Avesta

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The Avesta (अवेस्ता) (əˈvɛstə) is the primary collection of religious texts of Zoroastrianism, composed in the otherwise unrecorded Avestan language.

General description

The Avesta texts fall into several different categories, arranged either by dialect, or by usage. The principal text in the liturgical group is the Yasna, which takes its name from the Yasna ceremony, Zoroastrianism's primary act of worship, and at which the Yasna text is recited. The most important portion of the Yasna texts are the five Gathas, consisting of seventeen hymns attributed to Zoroaster himself. These hymns, together with five other short Old Avestan texts that are also part of the Yasna, are in the Old (or 'Gathic') Avestan language. The remainder of the Yasna's texts are in Younger Avestan, which is not only from a later stage of the language, but also from a different geographic region.

The surviving texts of the Avesta, as they exist today, derive from a single master copy produced by Sasanian Empire-era (224–651 CE) collation and recension. That master copy, now lost, is known as the 'Sassanian archetype'. The oldest surviving manuscript of an Avestan language text is dated 1323 CE. Summaries of the various Avesta texts found in the 9th/10th century texts of Zoroastrian tradition suggest that a significant portion of the literature in the Avestan language has been lost. Only about one-quarter of the Avestan sentences or verses referred to by the 9th/10th century commentators can be found in the surviving texts. This suggests that three-quarters of Avestan material, including an indeterminable number of juridical, historical and legendary texts, have been lost since then. On the other hand, it appears that the most valuable portions of the canon, including all of the oldest texts, have survived. The likely reason for this is that the surviving materials represent those portions of the Avesta that were in regular liturgical use, and therefore known by heart by the priests and not dependent for their preservation on the survival of particular manuscripts.[1]

Thakur Deshraj writes

.....इस वैदिक काल की विशेष घटना यह हुई कि ईरान स्थित आर्यों ने अपना अलग धर्म खड़ा कर दिया। मूल तत्वों में कोई भेद न था, फिर भी कुछ गौण में अन्तर पड़ ही गया। कुछ इतिहासकारों का कथन है कि - ईरानी आर्य उन लोगों का समुदाय था जिन्हें भारतीय आर्य मध्य-एशिया से भारत आते समय ईरान में छोड़ आए थे। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि सरस्वती तीर के आर्य ही ईरान जाकर बसे थे। कोई-सा भी मत सही हो, किन्तु यह बिल्कुल ठीक है कि ईरानी और भारतीय आर्य एक ही परिवार के दो दल थे। भारतीय लोग देवासुर संग्राम नाम से बहुत परिचित हैं। लेकिन उनमें से देवासुर संग्राम के विषय में जानकारी बहुत कम रखते हैं। भारतीय आर्यों का देव ही ईरानी आर्यों का असुर है। जिन्दोवेस्ता में देव या सुर को अदेव या असुर से नीच माना गया है। किन्ही-किन्ही विद्वानों का कथन है कि भारतीय आर्य सोमरस पीना पसन्द करते थे और ईरानी आर्य सोमरस को सुरा समझते थे। इसलिए वह सुरा के पीने वालों को सुर नाम से, अपने पक्ष के नेताओं को असुर ‘जो सुरा न पिए’ नाम से पुकारने लगे।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-12


पार्सी भाषा में ‘स’ के स्थान पर ‘ह’ का प्रयोग होता है। इसलिए ईरान में अपने प्रिय असुर को अहुर बोलते थे और ईश्वर के लिए अहुर-मजद, किन्तु पीछे ईरानी आर्य भी सुरा-सेवी बन गए। इसीलिए जिन्दावस्ता में जहां सोम (पार्सी नाम हाओम) की निन्दा है, वहीं आगे चलकर हाओम (सोम) की प्रशंसा भी की गई है। अध्यापक विनोद बिहारीराय इस प्रसंग में लिखते हैं-

देवासुर संग्राम - यदिच पार्सी और हिन्दू दोनों जाति के पुरखे पहले एक ही जाति के थे, एकत्र रहते थे और एक ही सामाजिक और धर्म एवं नैतिक रीति-नीति पर चलते थे तथापि उनके बीच में परस्पर बहुत वैर हो गया था और इसी विरूद्धता के कारण एक दूसरे से पृथक् होकर दो जाति हो गए। इस विरूद्धता का कारण निरूपण करना सहज नहीं है। वर्णन पर सोच-विचार करने से ऐसा बोध होता है कि महात्मा जरदुरत्र और उनके विचार वाले लोग तीखी सोम के पीने के विरूद्ध थे और कृषि कार्य में उन्नति करने को जोर देते थे किन्तु एक बड़ा समूह न सोम को छोड़ना चाहता था और न किसी स्थान पर रहकर खेती-कार्य में लगना चाहता था वरन किसी अधिक रम्य देश की खोज में था। इसी पर दोनों दलों में भयंकर युद्ध भी हुआ। हमारे बाप-दादे हिन्दूकुश को पार करके भारत में आ गए और जरदुरत्र के साथी ईरान में रह गए। ईरानी धर्म-ग्रन्थ जिन्दावेस्ता में एक स्थल पर इस देवासुर संग्राम का वर्णन इस प्रकार है -

मैं अन्द्र (इन्द्र) शौर्व (शर्व) और देव नाओघैथ्य (नासत्य) को इस घर से, इस गांव से, इस नगर से, इस देश से, इस पवित्र अखंड जगत् से निकाल देता हूं।

पौराणिक हिन्दू देवासुर युद्ध का कारण यों बताते हैं कि-समुद्र मंथन से सुधा या अमृत की उत्पत्ति। देवताओं ने छल से असुरों को अमृत पीने से वंचित रखा। या सुधास्वरूप मानते हैं और चन्द्रमा का एक दूसरा नाम सोम भी बताते हैं। सो वैदिक सोमरस पुराणों में अमृत या सुधा कहलाता है। देवगुण इसके पीने की बड़ी कामना रखते थे। यह बात कि देवताओं ने असुरों को धोखे में अमृत पीने नहीं दिया, हिन्दुआकं की मन गढ़न्त कथा है। असल बात तो यह है कि असुर के उपासक पार्सियों के पूर्व पुरूषों ने देवों के उपासक हिन्दुओं के पूर्व पुरूषों को सोम व अमृत-पान का विरोध किया और इसीलिए दोनों में युद्ध हुआ।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-13


जरदुरत्र के साथियों में, विस्ताश्प एक मुख्य योद्धा था, जिसे वेद में इष्टाश्व के नाम से पुकारा गया है। यथा -

किमिष्टाश्व इष्टरश्मिरेत ईशानासस्तरूषं ऋंजते नॄ न। (ऋगवेद 1.122.13)

अर्थ - जगत के शासन कर्ता इष्टाश्व और इष्टरश्मि हमारे आश्रय देने वालों का क्या कर सकते हैं ।

ये उदाहरण तो हुए भारतीय और ईरानी आर्यों की विरूद्धता के कारणों के सम्बन्ध में, अब उनके आवस्तिक और वैदिक धर्म में कहां तक समानता है, यह दिखाना भी जरूरी समझते हैं।

आवस्तिक और वैदिक धर्म में समानता - वैदिक ऋषि दो लकड़ियों को घिसकर आग बनाते थे। पार्सियों में भी यही रीति प्रचलित थी। हिन्दू अग्नि-होत्री अपने घर में पवित्र अग्नि-स्थापन करते थे। पार्सी लोग भी अपने घर में पवित्र अग्नि की आज तक रक्षा करते हैं। हिन्दू विवाह के समय अर्यन देवता का मन्त्र पढ़ते हैं। पार्सी भी विवाह के समय ऐर्यमन देवता का मंत्र पढ़ते हैं। अवेस्ता में ‘अथूब’ और ‘जओता’ नाम के दो प्रकार के पुरोहित पाए जाते हैं, जो वेद में ‘अथर्वन’ और ‘होता’ नाम पुरोहितों से मिलते हैं। पार्सियों के क्रिया-धर्म में दूध, मक्खन, मांस, फल, हाओम (सोम), भेड़ के रोम, पत्तों के गुच्छे और पकवान का व्यवहार दृष्टिगोचर होता है। हिन्दू भी लगभग अपने क्रिया-कर्म में ऐसी ही वस्तुओं का व्यवहार करते हैं। पार्सियों की इजश्ने और वैदिकों की ज्यातिष्टोम यज्ञ-क्रिया एक ही थी। वैदिकों की आप्ती, दर्श-पौर्णमास और चातुर्मास्य यज्ञों की गजह पर आफिगान, दरून गाहानवर, आवास्तिक कृत्य हैं। कुछ अन्तर के साथ दोनों वर्गों में यज्ञोपवीत एक सी ही थी। दोनों ही शुद्धि के लिए गौ-मूत्र और नदियों के जल का प्रयोग करते थे। मूर्ति-पूजा वेद और अवेस्ता दोनों ही में नहीं थी। तात्पर्य यह है कि कुछ मतभेदों के कारण ईरानी और भारतीय आर्य अलग प्रदेशों में बस कर तथा अलग-अलग धर्म-ग्रन्थ रचकर भी मूल-तत्वों में एक ही थे। यह क्रम भी बराबर जारी रहा था। कभी भारतीय ईरानी आर्यों में मिल जाते थे और ईरानी भारतीय आर्यों में। सूर्य नामक देव बहुत काल तक ईरानियों का साथी रहा, फिर भारतीय में मिल गया। किन्तु यम जो सूर्य का पुत्र समझा जाता है और शुक्र सदैव ईरानियों के साथी रहे। शुक्र अथवा उशना के मुकाबले का एक देव बृहस्पति भारतीयों का पूरा मददगार था। ऋग्वेद में इनको भी कहीं-कहीं पर असुर कहा है, इसके अर्थ यही हैं कि आरम्भ में भारतीय आर्य असुर शब्द को अधिक घृणा की दृष्टि से देखने की अपेक्षा अच्छा समझते थे, किन्तु ज्यों-ज्यों संघर्ष बढ़ा, भारतीय आर्यों को असुर शब्द उल्टा जंचने लगा।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-14


Zend-Avesta (जिन्दावेस्ता)

Zend or Zand is a Zoroastrian technical term for exegetical glosses, paraphrases, commentaries and translations of the Avesta's texts. The term zand is a contraction of the Avestan language word zainti, meaning "interpretation", or "as understood".[2]

External Links

References


Author of this page: Dayanand Deswal दयानन्द देसवाल

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