Ganga Ram Dhaka

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Ganga Ram Dhaka (चौधरी गंगाराम ढाका), from Nagrana (नगराना), Hanumangarh, was an advocate and a Social worker in Hanumangarh, Rajasthan. [1]

जाट जन सेवक

ठाकुर देशराज[2] ने लिखा है .... चौधरी गंगाराम ढाका वकील: [पृ.133]: सन् 1932 का साल और जाड़े का मौसम। भादरा में मैं वहां लोक नायक श्री खूबरामजी शर्राफ़ और उनके बहादुर भतीजे श्री सत्यनारायण जी शर्राफ़ से मिलने गया था। वह एक लंबे और पुष्ट शरीर वाले जाट वकील से श्री खूबराम जी से परिचय कराया। यह जाट वकील श्री गंगाराम जी वकील थे। आपके पिता का नाम चौधरी छोटूराम जी और जन्मभूमि खारिया जिला हिसार है।

चौधरी गंगाराम जी प्रसन्नमुख और विनोदी स्वभाव के आदमी हैं। वह निधड़कता से आतंक के दिनों में भी मुझसे मिले। बीकानेर राज्य तहसील हनुमानगढ़ में नगराना बास उनकी भूमि है। उन्होंने आरंभ में उन तमाम मुसीबतों को उठाया है जो पढ़े लिखे और कौम परस्त हर एक जाट के लिए बीकानेर के सामंत शाही शासन में कर्मरेख के रूप में लिखी हुई थी। इसीलिए तो आपको अपनी थानेदारी छोड़नी पड़ी और वकालत को अपनाना पड़ा।

चौधरी गंगाराम जी जहां अच्छे वकील हैं वहां उन्होंने कौम की सेवा में भी अच्छी दिलचस्पी ली है।


[पृ.134]: उदार वृति के नेताओं की भांति उन्होंने अपनी कौम को आगे बढ़ाने की आकांक्षाएं रखी हैं। बीकानेर के जाट महारथी चौधरी हरिश्चंद्र और जीवनराम जी के पुराने साथियों में से हैं और एक प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। आपके दूसरे भाई चौधरी मनीराम जी हैं। आपने भादरा के बोर्डिंग हाउस को जिंदा संस्था बनाने की पूरी कोशिश की है। इस समय आप नागराना तहसील हनुमानगढ़ में रहते हैं।

इनके दादा चौधरी देदारामजी तहसील हनुमानगढ़ के टीबी गांव में रहते थे। खारिया में इनकी ननसाल थी। इन गांवों के हक मालिकाना, बीच में अर्थात 19 वी शताब्दी के आख़िर में, जब बीकानेर दरबार ने जप्त किए तो इनके दादा खारिया जिला हिसार चले गए। आप की मां का देहांत, जबकि आप दूध पीते बच्चे थे हो गया। दादी ने लालन पालन किया। संवत 1958 में आपके पिता आगरा के स्वामी बाग में चले गए जहां वे राधास्वामी मत के लोगों के बच्चों को पढ़ाने का काम करने लगे।

सन् 1914 में चौधरी गंगाराम ने चौधरी हरीश चंद्र जी जमादार के सहयोग से अर्जीनवीस की सनद हासिल की और सन् 1916 में पुलिस इंस्पेक्टरी पास करके बीकानेर की पुलिस में इंस्पेक्टर हो गए किंतु डीआईजी सबलसिंह ने, जो कि जाटों की परछाई तक से नफरत करते थे, आपको पुलिस में नहीं निभने दिया।

सन् 1928 से आपने वकालत आरंभ कर दी। इससे आपको उन दिनों ₹500 और ₹600 माहवार की आमदनी होने लगी। अच्छी आमदनी की अच्छी बचत से आपने हजारों


[पृ.135]:बीघे जमीन मलड़खेड़ा और कॉलोनी क्षेत्र में खरीद ली। पिछले वर्ष जमीन बेचकर लगभग ₹6000 सालाना आमदनी की और आपने गंगानगर में दुकानें खरीद ली हैं। आप आर्य समाजी ख्यालात के आदमी हैं। कांग्रेस के कामों में भी आपने मदद दी है। सन् 1935 में आप के इकलौते पुत्र का देहांत हो गया इससे आपको बड़ा धक्का लगा और तभी से वकालत छोड़कर एकांत का जीवन बिताते हैं।

बाहरी कड़ियां

पिक्चर गैलरी

References

  1. Thakur Deshraj:Jat Jan Sewak, 1949, p.133-135
  2. Thakur Deshraj:Jat Jan Sewak, 1949, p.133-135

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