Gothra (Tagalan)

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Note - Click → Gothra for details of similarly named villages at other places.


Location of Gothra (Tagalan) is in south-west of Jeenmata in Sikar district

Gothra Tagalan गोठडा तगालान is a village in Dhod tahsil of Sikar district in Rajasthan.

Before creation of Dhod tahsil, this village used to fall within Sikar tahsil.

The village is associated with the history of Burdak gotra.

The Founders

Nanakji Burdak (1259-1319) AD - Founder of Gothra (Tagalan)

Gothra (Tagalan) was founded in year 1294 by Sahraj, Dhanraj and Karma Ram, the three sons of Nanakji Burdak, the sole survivor and ancestor of Burdaks. The mother of Nanakji Burdak was named Rambha of Kharra clan from village Kharra-Ka-Gothra. Hence the name Gothra. Later on it was Jagir of Tagelan clan Jats and it became Gothra (Tagalan).

Location

It is about 6 km south-west of Jeenmata temple. Nearby villages are Khud, Mandota, Khatiwa and Dudwa. The literal meaning of 'Gothra' is Place for keeping cows. 'Tagalan' word indicates the fact that the area has been associated with the Tigala Gotra Jats. Geographical Coordinates are:27°24'7"N 75°9'44"E.

How to reach

We can reach Gothra (Tagalan) from Jeenmata. It is about 7 kms. On the road from Jeenmata in the west we leave Jeenwas in the left and then after a crossing of Biroli we proceed straight and then turns road to the left and we reach Gothra (Tagalan).

We can reach from Sikar -Gokulpura- Mandawara - Khori Doongar - Bidoli - Gothra (Tagalan).

Jat Gotras

Population

Its population as of 2001 is 3,097.

History

Gusai Mandir Silalekh Gothra Tagalan

As per records of the bards of Burdak the village was founded by Burdak Jats.[1]They founded village Sarnau near Jeenmata in Sikar Rajasthan. In village Sarnau there was a war between Burdaks and Dhakas. Burdaks defeated Dhakas. But later on with the help of Badsah Dhakas defeated and killed all Burdaks in Sarnau. One Kharra gotra woman who was married in Burdaks was escaped and she went to her pihar at Kharra-Ka-Gothra village. She was pregnant at that time. She gave birth to a child in nanihal at Kharra-Ka-Gothra village. Burdaks in Rajasthan are descendant of this sole child from village Kharra-Ka-Gothra.

The Kharra gotra woman, mother of the sole survivor of Burdak clan, was worshipper of Gosain ji. She was a strong devotee of Gosain ji. The sole Burdak survivor boy was very energetic. He targeted matakas of village woman carrying water with his bow and arro. Village women got copper mataka. Even then the boy targeted these matakas with iron bow and arrow. The boy’s Kharra gotra mama once requested his co-brothers to stop the overflow of village Johar. The Kharras denied help saying the right to property was of Burdak Bhanja why should they help. The mama of Burdak boy died over it. A chabutara is still there at the Johar of village Gothra (Tagalan). There is one very old temple of Gosain ji in Gothra (Tagalan) village. Presently there are about 400 families of Burdaks in this village.

गोठड़ा गाँव का इतिहास

Gusainji statue in temple at Gothra Tagalan

संवत 1315 (1258 AD) में बुरड़कों की राजधानी सरनाऊ दिल्ली के बादशाह नसरुदीन महमूदके अधीन हुई. बादशाह ने गानोड़ा गाँव के ढाका मोमराज को 52000 फ़ौज का मनसबदार बनाया. उस समय सरनाऊ कोट राजधानी पर चौधरी कालूराम बुरड़क के पुत्र पदम सिंह बुरड़क तथा जगसिंह बुरड़क के अधिकार में थी. इस जागीर में 84 गाँव थे.

मोमराज ढाका ने बुरड़कों के साथ 6 लड़ाइयाँ लड़ी परन्तु उनको नहीं हरा पाया. मोमराज ढाका सभी तरह से निराश हो गया तो पौष बदी 13 संवत 1313 (1256 AD) के बाद उसने दो साल तक स्वयं कोई सीधी लडाई नहीं लडी परन्तु सोचने लगा कि किस तरह से बुरडकों को परास्त किया जाये. जासूसों से पता लगाया कि सभी बुरडक परिवार आसोज माह के अमावस को निशस्त्र हालाणी बावडी पर श्राध के लिये एकत्रित होते हैं, स्नान करते हैं और बडा श्राध निकालते हैं. संवत 1315 (1258 AD) की आसोज माह के अमावस को सभी बुरडक निशस्त्र हालाणी बावडी पर श्राध के लिये एकत्रित हुये और उस समय मोमराज ढाका ने 25000 की फ़ौज लेकर उनपर तोपों से हमला किया. सभी बुरड़क मारे गए और किला नष्ट कर दिया गया. सरनाउ-कोट में कोइ भी नहीं बचा. मोमराज खुश होकर दिल्ली चला गया.

पदम सिंह की खर्रा गोत्र की पत्नी , जिसका नाम रम्भा था, वह उस समय सरनाउ-कोट से बाहर अपने पीहर खर्रा के गोठडा गयी हुई थी. रम्भा बच गयी और वह उस समय तीन माह की गर्भवती थी. वह इस बात से परेसान थी कि उसके कारण अब उसके पीहर वालों का भी सर्वनाश होगा. उसके ईस्ट-देव गोसाईंजी थे. उसने गोसाईंजी की पूजा की. गोसाईं जी ने एक रात 10 बजे सफ़ेद घोड़े पर स्वर, सफ़ेद कपड़ों में, सफ़ेद दाढ़ी और बड़ी मूंछ सहित रम्भा को दर्शन दिए. ईस्टदेव गोसाईंजी ने रम्भा को आशीर्वाद दिया और कहा कि -

"चैत सुदी राम-नवमी के दिन उत्तरा नक्षत्र में पुत्र पैदा होगा. उसका नाम नानक रखना और नाल कुरड़ी में डालना. जैसे कुरड़ी बढ़ेगी वैसे ही वंश बढेगा. श्राध मत करना. बड़ा नहान मत करना. जब नानक हो जाये तब पीहर में मत रहना. मुझे मत भुलाना. हर दूज के रोज पूजना. तेरे बेटे को कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकेगा."
गुसाईंजी का मंदिर गोठडा तगालान

गोसाईंजी के आशीर्वाद से चैत सुदी नवमी संवत 1316 को रम्भा को 10 बजे खर्रा के गोठडा डूंगर की घाटी पर एक लड़का हुआ. उसका नाम नानक रखा. नानक के बड़े होने पर उसकी शादी कुशल जी तेतरवाल की बेटी मानकौरी से की. सभी बुरड़क नानकजी से फले-फूले हैं.

नानकजी के तीन पुत्र हुए. सहराज, धनराज और करमाराम. नानकजी ने मूल खर्रा का गोठडा गाँव छोड़ कर संवत 1353 (1296 AD) में बैसाख सुदी आखा तीज के दिन दूसरा गोठडा गाँव बसाया. नारायण ब्रह्मण ने पूजा की. पनघट का कुआ करवाया. खंडेला राजा भोजराज का सहयोग लिया. कुए की गहराई 26 हाथ और चौड़ाई पौने पांच हाथ रखी. गूण उत्तराधी रखी. उस समय दिल्ली बादशाह अलाउदीन खिलजी थे. गाँव में भगवान का मंदिर बनाया. 51 बीघा जमीन मंदिर के लिए छोडी. साथ ही यह प्राण लिया जो राजस्थानी भाषा में निम्नांसर है:

बुरडक जायो बावै नहीं, सींव दाब लेवै नहीं, लेवे तो वंश चाले नहीं. ईष्ट देव गुसाईं जी को छोड़े नहीं.

संवत 1353 में गुसाईं जी का कच्चा मंदिर बनाया. गाँव में फिर भगवान का मंदिर चिनाया. इसकी पूजा हरी नारायण ब्रह्मण ने की. अमावस, ग्यारस, पूनम का पक्का पेटिया बांधा. 51 बीघा जमीन मंदिर की डोळी छोड़ी. संवत 1353 में नानकजी, कँवर सहराज, धनराज और करमराज ने गाँव गोठडा में माँ खर्री, दादा इन्द्राराम के नाम से इन्दोलाव तालाब बनाया और 1111 बीघा जमीन गौचर भूमि छोड़ी. इसी साल तालाब में गुसाईं जी का कच्चा मंदिर बनाया. नानक जी की मृत्यु संवत 1375 में हुई.

गुसाईंजी का मंदिर गोठडा तगालान

गाँव का नाम गोठडा तागालान रखने के सम्बन्ध में भड़वा (राव) के अभिलेखों में निम्न विवरण उपलब्ध है. कहते हैं कि जब भारत में औरंगजेब द्वारा मंदिरों को नष्ट किया जा रहा था तब उसने हर्ष और जीनमाता के मन्दिरों पर भी हमला किया. उस समय हर्ष के मंदिर की पूजा गूजर लोग तथा जीनमाता के मंदिर की पूजा तिगाला जाट करते थे. कहते हैं कि हमले के तुरन्त बाद यहां की मक्खियों ने बादशाह की सेना पर हमला बोल दिया. मक्खियों ने बादशाह की सेना का पीछा दिल्ली तक किया और सेना को बहुत नुकसान पहुंचाया. बदशाह ने जब हर्ष और जीनमाता का स्मरण किया तभी पीछा छोड़ा. इसके उपलक्ष में बादशाह द्वारा हर्ष मंदिर के लिये सवामण तेल और सवामण बाकला हर साल भेजने का वादा किया. जीनमाता के भाट हरफ़ूल तिगाला जाट को गाँव गोठडा तागालान की 18000 बीघा जमीन की जागीर बक्शी. इसलिए इया गाँव का नाम गोठडा तागालान कहलाता है. यह जागीर उनके पास 105 साल रही तत्पश्चात संवत 1837 में यह कासली के नवाब के साथ फतेहपुर के अधीन हुआ. बादमें यह जागीर शेखावतों के पास आई.

Notable persons

  • Rajendra Kumar Burdak - Village :Gothra Tagalan, Via:Khud, Mob:9929374876
  • Banwari Lal Burdak - Sarpanch
  • Harlal Thori - Village :Gothra Tagalan, Via:Khud, Mob:9887129812
  • Mohan Das Maharaj - Pujari Gusanji Temple, Mob- 9772344906
  • MUKESH_BURDAK GOTHARA TAGELAN [SIKAR] MOB.NO.:-7891961508

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External link

References

  1. Badwa Shri Bhawani Singh Rao of village Maheswas, tahsil Phulera, district Jaipur, Rajasthan, Mob:09785459386

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