Harivarsha

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Author:Laxman Burdak, IFS (R)

Harivarsha (हरिवर्ष) is name of a country mentioned in Mahabharata [1]. It has been identified with Europe.[2]

In Mahabharata

Harivarsha (हरिवर्ष) is mentioned in Mahabharata (II.25.7), (VI.11.2), (VI.11.14),


Sabha Parva, Mahabharata/Book II Chapter 25 mentions Harivarsha in shloka 7. [3] It mentions that the Pandavas crossing the White mountains, subjugated the country of the Kimpurushas....At last the son of the slayer of Paka, arriving in the country of North Harivarsha desired to conquer it. ...It was inhabited by Northen Kurus.


Bhisma Parva, Mahabharata/Book VI Chapter 11 mentions about Bharatavarsha, Himavat-varsha & Hari-varsha. Harivarsha (हरिवर्ष) is mentioned in Mahabharata (VI.11.2)[4]...."Dhritarashtra said,--'Tell me, O Sanjaya, of the period of life, the strength, the good and bad things, the future, past and present, of the residents, O Suta, of this Varsha of Bharata, and of the Himavat-varsha, as also of Hari-varsha, in detail."

Harivarsha (हरिवर्ष) is mentioned in Mahabharata (VI.11.14). [5]....The Varsha known as Himavat is superior to Bharatavarsha, while Harivarsha is superior to Himavatvarsha, in respect of all qualities.'

Details of how Arjuna arrives Harivarsha

Sabha Parva, Mahabharata/Book II Chapter 25 mentions that the Pandavas crossing the White mountains, subjugated the country of the Kimpurushas ruled by Darumaputra, after a collision involving a great slaughter of Kshatriyas, and brought the region under his complete sway.

Having reduced that country, the son of Indra (Arjuna) with a collected mind marched at the head of his troops to the country called Hataka, ruled by the Guhyakas.

Subjugating them by a policy of conciliation, the Kuru prince beheld (in that region) that excellent of lakes called Manasa and various other lakes and tanks sacred to the Rishis. And the exalted prince having arrived at the lake Manasa conquered the regions ruled by the Gandharvas that lay around the Hataka territories. Here the conqueror took, as tribute from the country, numerous excellent horses called Tittiri, Kalmasha, Manduka.

At last the son of the slayer of Paka, arriving in the country of North Harivarsha desired to conquer it. Thereupon certain frontier-guards of huge bodies and endued with great strength and energy, coming to him with gallant hearts, said to Arjuna that -

"This country can be never conquered by you. They advised him to return. Who ever enters this region, if human, is sure to perish. Your conquests have been enough. Nor is anything to be seen here that may be conquered by you. The Northern Kurus live here. There cannot be war here. Even if you enter it, you will not be able to behold anything, for with human eyes nothing can be seen here. If, however you want anything else, tell us, so that we may do thy bidding".

Thus addressed by them, Arjuna smilingly addressing them, said,--'I desire the acquisition of the imperial dignity by Yudhishthira the just, of great intelligence. If your land is shut against human beings, I shall not enter it. Let something be paid unto Yudhishthira by you as tribute. Hearing these words of Arjuna, they gave him as tribute many cloths and ornaments of celestial make, silks of celestial texture and skins of celestial origin.

It was thus that Arjuna subjugated the countries that lay to the North, having fought numberless battles with both Kshatriya and robber tribes. And having vanquished the chiefs and brought them under his sway he exacted from them much wealth, various gems and jewels, the horses of the species called Tittiri and Kalmasha, as also those of the colour of the parrot's wings and those that were like the peacocks in hue and all endued with the speed of the wind. And surrounded, by a large army consisting of the four kinds of forces, the hero came back to the excellent city of Sakraprastha. And Partha offered the whole of that wealth, together with the animals he had brought, unto Yudhishthira the just. And commanded by the monarch, the hero retired to a chamber of the palace for rest."

निषध पर्वत

विजयेन्द्र कुमार माथुर[6] ने लेख किया है ...2. निषध पर्वत (AS, p.503): महाभारत के वर्णनानुसार हेमकूट पर्वत के उत्तर की ओर सहस्रों योजनों तक निषद पर्वत की श्रेणी पूर्व पश्चिम समुद्र तक फैली हुई है- 'हिमवान् हेमकूटश्च निषधश्च नगोत्तम:' भीष्मपर्व 6,4. श्री चि.वि. वैद्य का अनुमान है कि यह पर्वत वर्तमान अलताई पर्वत श्रेणी का ही प्राचीन भारतीय नाम है। हेमकूट और निषध पर्वत के बीच के भाग का नाम 'हरिवर्ष' कहा गया है। महाभारत के वर्णन में निषद पर नाग जाति का निवास माना गया है- 'सर्पानागाश्च निषधे गोकर्ण च तपोवनम्' भीष्मपर्व 6, 51. विष्णु पुराण 22,10 में भी इस पर्वत का उल्लेख हुआ है- 'हिमवान् हेमकूटश्च निषधश्चास्य दक्षिणे' इसी को विष्णु 22,27 में निषद भी कहा गया है.

प्राचीनकाल में यूरोप देश

दलीप सिंह अहलावत[7] लिखते हैं: यूरोप देश - इस देश को प्राचीनकाल में कारुपथ तथा अङ्गदियापुरी कहते थे, जिसको श्रीमान् महाराज रामचन्द्र जी के आज्ञानुसार लक्ष्मण जी ने एक वर्ष यूरोप में रहकर अपने ज्येष्ठ पुत्र अंगद के लिए आबाद किया था जो कि द्वापर में हरिवर्ष तथा अंगदेश और अब हंगरी आदि नामों से प्रसिद्ध है। अंगदियापुरी के दक्षिणी भाग में रूम सागर और अटलांटिक सागर के किनारे-किनारे अफ्रीका निवासी हब्शी आदि राक्षस जातियों के आक्रमण रोकने के लिए लक्ष्मण जी ने वीर सैनिकों की छावनियां आवर्त्त कीं। जिसको अब ऑस्ट्रिया कहते हैं। उत्तरी भाग में ब्रह्मपुरी बसाई जिसको अब जर्मनी कहते हैं। दोनों भागों के मध्य लक्ष्मण जी ने अपना हैडक्वार्टर बनाया जिसको अब लक्षमबर्ग कहते हैं। उसी के पास श्री रामचन्द्र जी के खानदानी नाम नारायण से नारायण मंडी आबाद हुई जिसको अब नॉरमण्डी कहते हैं। नॉरमण्डी के निकट एक दूसरे से मिले हुए द्वीप अंगलेशी नाम से आवर्त्त हुए जिसको पहले ऐंग्लेसी कहते थे और अब इंग्लैण्ड कहते हैं।

द्वापर के अन्त में अंगदियापुरी देश, अंगदेश के नाम से प्रसिद्ध हुआ, जिसका राज्य सम्राट् दुर्योधन ने अपने मित्र राजा कर्ण को दे दिया था। करीब-करीब यूरोप के समस्त देशों का राज्य शासन आज तक महात्मा अंगद के उत्तराधिकारी अंगवंशीय तथा अंगलेशों के हाथ में है, जो कि ऐंग्लो, एंग्लोसेक्शन, ऐंग्लेसी, इंगलिश, इंगेरियन्स आदि नामों से प्रसिद्ध है और जर्मनी में आज तक संस्कृत भाषा का आदर तथा वेदों के स्वाध्याय का प्रचार है। (पृ० 1-3)।

यूरोप अपभ्रंश है युवरोप का। युव-युवराज, रोप-आरोप किया हुआ। तात्पर्य है उस देश से, जो लक्ष्मण जी के ज्येष्ठपुत्र अङ्गद के लिए आवर्त्त किया गया था। यूरोप के निवासी यूरोपियन्स कहलाते हैं। यूरोपियन्स बहुवचन है यूरोपियन का। यूरोपियन विशेषण है यूरोपी का। यूरोपी अपभ्रंश है युवरोपी का। तात्पर्य है उन लोगों से जो यूरोप देश में युवराज अङ्गद के साथ भेजे और बसाए गये थे। (पृ० 4)

कारुपथ यौगिक शब्द है कारु + पथ का। कारु = कारो, पथ = रास्ता। तात्पर्य है उस देश से जो भूमध्य रेखा से बहुत दूर कार्पेथियन पर्वत (Carpathian Mts.) के चारों ओर ऑस्ट्रिया, हंगरी, जर्मनी, इंग्लैण्ड, लक्षमबर्ग, नॉरमण्डी आदि नामों से फैला हुआ है। जैसे एशिया में हिमालय पर्वतमाला है, इसी तरह यूरोप में कार्पेथियन पर्वतमाला है।

इससे सिद्ध हुआ कि श्री रामचन्द्र जी के समय तक वीरान यूरोप देश कारुपथ देश कहलाता था। उसके आबाद करने पर युवरोप, अङ्गदियापुरी तथा अङ्गदेश के नाम से प्रसिद्ध हुआ और ग्रेट ब्रिटेन, आयरलैण्ड, ऑस्ट्रिया, हंगरी, जर्मनी, लक्षमबर्ग, नॉरमण्डी, फ्रांस, बेल्जियम, हालैण्ड, डेनमार्क, स्विट्जरलैंड, इटली, पोलैंड आदि अङ्गदियापुरी के प्रान्तमात्र महात्मा अङ्गद के क्षेत्र शासन के आधारी किये गये थे। (पृ० 4-5)

नोट - महाभारतकाल में यूरोप को ‘हरिवर्ष’ कहते हैं। हरि कहते हैं बन्दर को। उस देश में अब भी रक्तमुख अर्थात् वानर के समान भूरे नेत्र वाले होते हैं। ‘यूरोप’ को संस्कृत में ‘हरिवर्ष’ कहते थे। [8]

External links

References

  1. (II.25.7)
  2. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Chapter IV,p.340
  3. उत्तरं हरिवर्षं तु समासाथ्य स पाण्डवः इयेष जेतुं तं थेशं पाकशासननन्थनः (II.25.7)
  4. अनागतम अतिक्रान्तं वर्तमानं च संजय, आचक्ष्व मे विस्तरेण हरिवर्षं तथैव च (VI.11.2)
  5. संक्षेपॊ वर्तते राजन दवापरे ऽसमिन नराधिप, गुणॊत्तरं हैमवतं हरिवर्षं ततः परम (VI.11.14)
  6. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.503
  7. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Chapter IV,p.339-340
  8. (सत्यार्थप्रकाश दशम समुल्लास पृ० 173)