Jajau

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Jajau (जाजो/जाजऊ) is a village of in Kheragarh tahsil of Agra district in Uttar Pradesh.

Jat Gotras

Population

Total population : 2943
(Males: 1591, Females: 1352)
(according to statistical data of Census 2011)[1]

History

The battle of Jajau and rise of Churaman

Aurangzeb died in 1707. Taking advantage of the weakness of Mughal rule Churaman planned to expand his state. His rise started from the battle of Jajau in 1707. After the war was over he looted both armies of Azam as well as Muazzam. Churaman showed wisdom and decided to be honest to the New Mughal ruler with a view to protect huge wealth of booty, he appeared before Bahadurshah on 15 September 1707 and presented gifts in his honour.

In January 1709 Churaman entered into an agreement with Jai Singh, looking to the possibilities of victory of Rajputs in the battles of Sambhar and Kaman and Bahadurshah’s intention to arrive at compromise with them. Under the garb of agreement Churaman intensified his campaign to abolish Rajput Zamindaris and capturing back the Jat areas occupied by Kachwahas. He succeeded in getting back Sogar, Bhusawar, Kaman, Khohari, Kot, Khunthare, Ithera, Jadila and Chaugdara.

In 1710 Churaman joined Bahdurshah in his campaign against Sikhs. He took part in the battles of Sadhaura and Lohagarh and went up to Lahore with Bahadurshah. Then Churaman was excused unconditionally and he returned to his old Mansab.

After the death of Bahadurshah his son Jahandarshah became the successor. In 1713 when there was a war between Jahandarshah and Farrukhsiyar, Churaman looted both during the course of this succession war. This way he got a lot of wealth in booty. Similarly he captured elephants of the Royal army during the battle of Hasanpur.

दलीप सिंह अहलावत लिखते हैं

सम्राट् औरंगजेब की मृत्यु (फरवरी 20, 1707 ई०) होने पर उसके अयोग्य पुत्रों के मध्य उत्तराधिकार के लिए युद्ध हुआ जिसमें अवसरवादी चूड़ामन ने विजेता का ही पक्ष लिया। यह निर्णायक युद्ध औरंगजेब के दो पुत्रों आजम और मुअज्ज़्म ‘शाह आलम प्रथम’ के मध्य, जून 8, 1707 ई० को जाट इलाके में, आगरा के दक्षिण में 20 मील पर जाजो के स्थान में हुआ। इस समय चूड़ामन अपने वीर सैनिकों के साथ युद्ध का रुख देखता रहा और आक्रमण के लिए मौके की तलाश करता रहा। पहले उसने मुअज्जम के कैम्प को लूटा। जब उसने देखा कि आजम हारने लगा है तब मौके का फायदा उठाकर वह भी आजम पर टूट पड़ा और उसके कैम्प को भी लूट लिया। इस लूट के फलस्वरूप चूड़ामन बहुत धनी बन गया। मुग़लों की नकदी, सोना-चांदी, अमूल्य रत्नजड़ित आभूषण, शस्त्रास्त्र, घोड़े, हाथी और रसद उसके हाथ लगे। इस धन के कारण वह जीवन भर आर्थिक चिन्ताओं से बिलकुल मुक्त रहा। इस बारे में कोई सन्देह नहीं कि इस विपुल सम्पत्ति का कुछ भाग सन् 1721 ई० में चूड़ामन की आत्महत्या के पश्चात् ठाकुर बदनसिंह और महाराजा सूरजमल के खजाने में भी पहुंचा। अब चूड़ामन अपने सैनिकों को वेतन दे सकता था, अपने विरोधियों को धन देकर अपने पक्ष में कर सकता था और आवश्यकतानुसार किले बनवा सकता था, थून का दुर्ग इसी धन से बनवाया और सुसज्जित किया गया। जाजो के युद्ध में जाट सिनसिनवारों ने जो सहायता दी थी, उसके उपलक्ष्य में उन्हें भी विजयी सम्राट् बहादुरशाह ने इनाम दिये। [2]

Notable persons

External links

References


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