Fasal Bima ke Naam Par Loot

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लेखक : प्रो. एचआर ईसराण, पूर्व प्राचार्य, कॉलेज शिक्षा, राजस्थान

फसल बीमा के नाम पर लूट

भारत में कृषि-कर्म से जुड़े किसानों और मजदूरों की दारुण दशा कुछ वर्षों से बद से बदतर होती जा रही है। मैथिलीशरण गुप्त ने कहा था -

"पानी बनाकर रक्त का, कृषि कृषक करते हैं यहां ,
फिर भी अभागे भूख से, दिन-रात मरते हैं यहां।"

सरकारें किसानों के नाम पर योजनाओं का ढिंढोरा पीटकर उन्हें सिर्फ झांसा देती हैं, उनके साथ छलावा करती हैं। पिछले कुछ सालों में अधिकांश फसलों की लागत में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है जबकि उनकी कीमतों में भारी गिरावट दर्ज की गई है। नतीजतन खेती घाटे का सौदा साबित हो रही है। सरकारें बिचौलिया बनकर किस तरह लाचार किसानों को ख़ुद लूटती हैं और बीमा कंपनियों, मंडियों व कॉरपोरेट घरानों को उन्हें लूटने की छूट देती हैं, आइए इस गोरखधंधे को समझिए।

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में छल-कपट

13 जनवरी 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कैबिनेट द्वारा मंजूरी दी गई 'प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना' वस्तुतः पूर्व सरकार के समय से चल रही विभिन्न फसल बीमा योजनाओं का समन्वित स्वरूप है। नई बोतल में पुरानी शराब जैसी है यह। पुरानी योजनाओं और प्रधानमंत्री फसल योजना में कोई गुणात्मक फर्क नज़र नहीं आता है। हाँ, किसान पर प्रीमियम का भार कुछ कम किया गया है। लेकिन कुल प्रीमियम की राशि दुगुनी करने से सरकारी तिजोरी से कम्पनियों को दुगुना प्रिमियम व दुगुनी ही सब्सिडी देनी होगी। अर्थात कृषि बजट से बीमा कम्पनियों को लाभ पहुंचाने की तरक़ीब निकाली गई है। 

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत किसानों को खरीफ फसल के लिए बीमा राशि का 2 फ़ीसदी, रबी फसल के लिए बीमा राशि का 1.5 फ़ीसदी और बागवानी तथा नक़दी फसलों के लिए बीमा राशि का 5 फ़ीसदी देना होता है, जबकि शेष राशि केंद्र सरकार और राज्य सरकार बराबर-बराबर के हिस्से में वहन करती हैं। राज्यों को केंद्र के साथ बीमा प्रीमियम संयुक्त रूप से साझा करना अनिवार्य है। अर्थात वास्तविक प्रीमियम दर और किसानों द्वारा देय बीमा दर के बीच का अन्तर राज्य और केन्द्र सरकार द्वारा समान रूप से साझा किया जाता है।

राजस्थान में खरीफ सीजन, 2018 हेतु प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अंतर्गत 14 फसलों को अधिसूचित किया गया है। एक किसान अधिकतम 7 हेक्टर तक अधिसूचित फसलों का बीमा अनुदानित दर पर करवा सकता है। सात हेक्टर से ज्यादा कृषि भूमि पर फसल बीमा करवाने पर संपूर्ण प्रीमियम राशि किसान द्वारा जमा करवानी होगी।

राजस्थान के 33 जिलों को क्लस्टर (8 या 10) में बांट कर प्रत्येक क्लस्टर के लिए अधिसूचित फसलों के लिए प्रीमियम दरें तय हैं। किस क्लस्टर में कौन सी बीमा कंपनी फसल बीमा के कार्य का क्रियान्वयन करेगी, यह सरकार तय करती है। 

खेती-किसानी की ज़मीनी हक़ीक़त से कोई वास्ता नहीं रखने वाले अधिकारियों एवं बीमा कंपनियों द्वारा अपने हित को सर्वोपरि रखते हुए शब्दजाल गूंथकर तैयार की गई इस बीमा योजना का लाभ किसानों को कतई नहीं मिल पा रहा है, उल्टा उनसे प्रीमियम के रूप में अरबों रुपए वसूल कर उनके पसीने की कमाई को लूटा जा रहा है। सरकारी मिलीभगत से ये गोरखधंधा कैसे चल रहा है, आइए इसे जानिए।

गत वर्षों की ज़मीनी हक़ीक़त की पड़ताल करने पर पता चला कि प्रधानमंत्री फसल बीमा के नाम पर बीमा कंपनियों व सरकारी तंत्र ने किसानों की जमकर जेब काटी है। इसके अलावा सरकार की मिलीभगत से सरकारी तिजोरी से ख़ूब धनराशि हड़पी गई है। केंद्र और राज्य सरकारों ने अपने ख़ज़ाने से फसल बीमा योजना के अपने हिस्से की अरबों रुपए की राशि बीमा कंपनियों को चुकाई है। पर जब किसानों को फसल बीमा का मुआवजा देने की बात आई, तो इन बीमा कंपनियों ने तरह-तरह की शर्तों की आड़ लेकर ऊंट के मुंह में जीरे की तरह किसानों को नाम मात्र का मुआवजा देकर इतिश्री कर ली। मसलन, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में 2 रुपए, 5 रुपए, 20 रुपये, 100 रुपए तक का मुआवजा किसानों को देकर उनके नुकसान की भरपाई करने का दावा किया गया। जबकि किसानों को अपनी फसल का हर्जाना लेने के लिए हजारों रुपये क्लेम फार्म और दस्तावेज आदि जमा करवाने में व्यय करने पड़े। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2016-17 में राजस्थान में 1959. 5 करोड़ रुपये का प्रीमियम बीमा कंपनियों के पास जमा हुआ, जिसके एवज में बीमा कंपनियों ने किसानों के 292 करोड़ रुपये के दावे ही स्वीकार किए हैं।

फसल बीमा की अन्यायपूर्ण शर्तें

फसल बीमा किसानों की कमाई हड़पने एवं सरकारी ख़ज़ाने में सेंध लगाने का षड्यंत्र कैसे है, यह इस बीमा की अनुचित, अन्यायपूर्ण, हास्यास्पद और बेहूदा शर्तों से साबित हो जाता है।

1. जिन किसानों ने बैंक/ कोऑपरेटिव सोसाइटी से लोन ले रखा है या जिनके पास किसान क्रेडिट कार्ड है, उन ऋणी किसानों का प्रीमियम बैंकों द्वारा किसानों से बिना पूछे उनके खातों से सीधा डेबिट ( काट ) कर निजी बीमा कंपनियों को भेज दिया जाता है। स्पष्ट है कि किसान के सरंक्षण के बजाय सरकार तो निजी बीमा कंपनियों के एजेंट के रूप में काम कर रही है।

बीमा कंपनियों को लाभ पहुंचाने की नीयत से किसानों के साथ यह अमानवीय व्यवहार हो रहा है। अगर बीमा योजना अच्छी होगी तो किसान खुद उससे जुड़ेंगे। जबरदस्ती उनके खातों से प्रीमियम काटना बिल्कुल गलत है।

गैर ऋणी किसानों की फसल का बीमा ऐच्छिक होता है। दोनों ही मामलों में केंद्र एवं राज्य सरकारें अपने हिस्से के प्रीमियम का भुगतान बीमा कंपनियों को करती हैं। बैंक को फसल बीमा करने के लिए किसान के प्रीमियम का 4% कमीशन मिलता है।

इण्डियन काउंसिल फॉर रिसर्च आन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस (Indian Council for Research on International Economic Relations - ICRIER) की एक शोधकर्ता प्रेरणा टेर्वे के अनुसार, ‘इस तरह की योजना की सफलता का आकलन इस तथ्य पर निर्भर करता है कि कितने गैर-ऋणी (लोन न लेने वाले) किसान इसमें रुचि रखते हैं क्योंकि उनके लिये यह योजना ऐच्छिक है। उनकी संख्या कम होती जा रही है, जो निश्चित रूप से इस योजना के बारे में अच्छा संकेत नहीं है।’ 

13 मार्च 2018 में लोकसभा में सरकार की ओर से दिये जवाब से पता चलता है कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के प्रति किसानों में दिलचस्पी कम हुई है। जवाब के मुताबिक, लोन लेने वाले और नहीं लेने वाले, दोनों तरह के किसानों के नामांकन में भारी गिरावट आई है। 2016-17 में यह संख्या जहाँ 57.48 मिलियन थी, वह घटकर 2017-18 में 47.9 मिलियन हो गई। इनमें से लोन लेने वाले किसानों की संख्या, जो बीमा योजना में अनिवार्य रूप से जोड़े गए, 2016-17 की 43.7 मिलियन से घटकर 2017-18 में 34.9 मिलियन हो गई।

2. चालाकी देखिए कि बीमाधारक किसान को बीमा पॉलिसी जैसा कोई भी दस्तावेज नहीं दिया जाता है। यानी किसान को पता ही नहीं होता कि उसका बीमा हो चुका है और उसे कब व कितना मुआवजा किन प्रावधानों व शर्तों के तहत मिल सकता है। 

3. किसान को फसल के नुकसान का अगर आंशिक क्लेम मिल भी जाता है तो सबसे पहले बैंक अपने ऋण की वसूली उस मुवावजे में से सीधे कर लेते हैं। इस तरह फसल के नुकसान के बोझ तले दबे किसान को तात्कालिक रूप से कोई राहत नहीं मिलती है।किसान अब समझने लग गए हैं कि यह किसान की फसल का बीमा नहीं है, बल्कि इस फसल बीमा के ज़रिए बैंकों ने किसानों को भुगतना किए अपने लोन का बीमा करवाया है।

4. कैग ने फसल बीमा योजना का मूल्यांकन कर 2017 में जो रिपोर्ट प्रस्तुत की, उसमें बताया गया है कि जितने किसानों पर सर्वेक्षण किया गया उनमें से दो तिहाई अर्थात लगभग 67 फ़ीसदी किसानों को इस योजना की कोई जानकारी नहीं थी। इस योजना के प्रावधानों एवं पेचीदगियों की जानकारी रखने वाले किसान तो बिरले ही हैं। कैग की रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि इस योजना में शिकायत निवारण तंत्र का गंभीर अभाव है।

5. भोले-भाले किसान को अपनी फसल का बीमा करवाने के लिए खेती या मजदूरी का काम छोड़कर किराया-भाड़ा वहन कर कई बार कस्बे में कभी पटवारी, कभी बैंक, कभी कृषि विभाग तो कभी बीमा एजेंटों के यहां भटकना पड़ता है। बीमा करवाने के लिए कई तरह के दस्तावेज जैसे खेत की गिरदावरी, पटवारी द्वारा जारी फसल का विवरण ( किस खसरा नंबर में में किस फसल की कितनी बिजाई की है ) की लिखित प्रति, निर्धारित बीमा राशि, पहचान- पत्र आदि जमा करवाने होते हैं। कई तरह के एफिडेविट प्रस्तुत करने के नाम पर किसानों की जेब काटी जाती है। चूंकि पटवारी के पास कई काम और कई हलकों का चार्ज होता है, इसलिए उससे भी आसानी से नियत स्थल पर मुलाकात नहीं हो पाती।

6. फसल बीमा योजना में किसान के खेत को यूनिट नहीं मानकर पटवार हल्का/ तहसील को फसल बीमा की यूनिट माना गया है। यह सरासर अन्यायपूर्ण है कि इकाई किसान को नहीं बल्कि एक समूह ( पटवार हल्का/ ब्लॉक/ तहसील ) को माना गया है। इसके साथ बेहूदा शर्त यह है कि पूरे समूह अर्थात पटवार हल्का/ ब्लॉक की 70 प्रतिशत फसल बर्बाद होगी तभी किसान को फसल बीमा का क्लेम मिलेगा। कितना अज़ीब है कि जब स्कूटर/कार का सामूहिक बीमा नहीं हो सकता तो किसान का सामूहिक बीमा क्यों होता है? किसान को यूनिट नहीं मानना अन्यायपूर्ण है।

7. बीमा पर क्लेम तय करने की प्रक्रिया व शर्तें इतनी पेचीदा हैं कि किसान के लिए नुकसान का दावा करना और क्लेम स्वीकार करवाना  टेढ़ी खीर है। किसी बीमाधारी किसान की फसल का ख़राबा होने पर मुआवजा हासिल करने के लिए उसे साबित करना पड़ेगा कि उसके पटवार हलके/ ब्लॉक/ तहसील में 70 फ़ीसदी किसानों की फसल बर्बाद हुई है। जबकि सब जानते हैं कि किसी इलाक़े विशेष के हर खेत में एक सी स्थिति नहीं रहती। पिछले दशकों से तो मानसून इतनी मनमानी करने लगा है कि एक खेत में वर्षात हो जाती है और पड़ौसी का खेत सूखा रह जाता है।

8. फसल बीमा योजना ख़राबे का आकलन पटवार हल्का/ ब्लॉक/ तहसील को यूनिट मानकर क्रॉप कटिंग एक्सपेरिमेंट्स ( Crop cutting experiments- CCE ) के आधार पर किया जाता है, जो कि बेहद पेचीदा व वक्त बरबाद करने वाली प्रक्रिया है। फिलहाल सभी फसलों की क्रॉप कटिंग एक्सपेरिमेंट के आंकड़े उपलब्ध नहीं होने से गंभीर समस्या बनी हुई है।

दरअसल, इस फसल बीमा योजना में दावों का निपटान करने में सबसे ज्यादा बाधक और पेचीदा प्रक्रिया है-- क्रॉप कटिंग एक्सपेरीमेंट्स (crop cutting experiment - CCE) यह वह प्रक्रिया/ तंत्र है जिसे अपनाकर राज्य सरकारें फसल उपज का डेटा जुटाती हैं और बीमा कम्पनियों के पास जमा कराती हैं। इसी के आधार पर, बीमा कम्पनियाँ फसल क्षति का निर्णय लेती हैं और फिर दावा निपटान पर निर्णय लेती हैं।

फसल बीमा की सफलता के लिये व्यापक पारदर्शी और भरोसेमन्द सीसीई की आवश्यकता है, जिसकी वर्तमान में कोई व्यवस्था नहीं है। ICRIER के पेपर के मुताबिक, 2016-17 में सरकार ने 0.92 मिलियन CCE किये थे। जबकि दोनों फसल सीजन के लिये लगभग तीन मिलियन CCE की जरूरत थी। सीसीई को विश्वसनीय और समयबद्ध बनाने के लिये सरकारों ने ना तो कोई समुचित व्यवस्था की है और ना ही कोई निवेश किया है। वस्तुतः राज्य सरकारों के पास लक्षित हिस्से के आधे हिस्से में भी सीसीई के संचालन करने के लिये जनशक्ति (manpower) नहीं है।

कृषि मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकांश राज्यों ने उपज डेटा भेजने में देरी की है। झारखण्ड, पश्चिम बंगाल और गुजरात तो ऐसे राज्य हैं जिन्होंने डेटा दिया ही नहीं। झारखण्ड और तेलंगाना ने 2016 का खरीफ फसलों के लिये अब तक डेटा नहीं दिया है। 

सरकार और बीमा कंपनियों के बीच विवाद इस बात पर है कि सीसीई के लिये खेत कैसे चुने जाते हैं और यह प्रक्रिया कैसे की जाती है। अधिकांश समस्या इसलिये है कि सरकार और बीमा कम्पनियाँ ग्राम स्तर पर सीसीई नहीं कर रही हैं। 

9. मनमानी यह भी है कि बीमा कंपनियां किसान को वर्तमान फसल में हुए नुकसान के आधार पर बीमा नहीं दे रही हैं बल्कि खेत में 7 वर्ष में हुई पैदावार को आधार बना रही हैं। किसान की पूरी फसल वर्तमान साल में चाहे खराब हो गई हो लेकिन पिछले 6 वर्ष में उत्पादन अच्छा रहा हो तो उसे बीमा का लाभ नहीं मिल पाएगा। ऐसे में किसान के नुकसान की भरपाई भी नहीं हो पाएगी।

10.. किसान को फसलों की बर्बादी का क्लेम तभी देय होता है जब उसके हलका/ ब्लॉक के 70 प्रतिशत खेतों में नुकसान हुआ हो। पटवारी व सर्वेयर यह मानने को तैयार नहीं होते कि सत्तर प्रतिशत खेतों में नुकसान हुआ है। अगर यह बात मान भी ली जाती है तो हर खेत के नुकसान को 50 प्रतिशत से कम बता दिया जाता है, जिससे क्लेम की राशि कम हो जाती है। 

फसल बीमा योजना की क्लेम स्वीकार करने की इस बेहूदा शर्त के मायने समझाते हुए कृषि सरोकारों के विशेषज्ञ देवेन्द्र शर्मा अपने एक लेख में लिखते हैं कि मान लीजिए एक घर में आग लगे और बीमा कंपनी यह कहे कि हम बीमा राशि तभी देंगे जब मोहल्ले के सत्तर और घरों में आग लगी हो। कितनी बेहूदा और अन्यायपूर्ण शर्त है यह। हलका/ ब्लॉक को यूनिट क्यों माना जाता है? किसान को यूनिट मानकर फसल की बीमा तय होनी चाहिए। यह तो हास्यास्पद प्रावधान है कि बीमा राशि तभी मिलेगी जब 70 प्रतिशत इलाके में नुकसान हुआ हो। यानी दूसरे के घर में आग लगेगी तभी आपको आपके घर में आग लगने का बीमा मिलेगा। 

राज्यों की उदासीनता

11. राज्य सरकारें भी भारी वित्तीय भार का हवाला देते हुए, बीमा कम्पनियों को भुगतान किये जाने वाले प्रीमियम में अपने हिस्से का नियमित भुगतान नहीं कर रही है। जब तक राज्य सरकार भुगतान नहीं करती, तब तक केन्द्र सरकार भी अपने हिस्से का भुगतान नहीं करती।

2017 के खरीफ सीजन के लिये 24 राज्यों में से 10 राज्यों ने अपना हिस्सा नहीं दिया है। मसलन, बिहार ने खरीफ 2017 के लिये प्रीमियम शेयर का भुगतान करने की तुलना में अपनी खुद की योजना शुरू करना पसन्द किया। नतीजतन प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत इस सीजन के लिये बिहार के किसी भी किसान को क्लेम नहीं दिया गया।

फसल बीमा योजना के असफल होने का एक कारण यह भी है कि अधिकांश राज्यों द्वारा उनकी प्रीमियम सब्सिडी शेयर का न तो समय पर भुगतान हो पाया है और न ही उन्होंने समय पर उपज के ख़राबे/ नुकसान का आकलन के लिए जरूरी क्रॉप कटिंग एक्सपेरिमेंट रिपोर्ट प्रस्तुत की है। कई राज्यों की शिकायत यह है कि उनके वार्षिक कृषि बजट का 40% तक फसल बीमा प्रीमियम खातों में व्यय हो जाता है। इसलिए किसानों के हित की अन्य योजनाओं के संचालन में धन की कमी पड़ जाती है।

12. ओलावृष्टि से फसल को हुए नुकसान की बात करें तो तथ्य यह है कि ओले अक्सर आठ सौ मीटर से लेकर एक किमी की चौड़ाई में पड़ते हैं। उसके दायरे के बाहर के खेतों की फसलें चपेट में आने से बच जाती है। इसलिए एक हलके/ ब्लॉक में सत्तर प्रतिशत खेती की ज़मीन में नुकसान की शर्त पूरी नहीं हो पाती और इस तरह किसानों को फसल के नुकसान का क्लेम भी नहीं मिल पाता। 

13. किसानों की फसल जब बारिश और तेज हवा के कारण बर्बाद होती है, तब भी क्लेम चुकाने से बचने के लिए बीमा कंपनियों ने एक पेच फंसा रखा है। कुछ किसानों के खेतों में फसलें जमीन पर धराशाही होने से बच जाती हैं पर पौध के दाने तेज हवा/ वर्षात के प्रहार से झड़ जाते हैं और इस तरह फसल बर्बाद हो जाती है। कितनी अन्यायपूर्ण बात है कि उन्हें क्लेम इसलिए नहीं मिलता क्योंकि उनकी फ़सल खड़ी रह गईं हैं। सामान्य समझ की बात है कि कुछ किसानों की फसल जमीन पर धराशायी होने से इसलिए बच जाती है कि उनमें सघनता कम होती है। यानी फसल के पौधों के बीच गैप इतना होता है कि हवा को प्रवाहित होने की जगह मिल जाती है। दूसरी तरफ़, जिन खेतों में खाद-पानी ज्यादा दिया गया है या जहाँ उर्वरापन ज्यादा है, वहां फसलें सघन होती हैं। पौधे एक दूसरे से इतनी नज़दीक होते हैं कि हवा के सामने सघन फ़सल की दीवार -सी बन जाती है। वेगवान हवा को गुजरने का पर्याप्त गैप नहीं मिलने के कारण फसल उसके प्रहार का सामना न कर पाने पर गिर जाती हैं।

14. सरकारों ने एकड़ के हिसाब से धान का क्लेम तय कर रखा है। मसलन गेंहू के लिए नुकसान के लिए क्लेम साढ़े तीन हज़ार ₹ के आसपास है जबकि एक एकड़ जमीन में गेहूं बोने पर आठ से दस हज़ार रुपये की लागत आती है।

15. इस बीमा योजना में यह भी अजीब प्रावधान है कि किसी गांव- कस्बे में पूरी फसल के हुए नुकसान के आधार पर भरपाई का नियम है। चाहे किसी किसान को ज्यादा नुकसान हुआ हो, लेकिन उसके नुकसान की भरपाई दूसरों के नुकसान के औसत के आधार पर की जाती है।

16. पोस्ट हार्वेस्ट बीमा में तो शर्त यह है कि फसल का नुकसान होने के 48 घंटे में किसान को रिपोर्ट करना होगा। इससे अज़ीब बात क्या होगी कि शर्त में यह स्पष्ट नहीं कर रखा है कि किसान कहां और किस को रिपोर्ट करें?

17. किसान को उसकी खराब फसलों का क्लेम दिलवाने के नाम पर सर्वे करने वाले सर्वेयर भी पीड़ित किसान को मानसिक रूप से प्रताड़ित करते हैं। इस सम्बंध में चूरू जिले में किसानों के हक़ों की दमदार लड़ाई लड़ने वाले युवा किसान नेता निर्मल कुमार प्रजापत ने एक प्रकरण से अवगत करवाया। गत वर्ष तारानगर के कुछ गांवों में फ़सल ओलावृष्टि की चपेट में आ गई। भोले- भाले किसान क्या जानें कि इसकी रिपोर्ट कहाँ की जाए, किसको की जाए और वो भी 48 घण्टे में। ख़ैर, निर्मल कुमार ने सक्रियता का परिचय देते हुए इसकी रिपोर्ट लिखित में बैंक व प्रशासनिक अधिकारियों को सुपुर्द की। बड़े जदोजहद के बाद बीमा कंपनी ने दस दिन बाद सर्वेयर को मौका मुवायना कर नुकसान का जायज़ा लेने भेजा। ओले तो गिरने के कुछ देर बाद पिघल जाते हैं। ओलावृष्टि के दस दिन बाद सर्वेयर को ओले गिरे होने का क्या प्रमाण प्रस्तुत किया जाए? जब सर्वेयर को ओलों के प्रहार से नष्ट फलियां व मुड़ी हुई बालियां दिखाई गईं तो उसने ज्ञान झाड़ते हुए कहा कि यह ख़राबा तो कीटनाशक दवाओं का छिड़काव नहीं करने से हुआ होगा। जब किसान ने कहा कि उसने समय पर कीटनाशक का छिड़काव किया था तो प्रमाण के लिए सर्वेयर ने कीटनाशक दवाओं की खरीद के बिल मांग लिए। अब उसे कौन समझाए कि बाज़ार में कीटनाशक दवाओं व बीजों के नाम पर हो रहे दो नंबर के धंधे में किसान को उसकी खरीद पर बिल कोई नहीं देता। बिल नहीं होने पर सर्वेयर ने रिपोर्ट भेज दी कि किसान के खेत में ओलावृष्टि का कोई प्रमाण नहीं मिला तथा फसल की बालियां मुड़ी हुई होने व उनमें दाने नहीं पड़ने का कारण किसान द्वारा कीटनाशक दवाओं का छिड़काव नहीं करना है। इस प्रकार प्रकृति के प्रहार से पीड़ित किसानों को क्लेम से वंचित कर दिया गया।।

बीमा भुगतान की वस्तुस्थिति

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवॉयरमेंट ( CSE ) नामक संस्था द्वारा प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना पर सन 2017 में जारी रिपोर्ट से ज़ाहिर होता है कि इस योजना से असली फायदा किसानों को नहीं बल्कि बीमा कंपनियों को हो रहा है। निजी क्षेत्र की कंपनियों के लिए फसल बीमा एक शानदार कमाई वाला व्यवसाय बन रहा है क्योंकि उन्हें फसल की कटाई और उसके नुकसान के आकलन हेतु स्टाफ रखने की आवश्यक ढांचा तैयार करने के लिए इसमें कोई प्रारंभिक निवेश नहीं करना पड़ता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2017-18 में इस योजना के तहत आने वाले रकबे में यानी बीमा होने वाली फसल में कमी दर्ज की गई। बीते वित्तीय वर्ष के लिए कुल 40% खेतों को इसके दायरे में लाने का लक्ष्य तय किया गया था, लेकिन जमीन पर यह आंकड़ा 24% रहा। इससे पहले साल 2016-17 में यह 30% रहा था। सरकार ने वित्तीय वर्ष 2017-18 के लिए इस आंकड़े को 50% तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा।

केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की शुरुआत में यानी 2016-17 में इस पेटे 5500 करोड़ रुपये दिए थे। वित्तीय वर्ष 2017-18 में यह रकम बढ़ाकर 9,000 करोड़ रुपये कर दी गई। चालू वित्तीय वर्ष (2018-19) के बजट में इस योजना के लिए 44% बढ़ोतरी कर 13,000 करोड़ रुपये किया गया है। कुल मिलाकर कंपनियों को अब तक 27500 करोड़ रुपये मिल चुके हैं। सरकार की दी हुई रकम 27500 करोड़ और किसानों से वसूल किया गए प्रीमियम की राशि रुपये 15,891 करोड़ को जोड़ लें तो 43,391 करोड़ रुपये बीमा कंपनियों की जेब में जा चुके हैं लेकिन किसान अभी भी क्लेम के लिए तरस रहे हैं।

लोकसभा में सरकार द्वारा दिए गए उत्तर के अनुसार 2016 की खरीफ फसल में बीमा कंपनियों को किसानों और सरकारों से कुल मिलाकर 15685 करोड रुपए का प्रीमियम प्राप्त हुआ परन्तु अब तक किसानों को सिर्फ 3634 करोड़ रुपए के क्लेम का भुगतान ही किया गया है।

सीएसई की रिपोर्ट बताती है कि 2016 में बीमा कंपनियों द्वारा निपटाए गए दावों का आंकड़ा करीब 32% ही रहा था। इसके अलावा अप्रैल, 2017 तक 21 में से 14 राज्यों में खरीफ की फसल को पहुंचे नुकसान के लिए किए गए दावों का पूरा निपटारा नहीं किया गया था। इस दौरान किसानों ने कुल 5,962 करोड़ रुपये का दावा किया था। जबकि सरकार द्वारा बीमा कंपनियों को 9,000 करोड़ रुपये का भुगतान करने के बावजूद भी कंपनियों ने किसानों को बीमा का क्लेम नहीं दिया।

कृषि मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार बीमा कंपनियों को पिछले साल 22180 करोड़ रुपए की कमाई प्रीमियम से हुई है, जबकि इन बीमा कंपनियों ने किसानों को केवल 12949 करोड़ रुपए का भुगतान किया है। एक साल में बीमा कंपनियों ने 9231 करोड़ रुपया फसल बीमा योजना से कमा लिया है।

फसल बीमा योजना में क्लेम प्रोसेसिंग में देरी और दावों का भुगतान न होना, दो सबसे बड़ी समस्याएँ हैं। इस योजना के तहत, पिछले तीन फसल सीजन में किसानों द्वारा किये गए दावों में से केवल 45 प्रतिशत दावों का भुगतान ही बीमा कम्पनियों द्वारा किया गया है। इस कारण केवल 30 प्रतिशत क्षेत्र ही बीमा के दायरे में हैं। पिछले दो वर्षों में कुल बीमाकृत क्षेत्र में भी गिरावट आई है। 2016-17 में 56.8 मिलियन हेक्टेयर खेत बीमित थे, वह घटकर 2017-18 में 49.3 मिलियन हेक्टेयर हो गया है।

स्पष्ट है कि सरकार ने फसल बीमा योजना बनाते समय इसके क्रियान्वयन में आने वाली गंभीर समस्याओं पर गौर नहीं किया। व्यवहारिकता की कमी और लालफीताशाही के चलते प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना किसानों का भला नहीं कर पा रही है। इस में पारदर्शिता का घोर अभाव है।

निःसंदेह प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना देश के बदहाल किसानों की कार्पोरेटी लूट की एक नयी व्यवस्था है। निजी बीमा कम्पनियाँ किसानों को नवीन और आधुनिक कृषि पद्धतियों को अपनाकर ठेका खेती, कार्पोरेट खेती को बढावा देने के लिये उनके द्वारा प्रमाणित कम्पनियों की वस्तुओं को खरीदने के लिये बाध्य करेंगी तथा शर्तें लगाकर पारम्पारिक बीज, खाद, कीटनाशकों के उपयोग पर रोक लगायेंगी। किसानों का हक छीनकर उनका शोषण करके विदेशी निवेश बढ़ाना और न्यूनतम रोजगार पैदा करना किसानों के प्रति अन्याय है।

क्या होना चाहिए?

फ़सल बीमा योजना को किसान हितैषी बनाने के लिए कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा महत्त्वपूर्ण सुझाव देते रहे हैं परन्तु उन पर सरकार के स्तर पर अभी तक कोई गौर नहीं किया गया है। न्यायसंगत बात तो यह है कि ऋणी किसान के बैंक खाते से प्रीमियम की कटौती बंद हो क्योंकि बीमा कंपनियां यह तक नहीं जानतीं कि उन्होंने किसान की किस फसल का बीमा किया है, जिसका प्रीमियम उन्हें बैंक से मिल रहा है।

बीमा प्रीमियम के आंकलन के लिए बोली प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए। इसके बजाए एक स्वतंत्र इकाई का गठन हो जो मौसम आधारित फसलों के बारे में जानकारी दे और यह भी जानकारी दे कि हरेक जिले के लिए प्रीमियम कितना होना चाहिए।

क्रॉप कटिंग सर्वेक्षण के लिए बीमा कंपनियां द्वारा कुशल कामगारों की भर्ती करने से शिक्षित और अकुशल नौजवानों के लिए रोजगार के अवसर सृजित होंगे।

बीमा कंपनियों के लिए फसल के नुकसान या उसके दावे की प्रतिपूर्ति तय करने के लिए किसानों के खेत को मूल इकाई के रूप में अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। नुकसान का आंकलन ब्लॉक/ तहसील के आधार पर करने का प्रावधान ख़त्म किया जाना चाहिए।

मृदा/ मिट्टी जांच योजना कार्ड की हक़ीक़त

पिछले चार वर्षों में किसानों के साथ सबसे बड़ा धोखा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिट्टी जांच योजना कार्ड का भी है। मिट्टी जांचने के नाम पर सिर्फ कार्ड भरने का गोरखधंधा है, असल जांच है ही नहीं। तमाम प्रदेशों में आए दिन टेंडर निकलते हैं। बेमतलब के आईएसओ की मामूली पुष्टि वाली कथित लैबों की मिलीभगत वाली टेंडरिंग से ठेका बंटता है और किसान को मिट्टी की जांच के नाम पर उल्लू बना कर इस हेतु बजट में आवंटित सरकारी धनराशि को हड़पा/लूटा जा रहा है। जांच की जाए तो बहुत बड़ा घोटाला उज़ागर हो सकता है।

न्यूनतम समर्थन मूल्य ( MSP ) में चालबाजी

केन्द्र सरकार ने 4 जून 2018 को खरीफ की 14 फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (मinimum Support Price - MSP) बढ़ा देने की घोषणा की है। सरकार ने दावा किया कि उसने फसल पर लागत का डेढ़ गुणा एमएसपी बढ़ाकर स्वामीनाथन आयोग की एक महत्त्वपूर्ण सिफारिश को पूरा कर दिया है। घोषित मूल्य को गौर से देखने पर पता चलता है कि स्वामीनाथन आयोग के फॉर्मूले के अनुसार मूल्य नहीं बढ़ाएँ गए हैं।

लागत की गणना के दो तरीके हैं। पहले में बीज की लागत, श्रम (मानवीय, पशु और मशीन), उर्वरक, खाद, कीटनाशक और अन्य लागतों को शामिल किया जाता है। जिसे ए-2 कहा जाता है। इसमें पारिवारिक श्रम (एफएल) भी जोड़ा जाता है। 

दूसरे फॉर्मूले में ए-2+ एफएल में जमीन का किराया और जमीन का ब्याज जोड़ा जाता है। इसका जोड़ अन्तिम लागत यानी सी-2 कहलाएगा। किसानों की माँग है कि एमएसपी अन्तिम लागत का डेढ़ गुणा होना चाहिए जिसकी सिफारिश स्वामीनाथन आयोग ने भी की थी। यह एमएसपी ए-2 और एफएल का जोड़ नहीं बल्कि सी-2 होना चाहिए।

सरकार की चालबाजी समझने के लिए कुछ उदाहरणों पर गौर कीजिए। सरकार की घोषणा के मुताबिक आम चावल का एमएसपी 1750 रुपए प्रति क्विंटल हो गया है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के निकाय कमिशन फॉर एग्रीकल्चर कॉस्ट एंड प्राइसेस के अनुमान के मुताबिक, 2018-19 में सी-2 फॉर्मूले के तहत चावल की उत्पादन लागत 1560 रुपए प्रति क्विंटल होगी। अगर इसमें स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक 1.5 गुणा उत्पादन लागत जोड़ दी जाएँ तो वह 2340 रुपए प्रति क्विंटल बैठेगी। सरकार ने चावल की जो एमएसपी घोषित की है वह इससे 590 रुपए कम है। अरहर का मामला भी इससे बहुत अलग नहीं है। सी-2 फॉर्मूले के मुताबिक, 2018-19 में इसकी उत्पादन लागत 4981 होगी और इसलिये एमएसपी 7471.5 रुपए होना चाहिए। लेकिन सरकार ने इसकी एमएसपी 5676 रुपए प्रति क्विंटल ही की है ,जो कि स्वामीनाथन आयोग के फॉर्मूले से 1796.5 रुपए कम है।

वस्तुस्थिति यह है कि किसी भी फसल का एमएसपी स्वामीनाथन आयोग के सी-2 फॉर्मूले के मुताबिक उत्पादन लागत का डेढ़ गुणा नहीं है। यह भी तथ्य है कि किसानों के हित का ढोल पीटकर शुरू की गई कोई भी योजना 10 प्रतिशत किसानों को भी कवर नहीं करती। एमएसपी भी 94 प्रतिशत किसानों को कवर नहीं करता। इसके अलावा इस बात की भी कोई गांरटी नहीं है कि जो किसान इसके तहत कवर हैं, उन्हें फायदा ही हो।

नोट: यह पोस्ट प्रधानमंत्री फसल योजना से सम्बंधित अधिसूचना, सरकारी एजेंसियों द्वारा इस सम्बन्ध में जारी आंकड़ों, 'डाउन टू अर्थ' पत्रिका के अगस्त 2018 के अंक में छपे बनजोत कौर के लेख ' महत्त्व खोती महत्त्वाकांक्षी योजना' के अध्ययन व खेती-किसानी की समझ रखने वाले चिंतकों से हुई चर्चा के आधार पर तैयार की गई है।

प्रोफेसर हनुमानाराम ईसराण
पूर्व प्राचार्य, कॉलेज शिक्षा, राज.
दिनांक: 18 सितंबर, 2018

संदर्भ