | संदेश यह था कि चौधरी साहब हमारे साथ आ जाएँ और कौंसिल की अध्यक्षता के लिए खड़ें हो जाएँ , हम पूरी शक्ति उन्हें सफल बना देने मे लगा देंगे |
    जब सरदार लाल सिंह ने कहा कि चौधरी साहब ! हम लोगों को आपके मिनिस्टर न होने का बड़ा दुःख है , तो चौधरी साहब ने हँसते हुए कहा , मैं इस सद्भावना के लिए अतीव कृतज्ञ हूँ , क्या इस दुःख को प्रसन्नता में बदलने के लिए आप लाला मनोहर लाल से मंत्रित्व का त्यागपत्र दिला रहें हैं ? मैं आपके प्रयोजन को भली-भांति समझता हूँ |
    सरदार लाल सिंह इस उत्तर से सकपका गए और बोले , अभी तो हम आपको कौंसिल का अध्यक्ष बनाना चाहते हैं | चौधरी साहब बोले , किन्तु मैं अध्यक्षपद का उम्मीदवार नहीं , उसके उम्मीदवार तो मेरे भाई शहाबुद्दीन (मुस्लिम जाट ) हैं | सरदार लाल सिंह ने कहा , चौधरी साहब आप तो इनके हितों का इतना ख्याल रखते हैं , यह भी कुछ ख्याल आपका रखते हैं ? हम तो समझते जब फिरोज खान नून यह कह देते कि मेरी जगह चौधरी छोटूराम को मिनिस्टर बना दो | चौधरी साहब ने हँसकर जवाब दिया , सरदार साहब ! एक यूनियनिस्ट की हैसियत से तो वह ऐसा कह सकते थे किन्तु एक मुसलमान की हैसियत से ऐसा वे नहीं कह सकते थे , क्योंकि वह सीट एक मुसलमान थी | आपकी पार्टी तो एक हिन्दू की सीट पर भी मुझे बर्दाश्त नहीं कर सकी | मैं जानता हूँ यूनियनिस्ट पार्टी में भी अभी लोग विशुद्ध यूनियनिस्ट नहीं हैं , किन्तु मैं अबके मंत्री नहीं बना तो न सही | मेरे जो सिद्धान्त हैं उनके प्रचार के लिए मुझे अब और अधिक वक़्त मिलेगा |
    चौधरी साहब के इस स्पष्ट उत्तर को सुनकर सरदार साहब खाली हाथ वापिस हो गए | कहते है कि इसके बाद पंजाब के हिन्दू लीडरों ने सर सेठ छाज्जूराम को पत्र लिखा था कि आप छोटूराम को समझाकर हमारे साथ मिला दें | सेठ छाज्जूराम को चौधरी छोटूराम अपना धर्म पिता कहा करते थे , क्योंकि पढ़ने के समय से लेकर सेठ जी ने सदा ही चौधरी छोटूराम कि भरपूर मदद की और अपना वरदस्त उनके ऊपर रखा | इसी कारण प्रायः यह समझा जाता था कि सेठ जी की बात को चौधरी छोटूराम कभी इंकार नहीं कर सकेंगे | किन्तु हिन्दू नेताओं की उनके दरबार मे भी सुनवाई नहीं हुई | यह पत्र लेकर रायबहादुर बलवीर सिंह सेठ जी के पास गए | सेठ जी ने स्पष्ट कह दिया कि मैं राजनैतिक मामलों में कुछ अनुभव या ज्ञान नहीं रखता , जो चौधरी छोटूराम करते हैं , मैं उसी को ठीक मानता हूँ |
    " जाट हारा नहीं कभी रण में तीर तोप तलवारों से ,
    जाट तो हारा हैं , गद्दारों से दरबारों से
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  12. #12
    एक बार संयोगवश चौधरी छोटूराम और जनाब जिन्ना का एक साथ कालका में आना हो गया | चौधरी साहब के किसी मुस्लमान मित्र ने इस आशय से दोनों को अपने यहाँ भोजन पर निमंत्रित किया कि यहाँ उनकी आपस में कोई बातचीत हो जाये | जनाब जिन्ना पहले आकर कुर्सी पर बैठ चुके थे , चौधरी साहब थोडा देरी से पहुंचे | एक दुसरे के सामने कुर्सियां थी | धमंड में चूर जिन्ना ने उदासीनता सी दिखाते हुए अपना मुंह कुछ दूसरी ओर को कर रखा था | जिन्ना जानकर इस मुद्रा में बैठा था कि चौधरी छोटूराम उसे पहले सलाम करेंगे | परन्तु चौधरी छोटूराम भी आकर थोडा मुंह फेरकर उसी प्रकार बेरुखी के साथ बैठ गए और उनके मुंह तक कोई ग्रास न गया | वे तमामाते हुए कुछ मिनट बाद बाहर निकल आये | मेजबान के पूछने पर उन्होंने कहा कि जाट को मरोड़ में भी कौन घटा सकता है ?
    " जाट हारा नहीं कभी रण में तीर तोप तलवारों से ,
    जाट तो हारा हैं , गद्दारों से दरबारों से
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  13. #13
    " पुत्रा दे बैर ना मुके , माँ मुक गई पंजाबा दी "
    पाकिस्तान के एक चैनल पर महाराजा रणजीत सिंह पर एक परिचर्चा .... जो लोग कहते हैं कि हमने ' गुड गवर्नेंस' की हैं उनको असल में तारीख का नहीं पता उनको तो सर छोटूराम पढ़ लेना चाहिए | पंजाब की अगर हुकमरानी को पढ़ना हैं तो सिर्फ सर छोटूराम को पढ़ लें महाराजा रणजीत सिंह तो बहुत बड़े मॉडल हैं |
    परिचर्चा में रहबर-ए-आज़म सर छोटूराम के लिए अपने वज़ीर-ए-आला का भी मज़ाक उड़ा दिया .... कुछ तो बात हैं कि हस्ती मिटती नहीं हमारी ......ऐसे ही नहीं फैन हम रहबर-ए-आज़म के ... बेशक आज सर छोटूराम के पंजाब का धर्म के नाम पर बंटवारा कर दिया गया हो पर रहबर-ए-आज़म आज भी पश्चिमी पंजाब के पंजाबियों के दिलों जिंदा है |

    " जब पंजाब की धरती पर जिन्नाह के मुस्लिम फिरकापरस्ती के काले बादल मंडराने लगे और उसने यूनियनिस्ट पार्टी में सेंध लगानी चाही , और जब शहरी हिन्दू लाचार होकर अपने घरों में घुस गए , गांधी-नेहरू भी जिन्नाह के आगे घुटने टेक चुके थे , तब रहबर-ए-आज़म सर छोटूराम ने कायदे आजम जिन्नाह की ओर ताल ठोकी , उसे ललकारा , पटकी दी और जलील करके पंजाब से बाहर खदेड़ दिया | यह कोई सहज काम नहीं था , खास तौर पर मुस्लिम बहुल पंजाब में | "
    " जाट हारा नहीं कभी रण में तीर तोप तलवारों से ,
    जाट तो हारा हैं , गद्दारों से दरबारों से
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  14. #14
    मजदूर-हितों की रक्षा भी पंजाब से शुरू
    चौधरी छोटूराम जी को जिस भांति किसानों की चिंता रहती थी , उसी भांति मजदूरों के भले के लिये भी वे चिंतित रहते थे | सन 1935 के शासन-सुधारों के बाद बनी मिन्सिट्री में विकास के अतिरिक्त उद्द्योग विभाग भी उन्हीं के पास था | उद्योगों की उन्नति भी उनके समय में खूब हुई | उन्नति का क्रम कैसा रहा , इसका प्रमाण इन आंकड़ों से मिलता है : सन 1936 में 71 कारखानों का रजिस्ट्रेशन हुआ | सन 1937 में 98 , सन 1938 में 48 और सन 1939 में 71 कारखाने रजिस्टर्ड हुए | अर्थात 1936-40 तक चार वर्षों में 297 नए कारखाने खुले | कारखानों की कुल संख्या 800 हो गई थी | सन 1936 की अपेक्षा सन 1939 तक इन कारखानों पर होने वाला खर्च 13 लाख से बढ़कर 24 लाख हो गया था |
    हजारों मजदुर इन कारखानों में काम करते थे किन्तु उनकी सुविधा के लिए कारखानों के मालिक कुछ भी ध्यान नहीं देते थे | चौधरी साहिब की दृष्टि उनके कष्टों की ओर गई और उनके निवारण के लिए उन्होंने जून 1940 में पंजाब अस्सेम्ब्ली में एक बिल पास करवाया जोकि 11 जून ,1940 से पंजाब में लागु हुआ |
    इस बिल के अनुसार बंधुआ मजदूरी पर रोक | 14 साल से कम उम्र के बच्चों से मजदूरी नहीं कराई जाएगी | हफ्ते में एक दिन की छुट्टी वेतन सहित और दिन में 8 घंटे काम करने के नियत किये गए | छोटी-छोटी गलतियों पर वेतन नहीं काटा जाएगा। जुर्माने की राशि श्रमिक कल्याण के लिए ही प्रयोग हो पाएगी | काम करते हुए अगर कोई अंग-भंग हो जाए तो उसके लिए मुआवजा देने का प्रावधान किया गया |
    विरोधी पार्टियों जिसमें कांग्रेस , हिन्दू महासभा भी थी , चौधरी साहब के इस बिल पर आलोचनाएँ की | आलोचना करना उनके लिए स्वभाविक था क्योंकि उनमें से अनेक की इन उद्योग-धंधों में पूंजी लगी हुई थी | काम के घंटे और दिन नियत करने में उन्हें अपने अपरिमित मुनाफे में घाटा होता दिखाई देता था | व्यापारी वर्ग इस सिद्धांत में विश्वास रखता है कि मुनाफे की एक भी पाई छोड़ने की चीज नहीं |
    विरोध हुआ , किन्तु दृढनिश्चयी चौधरी छोटूराम के सामने शोषक वर्ग की कभी भी पेश नहीं पड़ी | उन्होंने बड़े मार्मिक शब्दों में मजदूरों के कष्टों का चित्र प्रस्तुत किया और उन कष्टों के निवारण में इस कानून को बहुत ही अच्छा बनाया |
    पंजाब की भांति फिर तो सारे भारत में ही कानून कुछ थोड़े से घटाव-बढ़ाव के साथ पास कर दिया गया | इसके बाद ही नवंबर 27, 1942 डॉक्टर भीमराव आंबेडकर जी ने इंडियन लेबर कांफ्रेंस के जरिए एक प्रस्ताव पास करवाया जिसमें भारतीय मज़दूरों के कार्य का समय 14 घंटों से 8 घंटे करवाया गया | इस प्रकार मजदूर हितों की रक्षा और उनके कष्ट निवारण के लिए अपेक्षित कानून बनाने में पंजाब सारे प्रान्त में अग्रिणी था और निसंदेह इसका श्रेय सर छोटूराम के नेतृत्व को ही था |
    इससे यह सिद्ध होता है कि आज मजदूर हितों की रक्षा के लिए जो सिद्धांत तथा कानून सरकार और समाज ने सर्वत्र स्वीकार कर लिये हैं , इन्हें चौधरी छोटूराम जी ने पहले ही लागू कर दिया था | यह उनकी प्रगतिशीलता का प्रमाण है , साथ ही इससे यह ज्ञात होता है कि वह किसानों की भाँती ही मजदूरों के शोषण को भी समाप्त करने के लिए प्रयत्नशील थे |
    " जाट हारा नहीं कभी रण में तीर तोप तलवारों से ,
    जाट तो हारा हैं , गद्दारों से दरबारों से
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    " इस कौम का ईलाही दुखड़ा किसे सुनाऊ ?
    डर हैं के इसके गम में घुल घुल के न मर जाऊँ || "
    ...........................चौ.छोटूराम ओहल्याण

  15. #15
    गवर्नर के साथ संघर्ष
    मोंटिग्यु – चेम्सफोर्ड के सुधारों के विधान में यह व्यवस्था थी कि इन सुधारों के लागू होने के अनन्तर कौंसिल के पहले चार अधिवेशन होने तक कौंसिल का अध्यक्ष गर्वनर द्वारा नामजद होगा | पांचवें अधिवेशन में कौंसिल के मेम्बरों द्वारा अध्यक्ष चुना जा सकता है | अब तक मिस्टर केशन जो कि हरियाणा के कमिश्नर रह चुके थे कोंसिल के सरकार द्वारा नामजद अध्यक्ष थे | राष्ट्रीयता एवं देशभक्ति का तकाजा था कि कौंसिल के सभी भारतीय सदस्य इस बात पर सहमत होते कि विधान द्वारा प्रदत्त अधिकार के अनुसार भारतीय सदस्यों में से किसी एक को अध्यक्ष चुनें | किन्तु राजा नरेन्द्रनाथ और सरदार जोधसिंह ने गवर्नर को सलाह दी कि आप मी० केशन को कौंसिल का मेम्बर नामजद कर दें ताकि उन्हें अध्यक्षता के लिए खड़ा होने का अधिकार प्राप्त हो जाए और वे दोबारा अध्यक्ष बनने का अवसर प्राप्त कर सकें | गवर्नर को अपनी शक्ति का विश्वास दिलाने के लिए उन्होंने यह भी कहा कि समस्त हिन्दू-सिक्ख तो मी० केशन को वोट देंगे ही , साथ ही 11 मुस्लमान भी हमने मी० केशन के पक्ष में कर लिए हैं | सर मालकम हेली यद्दपि मोंट्ग्यु चेम्सफोर्ड सुधारों को सफल बनाना चाहते थे किन्तु वे ऐसे किसी भी अवसर को हाथ से बाहर नहीं जाने देना चाहते थे जिससे यह सिद्ध होता कि भारत के हिन्दू मुस्लमान आपसी मतभेदों के समय हिन्दू या मुस्लमान की बजाए अंग्रेज को ही पसंद करते हैं | अतः उन्होंने बड़ी प्रसन्नता से राजा नरेन्द्रनाथ और सरदार जोधसिंह के प्रस्ताव को मान लिया | मियां फैजले हुसैन यद्दपि ‘ सर ‘ थे और पिछले जर्मन युद्ध में उन्होंने जन और धन से अंग्रेजों की बड़ी मदद की थी , जिसके उपलक्ष्य में अंग्रेज सरकार द्वारा वे सम्मानित भी हुए थे , किन्तु वे दुसरे देशभक्तों की तरह यह अवश्य चाहते थे कि अंग्रेज प्रभुत्व भारत में समाप्त हो और उनका स्थान भारतीय लें | उनका विश्वास बहिष्कार आन्दोलन में तो नहीं था , किन्तु वैधानिक तरीके से अंग्रेजी शासन को भारत से हटाने के लिए वे उतने ही प्रयत्नशील थे जितने सर फिरोजशाह मेहता , गोपालकृष्ण गोखले और जस्टिस रानाडे थे | अंतर इतना था कि उपर्युक्त नेता वैधानिक तरीकों से केवल भारतीय सवतंत्रता को प्राप्त करने का लक्ष्य बनाए हुए थे और मियां फैजले हुसैन इस उद्देश्य को लेकर काम कर रहे थे कि स्वतंत्र भारत के खेतिहर लोग भी शासन में उतने ही भागीदार हो सकें जितने कि महाजन एवं बुद्धिजीवी कहलाने वाले लोग | इसके लिए वे खेतिहर लोगों के लिए अधिक से अधिक शिक्षा की सुविधाएँ देने और उनकी आर्थिक दशा सुधारने वाले कानून बनाने की ओर अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगा रहे थे | पंजाब की भूमि ने उन्हें पैदा किया था और परमात्मा ने पंजाब में उन्हें बढ़ने के अवसर दिए | पंजाब के राजनीतिज्ञों में उनका स्थान ऊँचा था | पंजाब के मुसलमानों में तो वे उन दिनों सर्वोपरि नेता थे |
    भारत में जहाँ हिन्दू मुस्लमान का प्रश्न आता , वह मुसलमानों के साथ रहते थे , किन्तु जहाँ भारतीय और विदेशी का प्रसंग आता तो वे पक्के भारतीय थे | चौधरी छोटूराम के संघर्ष ने जहाँ उन्हें और भी अधिक मजबूत बनाया वहां उनमें इतना अंतर और आ गया था कि जहाँ ज़मींदार और गैर-ज़मींदार का प्रश्न आता था वहां वे ज़मींदार की पंक्ति में खड़ें दिखाए देते थे | आर्थिक क्षेत्र में वह एक मुस्लमान महाजन को अपना शोषक और हिन्दू ज़मींदार को अपना साथी मानने लग गए थे |
    किन्तु , चूँकि वे शाही तबियत के आदमी थे और अभावों का सामना उन्हें आरंभिक जीवन में करना नहीं पड़ा , इसलिए शरीर से वह कोमल व्यक्ति थे | वे नेतृत्व तो करने की क्षमता रखते थे , किन्तु मैदान में उतरने वाले कार्यकर्ता का काम उनके बूते का नहीं था | चौधरी छोटूराम मैदानी कार्यकर्ता भी थे और नेता भी और जिसे वह अपने से बड़ा अथवा ऊँचा मान लेते थे , उसमें श्रद्धा और निष्ठा भी पूरी रखते थे | चौधरी छोटूराम को पाकर मियां फैजले हुसैन का दृढ विश्वास हो गया था कि अब वह बहुत अंशों तक पूर्ण हैं |
    इसलिए जब उन्होंने सुना कि राजा नरेन्द्रनाथ और सरदार जोधसिंह ने गवर्नर से ऐसा अपवित्र गठबंधन कर लिया जिससे न केवल भारतीयों को दिया हुआ अधिकार वापिस होता है , अपितु अंग्रेजों का यह दावा भी सही होता है कि हिन्दू मुस्लमान दोनों के लिए अभी अंग्रेजों की आवश्यकता है , तो तुरंत चौधरी छोटूराम को अपने पास बुलाया और उनके आते ही पहला सवाल यह किया कि यदि गवर्नर से किसी मामले में मतभेद होने पर मुझे इस्तीफा देना पड़ें तो तुम दोगे या नहीं | चौधरी छोटूराम ने बिना हिचक के कहा ‘ अवश्य ‘ | मियां साहिब के दिल को इस उत्तर से बड़ी प्रसन्नता हुई और अचम्भा भी हुआ | उन्होंने फिर पूछा , चौधरी साहिब इतने गंभीर मामले पर आपने बिना ही कुछ जाने पूछे एकदम कैसे ‘हाँ’ कर ली ? चौधरी साहिब ने इसी निश्चिन्तता से कहा , जब हम एक ही पार्टी के सदस्य हैं और उस पार्टी में भी आप मेरे से वरिष्ठ हैं और मंत्रिमंडल में भी | तब आपके इस्तीफा देने पर मेरा नैतिक कर्तव्य हो जाता है कि मैं आपके साथ ही इस्तीफा दूँ | दुसरे यह कि पांच हजार मासिक वेतन जो मिनिस्टर को मिलता है उसके लिए मैं मिनिस्टर नहीं बना हूँ | एक उद्देश्य को लेकर चुनाव लड़ा और उसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए मिनिस्ट्री स्वीकार की , फिर उस उद्देश्य की पूर्ति में बाधा आती हो तो उसे छोड़ देना ही श्रेयकर होगा | उद्देश्य आपका और हमारा एक है | आप ऐसे आदमियों में से नहीं हैं जो बिना सोचे समझे कोई गंभीर पग उठातें हों , फिर आप से स्पष्ट कराने की आवश्यकता ही क्या थी | मियां साहिब को चौधरी साहिब के इन वचनों से और भी सांत्वना मिली और वे बोले कि राजा नरेन्द्रनाथ और सरदार जोधसिंह ने मिo केशन को ही पुनः कौंसिल का प्रेसिडेंट बनाने के लिए अपवित्र गठबंधन किया है | उसे हमें नहीं मानना है | अव्वल तो हम गवर्नर को समझाएंगे और इधर नरेन्द्रनाथ की पार्टी को भी समझा लो ; यदि वे लोग नहीं मानें तो हमें संघर्ष के लिए भी तैयार रहना चाहिए |
    चौधरी छोटूराम राजा नरेन्द्रनाथ के पास गये और उन्हें समझाया कि आप ऐसा कार्य न करें जिसे आगे की पीढ़ी मूर्खतापूर्ण और देशद्रोही बताये | राजा साहिब ने कहा मि० केशन को वचन दे चूका हूँ | मैं तो अपने वचन पर आरुढ़ रहूँगा | आप चाहें तो डॉक्टर गोकुलचंद नारंग और पं० नानकचंद से मिलें |
    चौधरी साहिब डॉक्टर नारंग के पास भी गए | प० नानकचंद भी बुला लिए गए | बहुत सारी बातचीत के बाद उक्त दोनों महानुभावों ने एक शर्त चौधरी साहिब के सामने रखी कि यदि मियां साहिब किसी हिन्दू को कौंसिल का अध्यक्ष बनाने जो तैयार हों जाएं तो हम केशन का साथ नहीं देंगे | इस पर चौधरी साहिब ने कहा , कौंसिल में एक हिन्दू मिनिस्टर है और एक मुस्लमान | यदि अध्यक्ष भी हिन्दू ही बना दिया जाये तो आप (हिन्दू) ही दो हो जाते हैं | मैं तो यह उचित समझता हूँ कि उपाध्यक्ष आप हिन्दू बना लें और मियां साहिब से यह तय कर लें कि अगली बार अध्यक्ष हिन्दू होगा | डॉक्टर नारंग ने चौधरी छोटूराम की यह बात नहीं मानी और उन्हें खाली हाथ लौटा दिया |
    जब हिन्दू महासभाईयों से कोई आशा न रही तो मियां साहिब चौधरी साहिब के लेकर गवर्नर के पास पहुंचे | उनके पूछने पर गवर्नर ने यह स्वीकार किया कि मि० केशन को कौंसिल का मेम्बर नामजद कर रहा हूँ , क्योंकि मुझे बताया गया है कि सभी हिन्दू मेम्बर और 11 मुस्लिम मेम्बर मि० केशन को दोबारा अध्यक्ष बनाने को तैयार हैं | शायद आप लोग चौधरी शाहबुद्दीन को अध्यक्ष बनाना चाहते हो , उनके पक्ष में तो सारे मुस्लमान मेम्बर भी नहीं हैं | यह हो सकता है कि कुछ ज़मींदार मेम्बर , और कुछ ख़ास तौर से चौधरी साहिब के दल के , मि० केशन को वोट न दें | किन्तु बहुमत मि० केशन के पक्ष में है | गवर्नर की इन बातों को सुनकर मियां साहिब ने कहा , यदि बहुमत मि० केशन के साथ है तो आप उन्हें नामजद कर सकते हैं किन्तु कौंसिल की अध्यक्षता करने के लिए बहुमत भी तगड़ा होना चाहिए | इस बात पर गवर्नर ने कहा – हाँ , पंजाब कौंसिल के 72 मेम्बरों में से 47-48 अर्थात दो तिहाई तो उनके पक्ष में होने ही चाहियें | निशाना लगता देखकर मियां साहिब ने कहा , इतना बड़ा बहुमत उनके साथ कदापि नहीं है | देखिये कांग्रेसी मेम्बर एक सरकारी अधिकारी के लिए सिद्धांततः वोट नहीं देंगे | इस पर गवर्नर ने चौधरी छोटूराम की ओर देखकर पूछा क्या मियां साहिब का यह अनुमान ठीक है ? चौधरी साहब ने कहा – एक चौधरी रामसिंह कांगडे वाले को छोड़कर हमारा कोई भी हिन्दू ज़मींदार मि० केशन को वोट नहीं देगा और असल बात तो यह है कि हम व्यक्तिगत रूप से मि० केशन को उनकी निष्पक्षता और ईमानदारी पर प्यार करते हैं , किन्तु जो अधिकार हमें प्राप्त है अपना अध्यक्ष बनाने कर , उसे हम एक सरकारी अधिकारी को अध्यक्ष बनाकर खोना नहीं चाहते हैं | चौधरी साहिब का ऐसा स्पष्ट जवाब सुनकर गवर्नर के पैरों तले से ज़मीन खिसकती महसूस हुई | उन्होंने एक और पाला डाला , देखो मैं स्वयं भी मि० केशन को अध्यक्ष बनाने के पक्ष में हूँ क्योंकि उनके प्रधान बनने से हिन्दू मुस्लमान का सवाल खड़ा न होगा | उनकी आपसी साम्प्रदायिक भावनाएं न होंगी , आप सब लोगों का उनकी कार्यकुशलता में विश्वास है ही | इस पर मियां साहिब ने कहा , लेकिन इस प्रकार तो कभी हिन्दू मुस्लिम समस्या हल नहीं होगी और दूसरी यह भी तो प्रतिक्रिया हो सकती है कि हमारी लड़ाई से अंग्रेज लाभ उठाना चाहता है और वह अपने भले के लिए हमें कभी भी एक नहीं होने देगा | इसलिए आप इन दोनों की इस नासमझी में अंग्रेज को बदनाम न कराइये | गवर्नर का यह दाव भी खाली गया आयर अंत में तय यह हुआ कि दोनों पक्ष अपने अपने मत की पुष्टि में मेंबरों के हस्ताक्षर लाएं , उन्हें को देखकर निर्णय लिया जायेगा | मियां साहिब और चौधरी साहिब दोनों गवर्नर के यहाँ से वापिस आ गए |
    तीन दिन के भीतर ही उन्होंने 35 मेम्बरों के हस्ताक्षर मि० केशन को वोट न देने के पक्ष में गवर्नर साहिब के पास भेज दिए | राजा नरेन्द्रनाथ ने हस्ताक्षर कराने के लिए एक सप्ताह का समय माँगा | राजा नरेन्द्रनाथ जिस समय हस्ताक्षर कराने की फ़िक्र में थे उसी समय श्री अब्दुल कादिर ने मि० केशन से यह कह दिया कि मैं स्वयं अध्यक्षता के लिए खड़ा हो रहा हूँ , अतः आपकी सहायता न कर सकूँगा |
    बात यह थी कि श्री अब्दुल कादिर ने मि० केशन और राजा नरेन्द्रनाथ को विश्वास दिलाया था कि मेरे साथ 11 मुस्लमान मेम्बर हैं वे उसे ही वोट देंगे जिसे मैं दिलाना चाहूँगा | मियां फैजले हुसैन को अब अपनी बात रखनी थी | अतः उन्होंने अब्दुल कादिर से कहा , मि० केशन को वोट दिलाने की अपेक्षा तो यही अच्छा होगा कि आप ही अध्यक्ष बन जाओ | इस पर अब्दुल कादिर रजामंद हो अगये | गवर्नर मि० केशन को वचन दे चुके थे , अतः उन्हें यह उचित प्रतीत नहीं हुआ कि स्वयं मि० केशन से कुछ कहें | उन्होंने दोनों मंत्रियों को बुलाया और उनसे कहा , बात वैधानिक रूप से आपकी ठीक है | बहुमत भी आपके पक्ष में है किन्तु मि० केशन को वचन दे चूका हूँ | आप मेरी बात रख लें | मियां साहिब ने कहा , मि० केशन के व्यक्तित्व से हमें कोई विरोध नहीं है | इसी समय मि० केशन गवर्नर साहिब से मिलने आये थे , उन्होंने सभी बातें पास अले कमरे में सुनी | तुरंत बीच में आकर बोले , मैं भी वोट पर अपना नाम चढ़ाना उचित नहीं समझता , इससे हमारे निजी संबंधों में कटुता आएगी | उनके इंकार करने पर मामला सुलझ गया और दोनों ओर का मान रह गया |
    contd .....
    " जाट हारा नहीं कभी रण में तीर तोप तलवारों से ,
    जाट तो हारा हैं , गद्दारों से दरबारों से
    |"

    " इस कौम का ईलाही दुखड़ा किसे सुनाऊ ?
    डर हैं के इसके गम में घुल घुल के न मर जाऊँ || "
    ...........................चौ.छोटूराम ओहल्याण

  16. #16
    .......
    राजा नरेन्द्रनाथ की प्रार्थना पर चुनाव की तारीख आगे के लिए बढाई गई क्योंकि उनका कहना था कि हमने अपना दूसरा उम्मीदवार अभी तैयार नहीं किया है | मियां साहब और चौधरी साहब ने उनकी समय लेने की बात को मान लिया |

    डॉक्टर नारंग मोर्चे पर आये | एक तो डॉक्टर साहब वैसे ही प्रभावशाली थे दुसरे सभी नामजद मेम्बरों ने गवर्नर साहब के आदेश पर डॉक्टर साहब को ही वोट दिए किन्तु फिर भी वे विजयी न हो सके |
    यहाँ यह भी स्मरणीय है कि चौधरी छोटूराम के प्रयत्नों से सभी जाट-सिख सदस्य सरदार जोधसिंह का साथ छोड़कर यूनियनिस्ट उम्मीदवार के पक्ष में आ गए |
    इस हार से हिन्दू सभासदों को गहरा धक्का लगा | उनके कहने सुनने से श्री मोहनलाल , जो लाहौर के प्रिसद्ध आर्य समाजियों में से थे , चौधरी छोटूराम जी के पास आये और किसी हिन्दू को उपाध्यक्ष (वाईस प्रेसिडेंट) बनाने के लिए उनकी सहायता चाही | चौधरी साहब ने कहा , मैंने तो आपके इन नेताओं से बड़ी विन्रमता के साथ निवेदन किया था कि आपसी राजीनामे से इन दोनों पदों की सर्वसम्मत नियुक्तियां कर लें | किन्तु उन्होंने मेरी सलाह बड़ी लापरवाही के साथ ठुकरा दी | अब वे जिसे चाहें उसे बनाएँगे किन्तु यह आप विश्वास रखें कि यूनियनिस्ट पार्टी ऐसा निश्चय नहीं कर सकती कि अध्यक्ष और उपाध्यक्ष दोनों ही मुस्लमान हों |
    आखिरकार हुआ भी यही , उपाध्यक्ष पद के लिए यूनियनिस्ट पार्टी ने सरदार महेंद्र सिंह जी को तय किया | वह जाट सिख थे | हिन्दू सभा ने प० नानकचंद जी को खड़ा किया | गवर्नर ने अब की बार भी सरकार द्वारा नामजद मेम्बरों को प० नानकचंद के पक्ष में अपना वोट देने का आदेश दिया , किन्तु विजयमाला यूनियनिस्ट उम्मीदवार सरदार महेंद्र सिंह के गले में पड़ी | इस प्रकार पंजाब कौंसिल में यूनियनिस्ट पार्टी ने पूर्ण राष्ट्रीयता का परिचय दिया और अपनी बात को पूरा किया |
    " जाट हारा नहीं कभी रण में तीर तोप तलवारों से ,
    जाट तो हारा हैं , गद्दारों से दरबारों से
    |"

    " इस कौम का ईलाही दुखड़ा किसे सुनाऊ ?
    डर हैं के इसके गम में घुल घुल के न मर जाऊँ || "
    ...........................चौ.छोटूराम ओहल्याण

  17. #17
    4 सितम्बर , 1935 को लायलपुर में ज़मींदारों की एक सभा को संबोधित करते हुए चौधरी छोटूराम ने कहा था अब पूंजीवाद के दिन लद गए हैं ...
    .... हमें मोटी तोंद वाले टैक्स वालों की जरुरत है , जब तक कि सरकार जमींदार को वह राहत न दे दे जो उसे देनी चाहिए | हाल में मैं राजस्व घटाने के पक्ष में नहीं हूँ , क्योंकि मुझे गरीब जमींदार की जरूरतों का ज्ञान है | यहाँ लालाओं के बीच कुछ लोग हैं जिन्हें तकलीफ होगी , क्योंकि वह बहुत ज्यादा खाते हैं , जबकि गरीब जमींदार अपनी जरूरतों के लिए मर रहा है | इन अमीरों को अपनी तकलीफ के समाधान के लिए मेरे पास आने दो | इनके लिए मेरे पास कारगर नुस्खा है |
    .... मैं गरीब ज़मींदारों की तकलीफ को समझ सकता हूँ क्योंकि मैंने वह तकलीफे झेली हैं | गाँधी व नेहरु इस गरीबी की कल्पना भी नहीं कर सकते | मैं किसी भी अमीर व्यक्ति को चुनौती देता हूँ कि वह उस रोटी का एक टूक भी खा कर दिखा दे जिसको ज़मींदार खाता है , मैं दावा करता हूँ यदि उसका गला न घुट जाए तो |
    ...मैं सर से पैर तक इन्कलाब हूँ , और मैं समझता हूँ कि यह मेरा कर्तव्य होगा इन्कलाब लाना |
    " जाट हारा नहीं कभी रण में तीर तोप तलवारों से ,
    जाट तो हारा हैं , गद्दारों से दरबारों से
    |"

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    डर हैं के इसके गम में घुल घुल के न मर जाऊँ || "
    ...........................चौ.छोटूराम ओहल्याण

  18. #18
    सर छोटूराम जब पंजाब में मंत्री थे तो उन्हें मुजफ्फरनगर उत्तर प्रदेश के जाट कालेज के उत्सव पर बुलाया गया । उस प्रोग्राम में एक जिलाधीश भी आमंत्रित थे। जिलाधीश महोदय ने जो कि गैर जाट जाति से संबंधित थे, अपने भाषण में चौधरी छोटूराम को पूर्ण सम्मान देते हुए कहा कि-"किसानों को सरकारी नौकरियों के पीछे दौड़ने की अपेक्षा अपने पैतृक व्यवसाय खेती बाड़ी करने में ध्यान लगाना चाहिए|"
    चौधरी छोटूराम हमेशा से किसानों के हिमायती थे और पंजाब में उस समय सर छोटूराम किसानों के लड़कों का नौकरी में प्रवेश हो, इस बात के लिए निरंतर संघर्ष रत थे।
    अतः जब सर छोटूराम की अध्यक्ष के नाते बोलने की बारी आई तो उन्होंने जिलाधीश की बात का करारा उत्तर देते हुए कहा कि"राज्य की नौकरी गुलामी नहीं है यह तो राज्य में हिस्सा लेना या हाथ बंटाना है।जो लोग नौकरी नहीं करेंगे वे राज्य में अपना भाग प्राप्त नहीं कर सकेंगे। नौकरी यदि बुरी चीज है तो जिलाधीश साहब आप अपने पैतृक व्यवसाय को छोड़कर नौकरी में क्यों आए??
    चौधरी साहब की स्पष्टवादिता एवं नाराजगी देखकर सभा की समाप्ति पर जिलाधीश ने अपने वक्तव्य पर खेद प्रकट किया।

    सर छोटूराम को इतना अगाध प्रेम था किसानों से। किसानों के हक के लिएचौधरी साहब किसी से भी टकराने के लिए हमेशा तैयार रहते थे।
    " जाट हारा नहीं कभी रण में तीर तोप तलवारों से ,
    जाट तो हारा हैं , गद्दारों से दरबारों से
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  19. #19
    पूर्वी पंजाब जाट महासभा के एक सम्मलेन , जो सोनीपत में हुआ था , में सर छोटूराम के भाषण के कुछ शब्द ( ये भाषण 2 अप्रैल, 1940 को दी ट्रिब्यून अख़बार के पृ.1 पर छापा था)
    जाटों को संबोधित करते हुए विकास मंत्री सर छोटूराम ने कहा : ... मैं आपको यकीन दिलाता हूँ की सर सिकंदर हयात खान कभी भी पूर्ण इस्लामिक सरकार में प्रीमियरशिप (प्रधानमंत्रित्व) स्वीकार नहीं करेंगे | वास्तव में , मुझे यकीन है कि वह ऐसी सरकार में मंत्री पद या अन्य कोई जिम्मेदार पद भी अस्वीकार कर देंगे | आपको स्पष्ट कर दूँ कि कुछ वर्ष पूर्व मैंने पंजाब में एक गैर साम्प्रदायिक पार्टी जिसके असेम्बली सबसे ज्यादा मुस्लिम सदस्य हैं , के नेता के तौर पर कहा था कि ऐसी हर कोशिश जिसमें इस्लामिक स्टेट बनाने की बात की जाएगी तो मैं सबसे पहला व्यक्ति होऊंगा जो उसके विरुद्ध बगावत का झंडा लेकर खड़ा होऊंगा और अपने पुरे जोर से उसका विरोध करूँगा |
    मुस्लिम लीग के हालिया लाहौर सत्र में लीग व श्रीमान जिन्नाह द्वारा प्रस्तावित दो राष्ट्र का सिद्धांत पूर्ण रूप से राष्ट्र विरोधी दृष्टिकोण से पास किया गया एक बेतुका प्रस्ताव है और यह पूरी तरह से अव्यावहारिक है | मैं ऐसी हर अव्यावहारिक व बेतुकी योजना का पुरजोर विरोध करूँगा , फिर चाहे वह किसी हिन्दू बनिये द्वारा आगे रखी गई हो या फिर खोजा बनिये (श्री जिन्नाह) द्वारा आगे रखी गई हो | हम लीग के इस राष्ट्र विरोधी व शरारत भरे प्रस्ताव का हर कीमत पर विरोध करने का संकल्प करते हैं |
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  20. #20
    ऐसे ही नहीं ये किश्ती मझधार से निकल कर यहाँ तक आई है | इसके लिए बहुत मेहनत करनी पड़ी है |
    सर छोटूराम एक ऐसे समाज हितेषी थे जिन्हें अपने ज़माने में लगभग हर गाँव के होनहार बच्चे की खबर रहती थी | जो कोई गरीब होनहार बच्चा होता तो उसके घर बिना खबर के आगे की पढाई के लिए वजीफा जाना शुरू हो जाता | ऐसा ही एक किस्सा हरयाणा के एक बड़े दलित नेता जो सूबे के उप-मुख्यमंत्री भी रहे और केंद्र में जहाजरानी मंत्री भी रहे , चौधरी चांदराम का है | चौधरी चांदराम गरीब दलित परिवार से थे परन्तु पढाई में बहुत ही होनहार थे | आठवीं कक्षा में उन्होंने बहुत ही अच्छे अंक प्राप्त किये परन्तु आगे की पढाई के लिए घर वालों की अथिक स्थिति साथ नहीं दे रही थी | तभी एक दिन चौधरी चांदराम के घर एक मनी-आर्डर आया और सन्देश था कि अपनी आगे की पढाई जारी रखना , तुम्हारी फीस मिलती रहेगी | और यह मनी आर्डर था चौधरी छोटूराम की तरफ से |

    चौधरी छोटूराम देहात के हर बच्चे की खबर रखते थे कि किसने क्या पढाई की और कितने अंकों से पास की , और फिर उसी योग्यता अनुसार उस बच्चे को पढाई और योग्यता अनुसार पद पर महकमे में लगवाते | ऐसी ही एक मिसाल इस ख़त में देखने को मिलती है जो उन्होंने चौधरी माडू सिंह को लिखा था | ख़त चौधरी छोटूराम लिखते हैं , ' मेरे मानना है कि रेवाड़ा में एक एफए पास नौजवान है . आप उसे कहें कि वह सहायक-पंचायत अधिकारी के लिए आवेदन करे | और उस नौजवान को यह नहीं पता चलना चाहिए कि यह सलाह मेरी तरफ से है | उसे यही लगना चाहिए कि ये आप ही उसे कह रहें हैं ' |

    ऐसे थे रहबरे आज़म सर छोटूराम | और एक हमारे आज के नेता हैं जो किसी भी नौजवान को नौकरी लगवाते हैं तो उसके पुरे कुण्बे पर एहसान जताते हैं और चुनाव के वक्त उस एहसान को याद दिलाते हैं कि मैंने नौकरी दिलवाई थी तो मुझे वोट दो | यदि सर छोटूराम यह रवैया अपनाते तो क्या ये किश्ती मझधार से निकल पाती ? सर छोटूराम हर कदम बहुत सोच समझ कर रखते थे , वह अपने हर कदम में समाज के भविष्य को ध्यान में रखते थे
    कि कल हम नहीं रहे तो भी समाज की किश्ती खुद पार लग जाए | तभी वह रहबरे आज़म दीनबंधु कहलाए |




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    " जाट हारा नहीं कभी रण में तीर तोप तलवारों से ,
    जाट तो हारा हैं , गद्दारों से दरबारों से
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    " इस कौम का ईलाही दुखड़ा किसे सुनाऊ ?
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