Surya Mandir

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Surya Mandir (सूर्य मंदिर) or Sun Temple at Jhalrapatan was constructed by Nagabhatta II in samvat 872 (=815 AD). Sun Temple Katarmal, Almora, Uttarakhand was constructed by Katyuri Kings in the 9th century CE.

History

कटारमल सूर्य मंदिर

विजयेन्द्र कुमार माथुर[1] ने लेख किया है ...कटारमल (AS, p.126) उत्तराखण्ड के अल्मोड़ा से 10 मील (लगभग 16 कि.मी.)दूर है। कटारमल में सूर्य का प्राचीन मंदिर है जो पहाड़ की चोटी पर है। सूर्य की मूर्ति पत्थर की है और बारहवीं शती ई. की कलाकृति मानी जाती है। सूर्य को कमलासीन अंकित किया गया है। उसके सिर पर मुकुट तथा पीछे प्रभामंडल है। मंदिर के विशालमंडप में अनेक मूर्तियाँ हैं। मंदिर वास्तुकला की दृष्टि से तो महत्त्वपूर्ण है ही, साथ ही उत्तर भारत का शायद यह अकेला ही सूर्य मंदिर है जहाँ सूर्य की पूजा आज भी प्रचलित है।

सूर्य मंदिर झालरापाटन

राजस्थान में झालरापाटन का सूर्य मंदिर यहाँ के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है। यह मंदिर अपनी प्राचीनता और स्थापत्य वैभव के कारण कोणार्क के सूर्य मंदिर और ग्वालियर के 'विवस्वान मंदिर' का स्मरण कराता है। शिल्प सौन्दर्य की दृष्टि से मंदिर की बाहरी व भीतरी मूर्तियाँ वास्तुकला की चरम ऊँचाईयों को छूती है। मंदिर का ऊर्घ्वमुखी कलात्मक अष्टदल कमल अत्यन्त सुन्दर जीवंत और आकर्षक है। शिखरों के कलश और गुम्बज अत्यन्त मनमोहक है। गुम्बदों की आकृति को देखकर मुग़लकालीन स्थापत्य एवं वास्तुकला का स्मरण हो जाता है।

राजस्थान में कभी 'झालरों के नगर' के नाम से प्रसिद्ध झालरापाटन का हृदय स्थल यहाँ का सूर्य मंदिर हैं। इस मंदिर का निर्माण नवीं सदी में हुआ था। यह मंदिर अपनी प्राचीनता और स्थापत्य वैभव के कारण प्रसिद्ध है। कर्नल जेम्स टॉड ने इस मंदिर को चार भूजा (चतुर्भज) मंदिर माना है। वर्तमान में मंदिर के गर्भग्रह में चतुर्भज नारायण की मूर्ति प्रतिष्ठित है।

इतिहास: 11 वीं सदी पश्चात् सूर्य मंदिर शैली में निर्मित 'शान्तिनाथ जैन मंदिर' को देखकर पर्यटकों को सूर्य मंदिर में जैन मंदिर का भ्रम होने लगता है। किन्तु चतुर्भुज नारायण की स्थापित प्रतिमा, भारतीय स्थापत्य कला का चरम उत्कर्ष एवं मंदिर का रथ शैली का आधार, ये सब निर्विवाद रूप से सूर्य मंदिर प्रमाणित करते हैं। वरिष्ठ इतिहासकार बलवंत सिंह हाड़ा द्वारा सूर्य मंदिर में प्राप्त शोधपूर्ण शिलालेख के अनुसार संवत 872 (9 वीं सदी) में नागभट्ट द्वितीय द्वारा झालरापाटन के इस मंदिर का निर्माण कराया गया था।

स्थापत्य शैली: झालरापाटन का विशाल सूर्य मंदिर, पद्मनाथजी मंदिर, बड़ा मंदिर, सात सहेलियों का मंदिर आदि अनेक नामों से प्रसिद्ध है। यह मंदिर दसवी शताब्दी का बताया जाता है। मंदिर का निर्माण खजुराहो एवं कोणार्क शैली में हुआ है। यह शैली ईसा की दसवीं से तेरहवीं सदी के बीच विकसित हुई थी। रथ शैली में बना यह मंदिर इस धारणा को पुष्ट करता है। भगवान सूर्य सात अश्वों वाले रथ पर आसीन हैं। मंदिर की आधारशिला सात अश्व जुते हुए रथ से मेल खाती है। मंदिर के अंदर शिखर स्तंभ एवं मूर्तियों में वास्तुकला उत्कीर्णता की चरम परिणति को देखकर दर्शक आश्चर्य से चकित होने लगता है।

शिल्प सौन्दर्य की दृष्टि से मंदिर की बाहरी व भीतरी मूर्तियां वास्तुकला की चरम ऊँचाईयों को छूती है। मंदिर का ऊर्घ्वमुखी कलात्मक अष्टदल कमल अत्यन्त सुन्दर जीवंत और आकर्षक है। मदिर का उर्ध्वमुखी अष्टदल कमल आठ पत्थरों को संयोजित कर इस कलात्मक ढंग से उत्कीर्ण किया गया है, जैसे यह मंदिर कमल का पुष्प है। मंदिर का गगन स्पर्शी सर्वोच्च शिखर 97 फीट ऊँचा है। मंदिर में अन्य उपशिखर भी हैं। शिखरों के कलश और गुम्बज अत्यन्त मनमोहक है। गुम्बदों की आकृति को देखकर मुग़लकालीन स्थापत्य एवं वास्तुकला का स्मरण हो जाता है। सम्पूर्ण मंदिर तोरण द्वार, मण्डप, निज मंदिर, गर्भ ग्रह आदि बाहरी भीतरी भागों में विभक्त हैं समय समय पर मंदिर के जीर्ण ध्वजों का पुनरोद्धार एवं ध्वजारोहण हुआ है।

विविध उल्लेख: पुराणों में भगवान सूर्य देव की उपासना चतुर्भुज नारायण के रूप में की गई है। 'राजस्थान गजेटियर' झालावाड़ के अनुसार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग, भारत सरकार द्वारा यहाँ के संरक्षित महत्वपूर्ण स्मारकों की सूची में सूर्य (पद्मनाथ) मंदिर का प्रथम स्थान है। 'सूचना व जनसम्पर्क विभाग' द्वारा प्रकाशित 'राजस्थान झालावाड़ दर्शन'[ पृष्ठ 13] तथा 'ज़िला झालावाड़ प्रगति के 3 वर्ष'[पृष्ठ 5] संदर्भ ग्रन्थों में भी सूर्य मंदिर को 'पद्मनाथ' तथा 'सात सहेलियों का मंदिर' कहा गया है। 'पर्यटन और सांस्कृतिक विभाग' राजस्थान द्वारा प्रकाशित 'राजस्थान दर्शन एवं गाइड' में इस प्राचीन मंदिर को झालरापाटन नगर का प्रमुख आकर्षण केन्द्र माना माना गया है। भारत में सूर्य की सबसे अच्छी एवं सुरक्षित प्रतिमा के रूप में इसे मान्यता प्रदान की गई है।

संदर्भ: [भारतकोश-सूर्य मंदिर झालरापाटन

ग्वालियर का सूर्य मंदिर

ग्वालियर का दुर्ग बहुत प्राचीन है और इसका प्रारंभिक इतिहास तिमिराच्छन है. हूण महाराजाधिराज तोरमाण के पुत्र मिहिरकुल के शासनकाल के 15 वें वर्ष (525 ई.) का एक शिलालेख ग्वालियर दुर्ग से प्राप्त हुआ था जिसमें मातृचेत नामक व्यक्ति द्वारा गोपाद्रि या गोप नाम की पहाड़ी (जिस पर दुर्ग स्थित है) पर एक सूर्य मंदिर बनवाए जाने का उल्लेख है. इससे स्पष्ट है कि इस पहाड़ी का प्राचीन नाम गोपाद्रि (रूपांतर गोपाचल, गोपगिरि) है तथा इस पर किसी न किसी प्रकार की बस्ती गुप्त काल में भी थी. दुर्ग के स्मारकों में ग्वालियर का लंबा इतिहास प्रतिबिंबित होता है. यहां का सर्व प्राचीन स्मारक मातृचेत का बनवाया हुआ सूर्य मंदिर ही था जिसका कोई चिन्ह अब नहीं है किंतु जिसकी स्थिति सूरज तालाब के निकट रही होगी. [2]

देवलार्क अथवा देवलास

विजयेन्द्र कुमार माथुर[3] ने लेख किया है ...देवलार्क अथवा 'देवलास' (AS, p.451) आजमगढ़ ज़िला, उत्तर प्रदेश (वर्तमान जिला मऊ) का एक क़स्बा है। देवलास का प्राचीन नाम देवलार्क हुआ करता था, जिसका अर्थ 'सूर्य मन्दिर' है। देवलार्क तमसा (टौंस) के उत्तरी तट पर मुहम्मदाबाद स्टेशन से 4 मील की दूरी पर बसा है। यहाँ पर प्राचीन सूर्य मंदिर के अवशेष आज भी उपस्थित हैं। मन्दिर में स्थापित सूर्य की प्राचीन मूर्ति स्वर्ण की थी, किन्तु अब संगमरमर की है।


देवलास एक प्रसिद्ध सांस्कृतिक स्थल है जो मऊ और आजमगढ़ से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह मुहम्मदाबाद गोहना तथा घोसी मार्ग पर है। लगभग 20 मंदिर यहां हैं तथा प्राचीन वटवृक्ष देखे जा सकते हैं। सब से प्रसिद्ध मंदिर सूर्य मंदिर है। शायद इसी लिए इसे पहले देवलार्क (देवल + अर्क = सूर्य मंदिर) कहा जाता था। यहां स्कन्द गुप्त कालीन / गुप्त कालीन मूर्तियां मिलती हैं। इन पर शोध किया जाना बाक़ी है। यहां देव ताल एवं तुलसी ताल नामक दो प्रसिद्ध ताल हैं। इन की प्राकृतिक छवि देखने लायक है। दीपावली के छठे दिन [ कार्तिक षष्ठी ] से यहां एक सप्ताह का बहुत बड़ा मेला लगता है, जिसमें कृषि संस्कृति की ज़रूरतों से लेकर अन्य वस्तुएं बिकती हैं। पशुओं की भी बिक्री होती रही है। मेले में सर्कस, मिठाइयां, लकड़ी, लोहे के सामान, पुस्तकें , प्लास्टिक की चीज़ें यहां बहुतायत से उपलब्ध होती हैं। दूर दूर की नाटक मंडलियां यहां इस अवसर पर आ कर मेले में लोक नाट्य एवं लोक संगीत की प्रस्तुति करती हैं। जनता इस मेले में उमड़ पड़ती है। कभी कभी तो तिल भर भी जगह नहीं होती।[4]

External links

References