Dhatarwal

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Dhatarwal

(Dhetrawal, Dhartawal, Dhatterwal, Dhetarwal,)

Location  : Rajasthan, Haryana and Madhya Pradesh

Country  : India

Languages : Rajasthani, Haryanvi, Hindi

Religion  : Hinduism

Dhetrawal (धेत्रवाल)[1] Dhatrawal (धत्रवाल) Dhatarwal (धतरवाल) Dhatterwal (धत्तरवाल) Dhetarwal (धेतरवाल) Dhatarwal (धातरवाल) Dheterwal (धेतरवाल) is gotra of Jats found in Rajasthan, Haryana and Madhya Pradesh. It seems to be variant of Dharatwal.

Origin

History

Dharteya (धार्तेय) was an ancient republic of Ayudhjivi Sangha known to Panini.

V. S. Agrawala[3] mentions Ayudhjivi Sanghas in the Ganapatha under Yaudheyadi group, repeated twice in the Panini's Ashtadhyayi (IV.1.178) and (V.3.117) which includes - Dhārteya – unidentified, probably the same as the Dārteyas. The Greek writers mention Dyrta as a town of Assakenoi or the Āśvakāyanas of Massaga, and this may have been the capital of the Darteyas.


H. W. Bellew[4] writes that After the capture of Aornos, Alexander, descending from the Rock, marched into the territories of the Assakenoi (perhaps the Aswaka or Assaka, the tribe perhaps of the Assagetes, which name may stand for Assa Jat of the Assa tribe of the Jat nation or race; the Assakenoi may be now represented by the Yaskun as before stated), in pursuit of the Barbarians who had fled into the mountains there; and when he arrived at the city of Dyrta (capital perhaps of the Darada), there, he found both that and the country around entirely destitute of inhabitants. (Alexander appears to have crossed the Barandu river into the Puran and Chakesar valleys, now inhabited by the Chagharzi Afghans; there is a castellated village in Chakesar called Daud perhaps the Musalman disguise of a native Dardu, possibly so named from inhabitants of the Dardu tribe.)


Khiyana village in Lunkaransar tahsil of Bikaner is the place of origin of Dhatarwal Jats in Rajasthan. Here a festival is organized every year in memory of their ancestral person Nathu Dada.

नाथूदादा की देवली खीयाणा

बीकानेर जिले में तहसील लूणकरणसर के गाँव खीयाणा के पास महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में नाथूदादा की देवली है, जिस पर भव्य मन्दिर का निर्माण धत्तरवाल समुदाय द्वारा करवाया गया। आसोज महीने की नवम् को प्रतिवर्ष लगने वाले इस भव्य मेले में धत्तरवाल समुदाय के साथ-साथ नाथूदादा में आस्था रखने वाले अनेक भक्तजन एकत्रित होकर भजन-जागरण का आयोन करते हैं। गत दिनों आयोजित इस मेले में नवनिर्मित मन्दिर भवन का लोकार्पण हेमाराम चौधरी द्वारा किया गया। समारोह में विधायक लूणकरणसर वीरेन्द्र बेनीवाल, चौधरी गंगाजल मील, बीकानेर डेयरी चैयरमेन राजाराम झोरड, चौधरी भूराराम जाखड आदि उपस्थित थे। मन्दिर कमेटी के सदस्यों ने सभी का माल्यार्पण कर स्वागत किया तथा आभार प्रकट किया तथा जागरण मन्डली द्वारा रातभर नाथूदादा की महिमा रचित गाथाओं को गाकर सभी को भक्तिमय रस में डूबो दिया। समारोह की अध्यक्षता डूंगर राम धत्तरवाल ने की। मुख्यअतिथी के रूप में बोलते हुए हेमाराम चौधरी ने नाथूदादा के चरित्र व जीवनी पर प्रकाश डाला। विधायक बेनीवाल ने कहा कि आने वाले समय में नाथू दादा के इस मेले में सिर्फ धत्तरवाल ही नहीं अन्य समुदाय के लोग भी आऐंगे। चौधरी गंगाजल मील ने अपने उद्बोधन में हेमाराम चौधरी व वीरेन्द्र बेनीवाल के प्रयासों व राज्य सरकार के समक्ष अपने-अपने क्षेत्र की समस्याओं को रखने व तर्क को अपने आप में उपलब्धी बताते हुए उनकी प्रगति की कामना नाथूदादा के द्वार से की। चौधरी राजाराम झोरड ने अपने ओजस्वी अन्दाज में सभी श्रद्धालुओं से शिक्षा के क्षेत्र में विकास पर जोर दिया। मन्दिर कमेटी की ओर से को स्मृति चिन्ह व सांफा पहना कर अभिनन्दन किया गया। इस अवसर पर देवदास रांकावत द्वारा राजस्थानी भाषा में लिखित नाथूदादा की जीवनी “मुळकती मौत कळपती काया” का विमोचन विधायक बेनीवाल द्वारा किया गया। मन्दिर कमेटी की ओर से कृष्ण चन्द्र धत्तरवाल (गोलूवाला) व मुखराम धत्तरवाल (भीखनेरा) ने सभी का आभार प्रकट किया।[5]

इतिहास

खीचड़ों का इतिहास एवं वंशावली की जानकारी प्रबोध खीचड़, खीचड़ों की ढाणी, बछरारा, रतनगढ़, चुरू, राजस्थान द्वारा ई-मेल से उपलब्ध कराई है। (Mob: 9414079295, Email: prabodhkumar9594@gmail.com)

खीचड़ों का गोत्र-चारा:

कोट-मलौट के राजा: विक्रम संवत 1015 (959 ई.) में क्षत्रिय जाति के राजा शिवसिंह राज करते थे। इनकी राजधानी कोट-मलौट थी जो अब मुक्तसर पंजाब में है। सन् 959 ई. में यवनों ने इस राजधानी पर आक्रमण किया। यवनों की सेना बहुत विशाल थी परिणाम स्वरूप शिवसिंह को कोट-मलोट (मलौट पंजाब) छोडना पड़ा। राजा शिवसिंह अपने 12 पुत्रों के साथ आकर सिद्धमुख (चुरू) में रहने लगे। राजा शिवसिंह के सबसे बड़े पुत्र खेमराज थे। बड़वा के अनुसार इनके वंशजों से खीचड़ गोत्र बना। खेमराज के वंशजों ने सर्वप्रथम कंवरपुरा गाँव बसाया। (तहसील: भादरा, हनुमानगढ़)। राजा शिवसिंह के पुत्रों से निम्न 12 उपगोत्र निकले -

1. खेमराज की सन्तानें खीचड़ कहलाई जिन्होने कंवरपुरा गाँव बसाया (तहसील: भादरा, हनुमानगढ़)
2. बरासी की सन्तानें बाबल कहलाई जिन्होने बरासरी (जमाल) गाँव बसाया
3. मानाजी की सन्तानें मांझु, सिहोल और लूंका कहलाई
4. करमाजी की सन्तानें करीर कहलाई
5. करनाजी की सन्तानें कुलडिया कहलाई
6. जगगूजी की सन्तानें झग्गल कहलाई
7. दुर्जनजी की सन्तानें दुराजना कहलाई
8. भींवाजी की सन्तानें भंवरिया कहलाई
9. नारायणजी की सन्तानें निराधना कहलाई
10. मालाजी की सन्तानें मेचू कहलाई

शिवसिंह के 12 पुत्रों में से 2 की अकाल मृत्यु हो गई थी। शेष 10 में से उपरोक्त गोत्र बने। मानाजी की तीन शादियाँ हुई थी जिनकी सन्तानें मांझु, सिहोल और लूंका कहलाई। इस प्रकार 12 भाईयों से उपरोक्त 12 गोत्र बने।

इस प्रकार उपरोक्त 12 गोत्र एक ही नख जोहिया, एक ही वंश सूर्यवंशी, एक ही गुरु वशिष्ठ, कुलदेवी कोटवासन माता जो हिंगलाज (क्वेटा पाकिस्तान में है) व भैरव का नाम भीमलोचन है। यहाँ सती का ब्रह्मरंध्र गिरा था।

दक्षिण की और प्रस्थान - कोट मलौट छूटने के बाद सब बारह भाई सिधमुख आए। खेमराज जी की संतान खीचड़ कहलाई। खेमराज का बड़ा पुत्र कंवरसिंह था जिसके नाम से कंवरपुरा (भादरा) बसाया जो आज भी है। कंवरसिंह के दश-बारह पीढ़ियों के बाद इनको कंवरपुरा छोडना पड़ा। वहाँ 12 वर्ष तक अकाल पड़ा। ये दक्षिण की और चले गए।

ये लोग झुंझुनु नवाव की रियासत के एक गाँव में पहुंचे। इनके साथ सभी पशु, सामान और गाड़ियाँ थी। यहाँ मुलेसिंह बुगालिया जाट की 12 गांवों में चौधर थी। गाँव के पानी के जोहड़ के पास ये रुक गए। इधर मुलेसिंह बुगालिया का भी एक ग्वाला भेड़ों को चराता हुया आया और इस जोहड़ पर पानी पिलाने लगा। यहाँ रुके हुये बाहरी लोगों को देखकर उसने भला बुरा कहा। खीचड़ों के दल में सींघल और बीजल नाम के दो व्यक्ति बहुत बहादुर और दबंग थे। उन्होने मुले सिंह बुगालिया के ग्वाले के रेवड़ से उठाकर दो मेंढ़े ले लिए और उनका मांस पकाने लगे। मुलेसिंह बुगालिया के ग्वाले ने इसकी शिकायत अपने मालिक मुलेसिंह को की। मुलेसिंह बुगालिया नवाब को कर देता था। उसने नवाब के पास जाकर बढ़ा-चढ़ा कर शिकायत की कि ये लोग पूरे रेवड़ को काट कर खा गए हैं। यह भी शिकायत की कि इनके पास असला और हथियार भी हैं। ये लोग उसकी जागीर पर कब्जा करना चाहते हैं। नवाब ने एक सेना मुले सिंह के साथ भेजी जो जोहड़ की और रवाना हुई। सींघल और बीजल के पास कोई असला और हथियार नहीं थे केवल कृषि उपकरण आदि थे। नवाब की सेना आते देखकर उन्होने अपनी कुलदेवी कोटवासन माता को याद किया। कहते हैं कोटवासन माता प्रकट हुई और कहा कि मैं आप लोगों की रक्षा करूंगी परंतु आपको मेरी निम्न चार बातें माननी होंगी -

  1. खीचड़ लोग कभी मांस नहीं खाएँगे।
  2. पराई औरत को अपनी बहिन बेटी समझेंगे।
  3. किसी की झूठी गवाही नहीं देंगे।
  4. करार से बेकरार नहीं होंगे।

कोटवासन माता ने आश्वासन दिया कि खीचड़ लोग इन बातों को मानते रहेंगे तो मैं सदा उनकी रक्षा करती रहूँगी। फौज जो चढ़ आई है उससे मैं निबट लूँगी। तुम्हारे खाने के जो बर्तन हैं वे उनको दिखा देना, उसमें चावल-मूंग की खिचड़ी होगी। यह कहकर देवी अंतर्ध्यान हो गई।

नवाब की फौज थोड़ी दूर पर थी तब नवाब ने देखा कि यहाँ तो कोई 25-30 लोग रुके हैं। उसने मुले सिंह से पूछा कि वह बड़ा काफिला कहाँ जो तुम बता रहे थे। नवाब ने फौज को दूर ही रोक कर कुछ ही लोगों को साथ लेकर पड़ाव की तरफ गया और यहाँ रुके लोगों से पूछा तुम लोग कौन हो और कहाँ से आए हो?

दोनों परिवार के मुखिया सींघल और बीजल नवाब के समक्ष आए और बताया कि हम खीचड़ जाट हैं और अकाल के कारण दक्षिण की और जा रहे हैं । यहाँ पानी देख कर पड़ाव डाल दिया था। हमने कोई रेवड़ नहीं काटा है, जैसा आरोप लगाया जा रहा है। आपका रेवड़ भी पास के जंगल में चर रहा होगा। नवाब ने इन तथ्यों की पुष्टि की। देखा कि सभी बर्तनों में खिचड़ी पक रही है और पास के जंगल में रेवड़ भी चर रहा है। नवाब ने मुले सिंह से कहा कि ये भले आदमी लगते हैं । तुमने इनकी झूठी शिकायत की है। इसलिए तुम्हारे 12 गांवों में से एक गाँव इनको दे दो।

बजावा गाँव में बसना - मुले सिंह नवाब के सामने झूटा साबित हो चुका था। उसने सोचा कि बजावा गाँव में वर्षा नहीं होती है और अकाल पड़ता है। ये लोग अपने आप ही भविष्य में यह गाँव छोड़ कर चले जाएंगे। मेरी चौधर तब यथावत 12 गांवों में बनी रहेगी। इस प्रकार सिंघल व बीजल के परिवारों को बजावा गाँव बसने के लिए मिल गया। नवाब ने बजावा गाँव का पट्टा इनके नाम कर दिया। बरसात का मौसम आया परंतु बजावा में वर्षा नहीं हुई। कहते हैं खीचड़ जाटों ने कुलदेवी कोटवासन माता को याद किया। कुलदेवी के आशीर्वाद से बजावा में अच्छी वर्षा हुई। कहते हैं कि कुलदेवी ने यह भी वरदान दिया कि बजावा में कभी अकाल नहीं पड़ेगा। ग्रामीण लोग बताते हैं कि यह परंपरा अभी भी कायम है, बजावा में कभी अकाल नहीं पड़ता।

मुलेसिंह बुगालिया से विवाद: सिंघल व बीजल के परिवार बजावा में काफी स्मृद्ध हो गए थे। दोनों भाई घोड़ों पर चढ़कर दूसरे गांवों में भी जाते रहते थे। रास्ते में मुले सिंह बुगालिया का गाँव भी पड़ता था। मुलेसिंह की बेटी देऊ की सगाई धेतरवाल जाटों में तय हुई थी। वह लड़की गाँव की औरतों के साथ कुएं पर पानी भरने जाती थी। इधर से कई गांवों के लोग गुजरते थे। एक दिन उसी रास्ते से दोनों भाई सींघल और बीजल घोड़ों पर गुजर रहे थे तब देऊ ने ताना मारा - "घोड़े वाले दोनों बदमास और लुच्चे हैं। रोज इस रास्ते मुझे उड़ाने के लिए फिरते हैं। आज ये फिर आ गए हैं।" ताना सुनकर दोनों भाई हक्के बक्के रह गए। दोनों भाईयों ने पनिहारिनों से पूछा कि यह ऐसा क्यों कह रही है। पनिहारिनों बताया कि यह ऐसा रोज ही कहती है कि इन्होने पहले मेरे पिता से बजावा गाँव छीना और अब मेरे को छीनना चाहते हैं। दोनों भाईयों ने कहा कि पहले तो ऐसा विचार नहीं था परंतु अब इस पर विचार करना पड़ेगा। दोनों भाईयों ने देऊ का हाथ पकड़ा और घोड़े पर बैठा कर ले गए। देऊ के पिता इस पर आग-बबूला हो गए। उसने बदला लेने के लिए देऊ के ससुराल वाले धेतरवाल जाटों की मदद लेने की सोची। धेतरवाल उस समय 18 गांवों के चौधरी थे। धेतरवाल जाटों को साथ लेकर मुले सिंह बुगालिया झुंझुणु नवाब से मिले। लड़की को वापस लाने के लिए नवाब की सहायता मांगी। नवाब को मुले सिंह की पहले की झूठी शिकायत याद थी। उसने सींघल और बीजल को बुलावा भिजवाया। अब दोनों भाई और परिवार के लोग सोच में पड़ गए। सभी ने सलाह मशवरा किया और इस नतीजे पर पहुंचे की बुगालिया लड़की वापस नहीं की जाएगी चाहे इसके लिए कितनी भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े। अगले दिन दोनों भाई नवाब के समक्ष कचहरी में उपस्थित हुये और यथा स्थिति से नवाब को अवगत कराया। दोनों भाईयों ने बताया कि यह रोज हम पर झूठा आरोप लगाती थी तब हमने इसको घरवाली बनाने की सोचकर साथ ले आए। नवाब ने सौचा ये दोनों बहादुर हैं, कभी हमारे काम आ सकते हैं। नवाब के पूछने पर जवाब दिया कि वे अब इस लड़की को घरवाली बना चुके हैं किसी भी कीमत पर वापस नहीं करेंगे। नवाब ने एक लाख रुपये जुर्माना तय किया। दोनों भाईयों ने कुछ ही दिन में जुर्माना भर दिया

खीचड़ों की वंशावली: मुलेसिंह बुगालिया की बेटी देऊ बुगालिया सींघल की तीसरी पत्नी थी। इससे पहले सींघल की दो शादियाँ और हो चुकी थी। तीनों पत्नियों से परिवार की वृद्धि निम्नानुसार हुई:

सींघल की पहली पत्नी से मालाराम हुये जिसने मैणास गाँव बसाया। इनकी संताने मेंगरासी खीचड़ कहलाई।

सींघल की दूसरी पत्नी से महीधर हुये जिससे महला गोत्र बना। मईधर ने शीथल गाँव बसाया।

सींघल की तीसरी पत्नी देऊ बुगालिया से ढोला राम नामक पुत्र पैदा हुआ जिसने ढोलास नामक गाँव बसाया। इनकी संताने ढोलरासी खीचड़ कहलाई।

इस प्रकार महलाखीचड़ एक ही बाप से पैदा होने के कारण दोनों गोत्रों में आपस में भाईचारा है।

सींघल की संतानों ने तीन गाँव मैणास, शीथल और ढोलास गाँव बसाये। बजावा इनका पैतृक गाँव था।

खीचड़ गोत्र के आगे की पीढ़ियों में कुमास गाँव बसाया जो सीकर जिले में है तथा यहाँ पर 4-5 हजार की संख्या में खीचड़ परिवार निवास करते हैं।

हरयाणा के सिरसा जिले में बाहिया गाँव है जहां 400 घर खीचड़ जाटों के हैं।

In Mahabharata

Dhritarashtra (धृतराष्ट्र), the Nagavanshi King is mentioned in Mahabharata (I.31.13), (I.52.13), (I.59.41), (II.9.9), (V.101.15).


Adi Parva, Mahabharata/Mahabharata Book I Chapter 31 mentions Names of Chief Nagas. Dhritarashtra is listed in in verse (I.31.13). [6]


Adi Parva, Mahabharata/Mahabharata Book I Chapter 52 gives Names of all those Nagas that fell into the fire of the snake-sacrifice. Dhritarashtra is listed in in verse (I.52.13). [7]


Adi Parva, Mahabharata/Mahabharata Book I Chapter 59 gives origin of the celestials and other creatures. Dhritarashtra is listed in in verse (I.59.41). [8]


Sabha Parva, Mahabharata/Book II Chapter 9 mentions name of Nagavanshi King Dhritrashtra, along other Kings who attended Sabha of Varuna. Dhritarashtra is listed in in verse (II.9.9).[9]


Udyoga Parva/Mahabharata Book V Chapter 101 describes about Bhogavati city and innumerable Nagas who live there. Dhritarashtra is listed in in verse (V.101.15). [10]

Villages founded by Dhatarwal clan

Distribution in Rajasthan

They are found in Districts Hanumangarh, Sri Ganganagar, Jhunjhunu, Nagaur, Jodhpur, Barmer, Bikaner, Sikar,Tonk, Jaipur in Rajasthan.

Villages in Jodhpur district

Chandrakh, Ghevara, Jodhpur, Kherapa, Khetasar, Khinchan, Kushlawa, Mathaniya, Phalaudi, Sardarpura, Shaitansinghnagar,

Villages in Nagaur district

Gudha Bhagwandas, Koliya,

Villages in Barmer district

Aakli, Alamsar, Balotra, Bayatu Bhimji, Baytoo, Bhimarlai (भीमरलाई), Chaukriya Ki Dhani Chaukriya Ki Dhani, Chhitar Ka Par, Dhatarwalon Ka Tala, Dhatarwalon Ki Dhani, Dholanada (धोलानाडा) , Dhorimanna, Garal (15), Kalyanpur, Kitpal (कितपाल) , Kosariya, Nagoniyon Dhatarwalon Ki Dhani, Pabubera[11], Pachpadra, Panani Dhatarwalon Ki Dhani, Somesara, Tankeliyasr,

Villages in Hanumangarh district

Bhadra, Goluwala Sihagan, Matili, Ratanpura

Villages in Ganganagar district

Kupli, Rojri Ganganagar,

Villages in Bikaner district

Bheekhnera, Gusaina, Kheenyera, Meghana Bikaner, Purani Ginnani, Ranjitpura (Bajju), Satasar, Shekhsar, Takhatpura,

Villages in Jhunjhunu district

Adooka, Dhatarwala (Chirawa), Dhatarwalon Ka Bas, Dudhi (Pilani), Kolinda (Bisau), Rayla (Chirawa),

villages in Sikar district

Jaleu,

The Lampua village in Sikar district was founded by Dhetarwal Jats about 350 years back. Later Bajiya Jats came from Lakhani and settled here.


Villages in Tonk district

Nimehada (8), Nayagaon Dhatarwal (3),

Villages in Jaipur district

Gopipura,

Villages in Churu district

Bhawandesar, Churu, Dhetarwalon Ka Bas, Lalgarh, Sahwa, Sujangarh (2), Taranagar, Buchawas,

Villages in Sawai Madhopur district

Khijuri,

Distribution in Haryana state

Villages in Sirsa district

Khairekan, Khairampur (Adampur), Khai Shergarh,

Village in Bhiwani district

Dhani Mahu, Fartia Bhima, Fartia Tal, Dhani Dholan(Loharu)

Villages in Hisar district

Bithmara, Kuleri,

Distribution in Madhya Pradesh state

Villages in Ratlam district

Villages in Ratlam district with population of this gotra are:

Dantodiya 1,

Notable persons

  • Dr. Raghuveer Dhatarwal - M.O. Medical & Health, Date of Birth : 1-January-1982.VPO - Gudha Bhagwandas, Teh.- Khinwsar, Distt. - Nagaur, Present Address : PHC, Nathusar, Bikaner, Mobile Number : 9610322885
  • Harlal Singh (Dheterwal) - Assistant Professor College Education, Date of Birth : 1-January-1972, Village - Jaleu, Post. - Dewas, Teh. - Fatehpur, Distt. - Sikar 332301, Present Address : Shekhawati Engineering College, Dundlod, Nawalgarh, Jhunjhunu - 333702, Phone Number : 01571-281224, Mob: 9414444801, Email:hlsingh9@rediffmail.com
  • जसराज धतरवाल - पुत्र लालाराम जी धतरवाल, गांव धतरवालो की ढाणी (चारलाई कंल्ला) वाया कल्याणपुर, तहसील पचपदरा, जिला बाड़मेर पोस्ट संरवड़ी कोड़ नं: 344026, फोन नंबर 9649579448, 9001413073

Gallery of Dhatarwal

References

  1. O.S.Tugania:Jat Samuday ke Pramukh Adhar Bindu,p.46,s.n. 1339
  2. Dr Mahendra Singh Arya etc,: Ādhunik Jat Itihas, Agra 1998 p.258
  3. V. S. Agrawala: India as Known to Panini, 1953, p.450
  4. An Inquiry Into the Ethnography of Afghanistan, H. W. Bellew, p.69
  5. http://www.jatduniya.com/news/oct%2007/oct%2007.htm
  6. अपराजितॊ जयॊतिकश च पन्नगः श्रीवहस तथा, कौरव्यॊ धृतराष्ट्रश च पुष्करः शल्यकस तथा (I.31.13)
  7. धृतराष्ट्र कुले जाताञ शृणु नागान यथातथम, कीर्त्यमानान मया बरह्मन वातवेगान विषॊल्बणान (I.52.13)
  8. भीमसेनॊग्र सेनौ च सुपर्णॊ वरुणस तथा, गॊपतिर धृतराष्ट्रश च सूर्यवर्चाश च सप्तमः (I.59.41)
  9. कम्बलाश्वतरौ नागौ धृतराष्ट्र बलाहकौ, मणिमान कुण्डलधरः कर्कॊटक धनंजयौ Mahabharata (II.9.9)
  10. दिलीपः शङ्खशीर्षश च जयॊतिष्कॊ ऽथापराजितः, कौरव्यॊ धृतराष्ट्रश च कुमारः कुशकस तथा (V.101.15)
  11. https://www.jatland.com/forums/showthread.php/40442-गोत्र-जोड़ने बाबत
  12. Thakur Deshraj:Jat Jan Sewak, 1949, p.396-397
  13. The Tribune, Chandigarh, dated December 7, 2021
  14. Jat Samaj, March 2009, p.31

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