Bhagwan Das

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Bhagwan Das (भगवानदास) (b.?-1740) was a very popular saint in Haryana.

भगवानदास का जीवन परिचय

अलवर राज्य में एक जाट साधू भगवानदास हुए हैं। ‘मुरक्कए अलवर’ में उनका वर्णन इस प्रकार से दिया हुआ है - आरम्भ में भगवानदास के मां-बाप हरयाणे में रहते थे। वहां से आकर मौजा टीकला परगना बीधोता में आबाद हुए। उनके बाप का नाम गोरखा और मां का नाम केशी था। जाति उनकी जाट थी और हरियाणी थी उपाधि। गौ चराया करते थे। समय पाकर वैराग्य की ओर झुके।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-611


आगे चलकर इतने प्रसिद्ध महात्मा हो गए कि भविष्य की बातें बताने लग गए। उनके तप और सत्यवाणी की चर्चा घर-घर फैल गई। वह समय शाहजहां बादशाह का था। भगवानदासजी के पास दर्शकों की भीड़ लगी रहती थी। नारनौल में उस समय एक मुसलमान हाकिम था। उसने देखा कि मुसलमान लोग भी इस साधु में श्रद्धा रखते हैं और वे इसकी बातों को मानते हैं, इस्लाम के प्रचार का असर भी इस साधु के कारण कम होता है ते उसने भगवानदासजी को पकड़वा मंगाया। उन्हें जेल में डाल दिया। मुसलमान हाकिम को इससे भी संतोष न हुआ। उसने घोड़ों के लिए दाना दलने का काम भगवानदासजी को सौंपा। साधु भगवानदास हंसते हुए दाना दलने लगे। साथ ही वह गाते जाते थे, ‘जो खाएगा मर जाएगा।’ आखिर हुआ भी ऐसा ही। जिन घोड़ों ने भगवानदासजी का दला हुआ दाना खाया, वे मर गए। हाकिम बड़ा भयभीत हुआ। उसने माफी मांगी और भगवानदासजी को छोड़ दिया। इस घटना के बाद उनकी भारी प्रसिद्धि हो गई। ब्राह्मण, राजपूत सभी जातियों के लोग भगवानदासजी के चेले हो गए। उन्होंने अपने शिष्यों को ये हिदायतें कीं -

  • (1) गाजर मूली मत खाओ,
  • (2) तम्बाकू मत पिओ,
  • (3) बैलों को बधिता मत कराओ।

उनके अनुयायी इन बातों का पालन भी करते हैं। उन्होंने अवतारों की फिलासफी के विरुद्ध भी प्रचार किया।[1] सन् 1740 में वह मर गए। मौजा टीकला में जो अब परगना बावल में है, उनकी समाधि और छतरी बनाई गई। उनकी मृत्यु का बड़ा भारी शोक मनाया गया था। भादों बदी अष्टमी को वहां पर भगवानदास के नाम पर मेला लगता है। उसमें हजारों आदमी इकट्ठे होते हैं। दूर-दूर से पूजने वाले आते हैं। बहुत-सा चढ़ावा चढ़ाया जाता है। उनके मन्दिर के साथ (महंत) जाट लोग हैं। वही उस चढ़ावे को लेते हैं। मशहूर है कि भगवानदासजी कुछ दिनों के लिए मौजा काठ के माजरे में भी आये थे, जोकि कस्बा करनकोट के पास है। वहां पर साधु भगवानदासजी ने एक कुआं बनवाया था। उसका नाम उन्होंने कृष्ण-कुआं रखा था। आज भी वह कुआं इसी नाम से पुकारा जाता है।

सन्दर्भ

  1. मुरक्क-ए-अलवर पृ. 67

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