Hardwari Lal

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Hardwari Lal

Hardwari Lal (हरद्वारी लाल) (Dalal) (Born: Sept. 10, 1910) hailed fromChhara village in Rohtak district in Haryana, who remained MLA for a long time, both in Punjab and Haryana Assemblies. He was also the Member of Parliament (Lok Sabha) from Rohtak Constituency in 1984-1989. Chhara village is now part of Jhajjar district.

After formation of Haryana state on 1 November 1966, Hardwari lal was the Education Minister in the cabinet of Chief Minister Rao Birender Singh (in 1967).

A lawyer from profession, he was an educationist and was later appointed as Vice Chancellor of Maharishi Dayanand University (MDU), Rohtak.

Dalip Singh Ahlawat writes

1 नवम्बर 1966 को हरयाणा प्रान्त का निर्माण होने पर इसी दिन पं० भगवतदयाल शर्मा केन्द्रीय नेताओं के साथ अपनी सांठ-गांठ तथा भूतपूर्व पंजाब प्रदेश की कांग्रेस के अध्यक्ष होने की स्थिति का लाभ उठाते हुए, हरयाणा के प्रथम मुख्यमन्त्री बन बैठे। वह तो पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष के नाते हरयाणा राज्य के निर्माण का विरोध करते आ रहे थे। इस स्थिति परिवर्तन से हरयाणा के अधिकारों के लिए पिछले कई वर्षों से लड़ाई लड़ने वाले चौ० देवीलाल का मुख्यमन्त्री बनने का वास्तविक अधिकार था। पंजाब के भूतपूर्व मुख्यमंत्रियों से हरयाणा के हकों के लिए लड़ाई लड़कर कष्ट झेलने वालों में देवीलाल के अतिरिक्त किसी और का नाम खोजने पर भी नहीं मिलता।

चौ० देवीलाल हरयाणा के बनते ही हरयाणा के हितों तथा स्वाभिमान की रक्षा के लिए सन् 1962 में स्वेच्छा से छोड़ी कांग्रेस में अपने अनुयायियों समेत पुनः मिल गये थे। श्री भगवतदयाल शर्मा राज्य की राजनैतिक स्थिति का लाभ उठाते हुए देवीलाल के प्रभाव को शून्य कर देना चाहते थे। अपनी स्थिति और सुदृढ़ करने के लिए 18 नवम्बर 1966 को श्री रामकिशन गुप्ता को राज्य कांग्रेस का अध्यक्ष निर्वाचित करवा लिया।

सन् 1967 के आम चुनाव में चौ० देवीलाल ने विपरीत दिशा को देखकर कांग्रेस टिकट का प्रत्याशी बनना ठीक नहीं समझा। कुल 81 सदस्यों के सदन में 48 स्थान प्राप्त करके 7 सदस्यों के बहुमत से पं० भगवतदयाल शर्मा दूसरी बार मार्च 10, 1967 को हरयाणा के मुख्यमन्त्री निर्वाचित हुए। उन्होंने 11 सदस्यों को मन्त्रिमण्डल में ले लिया। मुख्यमन्त्री बनते ही पण्डित जी ने जात-पात का भेदभाव पैदा कर दिया। उन्होंने एक सम्मेलन में, जो रोहतक अनाज मण्डी में हुआ था, अपने


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-973


भाषण में खुले तौर पर कहा कि “अब मैं इन चौधरियों की नहीं चलने दूंगा। इनके डोगे (लाठी या बैंत) खूंटियों पर रखवा दूंगा आदि आदि।” इनका तात्पर्य जाटों से था। इससे हरयाणा की जाट जाति एवं एम० एल० ए० सभी मुख्यमन्त्री से नाराज हो गये। मन्त्रिमण्डल के गठन के बाद 17 मार्च 1967 को स्पीकर के चुनाव के अवसर पर पंडित जी के प्रतिनिधि श्री दयाकिशन को विरोधी पक्ष के उम्मीदवार राव वीरेन्द्रसिंह के मुकाबले में 3 मत कम मिले। भगवतदयाल के विरुद्ध विद्रोह की यह योजना गुप्त रूप से दिल्ली में तैयार की गई थी।

इस आकस्मिक नाटक के सूत्रधार चौ० देवीलाल उस समय विधानसभा की दीर्घा में बैठे थे। चौधरी साहब के छोटे पुत्र श्री प्रतापसिंह पहली बार जिला सिरसा के रोड़ी निर्वाचन क्षेत्र से जीतकर हरयाणा के विधायकों की श्रेणी में शामिल हुए थे। उस दिन अपने दल के नेता भगवतदयाल के विरुद्ध विद्रोह का झंडा ऊंचा करने वाले 12 कांग्रेसी विधायकों में से यह भी एक थे।

पं० भगवतदयाल 17 मार्च के दिन विधानसभा सदन में अपने मन्त्रिमण्डल की निर्णायक हार के बाद मन्त्रिमण्डल की बागडोर चौ० हरद्वारी लाल को सौंपकर स्वयं केन्द्रीय नेताओं से विचारविमर्श करने दिल्ली चले गये। केन्द्रीय नेताओं ने कांग्रेस दल के इस अपमान के लिए पण्डित जी को ही उत्तरदायी ठहराया। इधर चण्डीगढ़ में संयुक्त मोर्चे का विधिवत् गठन हो चुका था। संयुक्त मोर्चे के नेताओं ने तत्कालीन उपमुख्यमन्त्री चौ० हरद्वारीलाल को अपने यहां मन्त्री पद का प्रलोभन देकर फुसला लिया। चौ० हरद्वारीलाल ने पहले तो मन्त्रिमण्डल के अन्य सदस्यों से यह कहा कि दिल्ली से पण्डित जी का फोन आया है कि मेरे हाथ मजबूत करने के लिए सब लोग अपना त्यागपत्र लिखकर मेरे पास दिल्ली भिजवा दें। जब सबके त्यागपत्र उनके कब्जे में आ गये तो राज्य के गवर्नर को पेश करके पण्डित जी का मन्त्रिमण्डल भंग करवा दिया। अब पण्डित जी को त्यागपत्र देने के सिवाय अन्य कोई रास्ता नहीं रह गया था। अतः उन्होंने 22 मार्च, 1967 को अपना त्यागपत्र राज्यपाल के पास भिजवा दिया। इस तरह से पं० भगवतदयाल का शासन तेरहवें दिन समाप्त हो गया। इसके पश्चात् वे हरयाणा के मन्त्रिमण्डल में नहीं आ सके।[1]

Brief bio-data from Lok Sabha web portal

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http://164.100.47.132/LssNew/biodata_1_12/3036.htm

8th Lok Sabha Members Bioprofile


HARDWARI LAL, SHRI M.A., [Congress (I)—Haryana Rohtak, 1984] s. of Shri Nathu Ram; b. at Chhara Village, Rohtak District, September 10, 1910; ed. at Jat Heroes Memorial School, Rohtak and St. Stephen College, Delhi; D. Litt (Honoris Causa) Jabbalpur University; m. Smt. Vidyavati, December 25, 1934; 3 d.; Civil Service, Teacher, Educationist and Writer; previously associated with Swatantra Party, detained under MISA, July 1975—January 1977; President, Swatantra Party, Haryana Unit, 1968; Member, Punjab Civil Service upto 1951; Minister of Education and Planning Government of Haryana 1967; Principal, Vaish College, Bhiwani 1952-54; Founder Principal, K.M. College, Delhi; 1954-57; Vice-Chancellor, Kurukshetra University and Maharishi Dayanand University since October 27, 1977; Chairman, (i) Flood Advisory Committee Haryana, 1977-78, (ii) Cooperative Sugar Mill Panipat; Member, (i) Punjab Public Service Commission, and (ii) Standing Committee, Association of Indian Universities for 2 years; Member Council, Association of Commonwealth Universities, 1982, Founder K. M. College of Education, Bhiwani; Member, Punjab Haryana Legislative Assembly, February 1962—October, 1977.

Social activities: Founding, managing and administering educational institutions.
Favourite pastime and recreation: Walking and reading.
Special interests: Reading.
Books published: (i) "A Chief Minister Runs Amuck" (ii) "Emergence of Rough and Corrupt Politics in India—Anatomy of a Chief Minister" (iii) "Bansi Lal and His Associates" (iv) "555 days in Jail" (v) "Myth and Law of Parliamentary Privileges"; Editor, Punjab 'Sentinel' (Weekly), 1965-66.
Travels abroad: U.K., U.S.A., Canada, France, West Germany, Switzerland, Romania and Libya.
Permanent address: (1) Vice-Chancellor, Maharishi Dayanand University, Rohtak; (ii) 6/1 Roop Nagar, Delhi-110007.

‘One and a half educated men’ of Haryana

This is copy of article Posted in blog : http://irtsaforums.net/blog/?p=5071 on August 20, 2012 by admin

by Ranbir Singh

THE late Hardwari Lal, one of the leading educationists and politicians of Haryana at one time, reportedly often boasted that there were only “one and a half educated men” in the state then — one was he himself, and the half was Sarup Singh.

He based his claim on the fact that he was one of the few first class graduates of his times from St. Stephen’s College of Delhi University. That he became the Principal of Vaish College, Bhiwani, even without having a master’s degree formed another basis for his boasting. It is another matter that he acquired a first class degree in political science from Panjab University later on to fulfil the eligibility condition for heading a degree college.

Subsequently, he was also appointed the founder-Principal of Kirori Mal College, Delhi. Besides, he remained the Education Minister of Haryana in the Congress government headed by Bhagwat Dayal Sharma in 1966 and in the Samyukta Vidhayak Dal government with Rao Birender Singh as Chief Minister in 1967.

Hardwari Lal also remained the Vice-Chancellor of Kurukshetra University from 1959 to 1962 and of Maharshi Dayanand University, Rohtak, from 1977 to 1983. Furthermore, he regularly contributed articles to English dailies like The Tribune, The Indian Express, Hindustan Times and The Statesman. Also, he always wrote a booklet whenever he felt offended with the Chief Minister.

But how could he deny the claim of Dr Sarup Singh, who had not only headed Kirori Mal College as Principal but also Kurukshetra University. He (Singh) had a first class master’s degree in English from Delhi University as well as a Ph.D. degree in the same subject from London University. Moreover, he had held the offices of the Pro-Vice-Chancellor and the Vice-Chancellor in Delhi University.

If Hardwari Lal had been a member of the Punjab Public Service Commission, Sarup Singh remained that of the Union Public Service Commission. The latter also held the position of the Chancellor of the universities in Kerala, Rajasthan and Gujarat in his capacity as the Governor of those states. If Hardwari Lal had authored one outstanding book on “Myth and Law of Parliamentary Privileges” (1979), Sarup Singh had penned three well-reviewed books and contributed a large number of papers in distinguished journals.

While Hardwari Lal received recognition as an expert on law, Sarup Singh was an internationally known scholar in the field of English literature. Then, how could Hardwari Lal claim to be the only educated man of Haryana, describing Sarup Singh as a half-educated man?

The answer will have to be searched in the old District Gazette of Rohtak where a British Deputy Commissioner is reported to have recorded: “A Jat is right when he is right. He is also right when he is wrong." Let us not forget that Hardwari Lal was a Jat from Chhara village of Rohtak district in the colonial period, which is now a part of Jhajjar district.

Source Link: http://www.tribuneindia.com

ताजा समाचारों में

राज्य के डेढ़ पढे-लिखों में एक थे संत हरद्वारी लाल, वोटों के लिए उतरे थे जोहड़ में

पहली बार 1977 में बादली हलका बनकर तैयार हुआ और यहां पर चुनाव लड़ने के लिए बतौर आजाद उम्मीदवार संत हरद्वारी लाल उतरे। इससे पहले संत हरद्वारी लाल बहादुरगढ़ से तीन चुनाव लगातार लड़ते आ रहे थे। इसमें से दो चुनाव में जीते थे। जैसे ही बादली विधानसभा बनी और उनका पैतृक गांव छारा भी इसमें जोड़ा गया तो उन्होंने मन बना लिया कि यहीं से चुनाव लड़ेंगे। तब लोगों ने उन्हें चुनाव में उतरने की मनाही कर दी। लेकिन उन्होंने बच्चे की तरह जिद पकड़ ली कि वे इसी सीट से चुनाव लड़ेंगे। चुनाव से पहले वे गांव छारा के ही जोहड़ में कूद गए और बोले कि जब तक गांव वाले वोट देने का वादा नहीं करेंगे वे बाहर नहीं आएंगे। पहले राजीव के नाम और फिर देवीलाल के नाम पर वोट मांगे। संत हरद्वारी लाल के विधायक से सांसद बनने और फिर कुलपति बनने की कहानी का जिक्र उनके वकील रहे एडवोकेट बलवान सिंह सुहाग ने किया। वो बताते हैं कि जोहड़ में उतरने का असर यह हुआ कि वर्ष 1977 के विधानसभा चुनाव में उन्हें बादली हलके के लोगों ने सहयोग दिया। बादली से ही उदय सिंह दलाल उनके सामने जनता पार्टी से मात्र 387 वोटों से हारे। वहीं 1984 में कांग्रेस से चुनाव लड़ते हुए लोकसभा चुनाव में रोहतक सीट से लोकदल से उतरे सरूप सिंह को हराया। इसके बाद 1989 का चुनाव वे देवीलाल से हार गए। वहीं इससे पहले 1987 में उपचुनाव में भी जीते।

मुख्यमंत्रियों से पंगा लेना तो उनका शौक था। संयुक्त पंजाब के सी.एम. प्रताप सिंह कैरों और कामरेड रामकिशन से उनका छत्तीस का आंकड़ा था। चौ. भजनलाल से भी बनती नहीं थी। इसका कारण था कि ये उनके खिलाफ पत्र व्यवहार सरकारों में करते रहते थे। इसके चलते हरद्वारी लाल को घर पर 21 गार्ड की सुरक्षा दी गई थी। पहली बार चौ. भजन लाल ने इनके खिलाफ तीन इस्तगासा डलवाए और मेरे मार्फत ही इन्हें कोर्ट से जमानत मिली। देवीलाल के खिलाफ भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखा था। तीनों लालों की बही लिखने का दरअसल हरद्वारी लाल ने ही किया था।

एम.डी.यू. रोहतक में बतौर कुलपति हरद्वारी लाल छात्रों के बीच

जब प्रदेश में थे डेढ़ पढ़े लिखे दो ही लोग

एडवोकेट सुहाग बताते हैं कि जब प्रदेश में पढ़े लिखे दो ही लोग माने जाते थे, इसमें पहले संत हरद्वारी लाल खुद को पूरा एक और डॉ. स्वरूप सिंह को आधा पढ़ा-लिखा कहते थे। डॉ. हरद्वारी जब दिल्ली के किरोड़ी मल कॉलेज में प्रिंसीपल थे, तब डॉ. स्वरूप सिंह वहां स्टूडेंट थे। बड़ा होने के चलते हरद्वारी लाल खुद को पूरा पढ़ा-लिखा बोला करते और डॉ. स्वरूप को आधा। वे एक मात्र ऐसे प्रिंसिपल थे जो बिना एम.ए. किए प्रिंसिपल लगे। पहले वैश्य कॉलेज रोहतक और फिर किरोड़ीमल कॉलेज दिल्ली में। सात साल एम.डी.यू. के कुलपति भी रहे।

सबसे कम अंतराल से जीतने का रिकॉर्ड

विधानसभा चुनाव में सबसे कम अंतराल से जीतने का बहादुरगढ़ से 395 और बादली हलके से 387 वोट का रिकॉर्ड आज भी हरद्वारी लाल के नाम है। गृहस्थ जीवन जीने के बाद पारिवारिक कारणों के चलते संन्यास धारण कर लिया था। सबसे पहले 1967 में निर्दलीय मैदान में उतरे और हरिसिंह को 13011 वोटों के अंतराल से हराया। राव बीरेंद्र की सरकार में शिक्षा मंत्री बने। 1968 में स्वतंत्र पार्टी से चुनाव लड़े और कांग्रेस के प्रताप सिंह से 4435 वोटों से मात खाई। फिर 1972 में फिर बहादुरगढ़ से चुनाव में उतरे और जीते । (दैनिक भास्कर, रोहतक - दिनांक 16 अप्रैल 2019)

External Links

References


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