Chatti

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Map of Germania tribes

Chatti (कट्टी/कटी/कठी) (also Chatthi/Catti) were an ancient Germanic tribe whose homeland was near the upper Weser.[1][2]

Location

They settled in central and northern Hesse and southern Lower Saxony, along the upper reaches of the Weser River and in the valleys and mountains of the Eder, Fulda, and Weser River regions, a district approximately corresponding to Hesse-Kassel, though probably somewhat more extensive. According to Tacitus,[3] the Batavians of his time were descended from a part of the Chatti, who left their homeland after an internal quarrel drove them out, to take up new lands at the mouth of the Rhine.

History

While Julius Caesar was well informed about the regions and tribes on the eastern banks of the Rhine, he never mentioned the Chatti by name. He did make note of the Suebi, and suggested that they had previously driven out the Celts to the south of the Hesse-Kassel region in the prior centuries BC.[4]

Pliny the Elder, in his Natural History grouped the Chatti and Suebi together with the Hermunduri and the Cherusci, calling this group the Hermiones, which is a nation of Germanic tribes mentioned by Tacitus as living in inland Germany.[5]

Some commentators believe that Caesar's Suebi were possibly the later Chatti, a branch of the Suebian movement of people who had become more clearly identifiable.[6] If not, then the Chatti may represent a successful resistance to the Suevi, as opposed to the Tencteri, Usipetes, and Ubii who all were forced from homelands in the same region by the Suebic incursions.

The first ancient writer to mention the Chatti is Strabo, some time after 16 AD, who includes the Chatti in a listing of conquered Germanic tribes who were more settled and agricultural, but also poorer, than the nomadic tribes in central and eastern Germania such as the Suebi. They were poor because they had fought the Romans, and had been defeated and plundered.[7]

For the first century AD, Tacitus provides important information about the Chatti's part in the Germanic wars and certain elements of their culture.[8]

Jat clans

जाट इतिहास और जर्मन जातियां

ठाकुर देशराज[9] के अनुसार हेरोडोटस ने लिखा है कि - मध्य एशिया की बड़ी जेटी जाति में अश्वमेध का रिवाज था और संक्रांति के शुभ अवसर पर यह महोत्सव उनके यहां होता था (पारसी लोगों में तो अश्वमेध नहीं होता फिर हेरोडोटस किस आधार पर उन्हें शाक ही पुकारता है। - ले.) । मध्य ऐशिया में एक अश्व जाति भी जाटों के पड़ोस में रहती थी, वह वास्तव की संतान के लोग के जाते थे। लेकिन पिंकर्टन ने यूरोप में जाटों के साथ सुएवी, कट्टी, केम्ब्री और हेमेन्द्री आदि 6 जातियां बताई हैं। ये सब एल्प और वेजर नदी के किनारे तक फैल गई थीं। वहां उन्होंने युद्ध के देवता महादेवजी के नाम पर एक विशाल स्तंभ खड़ा किया था। अनेक इतिहास लेखकों ने अपनी-अपनी मति से उसे मंगल अथवा बुद्ध का स्तंभ बताया है। ये छः जातियां भारत में क्रम से जाट, अहीर, काछी, कुर्मी, हेमेन्द्री कहलाती हैं। वास्तव में जाटों का और अहीर काछियों आदि का प्रारम्भ से निकट रहना और निकटतम सम्बन्ध पाया जाता है। ये सभी एक ही स्टाक की जगजार्टिस के किनारे की रहने वाली जातियां थीं। जाटों ने यूनान में कर्जसीज को और अर्बेला में दारा को रथों की सेना की सहायता दी थी। इस सेना में 15 हाथी और 200 रथ थे। [Todd|कर्नल टाड]] ने हेरोडोटस के आधार पर लिखा है कि इन लोगों से युद्ध करने के लिए सिकन्दर ने स्वयं कमान की थी। वे अपनी भुजाओं के बल से यूनानियों को प्रत्येक आचरण में विफल कर देते थे। उन्होंने सिकन्दर की पर्शिनियो की कमान वाली सेना को अस्तव्यस्त कर दिया था, जिससे उसे दूसरी सेना उनसे भिड़ने के लिए भेजनी पड़ी थी। प्रत्येक जाट ने वह पराक्रम दिखाया कि मानो वह जीत की पक्की अभिलाषा रखता है, किन्तु अर्बोला के युद्ध में दारा की पराजय बदी थी। काछी लोग भी इस युद्ध में बड़ी बहादुरी से लड़े थे।


दलीप सिंह अहलावत[10] लिखते हैं कि विजेता जाट अत्तीला का साम्राज्य कैस्पियन सागर से लेकर राइन नदी (पश्चिमी जर्मनी में) तक फैला हुआ था। तात्पर्य है कि जाटों का निवास व शासन जर्मनी में भी रहा है। ये लोग ईसा से लगभग 500 वर्ष पूर्व जर्मनी में पहुंचे। यूरोप के अन्य देशों इटली, गॉल, स्पेन, पुर्तगाल, इंगलैण्ड और यूनान आदि पर जो जाटों ने आक्रमण किये उनका वर्णन यूरोपीय इतिहास में यही मिलता है कि उसमें अधिकांश जाट लोग जर्मनी और स्कन्धनाभ (स्केण्डेनेविया) के निवासी थे।

श्री मैक्समूलर ने भी जर्मनी में आर्य रक्त स्वीकार किया है। टसीटस ने लिखा है कि :“जर्मन लोगों के रहन-सहन, आकृति, रस्म व रिवाज तथा नित्य कार्यों का जो वृत्तान्त पाया जाता है उससे विदित होता है कि कदाचित् ये लोग और शाक द्वीप (ईरान) के जिट, कठी, किम्बरी (कृमि) और शिवि (चारों जाट) एक ही वंश के हैं।”

आगे यही लिखते हैं कि “जर्मन लोग घोड़े की आकृति बनी हुई देखकर ही सिक्के का व्यवहार करते थे, अन्यथा नहीं। यूरोप के असि जेटी लोग और भारत के अट्टी तक्षक जटी, बुध को अपना पूर्वज मानकर पूजते थे। प्रत्येक जर्मन का बिस्तर पर से उठकर स्नान करने का स्वभाव जर्मनी के शीतप्रधान देश का नहीं हो सकता, किन्तु यह पूर्वी देश का है।”

कर्नल टॉड ने लिखा है कि “घोड़े की पूजा जर्मनी में सू, कट्टी, सुजोम्बी और जेटी (जाट) नाम की जातियों ने फैलाई है, जिस भांति कि स्कन्धनाभ में असि जाटों ने फैलाई।” कर्नल टॉड ने भारत के जाट और राजपूत तथा जर्मन लोगों की समानता के लिए लिखा है कि “चढ़ाई करने वालों और इन सब हिन्दू सैनिकों का धर्म बौद्ध-धर्म था। इसी से स्केण्डेनेविया वालों और जर्मन जातियों और राजपूतों के आचार, विचार और देवता सम्बन्धी कथाओं की सदृश्यता और उनके वीररसात्मक काव्यों का मिलान करने से यह बात अधिकतर प्रमाणित हो जाती है।”

प्रसिद्ध इतिहासज्ञ टसीटस ने लिखा है कि “जर्मनी और स्कन्धनाभ के असि लोग जाटवीर ही थे[11]। जाट इतिहास अंग्रेजी पृ० 36 पर लेफ्टिनेन्ट रामस्वरूप ने लिखा है कि “प्राचीनकाल में जर्मनी पर शिवि गोत्र के जाटों का राज्य व निवास था।”

External links

References

  1. Encyclopædia Britannica Article
  2. Carl Waldman; Catherine Mason (2006). Encyclopedia of European Peoples. Infobase Publishing. pp. 170–. ISBN 978-1-4381-2918-1.
  3. [http://classics.mit.edu/Tacitus/histories.4.iv.html Histories iv. under 70]
  4. James Cowles Prichard (1841). Researches Into the Physical History of Mankind: Researches into the ethnography of Europe. Sherwood, Gilbert, and Piper. pp. 352–
  5. Natural History Plin. Nat. 4.28
  6. Peck, Harpers Dictionary of Classical Antiquities year=1898
  7. Strabo, 7.1.3-4.
  8. Tac. Ger. 30
  9. जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठ-185
  10. जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठ.395-396
  11. आधार लेख - जाट इतिहास पृ० 183 से 185, लेखक ठा० देशराज।