Amarnath

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Author:Laxman Burdak, IFS (R)

Anantnag district map

Amarnath (अमरनाथ) cave is a Hindu shrine located in Jammu and Kashmir, India.

Variants

Location

The cave is situated at an altitude of 3,888 m , about 141 km (88 mi) from Srinagar, the summer capital of Jammu and Kashmir and reached through Pahalgam town. The cave is surrounded by snowy mountains. The cave itself is covered with snow most of the year except for a short period of time in summer when it is open for pilgrims. Hundreds of thousands of Hindu devotees make an annual pilgrimage to the Amarnath cave across challenging mountainous terrain.

Origin

History

The book Rajatarangini (Book VII v.183) refers to Amareshwara or Amarnath. It is believed that Queen Suryamathi in the 11th century AD gifted trishuls, banalingas and other sacred emblems to this temple.[1] Rajavalipataka, begun by Prjayabhatta has detailed references to the pilgrimage to Amarnath Cave. Other than this, there are further references to this pilgrimage in many other ancient texts.

Discovery of Holy Cave: According to legend, Bhrigu Muni was the first to have discovered Amarnath. Long time ago it is believed that The Valley of Kashmir was submerged under water and Kashyapa drained it through a series of rivers and rivulets. Therefore, when the waters drained, Bhrigu was the first to have Darshan of Lord Amarnath. Thereafter, when people heard of the Lingam, it became an abode of Lord Bholenath for all believers and a pilgrimage which is done by lakhs of people each year. According to the researchers and as per the belief of locals gadaria community were the first to discover the Amaranth cave and saw the first glimpse of Baba Barfani.

François Bernier, a French physician accompanied Emperor Aurangzeb during his visit to Kashmir in 1663. In his book “Travels in Mughal Empire” he writes while giving an account the places he visited in Kashmir that he was “pursuing journey to a grotto full of wonderful congelations, two days journey from Sangsafed” when he “received intelligence that my Nawab felt very impatient and uneasy on account of my long absence”. The “grotto” he refers to is obviously the Amarnath cave as the editor of the second edition of the English translation of the book, Vincient A. Smith makes clear in his introduction. He writes: “The grotto full of wonderful congelations is the Amarnath cave, where blocks of ice, stalagmites formed by dripping water from the roof are worshipped by many Hindus who resort here as images of Shiva…..”[2]

The Amarnath temple

The Amarnath temple is one of 18 Maha Shakti Peethas, or "Grand Shakti Peethas" – highly revered temples throughout South Asia that commemorate the location of fallen body parts of the Hindu deity Sati.

अमरनाथ

विजयेन्द्र कुमार माथुर[3] ने लेख किया है ...अमरनाथ (कश्मीर) (AS, p.31): हिमाच्छादित शैलमालाओं के बीच समुद्रतल से लगभग 12000 फुट की ऊंचाई पर पहलगांव से 27 मील दूर प्राचीन महत्वपूर्ण तीर्थ है. गुफा में ऊपर से जल टपकने के कारण नीचे हिमनिर्मित शिवलिंग की आकृति उच्चयवाश्म (stalagmite) बन जाती है जिसके लिए कहा जाता है कि यह शुक्लपक्ष में स्वयं निर्मित होकर कृष्णपक्ष में धीरे-धीरे विगलित हो जाती है. अमरनाथ की यात्रा वर्ष में केवल एक दिन श्रावणपूर्णिमा-रक्षाबंधन दिवस को होती है (देखें अमर पर्वत)

अमरनाथ परिचय

अमरनाथ हिन्दुओं का एक प्रमुख तीर्थस्थल है। यह जम्मू - कश्मीर राज्य के श्रीनगर शहर के उत्तर-पूर्व में 141 किलोमीटर दूर समुद्र तल से 3,888 मीटर (12756 फुट) की ऊंचाई पर स्थित है। इस गुफ़ा की लंबाई (भीतर की ओर गहराई) 19 मीटर और चौड़ाई 16 मीटर है। यह गुफ़ा लगभग 150 फीट क्षेत्र में फैली है और गुफ़ा 11 मीटर ऊंची है तथा इसमें हज़ारों श्रद्धालु समा सकते हैं। प्रकृति का अद्भुत वैभव अमरनाथ गुफ़ा, भगवान शिव के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है। अमरनाथ को तीर्थों का तीर्थ कहा जाता है। एक पौराणिक गाथा के अनुसार भगवान शिव ने पार्वती को अमरत्व का रहस्य (जीवन और मृत्यु के रहस्य) बताने के लिए इस गुफ़ा को चुना था। मृत्यु को जीतने वाले मृत्युंजय शिव अमर हैं, इसलिए 'अमरेश्वर' भी कहलाते हैं। जनसाधारण 'अमरेश्वर' को ही अमरनाथ कहकर पुकारते हैं।[4]

इतिहास: अमरनाथ यात्रा के उद्गम के बारे में इतिहासकारों के अलग-अलग विचार हैं। कुछ लोगों का विचार है कि यह ऐतिहासिक समय से संक्षिप्त व्यवधान के साथ चली आ रही है जबकि अन्य लोगों का कहना है कि यह 18वीं तथा 19वीं शताब्दी में मलिकों या मुस्लिम गडरियों द्वारा पवित्र गुफ़ा का पता लगाने के बाद शुरू हुई। आज भी चौथाई चढ़ावा उस मुसलमान गडरिए के वंशजों को मिलता है। इतिहासकारों का विचार है कि अमरनाथ यात्रा हज़ारों वर्षों से विद्यमान है। तथा बाबा अमरनाथ दर्शन का महत्त्व पुराणों में भी मिलता है। पुराण अनुसार काशी में लिंग दर्शन और पूजन से दस गुना, प्रयाग से सौ गुना और नैमिषारण्य से हज़ार गुना पुण्य देने वाले श्री अमरनाथ के दर्शन है। बृंगेश सहिंता, नीलमत पुराण, |कल्हण की राजतरंगिनी आदि में इस का बराबर उल्लेख मिलता है। बृंगेश संहिता में कुछ महत्त्वपूर्ण स्थानों का उल्लेख है जहाँ तीर्थयात्रियों को श्री अमरनाथ गुफ़ा की ओर जाते समय धार्मिक अनुष्ठान करने पड़ते थे। उनमें अनन्तनया (अनन्तनाग), माच भवन (मट्टन), गणेशबल (गणेशपुर), मामलेश्वर (मामल), चंदनवाड़ी (2,811 मीटर), सुशरामनगर (शेषनाग) 3454 मीटर, पंचतरंगिनी (पंचतरणी) 3845 मीटर और अमरावती शामिल हैं।[5]

कल्हण की 'राजतरंगिनी तरंग द्वितीय' में कश्मीर के शासक सामदीमत (34 ईपू-17वीं ईस्वी) का एक आख्यान है। वह शिव का एक बड़ा भक्त था जो वनों में बर्फ़ के शिवलिंग की पूजा किया करता था। बर्फ़ का शिवलिंग कश्मीर को छोड़कर विश्व में कहीं भी नहीं मिलता। कश्मीर में भी यह आनन्दमय ग्रीष्म काल में प्रकट होता है। कल्हण ने यह भी उल्लेख किया है कि अरेश्वरा (अमरनाथ) आने वाले तीर्थयात्रियों को सुषराम नाग (शेषनाग) आज तक दिखाई देता है। नीलमत पुराण में अमरेश्वरा के बारे में दिए गए उल्लेख से पता चलता है कि इस तीर्थ के बारे में छठी-सातवीं शताब्दी में भी जानकारी थी।[6]

कश्मीर के महान् शासकों में से एक था 'जैनुलबुद्दीन' (1420-70 ईस्वी), जिसे कश्मीरी लोग प्यार से बादशाह कहते थे, उसने अमरनाथ गुफ़ा की यात्रा की थी। इस बारे में उसके इतिहासकार जोनराज ने उल्लेख किया है। अकबर के इतिहासकार अबुल फ़जल (16वीं शताब्दी) ने आइना-ए-अकबरी में उल्लेख किया है कि अमरनाथ एक पवित्र तीर्थस्थल है। गुफ़ा में बर्फ़ का एक बुलबुला बनता है। जो थोड़ा-थोड़ा करके 15 दिन तक रोजाना बढता रहता है और दो गज से अधिक ऊंचा हो जाता है। चन्द्रमा के घटने के साथ-साथ वह भी घटना शुरू कर देता है और जब चांद लुप्त हो जाता है तो शिवलिंग भी विलुप्त हो जाता है। [7]

अमरपर्वत

विजयेन्द्र कुमार माथुर[8] ने लेख किया है ...अमर पर्वत (AS, p.32): 'कृत्स्नं पंचनदं चैव तथैवामरपर्वतम्, उत्त्रज्योतिषं चैव तथा दिव्यकंट पुरम्-द्वारपालं च तरसा वशेचक्रे महाद्युति:' (महाभारत सभापर्व 32, 11-12)

नकुल ने अपनी पश्चिम दिशा की विजय-यात्रा के प्रसंग में अमर पर्वत को विजित किया था। प्रसंग से यह पंजाब का कोई पर्वत जान पड़ता है। संभव है अमरनाथ को ही इस उद्धरण में अमरपर्वत कहा गया हो।

In Mahabharata

Amaraparvata (अमरपर्वत) in Mahabharata (II.29.10)

Sabha Parva, Mahabharata/Book II Chapter 29mentions the Countries subjugated by Nakula in West. Amaraparvata (अमरपर्वत) is mentioned in Mahabharata (II.29.10) [9]....And making circuitous journey that bull among men (Nakula) then conquered the (Mlechcha) tribes called the Utsava-sanketas. And the illustrious hero soon brought under subjection the mighty Gramaniya that dwelt on the shore of the sea, and the Sudras and the Abhiras that dwelt on the banks of the Saraswati, and all those tribes that lived upon fisheries, and those also that dwelt on the mountains, and the whole of the country called after the five rivers, and the mountains called Amara (Amaraparvata), and the country called Uttarayotisha and the city of and the tribe called Dwarapala.

External links

References

  1. "Amarnath Yatra: In Search Of Salvation". Shriamarnathyatra.net.
  2. Mohini Qasba Raina (2013). Kashur The Kashmiri Speaking People. Partridge Publishing Singapore. p. 327.
  3. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.31
  4. भारतकोश-अमरनाथ
  5. भारतकोश-अमरनाथ
  6. भारतकोश-अमरनाथ
  7. भारतकोश-अमरनाथ
  8. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.32
  9. कृत्स्नं पञ्चनदं चैव तथैवामरपर्वतम्, उत्तरज्यॊतिकं चैव तदा वृण्डाटकं पुरम (= दिव्यकंट पुरम्), द्वारपालं च तरसा वशे चक्रे महाद्युति (II.29.10)