Fatehgarh Churian

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Fatehgarh Churian on map of Gurdasur

Fatehgarh Churian (फ़तेहगढ़ चूरीयान) is a city and a municipal council in Gurdaspur district in the state of Punjab, India.

Location

It is situated on the boundary between Gurdaspur and Amritsar districts, it is the last village in Gurdaspur district although it is closer to Amritsar than Gurdaspur. It is well connected to other towns by the road network. It is surrounded by towns like Amritsar (26 km), Batala (25 km), Ajnala (21 km), and Dera Baba Nanak (19 km). It is on the railway line between Amritsar and Dera Baba Nanak.

Jat Gotras

History

Not much is known about the history of this town except that in 17th century Bandesha's Jats dominated in this area. In 18th century the Kanhiya Misal after looting Kasoor and other towns they settled in Sangatpura District, Amritsar, 7 km from Fatehgarh Churian, and after that they forcefully took possession of entire area from Bandesha's .

It is said that the son of Maharaja Ranjit Singh (Punjab) was married here to the daughter of this missal. Before partition the village was a Muslim dominated area. This fact is quite evident from the number of old mosques (which now are converted into Gurudwaras).

जाट इतिहास:ठाकुर देशराज: फतेहगढ़

हकीकतसिंह के पिता का नाम बघेलसिंह था। यह जुल्का गांव का सिन्धू जाट था। यह कान से थोड़ी ही दूर पर है जहां कि जैसिंह कन्हैया पैदा हुए थे। जैसिंह और हकीकतसिंह दोनों ही कपूरसिंह सिंघापुरिया के यहां रहते थे। कपूर की मृत्यु के बाद दोनों स्वतंत्र शासक बन बैठे। हकीकतसिंह के अधिकार में कलानौर, बूर, दुल्बू, काहनगढ़, अदालतगढ़, पठानकोट, मतू और बहुत से गांव आ गए। इनकी कमान में संगतपुरिया सरदार तथा साहबसिंह नाबिकी, दयालसिंह और सन्तसिंह दादूपुरिया, देसासिंह मोहल, चेतसिंह बनोद, साहबसिंह तारागढ़िया और बहुत से अन्य सरदार युद्ध-क्षेत्र में जाते थे। सन् 1760 में हकीकतसिंह ने चूरीयानवाला को मिसमार कर दिया और उसके खंडहरों पर संगतपुरिया गांव तथा फतेहगढ़ किले को स्थापित किया। महतावसिंह ने जिसके अधिकार में अपने भाई की रियासत का बहुत-सा भाग था, एक मजबूत किला बनवाया जिसका नाम चित्तौरगढ़ रखा।


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सरदार हकीकतसिंह का सन् 1782 में देहान्त हो गया और उनका इकलौता पुत्र जैमलसिंह जो कि 11 बरस का नाबालिग था, रियासत का अधिकारी हुआ। इन्होंने न तो कन्हैया रियासत को बढ़ाया ही और न घटने ही दिया, बल्कि ज्यों का त्यों कायम रक्खा। सन् 1812 में इनका भी देहान्त हो गया और रणजीतसिंह ने इस आशा पर कि फतेहसिंह पर धन-राशि इकट्ठी होगी, किले पर अधिकार करने का विचार किया। उन्होंने विधवा से सहानुभूति प्रकट करने के बहाने रामसिंह को वहां भेजा। जैसे ही यह अफसर किले में घुसा कि इसने महाराज के नाम पर किले पर अधिकार कर लिया। तीन महीने के बाद जैमलसिंह की विधवा के एक लड़का पैदा हुआ, जिसका नाम चांदसिंह रक्खा गया। इस बच्चे के नाम पर महाराज ने 15000) रु० की कीमत का हिस्सा उस रियासत में छोड़ दिया। जैमलसिंह ने अपनी मृत्यु के कुछ ही महीने पहले अपनी इकलौती पुत्री चांदकौर का, जिसकी उम्र केवल 10 वर्ष थी, पाणिग्रहण संस्कार महाराज रणजीतसिंह के पुत्र खड़गसिंह के साथ जो कि पंजाब राज्य का भावी शासक था, कर दिया। यह विवाह संस्कार सन् 1812 की छठी फरवरी को फतेहगढ़ में बड़ी ही शान-शौकत और धूमधाम के साथ सम्पन्न हुआ था। इसमें कैथल, जींद, नाभा के सरदारों के अलावा गवर्नर-जनरल का एजेण्ट अक्टरलोनी भी सम्मिलित हुआ था। सन् 1821 की फरवरी में चांदकौर के गर्भ से नौनिहालसिंह पैदा हुए। महाराजाधिराज रणजीतसिंह की मृत्यु जून सन् 1839 में हो गई और उनके बाद खड़गसिंह गद्दी पर बैठे। खड़गसिंह कड़े मिजाज के और कम समझ के आदमी थे। अपनी धार्मिक क्रियाओं के सम्पन्न करते हुए और भूत-प्रेत में विश्वास रखते हुए भी वह बहुत से अयोग्य देवी-देवताओं की पूजा करते थे। उस समय के माने हुए किसी भी व्यक्ति के हाथों में वह कठपुतली की भांति थे। राजा ध्यानसिंह के कारण ही वह शान्ति के साथ गद्दी पर बैठ सकते थे, क्योंकि उसने लोगों के सामने यह कहा था कि महाराज रणजीतसिंहजी मरते समय यह कह गये हैं कि - “राजगद्दी का अधिकारी खड़गसिंह होगा और ध्यानसिंह उनके मन्त्री होंगे।” रणजीतसिंह के जीवन के अन्तिम बरसों में ध्यानसिंह की काफी इज्जत हो चुकी थी और यह विश्वास किय जाता था कि अब इसकी शक्ति क्षीण न होगी। अतः इसके लिए यह आवश्यक था कि गद्दी पर ऐसा राजकुंवर बैठे जो उसकी राय पर चलकर शासन करे और खुद शासन करने की कोई चेष्टा न करे। ध्यानसिंह का लक्ष्य इससे भी अधिक आकांक्षा का था। उसका ज्येष्ट पुत्र महाराज रणजीतसिंह का बड़ा प्यारा था, जिसका नाम हीरासिंह था। महाराज के सामने जब कि अन्य सभी दरबारी, दो या तीन अत्यन्त पवित्र 'भाईयों' को छोड़कर, खड़े रहने को बाध्य थे, वहां पर भी हीरासिंह के बैठने को कुर्सी मिलती थी। बिना उसके महाराज न तो सोने को जाते थे और न टहलने को ही। इस प्रकार हीरासिंह महाराज के राजकुमारों


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की ही भांति पाला-पोषा गया था और खालसा-सैन्य उसको मानती भी ऐसा ही थी। अतः क्या यह माना जाता था कि किसी दिन वह पंजाब का राजा हो जाएगा और उसका बाप उसका प्रधानमंत्री होगा जो कि राज्य में वास्तविक शक्ति रखेगा, और उसका एक चचा, बहादुर राजा सुचेतसिंह फौज का कमांडर-इन-चीफ होगा तथा दूसरा गुलाबसिंह सारे पहाड़ी प्रदेश पर शासन करेगा? तब काबुल के अमीर और नैपाल राज्य से गाढ़ी मित्रता स्थापित करके जम्मू का डोगरा खानदान भारत में सबसे अधिक शक्तिशाली हो सकेगा और अपना वंश स्थापित कर सकेगा। किन्तु जैसा कि ध्यानसिंह समझे हुए थे, खड़गसिंह उसकी आज्ञा में चलने वाले न निकले। वे ध्यानसिंह से नफरत करते थे और उन्होंने सरदार चेतसिंह बजवा को अपना विश्वासपात्र बना लिया। चेतसिंह यह भली-भांति जानता था कि जब तक ध्यानसिंह जीवित है, तब तक उसकी पोजीशन सुरक्षित नहीं है। अतः उसने फ्रेंच जनरलों के साथ षड्यंत्र की बातचीत की जो कि ध्यानसिंह के जीवन के कट्टर विरोधी थे। किन्तु ध्यानसिंह अपनी चाल में हार खा जाने वाला व्यक्ति नहीं था। उसने रानी चांदकौर और नौनिहालसिंह को चेतसिंह से पृथक किए जाने की आवश्यकता का विश्वास करा दिया। क्योंकि उसने कहा कि - यदि चेतसिंह का षड्यंत्र सफल हो गया तो राज्य की सारी शक्ति चेतसिंह और फ्रांसीसियों के हाथ में चली जाएगी। अतः उसी रात को चेतसिंह के कत्ल किये जाने का पक्का विचार कर लिया गया। राजा ध्यानसिंह ने महल-रक्षकों को अपनी ओर कर लिया और तड़का होने के एक घंटे पहले कुंवर नौनिहालसिंह, गुलाबसिंह, सुचेतसिंह, अतरसिंह सिन्धानवालिया, फतेहसिंह मान तथा कुछ अन्य सरदारों के साथ भाजा दयालवाला गेट में होकर किले में घुसकर महाराज के ही महलों में चेतसिंह का कत्ल कर डाला। यह घटना 9 अक्टूबर सन् 1839 की है। इस कत्ल के बाद से ही महाराज खड़गसिंह का शासन सच्चे रूप में समाप्त ही हो गया। क्योंकि उनके पुत्र और मंत्री (ध्यानसिंह) की अनुमति पर ही आज्ञाएं मंजूर होने लगी थीं और यदि वे किसी आज्ञा की अनुमति दे देते थे तब तो वह कार्य रूप में परिणत होती थी, अन्यथा वह खारिज कर दी जाती थी। वे तो केवल दिखाने मात्र को महाराज थे। महाराज खड़गसिंह बड़ी शान-शौकत के साथ जवाहरातों से लदे हुए और प्रसिद्ध कोहनूर हीरे को धारण किए हुए मई सन् 1840 में गवर्नर जनरल के एजेण्ट मि० क्लार्क से मिले भी थे किन्तु वे पूर्णतया शक्तिहीन हो गए थे और अपने जीवन के अन्तिम चार महीनों में तो उनसे रियासत के किसी भी मामले में सलाह नहीं ली जाती थी और किले में सिवा नाम के कैदी जैसे ही रूप में रहते थे।

अब राजा ध्यानसिंह को अपनी शक्ति को कायम रखने में एक नया खतरा दिखाई दिया। वह खतरा था नौनिहालसिंह। क्योंकि ये बड़े ही साहसी और उच्चतम व्यक्ति थे। चाहे सरदार इनसे खिलाफ ही थे परन्तु फौज इनको ही


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज, पृष्ठान्त-524


चाहती थी क्योंकि फौज आशा करती थी कि ये अपने बाबा के समान ही विजय गौरव प्राप्त करेंगे। कुंवर नौनिहाल की भी यही आकांक्षा थी। राजा ध्यानसिंह का उनके ऊपर से प्रभाव दिन-दिन क्षीण होता गया और राजा को यह भय होने लगा कि जब ये गद्दी पर बैठेंगे तो कहीं दूसरा मन्त्री न चुन लें जिसका कि हटाना चेतसिंह से भी अधिक कठिन हो जाय। 28 वर्ष की उम्र में ता० 4 नवम्बर को महाराज खड़गसिंह का देहान्त हो गया। कहा जाता है कि इनकी मृत्यु ध्यानसिंह के हुक्म से दिए गए जहर के कारण हो गई थी जिसका कि पता उसके पुत्र को भी था। मरते समय महाराज नौनिहालसिंह के पास खबर पर खबर भेजीं किन्तु नौनिहालसिंह उनके पास नहीं गये। क्योंकि ये यह चाहते थे कि पिता की मृत्यु के बाद वह स्वतंत्र रूप से रियासत के मालिक हो जाएंगे। जब महाराज की मृत्यु के समाचार शाह बालावल में शिकार खेलते हुए इनके पास पहुंचे तो ये महाराज के मरने की खुशी को छिपा भी न सके। दूसरे दिन ता० 5 नवम्बर को किले के रोशनीगेट के पीछे के मैदान में महाराज के शव का दाह-संस्कार किया गया। इनके साथ साथ ही इनकी सुन्दर रानी जो सरदार मंगलसिंह सिन्धू की बहन थी, तीन बांदियों के साथ सती हो गई। शवें पूरी तरह से भस्म भी न होने पाई थीं कि धूप की तेजी के कारण व्याकुल होकर नौनिहालसिंह रावी नदी शाखा में स्नानादि से निवृत्त होकर पैदल ही महलों की ओर चल दिए। उनके साथ में सारे दरबारी थे और वे अपने अभिन्न हृदय मित्र ऊधमसिंह के हाथ में हाथ दिए हुए थे जो कि राजा गुलाबसिंह का सबसे बड़ा बेटा था। जैसे ही किले के फाटक पर पहुंचे इन्होंने पीने को पानी मांगा। उस वक्त कोई नौकर न था और पवित्र गंगाजल की सभी बोतलें खाली थीं जो कि शव पर छिड़कने को मंगाई गईं थीं। भूत प्रेतों में विश्वास करने वाले सरदार ने धीरे से उनके कान में कहा कि यह बुरा लक्षण है। किन्तु राजकुमार हंस दिये और आगे को चले। जैसे ही कि वह दरवाजे के नीचे पहुंचे कि ईंट-चूना बड़े जोर से गिर पड़ा। यह सारा कार्य लहमे में हो गया। मियां ऊधमसिंह की गर्दन टूट गई और वह मर गये और कुंवर नौनिहालसिंह का बायां हाथ टूट गया और उनकी हंसली भी टूट गई, वह भारी सांस लेने लगे। लेकिन न वह बोल सकते थे और न हिल सकते थे। राजा ध्यानसिंह ने जो उस मौके पर ठीक उनके पीछे मौजूद थे, जिनके कि कुछ चोट भी आयी थी, एक पालकी मंगाई और राजकुमार को उसमें लिटाकर संगमरमर के बाग वाले भवन में ले गये, जहां कि रणजीतसिंह सवेरे का दरबार किया करते थे और हजारी बाग के फाटक बन्द कर दिये गये और ताले डाल दिये गये। सिवाय फकीर अजीजुद्दीन और नूरुद्दीन और भाई रामसिंह और गोविन्दराम के किसी को भी अन्दर नहीं आने दिया गया और एक घंटे के अन्दर ही राजकुमार की मृत्यु हो गई।

तो भी राजा ध्यानसिंह को कोई हानि न थी। उसने कुंवर शेरसिंह को बुलाने


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के लिए जो कि लाहौर से 80 मील की दूरी पर कन्हूवान नामक स्थान में शिकार खेल रहे थे, दूत भेज दिया और रास्ते में जगह-जगह पर तेज घोड़े खड़े कराये थे, ताकि वह बहुत ही शीघ्र आ सकें। उन्होंने मुल्तान, पेशावर, मंडी और दूसरी जगहों पर यह खबर भेज दी कि कुंवर साहब को बहुत ही थोड़ी चोट आई है और उसने गवर्नर जनरल के एजेण्ट के लिए कुंवर शेरसिंह के नाम से चिट्ठी लिख दी कि मुझे बहुत ज्यादा चोट आई है, किन्तु आशा है कि ठीक हो जाऊंगा और तारीख 6 को राजा ने यह खबर फैलाने को एक सरदार अमृतसर भेजा कि कुंवर साहब बहुत कुछ अच्छे हो गये हैं। कुछ वक्त तो शव तम्बू में ही रखा रहा, किन्तु रात के समय किले में पहुंचा दिया गया और अन्दर के एक कमरे में रख दिया गया। ध्यानसिंह ने लाहौर और गोविन्दगढ़ के किले लेने के लिए तमाम तैयारियां कर लीं और ता० 7 को कुंवर शेरसिंह आ पहुंचे। अतः छिपाव की कोई आवश्यकता न थी इसलिए नौनिहालसिंह की मृत्यु का ऐलान कर दिया गया।

नौनिहालसिंह ने अपनी मृत्यु के पीछे दो हकदार गद्दी के छोड़े। इनमें से पहला महाराज रणजीतसिंह का प्रसिद्ध पुत्र कुंवर शेरसिंह था। महाराज ने भी हमेशा शेरसिंह का समर्थन किया था और एक बहुत बड़ा दल उसका अनुमोदन करने को तैयार था। उस समय उनकी अवस्था 33 साल की थी। यह खूबसूरत और शारीरिक गठन के अच्छे थे और रणक्षेत्र में एक बहादुर और फौज में प्रसिद्ध व्यक्ति थे। किन्तु आचरण के अच्छे न थे और सिख जैसी कौम पर शासन करने की योग्यता न रखते थे।

इस गद्दी के लिए दूसरा हकदार महाराज खड़गसिंह की विधवा रानी माई चांदकौर थी। जिस समय उनके पुत्र की मौत हुई उस समय वह फतहगढ़ में अपने मायके में थी। वह ता० 6 नवम्बर को लाहौर लौटीं और यहां उन्होंने देखा कि राजा ध्यानसिंह ने उनके खिलाफ कुंवर शेरसिंह के राजतिलक होने के लिए कुछ सरदारों को राजी कर लिया है। जब चांदकौर ने इस प्रकार स्थिति को अपने खिलाफ पाया, तो उन्होंने राजीनामा का उद्योग किया। उन्होंने और उनके मंत्री भाई रामसिंह ने जो पहली तदबीर सोची वह यह थी कि वे (रानी चांदकौर) ध्यानसिंह के पुत्र राजा हीरासिंह को गोद लें और उसे गद्दी पर बिठायें। दूसरी पार्टी ने इस बात का खण्डन किया और यह तदबीर पेश की कि रानी साहिबा शेरसिंह से शादी कर लें। किन्तु इन्होंने इस बात से साफ इन्कार कर दिया और यह प्रस्ताव रखा कि उन्हें सरदार अतरसिंह सिन्धानवालिया को अपना वारिश बना लेने दिया जाय। किन्तु इस प्रस्ताव का पहले प्रस्तावों से भी अधिक विरोध किया गया और तब रानी ने कहा कि उनके पुत्र नौनिहालसिंह की विधवा रानी साहिब कौर गिलवाली तीन महीने के हमले से हैं। इस ऐलान से स्थिति बिल्कुल बदल गई। अब राजा बनने का सवाल नहीं रहा, किन्तु एक रेजीडेण्ट बनने का सवाल


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हो गया और यह विवाद-ग्रस्त प्रश्न हो गया कि आया रानी या कुंवर साहब इस काम में सफल होंगे।

रानी चांदकौर के पक्ष में भाई रामसिंह और गोविन्दसिंह, सरदार अतरसिंह, लहनासिंह और अजीतसिंह सिन्धानवालिया, फतहसिंह मान, जनरल गुलाबसिंह पोविन्दिया, शेख गुलाम मुहीउद्दीन, जमादार खुशहालसिंह और जनरल तेजसिंह थे। कुंवर साहब के पक्ष में सरदार फतहसिंह अहलूवालिया, धनसिंह मालवाई, श्यामसिंह अटारी वाला, जम्बू के तीन राजा, ध्यानसिंह, गुलाबसिंह, सुचेतसिंह, भाई गुरमुखसिंह, फकीर अजीजुद्दीन और फ्रैंच जनरल वेन्तूरा आदि थे। दीनानाथ और सरदार लहनासिंह मौन थे। उपर्युक्त सरदारों और उनके साथियों की पौलिसी स्थिर न थी। जम्बू के राजा चाहे उनकी पौलिसी और लक्ष्य एक ही था, किन्तु कभी एक का समर्थन करते थे कभी दूसरे का और खुशहालसिंह और तेजसिंह उसी पार्टी का समर्थन करने को तैयार हो जाते कि जिसमें उन्हें अपने लिए अधिक फायदा पहुंचने की आशा होती। कुछ सरदारों को दोनों ही से सहानुभूति थी। माई चांदकौर इतनी प्रसिद्ध न थीं जितना कि उनका प्रधान सलाहकार भाई रामसिंह था, जिसने कि नौनिहालसिंह के समय में बहुत से सरदारों की जागीरों को कम कर दिया था। जो लोग उनका समर्थन करते थे उन्हें आशा थी कि जनानी और कमजोर हुकूमत के समय में वे अपने स्वतन्त्र अधिकारों को स्थापित रख सकेंगे जो कि उन्होंने रणजीतसिंह के जीवन के समय में स्थिर रक्खे थे। सिंधानवालिया सरदार जो कि इनके सबसे अधिक पक्षपाती थे, नवम्बर के आदि में लाहौर में उपस्थित न थे। अजीतसिंह जो कि उनका प्रेमी कहा जाता था, कुल्लू और मण्डी के धावे में लगा हुआ था और अतरसिंह हरद्वार में था। अतरसिंह जल्दी ही अपने भतीजे के साथ 12 नवम्बर के लगभग लाहौर आ गया। ठीक उसी समय रानी ने एक दूसरी योजना दोनों पार्टियों के मिलाने की की थी। वह योजना यह थी कि वे शेरसिंह के ज्येष्ठ पुत्र प्रतापसिंह को गोद ले लेंगी, और इस प्रकार अपनी हुकूमत में कुंवर साहब का हाथ रहने देंगी। किन्तु दूसरी योजना के अनुसार यह योजना भी असफल रही और लाहौर में यह भावना जोर पकड़ गई कि कुंवर और रानी साहिबा की संयुक्त रीजेंसी ही विधवा रानी के बालक होने के समय तक एकता स्थापित रखने का केवल मार्ग है। रीजेंटों के कार्यों की देखभाल जातीय सरदारों की कोंसिल करती रहे।

कुछ रूप में इस प्रबन्ध का संशोधन कर दिया था और ता० 20 को यह निश्चय हो गया कि माई चांदकौर रियासत की प्रधान बनाई जायें और शेरसिंह को सरदारों की कौंसिल का प्रेसीडेंट बनाया जाये और फौज पर भी इनका कमांड हो तथा ध्यानसिंह मंत्री बनाये जायें। इस योजना के लिए हर एक आशा करता था कि यह टूट जायेगी लेकिन ध्यानसिंह ने इस हुकूमत की योजना को कायम


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रखने के लिए कुछ समय मांगा और पूरी शक्ति लगा दी। किसी तरह एक हफ्ता व्यतीत हो गया। अन्त में कार्य रूप में परिणीत होने के लिए यह योजना असम्भव प्रतीत होने लगी और प्रतिदिन झगड़ा हो जाने का भय मालूम होने लगा। दोनों पार्टियों ने किले पर कब्जा कर लिया। रानी साहिबा ने तो भीतर के महलों पर और कुंवर साहब ने हजारीबाग और बाहर के भाग पर कब्जा कर लिया। कुंवर साहब कभी-कभी रियासत में किले से बाहर चले जाया करते थे और चांदकौर ने कई बार उनके बाहर चले जाने पर किले के फाटक बन्द करने का विचार किया। कार्य करने की प्रणाली भी बातरतीब न थी। सवेरे का दरबार शेरसिंह की उपस्थिति में हजारीबाग में होता था। इसके बाद मंत्री लोग शीशमहल में कॉन्फ्रेन्स करते थे और अंत में समनबुर्ज में जाकर रानी साहिबा की उपस्थिति में जाते थे।

राजा ध्यानसिंह जब चांदकौर की तरफ आ गये और राजा गुलाबसिंह इस बात को कहते थे जिनके कि लिये रानी साहिबा ने मानावार लौटा देने के लिये पक्का वायदा कर लिया था, लेकिन मंत्री ने दोनों पार्टियों को यह दिखलाने का विचार कर लिया था कि बिना उनकी सहायता के उनका स्थिर रहना संभव नहीं है। अन्त में निर्णय तारीख 17 को हो गया जिसके अनुसार शेरसिंह को 8 महीने के लिये अपने बटे प्रतापसिंह को कौंसिल का मेम्बर छोड़कर अपनी जागीर बटाला को वापस जाना पड़ा। रानी चांदकौर साहबकौर के बच्चा होने तक रीजेण्ट बना दी गईं, जबकि दूसरे प्रबन्ध किये जाने की योजना थी। इस योजना के इकरारनामे पर राजा ध्यानसिंह और गुलाबसिंह, सरदार लहनासिंह मजीठिया, अतरसिंह सिन्धानवाला, फतेहसिंह मान, मंगलसिंह सिन्धू, तेजसिंह, श्यामसिंह अटारीवाला, धनासिंह मारवई, जमादार खुशहालसिंह, भाई रामसिंह, गुरुमुखसिंह, फकीर अजीजुद्दीन, दीवान दीनानाथ और शेख गुलाम मुहीउद्दीन ने दस्तखत कर दिये। राजा ध्यानसिंह के उद्योग से दोनों पार्टियां इस कार्य में पूर्ण रूप से उपस्थित थीं और कुंवर शेरसिंह विरोध करना व्यर्थ समझ तथा राजा ध्यानसिंह की पालिसी को न समझकर, बटाला चले गये, जहां पर कि अपने सुयोग के लिये इन्तजार करते रहे।

रानी साहिबा के मंत्रियों को भी थोड़े ही समय में अपनी कमजोरी मालूम हो गई। राजा ध्यानसिंह मुश्किल से कभी-कभी दरबार में आते थे और अपना समय शिकार खेलने में गुजारते थे। इधर दिन पर दिन अशान्ति बढ़ती जाती थी। सड़कें खतरनाक हो गईं, जुर्म बहुत बढ़ गये और सीमा-प्रान्त के जिले बगावत करने की तैयारी करने लगे। अब ध्यानसिंह को सूझ पड़ा कि बिना उसके शासन-व्यवस्था नहीं चल सकती, लेकिन वह रानी साहिबा के मंत्रियों को भी यही सुझाना चाहता था। अतः वह दूसरी जनवरी 1841 को जम्बू को रवाना हो गया। अब राज्य में


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज, पृष्ठान्त-528


शीघ्र ही बरबादी आने लगी। क्योंकि फौज ने बगावत शुरू कर दी, जनरल आज्ञाओं की अवहेलना करने लगे। अतः राजा ध्यानसिंह के जम्बू चले जाने के एक हफ्ते ही बाद रानी चांदकौर और भाई रामसिंह ने मिश्र लालसिंह, फतहसिंह मान और अन्य लोगों के हाथों शीघ्रता से यह खबर भेजी कि वह बिना देरी किये ही फौरन जम्बू से वापस आ जाएं। ता० 13 जनवरी को अजीतसिंह सिन्धानवालिया ध्यानसिंह के आने के पहले ही अपने गांव यानी राजा सांसी गांव को जाने का बहाना करके लाहौर को चल दिया। लेकिन बजाय इसके वह गवर्नर जनरल के एजेण्ट से मुलाकात करने के लिए रानी चांदकौर की खबर लेकर लुधियाना चला गया। किन्तु मुलाकात करने में असफल रहा।

तारीख 14 को शेरसिंह ने लाहौर शहर से 6 मील की दूरी पर शालीमार स्थान पर आकर ही लाहौर को अपने कब्जे में ले लिया। कुंवर साहब के कमान में फौज थी जो कि पूरी तरह से उनके पक्ष में थी। फ्रेंच जनरलों ने भी उन्हें सहायता देने का वायदा कर लिया था और उन्होंने (शेरसिंह ने) राजा ध्यानसिंह की अनुपस्थिति में अपने भाग्य की परीक्षा करने की तैयारी कर दी। उनके शालीमार आने पर जनरल गुलाबसिंह की बटालियन का एक अफसर उनकी सेवा में आया और उनसे फौज में चलने के लिये प्रार्थना करने लगा। कुंवर साहब ने निमंत्रण को स्वीकार कर लिया और बेगमपुर छावनी को कूच कर दिया, जहां पर कि उन्होंने गुलाबसिंह पोविन्दिया के साथ अपने डेरे डाल दिये और इन्हें प्रधान माना गया।

किले की फौज चुपचाप न थी। किले में रानी साहिबा के साथ गुलाबसिंह, राजा हीरासिंह, सरदार अतरसिंह सिन्धानवालिया, मंगलसिंह सिन्धू और गुलाम मुहीउद्दीन थे। शीघ्र ही फौज बुलाई गई, अमीरसिंह मान की तीन टुकड़ियों और लेहनासिंह की घुड़सवार फौज आ गई। शहर के तमाम फाटकों के ऊपर तोपें रख दी गईं। राजा सुचेतसिंह की फौजें और चरपारी-घुड़सवार फौज शाहदरा से कूच करके किले के सामने खड़ी हो गई और एक ऊंट-सवार पूरी रफ्तार के साथ राजा ध्यानसिंह के पास भेजा गया।

तारीख 15 के दरम्यान फौज का एक बड़ा हिस्सा कुंवर साहब के पास जमा हो गया और तारीख 16 को उनके पास 26000 पैदल और 8000 घुड़सवार फौज तथा 45 तोपें हो गईं थीं। इसके बाद उन्होंने बड़ी शान के साथ जनरल वेन्तूरा, कोर्ट और बहुत से सिख सरदारों के साथ लाहौर को कूच किया और बिना किसी रुकावट के टकसाली फाटक से लाहौर शहर में प्रवेश किया। बादशाही मसजिद के पास कर्नल धोंकलसिंह ने वहां की मेगजीन को उन्हें दे दिया और थोड़े समय में ही सारे शहर पर उनका कब्जा हो गया। फिर उन्होंने किले की आधीनता स्वीकार किये जाने के लिये खबर भेजी, किन्तु गुलाबसिंह ने किले की


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज, पृष्ठान्त-529


रक्षा करने का पक्का विचार कर लिया। उसकी फौज में इस समय 3000 आदमी थे जिनमें अधिकतर राजा के पहाड़ी सैनिक थे जिनके कि ऊपर रानी चांदकौर का बहुत सा रुपया खर्च किया गया था। गुलाबसिंह ने हर एक स्थान पर घूमकर जांच की और सैनिकों को इनाम दिए जाने के वायदे करके प्रोत्साहित किया। तोपों की गोलाबारी के साथ धावा किया गया और हजारी बाग पर किले से गोलाबारी की जाने लगी। डोगरा सिपाही बड़े ही निशानेबाज थे और शेरसिंह के इतने आदमी मारे गये कि वह 17 तारीख के सवेरे हजारी बाग से हटकर बादशाही मसजिद के पास पहुंच गये।

राजा गुलाबसिंह से अधीनता स्वीकार करने के लिए फिर कहा गया। उन्होंने अपने भाई के आ पहुंचने तक सुलह करने को कहा, लेकिन यह मंजूर नहीं किया गया। इस पर उन्होंने सौगन्ध खाई कि छात्र-धर्म की हैसियत से वह अन्त तक किले की रक्षा करते रहेंगे। फिर गोलाबारी शुरू हुई और तमाम दिन होती रही। शाम को राजा ध्यानसिंह और सचेतसिंह जम्बू से आ गये और शहर के बाहर डेरे डाल दिए। सुचेतसिंह, शेरसिंह के पास गए और उनसे कहा कि ध्यानसिंह दूसरे दिन आयेंगे। ता० 18 के सुबह को राजा ध्यानसिंह और कुंवरसाहब मिले। राजा ध्यानसिंह ने शेरसिंह के चपल स्वभाव पर खेद प्रकट किया और शीघ्र ही सन्धि करने के लिए राय दी। राजा गुलाबसिंह ने यह राय प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार की और उनके भाई ने उनके मुआफिक ही शर्तें मंजूर कीं। फौजें मय हथियारों के वापस कर दी गईं। रानी चांदकौर रीजैन्सी से अलग हो गईं और जम्बू के पास कावियाली में एक बड़ी जागीर उनके लिए मंजूर की गईं। इन शर्तों के बन जाने पर राजा गुलाबसिंह ने ता० 19 को किले से बाहर कूच कर दिया और सामने मैदान में डेरे डाल दिये। सरदार अतरसिंह सिन्धानवालिया भी किले से बाहर चले गये और शाह बिलाबन में तम्बू डाल दिये। दूसरे दिन सवेरे कुंवर साहब बड़े जलूस के साथ घुड़सवार फौज का निरीक्षण करने गये और उनकी सेवाओं के लिए उन्हें धन्यवाद दिया और फिर किले को चल पड़े जहां कि वह गद्दी पर बैठे और तमाम फौज ने उन्हें सलामी दी। रानी चांदकौर उस समय समन बुर्ज में थीं और उनके पास पुजारी विक्रमसिंह थे। लाहौर शहर में अब अशान्ति खड़ी हो गई। सैनिकों ने दुश्मन और दोस्तों के घरों को एक ही तरह से लूटा। जमादार खुशहालसिंह की भी उन्होंने दुर्दशा कर दी और उनके अलावा राजा गुलाबसिंह, जनरल कोर्ट, सरदार मुहम्मद सुल्तानखां और लेहनासिंह मजीठिया पर भी धावा किया गया। लेहनासिंह मजीठिया का कैम्प लूट लिया गया और सेना ने गुलाबसिंह पर भी धावा करना चाहा, लेकिन उन्होंने फौज जमा कर ली और एक बड़ा खजाना लेकर जम्बू को प्रस्थान कर दिया। जमादार खुशहालसिंह भी उनके साथ गये। जनरल कोर्ट के डेरे पर उन्हीं के


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज, पृष्ठान्त-530


बटालियों की तीन रेजीमेण्टों ने हमला किया, लेकिन यह जनरल वेन्तूरा के पास रक्षा के लिये भाग गया, जिसे कि अपनी और अपने मित्र की रक्षा के लिये घुड़सवार सेना से काम लेना पड़ा। फौज ने मुंशी, लिखने वालों को चारों तरफ घूमकर मार डाला। कोई भी ऐसा मनुष्य जीवित न छोड़ा गया, जिसने कि यह मंजूर कर लिया कि वह लिख सकता है या उनकी उंगलियों से यह मालूम हो गया कि वह लिख सकते हैं। उन भयानक दिनों में हर एक आदमी ने अपनी रंजिश का बदला लिया। अफसरों को उन्हीं के आदमियों ने मारा। दुकानदारों को उन्हीं के कर्जदारों ने कत्ल किया। शहर में बड़ा ही भयंकर काण्ड हुआ। बहुत दिनों के बाद फौज काबू में आ सकी और जिन अधिकारों का उन्होंने उस समय उपयोग किया उन्हें वे कभी न भूले। उस समय से वे ज्यादा से ज्यादा विप्लवकारी होते गए, यहां तक कि कोई भी राजा या मन्त्री उन्हें न रोक सका।

ता० 27 तक शेरसिंह रियासत के महाराज न बन पाए। राजतिलक उनके मस्तक पर बाबा विक्रमसिंह ने किया, जिन्होंने कि कुंवर प्रतापसिंह को युवराज पद और राजा ध्यानसिंह को मंत्री पद दिया। तमाम सरदार और रईस मौजूद थे और उन्होंने नए महाराज के प्रति भक्ति प्रदर्शित की।

राजा ध्यानसिंह और राजा गुलाबसिंह इन मौकों के समय पृथक्-पृथक् मत प्रकट करते दिखलाई दिए किन्तु यह हर प्रकार से प्रमाणित है वह हमेशा मित्र भाव से रहे। एक भाई ने शेरसिंह का पक्ष लिया और दूसरे ने रानी का। कारण, ताकि इनमें से किसी एक को सफलता मिलने पर उनकी अपनी शक्ति और धन की रक्षा हो सके। राजा ध्यानसिंह का स्वभाव ऐसा था कि उसके परम भक्त भी कभी-कभी इस संशय में पड़ जाते थे कि वास्तव में वह किस पार्टी का समर्थक है। भले ही वह हर एक जरूरत के मौके के लिए तैयार रहता था, किन्तु उसकी एक खास पॉलिसी जरूर थी। इस आशा में वह लाहौर से जम्बू चला गया कि उसकी अनुपस्थिति में कुंवर शेरसिंह गद्दी लेने की चेष्टा करेंगे। उसने अपनी सफलता ही न चाही, किन्तु लाहौर से बाहर चले जाना भी चाहा ताकि कुंवर साहब की असफलता पर उससे राजीनामा किया जा सके और रानी चांदकौर का मंत्री होते हुए उनके साथ मिल जाना अयोग्य होता। परन्तु शेरसिंह को बहुत भीरु और अपने उद्योग के उत्साह में बहुत उत्साही न पाकर ध्यानसिंह का लाहौर में न रहना उसके लिए और भी फायदामंद होता और चांदकौर की कमजोर हुकूमत के लिए भी यह अन्तिम रूप से प्रकट हो जाता कि उसकी मदद के लिए राजा साहब की सहायता जरूरी थी और उसे पूरे अधिकारों के साथ बुलाया जाता और इस तरह वह शेरसिंह को पृथक् करने में समर्थ होता, चूंकि वह उसकी व्यक्तिगत इच्छा के लिए बिल्कुल आवश्यक नहीं था। सेना का भी राजा ध्यानसिंह की तरफ रुख था जिसके कि बिना वह राज्य ही नहीं कर सकता था। लेकिन उसकी यह तदबीर


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शेरसिंह ने असफल कर दी। वह ध्यानसिंह से भय करते थे, अतः उन्होंने उसकी बिना सहायता के ही शक्ति प्राप्त करने की इच्छा की, इसी कारण से उन्होंने अपनी तरफ फौज के आते ही फौरन किले पर धावा कर दिया। जम्बू में राजा ध्यानसिंह और किले में राजा गुलाबसिंह इस बात से बिल्कुल सहमत नहीं थे। दोनों ही इस बात को जानते थे कि अगर बिना उनकी सहायता के कुंवर साहब को सफलता दिलाई गई तो उनका रौब-दौब नष्ट हो जायेगा और इसी कारण गुलाबसिंह ने अपने भाई के आ पहुंचने तक के लिए सन्धि किए जाने की चेष्टा की और जब इसके लिए मना कर दिया गया तो अन्त तक किले की रक्षा करने को तैयार हो गया। वह भी खून देने के समय शेर की तरह बहादुर था और अगरचे वह हमेशा लड़ाई-झगड़े से बचता था तो भी झगड़ा हो जाने की सम्भावना पर उसके मुकाबले का कोई होशियार और बहादुर योद्धा न था और उसने यह इरादा कर लिया था कि बिना युद्ध के किले को अधीन न करूंगा। एक और भी कारण था जिसने उसे किले की रक्षा करने को विवश किया। वह यह था कि इस किले में बड़ा भारी धन था जिसके कि एक बहुत बड़े हिस्से को - रुपये और जवाहरात को - वह अपने साथ जम्बू ले गये, किन्तु गुलाबसिंह की पॉलिसी व बहादुरी एक तरफ रखते हुए ध्यानसिंह की रक्षा की गई न कि रानी चांदकौर की। यह बात इससे साफ जाहिर हो जाती है कि इसमें राजा हीरासिंह मौजूद थे और इसकी सबसे ज्यादा रक्षा करने वालों में सुल्तान मुहम्मदखां बर्कजई था जो कि राजा का परम भक्त था।

राजा गुलाबसिंह ने रानी चांदकौर और रानी साहबकौर को अपने साथ जम्बू ले जाने का विचार किया था, किन्तु शेरसिंह इस बात की आज्ञा नहीं देता था। वह हथियारों को दुश्मनों के हाथ में देना नहीं चाहता था। रानी चांदकौर को समनबुर्ज छोड़ने तथा शहर में अपने घर रहने की आज्ञा दी गई और यहां से वे फौज और सरदारों से गुप्त बातें करती रहीं। इन्होंने सरदार अजीतसिंह सिन्धानवालिया को गवर्नर-जनरल के पास अपनी वकालत को कलकत्ते भेजा। उसके दूत सारे देश में लगन के साथ काम में लगे हुए थे। अक्टूबर सन् 1841 ई० में सरदार अतरसिंह इनके निमन्त्रण पर थानेश्वर से फीरोजपुर आये जहां पर कि उन्होंने पंजाब में घुसने के एक अच्छे मौके का इन्तजार किया। इस समय रानी साहिबा के समर्थन में लगभग 12 हजार सेना और कुछ शक्तिशाली सरदार थे। चूंकि शेरसिंह फौज की आवश्यकताओं की पूर्ति करने की अयोग्यता के कारण मशहूर हो चुके थे, अतः रानी साहिबा का प्रभाव बढ़ गया और अप्रैल सन् 1832 ई० में आम तौर पर सारी फौज इन्हीं के पक्ष में हो गई।

अब महाराज शेरसिंह ने देखा कि जब तक वह जिन्दा रहेंगीं, तब तक वह सुरक्षित नहीं, अतः उन्होंने इनके नाश करने का इरादा कर लिया। राजा ध्यानसिंह


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भी इसी प्रकार उनकी मृत्यु चाहते थे। यह सत्य है कि वे ऐसी पार्टी की प्रधान थी कि वह किसी ही समय भयानक समय उपस्थित कर देतीं। अब महाराज ने यह भी मालूम किया कि वे मंत्री को चाहे जितना भी नहीं चाहते हैं लेकिन बिना उनके वह शासन-व्यवस्था नहीं कर सकते। इस तरह वह रानी की मृत्यु को राजी हो गए, जिससे कि उन्होंने यह विश्वास कर लिया कि उनका छुटकारा सिंधानबालियों से हो जायेगा।

जून सन् 1842 ई० में शेरसिंह ने बहुत से सरदारों और एक बड़ी फौज के साथ वजीराबाद को कूंच किया और राजा ध्यानसिंह पीछे लाहौर में रह गए। चांदकौर के लिए फिर किले में रहने के लिए आज्ञा दी गई जो कि महासिंह के अधिकार में था। 12 जून को इनकी आज्ञा पाकर रानी चांदकौर की बांदियों ने इन्हें खाने की चीज में जहर देकर मार डालने की इच्छा की। इन्होंने उसे चखा और उसे फेंक दिया। बांदियों ने इस भय से कि उनका यह जाल खुल गया, पत्थरों से उनके ऊपर हमला किया और उनके शरीर को घायल करके मरने के लिए छोड़कर भाग गईं। शीघ्र ही राजा ध्यानसिंह ने उनके जख्मों की मरहम पट्टी कराई। एक समय फखीर नूरुद्दीन ने सोचा कि उनकी जिन्दगी बच जायेगी, किन्तु उन्हें कभी भी होश न आया और दो दिन के अन्दर मर गई। मारने वालों के ऊपर बहुत वजन का लोहा रख दिया गया और कहा जाता है कि जब उन्हें भय दिखाया गया तो उन्होंने ध्यानसिंह के सामने साफ-साफ यह कह दिया कि उन्हें कत्ल करने के लिए कहा गया था और इस काम के लिए उन्हें बड़े-बड़े इनाम दिए जाने के वायदे किये गए थे।

रानी चांदकौर के भाई चांदसिंह ने शेरसिंह के गद्दी पर बैठने के समय तक कन्हैया मिसल पर अधिकार रखा। नौनिहालसिंह ने इस मिसल की खूब उन्नति रखी क्योंकि उन्होंने फतेहगढ़ को अपना बहुत सा खजाना भेज दिया था जिसे शेरसिंह ने फरवरी सन् 1841 में ले लिया था। केसरसिंह और उसकी माता को लाहौर से ले जाया गया था और चांदकौर के समय में उन्हें छोड़ा गया जिनसे कि शेरसिंह उस समय शादी करने की इच्छा करता था। चन्दासिंह के लिए 60 हजार की जागीर दी गई थी और रानी के मरने के बाद वह 45 हजार रुपये की रहने दी गई।

इस कुटुम्ब के दुर्भाग्य का अभी अन्त न हुआ था। जब हीरासिंह शक्तिशाली हुआ तो उसने चन्दासिंह की शेष सारी जागीर जब्त कर ली और कारण यह बतलाया गया कि राजा ध्यानसिंह की मृत्यु की खबर सुनकर उन्होंने रोशनी की थी। चाहे यह बात ठीक हो या झूंठ हो, इतना अवश्य ठीक है कि राजा ध्यानसिंह की मृत्यु पर चन्दासिंह को जरूर खुशी हुई।

जब सरदार जवाहरसिंह मन्त्री हुआ तो उसने इस कुटुम्ब को तलबन्दी और


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फतेहगढ़ राजवंशावली

कोटली में 3060) रु० की जागीर दे दी थी जिस पर केसरसिंह सन् 1870 ई० अपनी मृत्यु तक अधिकारी रहा। इस खानदान की जायदाद बहुत थोड़ी रह गई थी। स्वरूपसिंह के पास बटाला तहसील में फतेहगढ़ में थोड़ी सी जमीन थी, जहां पर कि इनके बुजुर्गों के बनाये हुए किले के खण्डहर अब तक खड़े हुये हैं। इनके पास अजनाला तहसील के कुछ गांवों में माफी भी है और इसके अलावा 622) रु० सालाना की नकद जागीर थी और अजनाला तहसील में संगलपुर में जहां पर कि ये रहते थे, तीन सौ बीघा जमीन के मालिक थे।

सर लैपिल ग्रिफिन ने इस खानदान का वंश-वृक्ष निम्न प्रकार दिया है -

बघेलसिंह के तीन पुत्र हुए - सरदार हकीकतसिंह, महताबसिंह और मस्मदासिंह। महताबसिंह के आगे दो पीढ़ियां थीं।

सरदार हकीकतसिंह के पुत्र जैमलसिंह थे। जैमलसिंह के पुत्र चांदसिंह थे और एक बेटी थी - बीबी चांदकौर जो महाराज खड़गसिह को ब्याही गई और उन्होंने कुंवर नौनिहालसिंह को जन्म दिया था।

चांदसिंह के दो पुत्र हुए - 1. केसरसिंह, 2. ईश्वरसिंह। केसरसिंह के पुत्र इब्दबालसिंह हुए।

ईश्वरसिंह के पुत्र थे स्वरूपसिंह, → पौत्र गुलाबसिंह, → प्रपौत्र उमरावसिंह।

Notable persons

References


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