Ganesh Ram Mehria

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Author:Laxman Burdak, IFS (R)

Ganesh Ram Mehria, from village Kudan Dist:Sikar Rajasthan, was a leading Freedom Fighter who took part in Shekhawati farmers movement in Rajasthan.

Genealogy

Kisanji → Bhimji → → Ram Narayan (d.1927) → 1. Jiwan Ram (d.1945), 2. Ganesh Ram Mehria (b.1898-d.-), 3. Tansukh Rai, 4. Tilok Chand.

Jiwan Ram got 2 sons: 1. Dalel Singh, 2. Tara Singh

Ganesh Ram Mehria got 5 sons: 1. Ramrakh Pal, 2. Murli Dhar, 3. Ram Lal, 4. Har Lal (or Hari Prasad), 5. Tej Pal

कूदन के महरिया

सीकर वाटी में राव राजा के प्रिय चौधरी नाथाराम महरिया थे। इसी परंपरा को उनके बेटे शिवबक्स महरिया ने निभाया। शिवबक्स कूदन के बेताज बादशाह थे। गांव में सुण्डा गोत्र के जाट अधिक संख्या में हैं। महरिया और सुंडा में हमेशा प्रतिस्पर्धा चलती रही है। लेकिन शिवबक्स महरिया के ऊंचे रसूख के कारण वे सुंडा लोगों पर भारी पड़ रहे थे। महरिया एक पोळी (दरवाजा) के भीतर रहते थे, जिसे मेहरिया पोली कहा जाता था। आज भी इस पोली के विशेष स्मारक के रुप में सुरक्षित हैं। विशेष रुप से नाथाराम महरिया गढों और महलों में प्रसिद्धि प्राप्त करते रहे हैं। किसान वर्ग में रहते हुए भी मेहरिया परिवार किसानों से अलग रहते एवं उनमें उच्च वर्ग की भावना थी। [1]

महरिया परिवारों का आदि पुरुष किसना मेहरिया थे, जिनकी छतरी अभी भी कूदन में मौजूद है। किसना राम के दो बेटे थे - 1. भीमाराम और 2.बोयत राम।

भींवाराम के चार पुत्र थे जिनके नाम भानाराम, मोटाराम, गुमानाराम और न्योला राम थे। इन चारों ने 25-25 रुपये खर्च कर किसनाराम की छतरी बनाई थी। चारों भाइयों की चार हवेलियां काफी पुरानी हैं जिससे इस परिवार की समृद्धि का पता लगता है। कूदन के महरिया उन्हीं की वंशबेल हैं।[2]

शिवबक्स महरिया कूदन का मुख्य चौधरी था। 1935 ई. में सीकर आंदोलन के समय कूदन गाँव में करीब दस हवेलियाँ थी। शिवबक्स राव राजा सीकर के अति विश्वसनीय व्यक्तियों में से थे। गोली काण्ड के बाद गाँव की हालत गंभीर होगाई थी। शिवबक्स महरिया ने स्वयं ही पूरे गाँव का लगान चुका दिया था। शिवबक्स के कोई संतान नहीं थी। उन्होने अपने भाई के बेटे रामदेव सिंह को गोद लिया जो आगे चलकर राजस्थान सरकार में मंत्री बने। [3]

जीवन परिचय

भिवानी जाने वाले शेखावाटी के जत्थे में - शेखावाटी में किसान आन्दोलन और जनजागरण के बीज गांधीजी ने सन 1921 में बोये. सन् 1921 में गांधीजी का आगमन भिवानी हुआ. इसका समाचार सेठ देवीबक्स सर्राफ को आ चुका था. सेठ देवीबक्स सर्राफ शेखावाटी जनजागरण के अग्रदूत थे. आप शेखावाटी के वैश्यों में प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने ठिकानेदारों के विरुद्ध आवाज उठाई. देवीबक्स सर्राफ ने शेखावाटी के अग्रणी किसान नेताओं को भिवानी जाने के लिए तैयार किया. भिवानी जाने वाले शेखावाटी के जत्थे में आप भी प्रमुख व्यक्ति थे. [4]

सन 1925 में पुष्कर सम्मलेन के पश्चात् शेखावाटी में दूसरी पंक्ति के जो नेता उभर कर आये, उनमें आपका प्रमुख नाम हैं [5]

सीकर वाटी में सामंतों से संघर्ष करने वालों में कूदन के किसान गणेशराम महरिया का नाम आज भी श्रद्धा के साथ लिया जाता है. वर्तमान पीढ़ी 'गणेश दादा' के नाम से याद करती है. गणेश राम महरिया का नाम स्वतंत्रता सेनानियों की सूचि में नहीं है जबकि वे किसान आन्दोलन की अगली कतार में थे. उनके पुत्र हरिप्रसाद महरिया ने बताया कि कूदन के गोलीकांड के दिन सब घरों के दरवाजे बंद हो गए थे. लेकिन महरिया की पोली के भीतर एक हवेली बेधड़क खुली थी. वह थी शिवबक्ष महरिया की हवेली. (राजेन्द्र कसवा, P. 146)

शेखावाटी किसान आन्दोलन पर रणमल सिंह

शेखावाटी किसान आन्दोलन पर रणमल सिंह[6] लिखते हैं कि [पृष्ठ-113]: सन् 1934 के प्रजापत महायज्ञ के एक वर्ष पश्चात सन् 1935 (संवत 1991) में खुड़ी छोटी में फगेडिया परिवार की सात वर्ष की मुन्नी देवी का विवाह ग्राम जसरासर के ढाका परिवार के 8 वर्षीय जीवनराम के साथ धुलण्डी संवत 1991 का तय हुआ, ढाका परिवार घोड़े पर तोरण मारना चाहता था, परंतु राजपूतों ने मना कर दिया। इस पर जाट-राजपूत आपस में तन गए। दोनों जातियों के लोग एकत्र होने लगे। विवाह आगे सरक गया। कैप्टन वेब जो सीकर ठिकाने के सीनियर अफसर थे , ने हमारे गाँव के चौधरी गोरूसिंह गढ़वाल जो उस समय जाट पंचायत के मंत्री थे, को बुलाकर कहा कि जाटों को समझा दो कि वे जिद न करें। चौधरी गोरूसिंह की बात जाटों ने नहीं मानी, पुलिस ने लाठी चार्ज कर दिया। इस संघर्ष में दो जाने शहीद हो गए – चौधरी रत्नाराम बाजिया ग्राम फकीरपुरा एवं चौधरी शिम्भूराम भूकर ग्राम गोठड़ा भूकरान । हमारे गाँव के चौधरी मूनाराम का एक हाथ टूट गया और हमारे परिवार के मेरे ताऊजी चौधरी किसनारम डोरवाल के पीठ व पैरों पर बत्तीस लठियों की चोट के निशान थे। चौधरी गोरूसिंह गढ़वाल के भी पैरों में खूब चोटें आई, पर वे बच गए।

चैत्र सुदी प्रथमा को संवत बदल गया और विक्रम संवत 1992 प्रारम्भ हो गया। सीकर ठिकाने के जाटों ने लगान बंदी की घोषणा करदी, जबरदस्ती लगान वसूली शुरू की। पहले भैरुपुरा गए। मर्द गाँव खाली कर गए और चौधरी ईश्वरसिंह भामू की धर्मपत्नी जो चौधरी धन्नाराम बुरड़क, पलथना की बहिन थी, ने ग्राम की महिलाओं को इकट्ठा करके सामना किया तो कैप्टेन वेब ने लगान वसूली रोकदी। चौधरी बक्साराम महरिया ने ठिकाने को समाचार भिजवा दिया कि हम कूदन में लगान वसूली करवा लेंगे।

कूदन ग्राम के पुरुष तो गाँव खाली कर गए। लगान वसूली कर्मचारी ग्राम कूदन की धर्मशाला में आकर ठहर गए। महिलाओं की नेता धापू देवी बनी जिसका पीहर ग्राम रसीदपुरा में फांडन गोत्र था। उसके दाँत टूट गए थे, इसलिए उसे बोखली बड़िया (ताई) कहते थे। महिलाओं ने काँटेदार झाड़ियाँ लेकर लगान वसूली करने वाले सीकर ठिकाने के कर्मचारियों पर आक्रमण कर दिया, अत: वे धर्मशाला के पिछवाड़े से कूदकर गाँव के बाहर ग्राम अजीतपुरा खेड़ा में भाग गए। कर्मचारियों की रक्षा के लिए पुलिस फोर्स भी आ गई। ग्राम गोठड़ा भूकरान के भूकर एवं अजीतपुरा के पिलानिया जाटों ने पुलिस का सामना किया। गोठड़ा गोली कांड हुआ और चार जने वहीं शहीद हो गए। इस गोली कांड के बाद पुलिस ने गाँव में प्रवेश किया और चौधरी कालुराम सुंडा उर्फ कालु बाबा की हवेली , तमाम मिट्टी के बर्तन, चूल्हा-चक्की सब तोड़ दिये। पूरे गाँव में पुरुष नाम की चिड़िया भी नहीं रही सिवाय राजपूत, ब्राह्मण, नाई व महाजन परिवार के। नाथाराम महरिया के अलावा तमाम जाटों ने ग्राम छोड़ कर भागे और जान बचाई।


[पृष्ठ-114]: कूदन के बाद ग्राम गोठड़ा भूकरान में लगान वसूली के लिए सीकर ठिकाने के कर्मचारी पुलिस के साथ गए और श्री पृथ्वीसिंह भूकर गोठड़ा के पिताजी श्री रामबक्स भूकर को पकड़ कर ले आए। उनके दोनों पैरों में रस्से बांधकर उन्हें (जिस जोहड़ में आज माध्यमिक विद्यालय है) जोहड़े में घसीटा, पीठ लहूलुहान हो गई। चौधरी रामबक्स जी ने कहा कि मरना मंजूर है परंतु हाथ से लगान नहीं दूंगा। उनकी हवेली लूट ली गई , हवेली से पाँच सौ मन ग्वार लूटकर ठिकाने वाले ले गए।

कूदन के बाद जाट एजीटेशन के पंचों – चौधरी हरीसिंह बुरड़क, पलथना, चौधरी ईश्वरसिंह भामु, भैरूंपुरा; पृथ्वी सिंह भूकर, गोठड़ा भूकरान; चौधरी पन्ने सिंह बाटड़, बाटड़ानाऊ; एवं चौधरी गोरूसिंह गढ़वाल (मंत्री) कटराथल – को गिरफ्तार करके देवगढ़ किले मैं कैद कर दिया। इस कांड के बाद कई गांवों के चुनिन्दा लोगों को देश निकाला (ठिकाना बदर) कर दिया। मेरे पिताजी चौधरी गनपत सिंह को ठिकाना बदर कर दिया गया। वे हटूँड़ी (अजमेर) में हरिभाऊ उपाध्याय के निवास पर रहे। मई 1935 में उन्हें ठिकाने से निकाला गया और 29 फरवरी, 1936 को रिहा किया गया।

जब सभी पाँच पंचों को नजरबंद कर दिया गया तो पाँच नए पंच और चुने गए – चौधरी गणेशराम महरिया, कूदन; चौधरी धन्नाराम बुरड़क, पलथाना; चौधरी जवाहर सिंह मावलिया, चन्दपुरा; चौधरी पन्नेसिंह जाखड़; कोलिडा तथा चौधरी लेखराम डोटासरा, कसवाली। खजांची चौधरी हरदेवसिंह भूकर, गोठड़ा भूकरान; थे एवं कार्यकारी मंत्री चौधरी देवीसिंह बोचलिया, कंवरपुरा (फुलेरा तहसील) थे। उक्त पांचों को भी पकड़कर देवगढ़ किले में ही नजरबंद कर दिया गया। इसके बाद पाँच पंच फिर चुने गए – चौधरी कालु राम सुंडा, कूदन; चौधरी मनसा राम थालोड़, नारसरा; चौधरी हरजीराम गढ़वाल, माधोपुरा (लक्ष्मणगढ़); मास्टर कन्हैयालाल महला, स्वरुपसर एवं चौधरी चूनाराम ढाका , फतेहपुरा

24 दिसंबर 1934 का अध्यादेश

सीकर ठिकाने में आन्दोलन होने लगे और किसानों ने लगान देना बंद कर दिया तब 24 दिसंबर 1934 ई. को जयपुर सरकार ने एक अध्यादेश जारी किया जिससे लगान देने से रोकने की कार्यवाही पर रोक लग गयी. इस क़ानून से सीकर ठिकाने के प्रशासन को और कड़े अधिकार मिल गए तथा उनका हाथ मजबूत हो गया. 31 जनवरी 1935 ई. को जुडिसियल आफिसर, रेवेन्यु मेंबर और पुलिस इंचार्ज के साथ सीकर ठिकाने की सशस्त्र पुलिस ने सीकर जाट पंचायत के सदस्यों के साथ 16 मुख्य जाट नेताओं को, जिनमें हरी सिंह, ईश्वर सिंह, पृथ्वी सिंह, गोरू सिंह, पन्ने सिंह, गणेश राम, सूरज सिंह, तेजा सिंह, गंगा सिंह आदि प्रमुख थे, किसानों को लगान न देने के लिए भड़काने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया.[7] इन गिरफ्तारियों पर किसानों में भारी असंतोष फैला और आस-पास के गाँवों से हजारों की संख्या में किसान सीकर पहुँच गए और उन्होंने सीकर प्रशासक मि. ए. डब्ल्यू. टी. वेब के बंगले को चारों और से घेर लिया और अपने नेताओं की रिहाई की मांग की एवं साथ ही पंचपाना शेखावाटी ठिकानों की तरह चार आना प्रति रूपया लगान में भी माफ़ी की मांग की. [8] [9]


सन 1938 में सीकर रावराजा के सीकर से निर्वासन प्रकरण में सीकर व पंचपना शेखावाटी के सारे ठिकानेदार व राजपूत पहले से ही रावराजा सीकर के पक्ष में थे. रावराजा सीकर ने सीकरवाटी जाट किसान पंचायत के सदस्यों को देवीपुरा की कोठी में बुलाया. जो पंच गए उन में आप भी सम्मिलित थे.[10]

जाटों ने सीकर दिवस मनाया

ठाकुर देशराज[11] ने लिखा है....26 मई 1935 को अखिल भारतीय जाट महासभा के आदेशों से भारत भर में जाटों ने सीकर दिवस मनाया। जगह-जगह सभाएं की गई, जुलूस निकाले गए। महासभा के तत्कालीन मंत्री झम्मन सिंह जी एडवोकेट ने एक प्रेस वक्तव्य द्वारा सीकर के दमन की निंदा की।

11 मई 1935 को जाट महासभा का अधिवेशन रायबहादुर चौधरी सर छोटूराम जी की अध्यक्षता में जयपुर काउंसिल के वाइस प्रेसिडेंट सर बीचम साहब से मिला और उसने सीकर कांड की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की।

सर जौंस बीचम एक गर्वीले अंग्रेज थे उन्होंने यह तो माना की सीकर की घटनाएं खेद जनक है और उन्हें सुधारा जाएगा किंतु जांच कराने से साफ इंकार कर दिया और जाट डेपुटेशन को भी सीकर जाकर जांच करने की इजाजत नहीं दी।

जाट डेपुटेशन जयपुर से लौट गया और दमन में कोई कमी नहीं हुई। सीकर में त्राहि-त्राहि मच गई। कुँवर पृथ्वी सिंह गोठड़ा और गणेशराम कूदन, गोरु राम कटराथल बाहर के जाटों के पास दौड़-दौड़ कर जा रहे थे। इन लोगों के सीकर में


[पृ.293]: वारंट थे और पुलिस चाहती थी कि यह हाथ लग जाए तो इन्हें पीस दिया जाए। अंत में दमन का मुकाबला करने के लिए यह सोचा गया कि जयपुर राजधानी में सत्याग्रह किया जाए। पहले तो एक डेपुटेशन मिले, जो यह कह दे या तो जयपुर हमारे जान माल की गारंटी दे वरना हम मरेंगे तो गांवों में क्यों मरे जयपुर आकर यहां गोलियां खाएंगे। सत्याग्रह के लिए कुछ जत्थे बाहर से भी तैयार किए गए।

इधर जून के प्रथम सप्ताह कुंवर रतन सिंह, ईश्वर सिंह, धन्नाराम ढाका, गणेश राम, ठाकुर देशराज जी आदि मुंबई गए। वहां मुंबई में श्री निरंजन शर्मा अजीत और देशी राज्यों के आदी अधिदेवता अमृत लाल जी सेठ के प्रयतन से मुंबई के तमाम पत्रों में सीकर के लिए ज़ोरों का आंदोलन आरंभ हो गया और कई मीटिंग में भी हुई, जिनमें सीकर की स्थिति पर प्रकाश डाला गया। मुंबई के बड़े से बड़े लीडर श्री नरीमान, जमुनादास महता आदि ने सीकर के संबंध में अपनी शक्ति लगाने का विश्वास दिलाया।

आखिरकार जयपुर को हार झक मारकर झुकना पड़ा और उसने सीकर के मामले में हस्तक्षेप किया। अनिश्चित समय के लिए राव राजा साहब सीकर को ठिकाने से अलग रहने की सलाह दी गई। गिरफ्तार हुए लोगों को छोड़ा गया। जिनके वांट थे रद्द किए गए। किंतु जाटों की नष्ट की हुई संपत्ति का कोई मुआवजा नहीं मिला और न उन लोगों के परिवारों को कोई सहायता दी गई जिनके आदमी मारे गए थे। इस प्रकार इस नाटक का अंत सीकर के राव राजा और दोनों को सुख के रूप में नहीं हुआ। किंतु यह अवश्य है कि सीकर के जाट को नवजीवन दे दिया।

जाट जन सेवक

ठाकुर देशराज[12] ने लिखा है ....चौधरी गणेशराम मेहरिया कुदन - [पृ.306]:आपका जन्म संवत 1954 माघ सुदी 14 को सीकर राज्य के कस्बे कूदन का है, जिसका फासला जेरठी-दादिया स्टेशन से 3 मील है। आपके पिताजी का नाम रामनारायण जी था, जिनका देहांत संवत 1984 में हो चुका है। आप चार भाई थे। आपके बड़े भाई का नाम जीवनरामजी था जिनका देहांत संवत 2002 में हो गया है। आप से दो भाई छोटे श्रीयुत तनसुख रायतिलोकचंद हैं।

आप की जमीदारी पेसे के अलावा लेनदेन का काम, कपड़े व किराने की सबसे बड़ी दुकान है। सीकर में जो महान जाट यज्ञ हुआ था यह इसी खानदान के आदमियों की जी तोड़ कोशिश का फल था। उसके बाद सीकर राज्य में महान जाट आंदोलन शुरू हुआ, जिसमें कुदन और खुड़ी में गोलियां बरसाई गई। जिसमें राज्य ने आपको डेढ माह के लिए जेल में बंद कर दिया, जिसके फलस्वरूप सीकर राज्य में खालसाशाही जमीन का बंदोबस्त हुआ और जो-जो जाटों की खून चूसने के लिए राज्य ने व जागीरदारों ने लाल बाग लगा रखी थी वह बंद होगई। आपके ही उत्साह दिलाने से सीकर स्टेशन पर जाट बोर्डिंग सीकर बन रहा है।


[पृ.306]: आप के 5 पुत्र रामरख पाल, मुरलीधर, रामलाल, हरलाल और तेजपाल हैं।

इनमें से मुरलीधर को इनके छोटे भाई तनसुख राम ने गोद ले लिया है। इनके बड़े भाई जीवनराम जी के दो लड़के दलेलसिंह व तारा सिंह और 4 कन्याएं हैं। सब भाई वह लड़के जाति सेवा भाव में ओत-प्रोत हैं।

सीकर के जाटों में आपके लिए कहा जा सकता है आप मननशीलता, सहनशक्ति और सोच विचार कर काम करने वालों में प्रथम श्रेणी के व्यक्ति हैं। बुद्धिमानी के साथ बातचीत करने की कला में निपुण हैं। सीकर राज्य में जितने बड़े धनी आदमी हैं उनमें आपका स्थान है। समझदारी में आपकी सराहना दूसरी जातियों के लोग भी करते हैं।

आप डींग नहीं मारते, काम करते हैं। वह भी समझदारी के साथ। खतरों से घबराते नहीं किंतु जानबूझकर खतरों में पड़ना भी पसंद नहीं करते।

यह आप की खूबी है कि आप अपने ही क्षेत्र और प्लेटफार्म पर काम करते हैं। किसी बहाव से प्रभावित होकर आप बहे नहीं। आपकी उपमा एक शांत सरोवर से दी जा सकती है जिसमें क्रोधरूपी लहरें पत्थर मारने पर ही पैदा होती हैं।

References

  1. Rajendra Kaswan: Mera Gaon Mera Desh, Jaipur, 2012, ISBN 978-81-89681-21-0, p.144
  2. Rajendra Kaswan: Mera Gaon Mera Desh, Jaipur, 2012, ISBN 978-81-89681-21-0, p.144-145
  3. Rajendra Kaswan: Mera Gaon Mera Desh, Jaipur, 2012, ISBN 978-81-89681-21-0, p.143
  4. राजेन्द्र कसवा: मेरा गाँव मेरा देश (वाया शेखावाटी), जयपुर, 2012, ISBN 978-81-89681-21-0, P. 70
  5. राजेन्द्र कसवा: मेरा गाँव मेरा देश (वाया शेखावाटी), जयपुर, 2012, ISBN 978-81-89681-21-0, P. 100
  6. रणमल सिंह के जीवन पर प्रकाशित पुस्तक - 'शताब्दी पुरुष - रणबंका रणमल सिंह' द्वितीय संस्करण 2015, ISBN 978-81-89681-74-0 पृष्ठ 113-114
  7. दी स्टेट्समेन दिनांक 16 फरवरी 1935
  8. दी स्टेट्समेन दिनांक 16 फरवरी 1935
  9. डॉ पेमाराम: शेखावाटी किसान आन्दोलन का इतिहास, 1990, p.113
  10. डॉ पेमाराम: शेखावाटी किसान आन्दोलन का इतिहास, 1990, p.158
  11. Thakur Deshraj:Jat Jan Sewak, 1949,p.292-93
  12. Thakur Deshraj:Jat Jan Sewak, 1949, p.305-306

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