Bhubaneshwar

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Bhubaneshwar or Bhubaneswar (Oriya: ଭୁବେନଶ୍ବର, Hindi: भुवनेश्वर) meaning "The Lord of the Universe" (Bhuvaneshwara) is the capital and largest city of the Indian state of Orissa, India. Once the capital of ancient Kalinga, the city has a long history and is today a center for commerce and religious activity. It is situated in Khurda district. Khurda (Alternatively "Khordha") is a township in one of the 30 districts which were carved during the re-ogansation of 1992-93.Khurda (Khordha) is a town and a notified area committee in Khurda district in the Indian State of Orissa.

Variants

History

The history of the Bhubaneswar-Khurda region goes back 2000 years. Emperor Kharavela established his capital in Sisupalgarh which is on the outskirts of the city. The Hathigumpha inscriptions at the Udayagiri caves and Khandagiri caves are evidence of the region's antiquity. Modern Bhubaneswar was originally meant to be a well planned city with wide roads and many gardens and parks.

The twin hills of Khandagiri & Udayagiri, 8 km from Bhubaneswar, served as the site of an ancient Jain monastery which was carved into cave like chambers in the face of the hill. Dating back to the 2nd century BC, some of the caves have beautiful carvings. The Rani Gumpha (Queen's Cave), one of the largest and double-storied, is ornately embellished with beautiful carvings. In the Hati Gumpha (Elephant Cave), King Kharavela has carved out the chronicles of his reign.

Lingaraj Temple

The 10th- or 11th-century Lingaraja temple of Bhubaneswar has been described as "the truest fusion of dream and reality." It is dedicated to Shiva. A rare masterpiece, the Lingaraja temple has been rated one of the finest examples of purely Hindu temple in India by Ferguson, the noted art critic and historian[citation needed]. The surface of the 55 m-high Lingaraja temple is covered with carvings. Sculpture and architecture fused elegantly to create a perfect harmony. Devout pilgrims, who wish to go to the Jagannath temple at Puri, must first offer worship at the Lingaraja temple.

Dhauli Giri

Just 8 km away from Bhubaneswar looking down on the plains that bore witness to the gruesome war waged on Kalinga by the Mauryan emperor Ashoka the Great, stand the rock edicts of Dhauli. It was here that Ashoka, full of remorse after the Kalinga War in 261 BC, renounced his blood-thirsty campaign and turned to Buddhism. Ashoka erected two main edicts in Kalinga, one in Dhauli and the other in Jayagarh. The principles of Ashoka which reflect his compassion were inscribed on all the other edicts in his empire except Kalinga. In the Kalinga edicts he warned the people of Kalinga not to revolt and that he would take appropriate action if they did. This is in sharp contrast to all of his other edicts and proof of his political acumen.

The edicts are remarkably well preserved, despite the fact that they date back to the 3rd century BC. A sculpted elephant, the universal symbol of Lord Buddha, tops the rock edicts. The Shanti Stupa or the peace pagoda, built through the Indo-Japanese collaboration, is located on the opposite hill.

एकाम्रकानन

विजयेन्द्र कुमार माथुर[1] ने लेख किया है ...एकाम्रकानन (AS, p.110) उड़ीसा राज्य में स्थित भुवनेश्वर शहर का प्राचीन नाम हैं। एकाम्रकानन मूलत: उत्कल का एक वन था जो प्राचीन काल में शिव की उपासना का केंद्र था।

भुवनेश्वर

विजयेन्द्र कुमार माथुर[2] ने लेख किया है ... भुवनेश्वर (AS, p.674), उड़ीसा की प्राचीन राजधानी, शहर और पूर्वी भारत का एक राज्य है। इसको पहले एकाम्रकानन भी कहते थे। भुवनेश्वर को बहुत प्राचीन काल से ही उत्कल की राजधानी बने रहने का सौभाग्य मिला है।

केसरी वंशीय राजाओं ने चौथी शती ई. के उत्तरार्ध से 11वीं शती ई. के पूर्वार्ध तक, प्रायः 670 वर्ष या 44 पीढ़ियों तक उड़ीसा पर शासन किया और इस लम्बी अवधि में उनकी राजधानी अधिकतर भुवनेश्वर में ही रही। एक अनुश्रुति के अनुसार राजा ययातिकेसरी ने 474 ई. में भुवनेश्वर में पहली बार अपनी राजधानी बनाई थी। कहा जाता है कि केसरीनरेशों ने भुवनेश्वर को लगभग सात सहस्र सुन्दर मन्दिरों से अलंकृत किया था। अब कुल केवल पाँच सौ मन्दिरों के ही अवशेष विद्यमान हैं। इनका निर्माण काल 500 ई. से 1100 ई. तक है।

यहाँ का मुख्य मन्दिर लिंगराज है, जिसे ललाटेडुकेशरी (617-657 ई.) ने बनवाया था। यह जगत् प्रसिद्ध मन्दिर उत्तरी भारत के मन्दिरों में रचना सौंदर्य तथा शोभा और अलंकरण की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इस मन्दिर का शिखर भारतीय मन्दिरों के शिखरों के विकास क्रम में प्रारम्भिक अवस्था का शिखर माना जाता है। यह नीचे तो प्रायः सीधा तथा समकोण है किन्तु ऊपर पहुँचकर धीरे-धीरे वक्र होता चला गया है और शीर्ष पर प्रायः वर्तुल दिखाई देता है।

भुवनेश्वर परिचय

यहाँ स्नान के लिए तीर्थ 9 प्रसिद्ध हैं- 1. विंदु सरोवर 2. पाप नाशिनी 3. गंगा यमुना 4. कोटितीर्थ 5. देवीपापहरा 6. मेधतीर्थ 7. अलाबुतीर्थ 8. अशोक कुंड 9. ब्रह्मकुंड

इनमें से विंदु सरोवर और ब्रह्मकुंड में स्नान तथा अन्य तीर्थों में मार्जन तर्पण होता है। ब्रह्मकुंड के घेरे में ही अशोक कुण्ड, मेघतीर्थ अबालु तीर्थ हैं। भुवनेश्वर बाज़ार के समीप विंदू सरोवर है। वहाँ से दो फर्लांग पर ब्रह्मकुण्ड है। इसमें गोमुख से बराबर जल आता है तथा अन्य मार्ग से निकलता रहता है। कोटितीर्थ मुख्यमार्ग के समीप है और देवो पापहरा तीर्थ मंदिर में ही है।

वर्तमान भुवनेश्वर: आज वर्तमान भुवनेश्वर में एक तरफ़ पुराना शहर, जिससे लगभग 30 प्राचीन मन्दिर और दूसरी तरफ़ 1948 के बाद का सुनियोजित नगर क्षेत्र है, जिसे कटक से स्थानान्तरित करके नई राजधानी बनाया गया। इस नवनिर्मित क्षेत्र में सचिवालय व विधानसभा की इमारतों सहित अनेक सरकारी ईमारतें, प्रान्तीय संग्रहालय, उत्कल विश्वविद्यालय (जो पहले 1944 में कटक में संस्थापित हुआ था), प्रान्तीय कृषि एवं तकनीकी विश्वविद्यालय, क्षेत्रीय भौतिक अनुसंधान केन्द्र, अनेक महाविद्यालय, भव्य इस्कान मन्दिर (अंतराष्ट्रीय कृष्ण अनुयायी संघ द्वारा निर्मित) तथा अव्यवस्थित ढंग से बिखरे अनेक व्यापारिक केन्द्र हैं। समीप ही इससे लगकर पहाड़ों को काटकर बनाई गई खंडगिरि एवं उदयगिरि की गुफ़ाएँ, नन्दन कानन प्राणी एवं वनस्पति उद्यान एवं शिशुपालगढ़ के प्राचीन उत्खनित स्थान पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केन्द्र हैं। शहर के मध्य में इन्दिरा गांधी की स्मृति में बनाया गया उद्यान है। भुवनेश्वर कोलकाता-चेन्नई राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है एवं दक्षिण-पूर्वी रेलमार्ग का एक प्रमुख केन्द्र है। यहाँ पर एक आधुनिक हवाई अड्डा है।

इसके ऐतिहासिक एवं तीसरी सदी ई.पू. के प्रसिद्ध कलिंग युद्ध के युद्धस्थल होने की जानकारी समीप स्थित धौलगिरि में प्राप्त शिलालेखों से मिलती है। पाँचवीं तथा दसवीं शताब्दी के मध्य में कई हिन्दू राजवंशों की प्रान्तीय राजधानी और शैव मत का प्रमुख धार्मिक केन्द्र रहा। 7वीं से 14वीं शताब्दी के मध्य निर्मित अनेक मन्दिर (परशुरामेश्वर, मुक्तेश्वर, राजारानी, लिंगराज, और अनन्त वासुदेव) ओड़िसी स्थापत्य के प्रत्येक दौर का प्रतिनिधित्व करने वाली मंजूषाएँ हैं।

संदर्भ: भारतकोश-भुवनेश्वर


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