Danes

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Danes (Danish: danskere) are people with Danish citizenship. Most Danes live in Denmark. The Danish ethnic identity is rooted in the history of tribal Danes, a North Germanic people inhabiting Denmark in the Iron Age and Viking Age who founded the Kingdom of Denmark.

Origins

The first mentions of "Danes" are recorded in the mid 6th century by historians Procopius (Greek: δάνοι) and Jordanes (danī), who both refer to a tribe related to the Suetidi inhabiting the peninsula of Jutland, the province of Scania and the isles in between. Frankish annalists of the 8th century often refer to Danish kings. The Bobbio Orosius from the early 7th century, distinguishes between South Danes inhabiting Jutland and North Danes inhabiting the isles and the province of Scania.

Dalip Singh Ahlawat[1] writes that Danes, Vikings, Normans and Goths were descendants of Scythian Jats. [2]

Dalip Singh Ahlawat[3] writes that Jat Blood flows in the people of England as the Celts, Jutes, Angles, Saxons and Danes were descendants of Scythian Jats. This is evident from Jat Clans surnames still prevalent in England though they follow Christianity. [4]

History

The first mentions of tribal Danes are from the 6th century in Jordanes' Getica, by Procopius, and by Gregory of Tours. The first mention of Danes within the Danish territory is on the Jelling Rune Stone which states how Harald Bluetooth converted the Danes to Christianity in the 10th century.[5] Denmark has been continuously inhabited since this period; and, although much cultural and ethnic influence and immigration from all over the world has entered Denmark since then, present day Danes tend to see themselves as ethnic descendants of the early tribal Danes mentioned in the historic sources. Whether this is true or not, the Danish Royal Family can certainly trace their family line back to Gorm the Old (d. 958 AD) in the Viking Age, and perhaps even before that to some of the preceding semi-mythical rulers.

The first mention of Danes within the Danish territory is on the Jelling Rune Stone which mentions how Harald Bluetooth converted the Danes to Christianity in the 10th century.[6] Between c. 960 and the early 980s, Harald Bluetooth established a kingdom in the lands of the Danes, stretching from Jutland to Scania. Around the same time, he received a visit from a German missionary who, by surviving an ordeal by fire according to legend, convinced Harold to convert to Christianity.[7]

The following years saw the Danish Viking expansion, which incorporated Norway and Northern England into the Danish kingdom. After the death of Canute the Great in 1035, England broke away from Danish control. Canute's nephew Sweyn Estridson (1020–74) re-established strong royal Danish authority and built a good relationship with the archbishop of Bremen — at that time the Archbishop of all of Scandinavia.

Jat History

ब्रिटेन का इतिहास

दलीप सिंह अहलावत[8] लिखते हैं: इंगलैण्ड जाटों का निवास एवं राज्य लिखने से पहले इस द्वीप के विषय में ऐतिहासिक जानकारी की आवश्यकता है जो कि संक्षिप्त में निम्नलिखित है -

ब्रिटेन के मूल निवासी असभ्य लोग थे जिन्हें प्राचीन पत्थर युग के लोग कहा जाता है। वे खेती बाड़ी करना नहीं जानते थे बल्कि जंगली जानवरों का शिकार करके निर्वाह करते थे। कुछ काल पश्चात् ब्रिटेन पर एक दूसरी जाति ने आक्रमण किया जिन्हें नवीन पत्थर-युग के लोग अथवा आईबेरियन कहा जाता था। उनका कद छोटा तथा रंग काला था। वे मूल रूप से पश्चिमी तथा दक्षिणी यूरोप के रहने वाले थे। स्कॉटलैण्ड और आयरलैण्ड के अधिकतर निवासी उन्हीं के वंशज हैं। आईबेरियन ने खेती-बाड़ी तथा पशु-पालन शुरु किये। उनका युग 3000 ई० पू० से 2000 ई० पू० का माना गया है। जबकि प्राचीन पत्थरयुग के लोग 3000 ई० पू० में ब्रिटेन में आबाद थे।

आईबेरियन लोगों के बाद एक अधिक सभ्य जाति आई, जिसे केल्ट (Celt) कहते हैं। इन्होंने लगभग 600 ई० पू० में ब्रिटेन पर आक्रमण किया और वहां पर आबाद हो गये।

केल्ट जाति के लोग आर्यवंशज थे। वे लम्बे और गोरे थे तथा उनके बाल पीले और माथे चौड़े थे। ये लोग आर्यन भाषा बोलते थे। ये लोग वीर योद्धा थे तथा लोहे के हथियारों का प्रयोग करने में निपुण थे। ये शिल्पकला में भी बड़े चतुर थे। खेती-बाड़ी इनका व्यवसाय था। इन लोगों ने दो दलों में आक्रमण किये। पहले दल के लोग गोइडल्स या गेल्स (Goidels or Gaels) कहलाते थे जो कि आज भी आयरलैण्ड और स्कॉटलैंड में पाये जाते हैं। लगभग 600 ई० पू० में दूसरे दल के लोग ब्रिथोन्स या ब्रिटोन्स (Brythons or Britons) कहलाते थे जिनके नाम पर इस टापू का नाम ब्रिटेनिया (ब्रिटेन) पड़ा।

पाठक समझ गये होंगे कि इस टापू का ‘ब्रिटेन’ नाम आर्य वंश के लोगों के नाम पर प्रचलित हुआ। याद रहे कि जाट भी आर्यवंशज हैं।

55 ई० पू० में रोमन आक्रमण से कुछ समय पहले बेल्ज और गाल (Belgae and Gauls) लोग यहां आकर दक्षिणी ब्रिटेन में आबाद हो गये। लगभग 330 ई० पू० में केल्ट लोगों की शक्ति


1. आधार लेख - जाट इतिहास पृ० 183-185, लेखक ठा० देशराज।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-397


एवं शासन पूरे ब्रिटेन और आयरलैण्ड पर हो गया था। इनके बाद रोमनों का शासन रहा1

ट्यूटानिक वंश के प्रकरण में पिछले पृष्ठों पर लिखकर यह सिद्ध किया गया है कि जूट्स, ऐंगल्स, सैक्सन्स, डेन, नॉरमन ये सब जाट जाति के लोग थे जो कि आपस में एक ही रक्त के भाई थे। इन सब को ट्यूटानिक नाम से भी पुकारा जाता है। अतः जहां पर ये नाम आयें तो इनको जाट समझो।

ब्रिटेन पर केल्ट्स लोगों के बाद रोमनों के आक्रमण एवं शासन रहा। इनका ब्रिटेन पर राज्य 43 ई० से सन् 410 ई० तक 300 वर्ष रहा। रोमनों के चले जाने के पश्चात् वहां जूट्स, ऐंगल्स और सैक्सन्स आए और शासन किया। इनके आक्रमण तथा शासन का काल 410 ई० से 825 ई० तक था। इन लोगों को स्केण्डेवियन या डेन लोगों ने पराजित किया जिनके आक्रमण तथा राज्य का काल 787 ई० से 1070 ई० तक था। डेन लोगों के बाद नॉरमन लोगों का ब्रिटेन पर सन् 1066 ई० से 1154 ई० तक शासन रहा2

ब्रिटेन पर रोमनों का शासन (43 ई० से 410 ई०):

यह पिछले पृष्ठों पर रोमन साम्राज्य के विषय में लिखा गया है कि इनका शासन रूम सागर के चारों ओर तथा लगभग पूरे यूरोप के देशों पर था। रोमनों का सबसे शक्तिशाली सेनापति जूलियस सीजर था। उसने 58 ई० पू० में गॉल (फ्रांस) को जीतने के लिए उस पर आक्रमण किया। गॉल में केल्ट जाति के लोग रहते थे। ब्रिटेन में रहने वाले केल्ट (ब्रिटोन्स) लोगों ने अपने सम्बन्धियों की गॉल में रोमनों के विरुद्ध मदद की। इससे क्रोधित होकर जूलियस सीजर ने 55 ई० पू० में ब्रिटेन पर आक्रमण किया जो कि ब्रिटोन्स लोगों ने असफल कर दिया। अगले वर्ष 54 ई० पू० में 25000 सैनिकों के साथ उसने फिर ब्रिटेन पर आक्रमण कर दिया। इस बार उसे अधिक सफलता मिली। ब्रिटेन से गॉल निवासियों को सहायता न देने का वचन लेकर उसने सन्धि कर ली और वापस गॉल लौट आया। फ्रांस से जूलियस सीजर रोम चला गया जहां पर उसके शत्रुओं ने उसकी हत्या कर दी।

सन् 43 ई० में रोमन सम्राट् क्लाडियस ने अपने सेनापति प्लाटियस के नेतृत्व में 1,50,000 सैनिक ब्रिटेन को विजय करने के लिए भेजे। उन्होंने पांच वर्ष ब्रिटोन्स से युद्ध करके 47 ई० में ब्रिटेन की दक्षिण और मध्य की भूमि को जीत लिया। 61 ई० में ब्रिटेन की रानी बोडिकिया के नेतृत्व में दक्षिण में रोमनों के विरुद्ध एक जोरदार विद्रोह हुआ किन्तु इसको दबा दिया गया। अब इंगलैंड का दक्षिणी भाग रोमन प्रान्त बन गया।

रोमन सम्राट् बेस्पसियन ने अपने प्रसिद्ध सेनापति जूलियस एग्रीकोला को 77 ई० में ब्रिटेन भेजा। उसने वेल्स तथा स्काटलैण्ड का अधिकतर भाग जीत लिया जिस पर 78 ई० से 85 ई० तक रोमनों का अधिकार रहा। उसने देश की विजय को पूरा किया और ब्रिटेन के विकास में अपना सारा ध्यान लगाया।


1, 2. इंगलैण्ड का इतिहास पृ० 4-6 तथा 116-118, लेखक प्रो० विशनदास एम० ए० और ए हिस्ट्री ऑफ ब्रिटेन पृ० 3-7, लेखक रामकुमार एम० ए० ।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-398


ब्रिटेन पर रोमनों ने करीब 300 वर्ष तक शासन किया। जब सन् 400 ई० में रोम नगर पर बीसीगोथ (पश्चिमी जाट) अलारिक* ने आक्रमण किया तो रोमन लोग ब्रिटेन को छोड़कर अपने देश में लौट आये। इसके अतिरिक्त, वहां अनेक घरेलू झगड़े तथा लड़ाइयां भी होती रहती थीं। इन कारणों से मजबूर होकर रोमनों को सदा के लिए ब्रिटेन छोड़ना पड़ा।

ब्रिटेन पर रोमनों का 300 वर्ष शासन रहा। परन्तु वे ब्रिटेन को उस तरह से रोमन सभ्यता का अनुयायी नहीं बना सके जिस तरह उन्होंने फ्रांस को बनाया। उन्होंने ब्रिटेन पर कुछ प्रभाव अवश्य डाला, परन्तु वह अस्थायी था। ब्रिटेन में क्रिश्चियन धर्म का प्रारम्भ रोमन शासन की भारी जीत थी। यह धर्म कुछ समय के लिए कमजोर अवश्य हो गया था, किन्तु यह फिर सारे ब्रिटिश द्वीपसमूह में फैल गया1

ब्रिटेन पर जूट्स, सेक्सन्स एंगल्स की विजय (410 ई० से 825 ई०):

जूट्स, सेक्सन्स और एंगल्स लोग जर्मनी की एल्ब नदी के मुहाने और डेन्मार्क के तट पर रहते थे। ये लोग बड़े बहादुर थे तथा लूटमार किया करते थे। ये क्रिश्चियन धर्म के विरोधी थे।

ब्रिटेन से रोमनों के चले जाने के बाद ब्रिटेन के लोग बहुत कमजोर और असहाय थे। इन लोगों पर स्काटलैंड के केल्टिक कबीलों, पिक्ट्स और स्काट्स ने हमला कर दिया। ब्रिटेन निवासियों की इसमें भारी हानि हुई। इनमें इतनी शक्ति न थी कि वे इन हमलों करने वालों को रोक सकें। इसलिए मदद के लिए इन्होंने जूट लोगों को बुलाया। जूट्स ने उसी समय ब्रिटिश सरदार वरटिगर्न के निमन्त्रण को स्वीकार कर लिया। जटलैण्ड से जाटों की एक विशाल सेना अपने जाट नेता हेंगिस्ट और होरसा के नेतृत्व में सन् 449 ई० में केण्ट (Kent) में उतर गई। इन्होंने पिक्ट्स और स्कॉट्स को हराया और वहां से बाहर निकाल दिया। उन्हें भगाने के बाद जाट ब्रिटेन के लोगों के विरुद्ध हो गये और उन्हें पूरी तरह से अपने वश में कर लिया और 472 ई० तक पूरे केण्ट पर अधिकार कर लिया। यहां पर आबाद हो गये। इसके अतिरिक्त जाटों ने अपना निवास व्हिट (Wight) द्वीप में किया2

जटलैण्ड के जाटों की विजय सुनकर उनके दक्षिणवासी सेक्सन्स तथा एंगल्स भी ललचाये। सर्वप्रथम सेक्सन्स ब्रिटेन में पहुंचे और उन्होंने ऐस्सेक्स, मिडिलसेक्स और वेस्सेक्स नाम से तीन राज्य स्थापित किये। वहां पर इन्होंने कुछ बस्तियां आबाद कर दीं। ब्रिटेन की जनता ने बड़ी वीरता से सेक्सन्स का मुकाबला किया और 520 ई० में मोण्डबेडन ने उन्हें करारी हार दी। इस तरह से


*. अधिक जानकारी के लिए इसी अध्याय में अद्भुत जाट विजेता अलारिक प्रकरण देखो।
1. इंगलैण्ड का इतिहास पृ० 7-9, लेखक प्रो० विशनदास; हिस्ट्री ऑफ ब्रिटेन पृ० 8-13, लेखक रामकुमार लूथरा।
2. आधार लेख - इंगलैण्ड का इतिहास पृ० 16-17, लेखक प्रो० विशनदास; हिस्ट्री ऑफ ब्रिटेन पृ० 21-22, लेखक रामकुमार लूथरा, अनटिक्विटी ऑफ जाट रेस, पृ० 63-66, लेखक: उजागरसिंह माहिल; जाट्स दी ऐन्शन्ट रूलर्ज पृ० 86 लेखक बी० एस० दहिया तथा जाट इतिहास अंग्रेजी पृ० 43, लेखक ले० रामसरूप जून


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-399


सेक्सन्स का बढ़ना कुछ समय के लिए रुक गया। परन्तु 577 ई० में डियोरहम की लड़ाई में सेक्सन्स ने केब्लिन के नेतृत्व में ब्रिटेन लोगों पर पूरी विजय प्राप्त कर ली तथा उनको अपना दास बनाए रखा। यह कामयाबी जूट्स (जाटों) की सहायता से हुई थी जिसके लिए सेक्सन्स ने उनसे मांग की थी1

अब प्रश्न पैदा होता है कि उन जूट्स (जाटों) का क्या हुआ जिन्होंने हेंगिस्ट और होरसा के नेतृत्व में ब्रिटेन के एक बड़े क्षेत्र पर अधिकार कर लिया था और सेक्सन्स को सहायता देकर उनका ब्रिटेन पर अधिकार करवाया। इसका उत्तर यही हो सकता है कि ब्रिटिश इतिहासकारों ने इनके इतिहास को लिखने में पक्षपात किया है।

सेक्सन्स के बाद एंग्ल्स पहुंचे जो जूट्स और सेक्सन्स की तरह ही लड़ाके तथा लुटेरे थे। सन् 613 ई० में नार्थम्ब्रिया के एंग्ल राजा ने ब्रिटेन पर आक्रमण करके विजय प्राप्त की। इसके बाद इन्हीं एगल्स के नाम पर ब्रिटेन का नाम इंग्लैंड हो गया। ये एंगल्स लोग भी जाट थे जैसा कि पिछले पृष्ठों पर लिखा गया है। इंग्लैंड में रहने वालों को अंग्रेज कहा गया।

एंगल्स लोग संख्या में दूसरों से अधिक थे इसी कारण से ब्रिटेन को एंगल्स की भूमि एवं इंग्लैंड कहा गया। इस तरह से ब्रिटेन पर जूट्स, सेक्सन्स और एंगल्स का अधिकार हो गया। इसी को ब्रिटेन पर अंग्रेजों की जीत कहा जाता है। इन तीनों कबीलों ने अपने अलग-अलग राज्य स्थापित किए। जूट्स ने केण्ट (Kent); सैक्सन्स ने सस्सेक्स (Sussex), एस्सेक्स (Essex), वेसेक्स (Wessex) और एंगल्स ने ईस्ट एंगलिया (East Anglia), मर्शिया (Mercia) और नार्थम्ब्रिया (Northumbria) के राज्य स्थापित किये। ये सातों राज्य सामूहिक रूप से हेपटार्की कहलाते थे। परन्तु ये राज्य स्वतन्त्र नहीं थे। इन सातों में जो शक्तिशाली होता था वह दूसरों का शासक बन जाता था।

ऊपर कहे हुए तीनों कबीले संगठित नहीं थे। नॉरमनों ने जब तक इस देश को नहीं जीता, इंग्लैंड में शक्तिशाली केन्द्रीय राज्य की स्थापना नहीं हो सकी। इन कबीलों ने देश से क्रिश्चियन धर्म और रोमन सभ्यता को मिटा दिया। आधुनिक इंग्लैंड एंग्लो-सैक्सन्स का बनाया हुआ है। आधुनिक अंग्रेज किसी न किसी रूप में इंग्लो-सैक्सन्स के ही वंशज हैं।

अंग्रेज जाति की उत्पत्ति और बनावट के सम्बन्ध में दो प्रतिद्वन्द्वी सिद्धान्त हैं।

  1. पलग्रोव, पियरसन और सेछम आदि प्रवीण मनुष्य रोमन केल्टिक सिद्धान्त को मानते हैं। उनका यह विचार है कि आधुनिक इंग्लैंड में रोमन-केल्टिक रक्त और संस्थाएं मौजूद हैं।
  2. ग्रीन और स्टब्स जैसे दूसरे प्रवीन मनुष्य ट्यूटानिक सिद्धान्त को मानते हैं। उनका यह विचार है कि ट्यूटानिक अर्थात् जूट, एंगल, सैक्सन और डेन लोगों का रक्त और संस्थाएं बहुत कुछ आधुनिक इंग्लैंड में पाई जाती हैं। इन दोनों में से ट्यूटानिक सिद्धान्त अधिक माना जाता

1. आधार लेख - इंग्लैण्ड का इतिहास पृ० 16-17, लेखक प्रो० विशनदास; ए हिस्ट्री ऑफ ब्रिटेन पृ० 21-22, लेखक रामकुमार लूथरा; अनटिक्विटी ऑफ जाट रेस, पृ० 63-66, लेखक: उजागरसिंह माहिल; जाट्स दी ऐन्शन्ट रूलर्ज पृ० 86 लेखक: बी० एस० दहिया तथा जाट इतिहास अंग्रेजी पृ० 43, लेखक ले० रामसरूप जून


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-400


है और आमतौर पर यह स्वीकार किया जाता है कि ब्रिटिश जाति मिले-जुले लोगों की जाति है। जिनमें ट्यूटानिक तत्त्व प्रधान है, जबकि केल्टिक तत्त्व भी पश्चिम में और आयरलैंड में बहुत कुछ बचा हुआ है1। इसका सार यह है कि इंगलैंड द्वीपसमूह के मनुष्यों की रगों में आज भी अधिकतर जाट रक्त बह रहा है। क्योंकि केल्टिक आर्य लोग तथा जूट, एंगल, सैक्सन और डेन लोग जाटवंशज थे। आज भी वहां पर अनेक जाटगोत्रों के मनुष्य विद्यमान हैं जो कि धर्म से ईसाई हैं।

इंगलैंड पर डेनों के आक्रमण तथा राज्य (787 ई० से 1070 ई०):

जो आक्रमणकारी स्केण्डेनेविया से आये उन्हें नॉरमन या विकिंग्ज और डेन आदि भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा गया। वे बड़े वीर योद्धा थे। डेन लोग डेन्मार्क, नॉरवे, स्वीडन, उत्तरी जर्मनी और उत्तरी समुद्रतटों से इंगलैंड में आये। इन लोगों ने इंग्लिश चैनल तटों पर दो शताब्दियों तक उपद्रव किए। एंग्लो-सैक्सनों के देश को जीत कर तथा यहां बस जाने के बाद इन्होंने इंगलैंड पर आक्रमण आरम्भ किये। सन् 787 ई० से 1070 ई० तक डेनों के आक्रमण और राज्य का काल है। धीरे-धीरे ये लोग इंगलैंड में बस गये और अंग्रेजों के साथ घुल-मिलकर एक जाति बन गये। डेन लोग जाट थे तथा इंगलैंड के निवासी भी इनके भाई थे इसीलिए वे बहुत आसानी से आपस में मिलकर एक हो गये। डेनों ने अंग्रेजों की भाषा अपना ली और ईसाई मत ग्रहण कर लिया2

महान् एल्फ्रेड से पहले डेनों का संघर्ष - डेन लोग पहले-पहल 794 ई० में इंगलैंड में आये और उन्होंने जेरो के मठ को लूट लिया। सम्राट् एम्बर्ट (802 ई० से 839 ई०) की मृत्यु के पश्चात् जब उसका पुत्र एथलवुल्फ राजा बना तब डेनों ने और ज्यादा दुःख देना आरम्भ कर दिया। 866 ई० में एक डेन सेना ने ईस्ट एंगलिया पर आक्रमण किया और यार्क पर अधिकार कर लिया तथा दक्षिण नार्थम्ब्रिया को भयभीत किया। वे मर्शिया में नॉटिंघम तक घुस गए और थेटफोर्ड में ईस्ट एंगलिया के राजा एड्मण्ड का वध कर दिया। 871 ई० में डेन सेना ने वेस्सेक्स पर आक्रमण किया। यहां उन्होंने एथलरेड को युद्ध में हराया3

महान् एल्फ्रेड के साथ डेनों का संघर्ष - एल्फ्रेड ने डेनों से कई बार युद्ध किए और कई बार धन देकर उन्हें लौटा दिया। अन्त में 878 ई० में उन्होंने चिप्पेहम के स्थान पर एल्फ्रेड को पूरी तरह पराजित कर दिया और उसे एक सूअर पालने वाले के घर में शरण लेनी पड़ी। इस सम्राट् ने फिर एक शक्तिशाली सेना संगठित की और डेनों को एडिंग्टन के युद्ध में पूरी तरह से हराया तथा उनके नेता गुर्थ्रम को 878 ई० में बेडमोर की सन्धि करने के लिए मजबूर किया। इस समय से एल्फ्रेड ने स्वदेश में शान्ति स्थापित कर ली और अंग्रेज तथा डेन सानन्द इकट्ठे रहने लगे4

एल्फ्रेड के पश्चात् डेनों का संघर्ष - एल्फ्रेड सन् 901 ई० में मर गया। उसके बड़े पुत्र ‘बड़े एडवर्ड’ ने शासन की बागडोर


1, 2, 3, 4. इंगलैण्ड का इतिहास पृ० 17-18, 113-114, 40 से 43, लेखक प्रो० विशनदास; ए हिस्ट्री ऑफ ब्रिटेन पृ० 5-6, 21-22, 32-H से 32-O लेखक रामकुमार लूथरा।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-401


सम्भाली। उसने डेनों से मर्शिया अजुर ईस्ट एंगलिया छीन लिया। सन् 924 ई० में उसकी मृत्यु होने के बाद उसका पोता एड्गर प्रसिद्ध सम्राट् हुआ। वह बड़ी शान्ति के साथ राज्य करता रहा, इसलिए उसे शान्तिप्रिय एड्गर कहा गया है। उसने सन् 959 से 975 ई० तक शासन किया। उसके पुत्र अनुद्यत एथलरेड के समय में डेन्मार्क से डेनों ने आक्रमण कर दिया। एथलरेड डेनों का सामना नहीं कर सका, इसलिए उसने डेनों को धन देकर लौटा दिया। जितना अधिक धन वह उन्हें देता था उतनी ही अधिक बार डेन आते थे। इससे तंग आकर उसने इंगलैंड में रहने वाले सब डेनों को मारने का आदेश जारी कर दिया। उसके वध का बदला लेने के लिए डेन्मार्क के राजा स्वेन ने इंगलैंड पर आक्रमण किया और उसे विजय कर लिया। अब डेन (जाट) स्वेन (Sweyn) इंगलैंड की गद्दी पर बैठा। उसकी सन् 1014 ई० में मृत्यु हो गई। उसके मरने पर एथलरेड फिर से इंगलैंड का राजा बना। स्वेन के पुत्र कैन्यूट ने एथलरेड से एक ही वर्ष में छः युद्ध किए और उसे मारकर कैन्यूट इंगलैंड का शासक बन गया1

डेन राजा कैन्यूट (सन् 1016-1035 ई०):

कैन्यूट इंगलैंड का प्रथम डेन सम्राट् था जिसने फिर से इंगलैंड में शान्ति और समृद्धि स्थापित की। यद्यपि यह एक विदेशी विजेता था, तो भी वह एक अच्छा राजा था। उसने एक इंगलैंड निवासी के समान शासन करना आरम्भ किया और ईसाई धर्म ग्रहण कर लिया। एथलरेड की विधवा से विवाह करके उसने नॉरमण्डी से भी मैत्री-सम्बन्ध जोड़ लिए। उसने 1028 ई० में नार्वे और डेन्मार्क को अपने अधीन कर लिया तथा स्काटलैंड के राजा ने भी उसे अपना अधिपति स्वीकार कर लिया। उसकी विदेशनीति प्रमुख रूप से सफल रही और उसने महाद्वीप की दृष्टि से इंगलैंड की स्थिति को ऊंचा किया।

उसने अंग्रेजों और डेनों को समान रूप से सरकारी नौकरियां दीं। वह एक योग्य शासक सिद्ध हुआ। उसने इंगलैंड को चार प्रान्तों में बांटकर प्रत्येक को एक नवाब (Earl) के अधीन रखा। वह इंगलैंड पर एक देशभक्त की तरह राज्य करता रहा। उसकी मृत्यु 1035 ई० में हो गई।

कैन्यूट के दो पुत्रों ने आपस में लड़ झगड़कर सन् 1042 ई० में अपना राज्य खो दिया। डेन लोग अंग्रेज जाति में लीन हो गये। नॉरमण्डी से आकर साधु एडवर्ड ने इंगलैंड का राज्य सम्भाला2

साधु एडवर्ड (1042 ई० से 1066 ई०):

वह अनुद्यत एथलरेड और एम्मा का पुत्र था। धार्मिक प्रवृत्तियों तथा चरित्र की साधुता के कारण उसे साधु एडवर्ड कहा जाता था। वह इंगलैंड का राजा बनने की अपेक्षा एक नार्मन भिक्षु बनने के अधिक योग्य था। नार्मनों के प्रति उसकी अनुचित कृपाओं के कारण अंग्रेज उससे घृणा करने लगे, इस कारण इंगलैंड में दो दल खड़े हो गये - (1) राजा का दल अर्थात् नॉरमन और उसके अनुयायी (2) राष्ट्रीय अथवा सेक्सन दल, जिसका नेता गाडविन जो राजा का विरोधी था। उसके राज्यकाल में वेस्सेक्स का नवाब गाडविन और उसका पुत्र हेरोल्ड इंगलैंड के वास्तविक


1, 2. आधार लेख - इंगलैण्ड का इतिहास पृ० 40 से 43, लेखक प्रो० विशनदास; ए हिस्ट्री ऑफ ब्रिटेन पृ० 32-H से 32-O लेखक रामकुमार लूथरा।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-401


शासक थे। हेरोल्ड ने राजा को नॉरमनों को देश से निकालने के लिए विवश कर दिया। उनके चले जाने के बाद एडवर्ड हेरोल्ड की सलाह से राज्य करता रहा। 1066 ई० में उसकी मृत्यु होने पर उसका बहनोई हेरोल्ड राजा बना1

इंगलैंड पर नॉरमन विजय (सन् 1066-1154):

स्केण्डेनेविया में रहने वाले जाटों को नार्समेन-नॉरमन, विकिंग्स और डेन आदि नामों से पुकारा गया। वे बड़े बलवान् और उग्र थे। वे अपने जहाजों में ग्रीनलैण्ड व अमेरिका में भी पहुंचे। उन्होंने रूम सागर पर प्रभुता प्राप्त करके सिसिली और दक्षिणी इटली में भी एक राज्य स्थापित किया था। उनका एक दल रूस गया जहां पर एक राज्य स्थापित किया। इन लोगों का एक दल सन् 913 ई० में फ्रांस गया और वहां पर कुछ क्षेत्र विजय करके वहां के निवासी हो गये। इन लोगों के नाम पर वह क्षेत्र नॉरमण्डी कहलाया।

1066 ई० में साधु एडवर्ड की मृत्यु होने पर हेरोल्ड इंगलैण्ड का राजा बना। नॉरमण्डी के नॉरमन ड्यूक विलियम ने 1066 ई० में इंगलैण्ड पर आक्रमण कर दिया। राजा हैरोल्ड ने अपनी अंग्रेजी सेना के साथ नॉरमन सेना का मुकाबला किया। अन्त में 24 अक्तूबर, 1066 ई० में हेस्टिंग्स अथवा सेनलेक के स्थान पर नॉरमन सेना ने अंग्रेजी सेना को परास्त किया। हेरोल्ड बड़ी वीरता से लड़ा परन्तु उसकी आंख में तीर लगा जिससे वह रणक्षेत्र में वीरगति को प्राप्त हुआ। नॉरमण्डी के ड्यूक विलियम का वैस्टमिन्स्टर में इंगलैण्ड के राजा के रूप में राज्याभिषेक किया गया2

उजागरसिंह माहिल ने इन नॉरमनों के विषय में लिखा है कि “नॉरमन और कोई नहीं थे बल्कि ये जटलैण्ड के जूट या जाट थे जिन्होंने फ्रांस के उत्तरी समुद्री तट पर अधिकार कर लिया था। वे ह्रोल्फ दी गेंजर (Hrolf the Ganger) के नेतृत्व में उत्तरी फ्रांस पर उसी प्रकार टूट पड़े थे जिस प्रकार उनके पूर्वज हेंगेस्ट एवं होरसा बर्तानिया पर टूट पड़े थे। ह्रोल्फ ने सेन (Seine) नदी के डेल्टा के दोनों ओर के क्षेत्र को फ्राँस के राजा चार्ल्स-दी-सिम्पल से छीन लिया। फ्राँस के राजा ने नॉरमन नेता ह्रोल्फ से एक सन्धि 912 ई० में कर ली जिसके अनुसार इस समुद्री तट को राजा ने नॉरमनों को सौंप दिया और अपनी पुत्री का विवाह ह्रोल्फ से कर दिया। इस तरह से ह्रोल्फ पहला ड्यूक ऑफ नॉरमण्डी बन गया। इनका नाम नॉरमन पड़ने का कारण यह है कि ये लोग नॉरवे और जूटलैण्ड के उत्तरी भाग में रहते थे। विजेता विलियम इस ह्रोल्फ से सातवीं पीढ़ी में था।”


1, 2. आधार लेख - इंगलैण्ड का इतिहास पृ० 40 से 43, 40, 49, लेखक प्रो० विशनदास; ए हिस्ट्री ऑफ ब्रिटेन पृ० 32-H से 32-O, 32-S से 32-T लेखक रामकुमार लूथरा।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-403


ड्यूक ऑफ नॉरमण्डी शासकों की वंशावली निम्न प्रकार से है -

1. ह्रोल्फ (912-927 ई०)

2. विलियम लोंग्वर्ड (927-943 ई०)

3. रिचर्ड प्रथम - निडर (943-996 ई०)

4. रिचर्ड द्वितीय - योग्य (996-1026 ई०)

5. रिचर्ड तृतीय (1026-1028 ई०)

6. राबर्ट (1028-1035 ई०)

7. विलियम प्रथम विजेता, (b.1035-r.1066-1087.

विलियम विजेता द्वारा इंगलैण्ड की विजय तथा उसके वंशज राजाओं का शासन, इंगलैंड के इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण भाग है। उत्तर में जटलैंड में रहने वाले पूर्वजों का वंशज विलियम विजेता एक जाट था। उस बात को सिद्ध करने के लिए मैं इतिहासकार एच० जी० वेल्ज का वर्णन लिखता हूं जिसने अपनी पुस्तक “दी आउटलाइन ऑफ हिस्ट्री” के अध्याय 32, विभाग 8 में डेन, नॉरमन तथा विलियम विजेता के विषय में निम्न प्रकार से लिखा है -

सर्वव्यापक इतिहास के दृष्टिकोण से ये सब लोग पूर्णतः एक ही नॉरडिक परिवार के लोग थे। इनके समूह न केवल पश्चिम की ओर बढ़ते गये बल्कि पूर्व में भी चले गये। हम बाल्टिक सागर से काला सागर तक गोथ कहे जाने वाले इन लोगों के आन्दोलनों का बहुत ही रोचक वर्णन कर चुके हैं। इन गोथ लोगों के दो भाग आस्ट्रोगाथ (पूर्वी जाट) और वीसीगोथ (पश्चिमी जाट) लोगों की उत्साहपूर्ण यात्रायें खोज करके लिख दी हैं जो कि स्पेन में वीसीगोथ राज्य तथा इटली में आस्ट्रोगोथ साम्राज्य थे जो समाप्त हो गये।

नौवीं शताब्दी में एक दूसरा आंदोलन इन नॉरमन लोगों का रूस के पार चल रहा था और उसी समय इंगलैण्ड में उनकी बस्तियां तथा नॉरमण्डी में ड्यूक का पद मिलकर उनकी रियासत नॉरमण्डी स्थापित हो रही थी। दक्षिणी स्कॉटलैण्ड, इंगलैंड, पूर्वी आयरलैंड, फलैंडर्ज़ (बेल्जियम में पश्चिमी प्रान्त), नॉरमण्डी तथा रूस के लोगों में इतने अधिक सामान्य तत्त्व विद्यमान हैं कि हम उनकी पहचान करने में उनको अलग-अलग नहीं कर सकते। मूलतः ये सभी लोग गोथिक या नॉरडिक हैं। इनके नाप-तौल के पैमाने इंच व फुट एक ही थे।

रूसी नॉरसमेन (नॉरमन) गर्मियों में नदियों के रास्ते यात्रा करते थे। ये लोग रूस में बड़ी संख्या में थे। वे अपने जहाजों को उत्तर की ओर से दक्षिण की ओर बहनेवाली नदियों से ले जाते थे। वे लोग कैस्पियन तथा काला सागर पर समुद्री डाकुओं, छापामारों तथा व्यापारियों की तरह प्रतीत होते थे। अरब इतिहासकारों ने इन लोगों को कैस्पियन सागर पर देखा तथा यह भी ज्ञात हुआ कि इनको रूसी कहा जाता था। इन लोगों ने सन् 865, 904, 943 तथा 1073 ई० में छोटे समुद्री जहाजों के एक बड़े बेड़े के साथ पर्शिया (ईरान) पर छापा मारा और कांस्टेण्टीपल (पूर्वी


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रोमन साम्राज्य की राजधानी) को भयभीत किया। इन नॉर्थमेन (नॉरमन) लोगों में एक रूरिक था जो कि लगभग सन् 850 ई० में नोवरगोरॉड (Novgorod) (पश्चिमी रूस में, लेनिनग्राड के दक्षिण में इलमेन (Ilmen) झील का क्षेत्र) का शासक बना और उसके उत्तराधिकारी ड्यूक आलेग ने कीफ (Kief) पर अधिकार कर लिया तथा आधुनिक रूस की नींव डाल दी। रूसी विकिंग्ज (नॉरमन) के कांस्टेण्टीपल के स्थान पर उनके युद्धकला के गुणों की बहुत प्रशंसा की गई। यूनानी उन्हें वरान्जियन्ज (Varangians) कहते थे तथा इन्होंने एक वरान्जियन्ज अङ्गरक्षक दल की स्थापना भी की।

1066 ई० में नॉरमनों द्वारा इंगलैण्ड को जीत लेने के पश्चात् बहुत से डेन तथा अंग्रेज लोगों को देश से बाहर निकाल दिया गया था और वे रूसी वरान्जियन्ज में सम्मिलित हो गये थे। उसी समय नॉरमण्डी के नॉरमन पश्चिम से रूमसागर में प्रवेश करने के लिए अपने पथ पर अग्रसर थे। पहले वे धन के लालच में आये किन्तु बाद में स्वतन्त्र छापामार बन गये। वे मुख्यतः समुद्र से नहीं बल्कि बिखरे हुए समूहों में थल से भी आए। वे लोग राइनलैण्ड (Rhineland, पश्चिमी जर्मनी में) तथा इटली से होकर आए थे। उनका उद्देश्य लड़ाई सम्बन्धी कार्यों, लूटपाट करने और तीर्थयात्रा करने का था। नौवीं और दसवीं शताब्दियों में उनकी ये तीर्थयात्राएं बहुत उन्नति पर थीं। जैसे ही इन नॉरमनों की शक्ति बढ़ी, वे लुटेरे एवं भयंकर डाकू के रूप में प्रकट हुये। सन् 1053 ई० में इन्होंने पूर्वी सम्राट् तथा पोप पर इतना दबाव डाला कि वे इनके विरुद्ध दुर्बल तथा विफल बन गये। बाद में ये हार गये और पकड़े गये तथा पोप द्वारा माफ कर दिए गए।

सन् 1060-1090 ई० में ये लोग केलेबरिया तथा दक्षिणी इटली में आबाद हो गये। सारासेन्ज (Saracens) से सिसिली पर विजय पाई। इन नॉरमन लोगों ने अपने नेता राबर्ट गुइस्कार्ड (Robert Guiscard), जो कि साहसी योद्धा था, और एक तीर्थयात्री के रूप में इटली में प्रवेश कर गया था और जिसने केलेबरिया (Calabria - इटली का एक दक्षिणी प्रान्त) में एक डाकू के रूप में अपना कार्य शुरु किया था, के नेतृत्व में सन् 1081 ई० बाईजन्टाईन (Byzantine) साम्राज्य को भयभीत कर दिया था।

उसकी सेना ने, जिसमें एक सिसिली के मुसलमानों का सेना दल था, ब्रिण्डिसी (Brindisi - इटली के पूर्वी तट पर) से समुद्र पार करके एपिरस (Epirus - यूनान का पश्चिमी प्रान्त) में प्रवेश किया था। परन्तु उनका यह मार्ग पाइर्रहस (Pyrrhus) के उस मार्ग से विपरीत था जिससे उसने 275 ई० पू० में रोमन साम्राज्य पर आक्रमण किया था।

इस राबर्ट ने बाईजन्टाईन साम्राज्य के शक्तिशाली दुर्ग दुराज्जो (Durazzo - अलबानिया में) पर घेरा डाला और उस पर सन् 1082 में अधिकार कर लिया। किन्तु इटली में घटनाओं के कारण उसे वहां से इटली लौटना पड़ा। अन्त में बाईजण्टाईन साम्राज्य पर नॉरमनों के इस पहले आक्रमण को समाप्त किया। इस प्रकार अधिक शक्तिशाली कमनेनियन (Comnenian) वंश के शासन के लिए रास्ता खोल दिया, जिसने सन् 1082 से 1204 ई० तक वहां शासन किया।

रोबर्ट गुइस्कार्ड ने सन् 1084 में रोम का घेरा लगाया तथा उसे जीत लिया। इसके लिये


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इतिहासकार गिब्बन ने बड़े सन्तोष से यह स्वीकार किया है कि इन लुटेरों में सिसिली के मुसलमान सैनिक भी शामिल थे।

12वीं शताब्दी के इटली के पूर्वी साम्राज्य पर नॉरमन लोगों ने तीन और आक्रमण किए। उनमें से एक रोबर्ट गुइस्कार्ड के पुत्र ने किया तथा दूसरे दो आक्रमण सिसिली से सीधे समुद्री मार्ग से किए गए थे।

आगे यही लेखक एच० जी० वेल्ज इसी अध्याय 32, के पृष्ठ 635 पर लिखते हैं कि “जब हम इन दक्षिणी रूसी क्षेत्रों की वर्तमान जनसंख्या के विषय में सोचते हैं तो हमें नॉरमन लोगों का बाल्टिक तथा काला सागर के बीच आवागमन भी याद रखना होगा और यह भी याद रखना होगा कि वहां स्लावोनिक (Slavonic) जनसंख्या काफी थी जो कि सीथियन तथा सरमाटियन्ज (Sarmatians) के वंशज एवं उत्तराधिकारी थे। तथा वे इन अशान्त, कानूनरहित किन्तु उपजाऊ क्षेत्रों में पहले ही आबाद हो गये थे। ये सब जातियां परस्पर घुलमिल गईं तथा एक-दूसरे के प्रभाव में आ गईं। स्लावोनिक भाषाओं की, सिवाय हंगरी में, सम्पूर्ण सफलता से प्रतीत होता है कि स्लाव (Slav) लोगों की ही जनसंख्या अत्यधिक थी।”

मैंने यह विस्तृत उदाहरण इस बात को स्पष्ट करने के लिए दिए हैं कि डेन, विकिंग्ज, नॉरमन और गोथ - ये सब सीथियन जाटों में से ही थे तथा उन्हीं के वंशज थे1

इंगलैंड पर नॉरमन राज्य (1066-1154 ई०):

विलियम प्रथम (विजयी) (1066-1087 ई०) -

14 अक्तूबर 1066 ई० को सेनलेक अथवा हेस्टिंग्स की विजय से विलियम प्रथम को इंगलैंड का सिंहासन प्राप्त हो गया। इस विजय के पश्चात् वह लन्दन की ओर बढ़ा और बुद्धिमानों की सभा (Witar) ने उसका स्वागत किया और अपनी इच्छा से उसे राजा के रूप में चुन लिया। इस प्रकार सैद्धान्तिक दृष्टि से उसके अधिकार का आधार चुनाव हो गया।

सेनलेक की विजय से विलियम इंगलैंड के केवल एक भाग का ही स्वामी बना था। देश के दूसरे भागों में अभी तक स्वतन्त्रता के युद्ध का कार्य चल रहा था तथा इंगलैंड के कई भागों में विद्रोह हुए और उन सबको दबाकर अपनी विजय को पूर्ण करने के लिए विलियम को पांच वर्ष तक घोर युद्ध करना पड़ा।

विलियम की नीति यह थी कि राजा की स्थिति को दृढ़ बनाया जाय और सारे इंगलैंड में एक शक्तिशाली केन्द्रीय शासन स्थापित किया जाय। वह सारी शक्ति अपने आप में केन्द्रित करके देश का वास्तविक शासक बनना चाहता था।

अंग्रेजों को अपने अधीन करने के लिए उनसे उनकी भूमियां जब्त कर लीं और वह नॉरमनों को दे दीं। इससे अमीर अंग्रेजों की शक्ति भंग हो गई तथा उनकी ओर से विरोध या विद्रोह का भय


1. अनटिक्विटी ऑफ जाट रेस, पृ० 66 से 70, लेखक उजागरसिंह माहिल।


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न रहा। उसने देशभर में किले बनवा दिये जिनमें नॉरमन सैनिक रखे ताकि वे अंग्रेजों के किसी भी विद्रोह को दबा सकें।

नॉरमनों को अपने अधीन रखने के लिये उसने नवाबी प्रथा का लोप कर दिया। उसने नॉरमन सरदारों को एक स्थान पर भूमि न देकर भिन्न-भिन्न भागों में बिखेरकर भूमियां दीं ताकि उनकी शक्ति का संगठन न हो सके। उसने अंग्रेजों की मिलिशिया सेना संगठित की, जो नॉरमनों के विद्रोह को दबाने के लिए हर समय तैयार रहती थी। उसने मुख्य काश्तकारों और उप-काश्तकारों को सालिसबरी में इकट्ठा करके उनसे राजा के प्रति भक्त रहने की शपथ दिलवाई।

उसने अंग्रेजी चर्च को रोम की बजाय अपने अधीन कर लिया। उसने पादरियों को मजबूर किया कि वे उसकी अधीनता स्वीकार करें तथा उसी से पद प्राप्त करें। उसने पादरियों की सभा (Synod) को आज्ञा दी कि वह राजा की स्वीकृति के बिना कोई कानून न बनाये। इससे चर्च की शक्ति राज के हाथों में आ गई।

विलियम द्वारा पादरियों को ब्रह्मचारी रहने की आज्ञा दी गई। पुराने सैक्सन पादरियों के स्थान पर नए नॉरमन पादरी रखे गए और चर्च का रोम के साथ सम्बन्ध कम कर दिया।

विलियम एक चतुर और दूरदर्शी राजनीतिज्ञ था। उसने इंगलैंड की सम्पत्ति और आय के स्रोतों की जाँच करवाई। यह जाँच इतनी पूर्ण थी कि कोई भूमि, सड़क तथा पशु आदि ऐसा न था जिसे पुस्तक में दर्ज न किया गया हो। यह जाँच सन् 1086 ई० में सम्पूर्ण हो गई और इसे ‘डूम्स्डे’ नामक पुस्तक में दर्ज किया गया। इसी को “डूम्सडे पुस्तक” (Doomsday Book) कहते हैं। यह प्रत्येक भूपति के नाम और उसकी जायदाद का वर्णन करती है तथा 11वीं शताब्दी के इंगलैंड के हालात का बहुमूल्य अभिलेख (Record) है। इससे सरकार की आय भी निश्चित हो गई और सरदारों की शक्ति का भी ज्ञान हो गया। यह पुस्तक उस समय के इंगलैंड का सच्चा चित्र है।

विलियम ने स्काटलैंड पर आक्रमण किया और उससे अपना परमाधिकार मनवाया। उसने फ्रांस के राजा को, विलियम के विद्रोही भाई की सहायता करने पर, दंड देने के लिए फ्रांस पर आक्रमण किया। उस प्रकार उसने इंगलैंड की प्रतिष्ठा बढ़ाई।

विलियम की इंगलैंड के प्रति सबसे बड़ी सेवा यह थी कि उसने देश में एक दृढ़ और निश्चित राष्ट्रीय राजतन्त्र स्थापित किया। वह एक योग्य प्रशासक और सफल राजनीतिज्ञ था। वह विदेशी था, परन्तु उसने इंगलैंड पर बुद्धिमत्ता के साथ शासन किया और अपनी प्रजा का उपकार किया। वह एक कठोर और कड़ा शासक था। उसने देश में शान्ति स्थापित की। राज्यभर में कोई आदमी अपनी छाती पर सोना रखकर जा सकता था। यह कहना उचित ही है कि “नॉरमन विजय इंगलैंड के इतिहास में एक निर्णायक स्थिति अथवा स्थल चिह्न है और यह विजय एक गुप्त आशीर्वाद थी।”

सम्राट् विलियम की सितम्बर 9, 1087 ई० को अपने घोड़े पर से गिरकर मृत्यु हो गई1


1. इंगलैण्ड का इतिहास पृ० 6-74, लेखक प्रो० विशनदास; ए हिस्ट्री ऑफ ब्रिटेन पृ० 32-R - 32-X, लेखक रामकुमार लूथरा।


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विलियम द्वितीय (1087-1100 ई०) -

विलियम विजयी ने अपने सबसे बड़े पुत्र राबर्ट को वसीयत द्वारा नॉरमण्डी का राज्य दिया और अपने अधिक पुरुषार्थी पुत्र विलियम को इंगलैंड का राज्य दिया। अपने तीसरे पुत्र हेनरी को केवल धन ही दिया। विलियम द्वितीय का अभिषेक 26 सितम्बर, 1087 ई० को वेस्टमिनिस्टर के बड़े गिरजा में हुआ।

वह एक अविश्वासी, अधार्मिक, सिद्धान्तहीन और क्रूर राजा था। उसमें अपने पिता के कोई गुण नहीं थे। उसने अपनी अनुचित आज्ञाओं को लोगों पर लागू करने के लिए वेतनभोगियों को अपने इर्दगिर्द इकट्ठा कर लिया। वह सरदारों से धन निचोड़ने के लिए अत्याचारपूर्ण तरीके प्रयोग में लाता था। इस कारण सामन्तगण इसको पसन्द नहीं करते थे तथा युद्ध आदि में कभी भी इसकी सहायता करने को तैयार नहीं होते थे।

प्रथम धर्मयुद्ध (First Crusade) 1095-1099 ई०

तुर्की ने जेरुसलेम को विजय कर लिया और वे जेरुसलेम की यात्रा करनेवाले ईसाई यात्रियों को बहुत कष्ट देते थे। सन् 1095 ई० में पोप ने ईसाई योद्धाओं को तुर्कों के विरुद्ध पवित्र युद्ध में शामिल होने के लिए आह्वान किया। प्रथम धर्म-युद्ध (1095-99) अपने उद्देश्य में सफल रहा और जेरुसलेम पर ईसाइयों का अधिकार हो गया।

विलियम द्वितीय की मृत्यु सन् 1100 ई० में घातक चोट लगने से हो गई।

हेनरी प्रथम (1100-1135 ई०) -

विजयी विलियम का सबसे छोटा पुत्र हेनरी प्रथम नये वन में शिकार खेल रहा था जबकि विलियम द्वितीय को घातक चोट लगी तथा उसकी मृत्यु हो गई। क्योंकि राबर्ट पूर्व में जेरुसलेम में धर्म-युद्ध लड़ रहा था, इसलिए हेनरी प्रथम को सरदारों ने राजा चुन लिया। उसका राज्याभिषेक 5 अगस्त 1100 ई० में हुआ। उसने स्वतन्त्राओं का चार्टर (शासन-पत्र) जारी करके अपनी प्रजा को सुशासन का विश्वास दिलाया। इस चार्टर की धारायें निम्नलिखित थीं –

  1. चार्टर में यह बताया गया कि राजा हेनरी को सारे इंगलैंड के लोगों ने राजा चुना है।
  2. उसने जनता के धन को निचोड़नेवाले सब कठोर, अत्याचारपूर्ण तरीके उड़ा दिए जो कि उसके भाई विलियम द्वितीय के राज्यकाल में प्रचलित थे।
  3. चर्च को भी अनुचित रूप से धन निचोड़ने के तरीकों से मुक्त कर दिया गया। सरदारों को विश्वास दिलाया गया कि उनसे अनुचित तरीकों से रुपया नहीं निचोड़ा जायेगा।
  4. सरदारों को भी चेतावनी दी गई कि वे अनुचित तरीकों से अपने काश्तकारों से धन न निचोड़ें।
  5. साधु एडवर्ड के कानूनों को फिर से लागू किया गया।
  6. यह प्रतिज्ञा की गई कि शुद्ध सिक्के जारी किये जायेंगे।

जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-408


हैनरी ने प्रशासनिक सुधार किए -

  1. उसने प्राचीन शत सभाओं (Hunded Moots) और शायर सभाओं (Shire Moots) को पुनर्जीवित किया।
  2. नॉरमन विजय से पहले के समय की बुद्धिमानों की सभा (Witanage moot) के स्थान पर महान् परिषद (Great Council) बनाई गई। इसमें बुद्धिमान् व्यक्ति न्याय के आधार पर झगड़ों का निर्णय करते थे।
  3. दो न्यायालय बनाये गये (1) एक्सचेकर (Exchequer) - जिसका काम राजस्व को इकट्ठा करना और उसका नियन्त्रण करना था। इसके प्रधान को 'जसतिशिया' कहा जाता था। (2) क्यूरिया रीजिस (Curia Regis) अथवा राजकीय न्यायालय, महत्त्वपूर्ण न्यायिक कार्य करता था। यह बड़े-बड़े काश्तकारों के मुकद्दमों और शायर सभाओं के फैसलों के विरुद्ध अपीलें करता था।
  4. घूमने-फिरने वाले न्यायाधीश (Lutinerant Justices) नियुक्त किये गये जो कि देश में घूमकर यह देखते थे कि छोटे न्यायालय लोगों को ठीक न्याय देते हैं या नहीं। इससे निर्धन से निर्धन व्यक्ति को भी उचित न्याय प्राप्त होने लगा।

न्यायिक कार्यों में रुचि रखने और उसके द्वारा किए गए अनेक न्यायिक सुधारों के कारण हेनरी सत्यपरायणता का शेर कहा जाता है।

हेनरी बड़ा बुद्धिमान् प्रशासक था। पादरियों और अंग्रेज जाति ने उसके कार्यों का समर्थन किया, क्योंकि उसने देश में शान्ति और न्याय की व्यवस्था की।

2 दिसम्बर, 1135 ई० को सम्राट् हेनरी की मृत्यु हो गई।

स्टीफन (1135-1154 ई०) -

स्टीफन विजयी विलियम प्रथम की पुत्री एडेला का पुत्र था। हेनरी प्रथम के मरने पर उसकी एकमात्र पुत्री माटिल्डा (Matilda) थी। हेनरी ने अपने सरदारों से, जिनमें स्टीफन भी शामिल था, यह शपथ ले ली थी कि वे उसके मरने पर उसकी पुत्री माटिल्डा को इंग्लैण्ड की रानी बनायेंगे। उन्होंने दबाव में आकर यह शपथ ली थी, परन्तु वास्तव में वे अशान्त समय में एक स्त्री को अपनी रानी बनाने से डरते थे। इसलिए उन्होंने बड़ी प्रसन्नता के साथ विजयी विलियम की पुत्री एडेला (Adela) के पुत्र स्टीफन को अपना राजा बना लिया। इस पर गृह-युद्ध शुरु हो गया, जो कई वर्षों तक चलता रहा। शुरु-शुरु में माटिल्डा को कुछ सफलता मिली। स्टीफन पकड़ा गया और माटिल्डा का लन्दन में अभिषेक किया गया। परन्तु उसने अपने घमण्डी व्यवहार से सरदारों को नाराज कर दिया और वे स्टीफन के झण्डे तले इकट्ठे हो गये।

माटिल्डा का मामा डेविड जो स्कॉटलैण्ड का राजा था, ने माटिल्डा के पक्ष को अपनाकर इंग्लैंड पर आक्रमण कर दिया, परन्तु वह सन् 1138 ई० में स्टैण्डर्ड की लड़ाई में पराजित हुआ। इसके बाद एक समझौता किया गया जिसके अनुसार डेविड के पुत्र हेनरी को नार्थम्बरलैंड में एक जागीर दी थी। अब माटिल्डा का कोई शक्तिशाली समर्थक न रहा। जब उसका भाई राबर्ट पकड़ा गया तो वह भागने पर मजबूर हो गई। राबर्ट और स्टीफन के समर्थकों में युद्ध फिर शुरु हो गया। परन्तु इससे थोड़े समय पश्चात् माटिल्डा को सिंहासन प्राप्ति की कोई आशा न रही और वह भागकर फ्रांस को चली गई।

अन्त में 1153 ई० में वालिंगफोर्ड (Wallingford) की सन्धि द्वारा युद्ध समाप्त हो गया


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-409


जिसके अनुसार स्टीफन मरने तक राजा रहेगा तथा उसका उत्तराधिकारी माटिल्डा का पुत्र हेनरी द्वितीय होगा। स्टीफन की मृत्यु सन् 1154 ई० में हो गई और हेनरी द्वितीय इंग्लैंड के सिंहासन पर बैठा। इस तरह से इंग्लैंड पर से नॉरमन राज्य सन् 1066 से 1154 ई० तक 88 वर्ष रहकर समाप्त हो गया।

स्टीफन एक कमजोर राजा था। उसके राज्यकाल में अव्यवस्था और अराजकता मची रही। इस कारण उसके राज्यकाल को 19 लम्बी सर्दियां कहा जाता है।

नॉरमन विजय से इंगलैंड को लाभ - नॉरमन शासक इंगलैंड के लिए एक आशीर्वाद थे और उन्होंने देश के राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक जीवन के स्तर को उन्नत किया। नॉरमन राजा बड़े शक्तिशाली थे और उन्होंने कठोरतापूर्वक देश से अव्यवस्था दूर करके अन्दरूनी शान्ति स्थापित कर दी और इंगलैंड पर एक स्थिर शासन स्थापित किया।

नॉरमनों ने देश को अपनी नई कला, वास्तुविद्या (Architecture), ज्ञान, व्यवहार, संस्थायें और संस्कृति प्रदान की। इन कारणों से नॉरमन विजय को इंगलैंड के इतिहास में निर्णयात्मक स्थिति माना जाता है।

समय बीतने पर नॉरमन लोग अंग्रेजों में विलीन होकर एक जाति बन गये1

इंग्लैंड के नॉरमन शासक (1066-1154 ई०)

विलियम प्रथम (विजयी) (1066-1087 ई०)

1. राबर्ट - नॉरमण्डी का ड्यूक (निःसन्तान मर गया)

2. विलियम द्वितीय (रूफस) (1087-1100)

3. हेनरी 1100-1135

4. एडला का पुत्र स्टीफन 1135-1154

हेनरी (1100-1135)

1. विलियम (1120 में डूबकर मरा) 2. माटिल्डा (पुत्री)

नोट : सन् 1154 ई० में स्टीफन के मरने पर इंगलैंड पर से नॉरमन जाटों का शासन समाप्त हो गया। उसके बाद अंजौवंश अथवा प्लांटेजिनेट्स का शासन इंगलैंड पर शुरु हो गया जिसका प्रथम सम्राट् हेनरी द्वितीय (1154-1189) था)।

External links

References