Jat History Thakur Deshraj/Parishisht

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जाट इतिहास
लेखक: ठाकुर देशराज
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परिशिष्ट : शिलालेख, राज-प्रासाद

जाट-राज्य पूर्ण वैभव-संपन्न

जाट-राज्य पूर्ण वैभव-संपन्न और समृद्धिशाली हुआ करते थे। वे किसी देश को जीत भी लेते तो उसकी सभ्यता को नष्ट नहीं करते थे। उनमें एक आदत ऐसी भी थी जिससे उनका गौरव आज नष्ट-प्रायः हो गया। वे कहते थे कि शुभ कृत्य ही स्मृति के लिए पर्याप्त है, स्मारक-स्तूप आदि बनाने की क्या आवश्यकता है? यही कारण है कि उनमें से बहुत कम ने यह चेष्टा की कोई अपना निशान खड़ा कर दें।

  • यूरोप में उन्होंने एक स्तूप रायन नदी के किनारे खड़ा किया था।
  • भारत में भी बयाने में राजा विष्णुवर्द्धन का एक जय-स्तंभ है जो भीम की लाठ के नाम से मशहूर है।
  • राजस्थान में उनके खुदाये हुए बहुत से तालाब और कुऐं हैं।
  • अलवर में महाराज सूरजमल के समय के बनवाये हुए तालाब हैं। वे सूरजकुण्ड, डुंडिया और चांदपोल के नाम से मशहूर हैं। इनका परिमाण इस प्रकार है - सूरजकुण्ड 80 गज लम्बा, 36 गज चौड़ा और 15 गज गहरा है। डूंडिया 62 गज लम्बा, 32 गज चौड़ा, 6 गज गहरा है। चांदपोल 27 गज लम्बा, 25 गज चौड़ा ओर 11 गज गहरा है। दो महल भी अलवर में महाराज सूरजमल के बनवाये हुए हैं जो सूरज-महल के नाम से मशहूर हैं। उनमें एक जनाना महल है। किले के दरवाजों के नाम महाराज सूरजमल ने बदल दिये थे जो अब तक सूरजपोल और रामपालपोल के नाम से मशहूर हैं। ऐसा कहा जाता है कि अलवर के किले में महाराज सूरजमल का एक खजाना भी था, किन्तु विश्वास नहीं होता।1

1. मुरक्कए अलवर। सफा 84-85

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वहां के पंडा बतलाते हैं कि इसे लाहौर के महाराज रणजीतसिंह ने एक लाख रुपया दान दिया था।
  • अमृतसर के लिए भी उन्होंने लाखों रुपये दान दिए थे।
  • देरावल में जाट-राज्य के समय के राज-महलों के कुछ खंडहर अब तक पाये जाते हैं। ‘वाक्य राजपूताना’ के लेखक ने लिखा है कि शालिवाहन से विताड़ित होकर जाट लोग देरावल में आकर राज करने लग गए थे। रंगमहल के पास भी उनके राजभवनों के चिन्ह मिलते हैं।1
  • जोधपुर राज्य में जाटों के अनेक शिलालेख और तालाब हैं।
  • महाराज कनिष्क की मूर्ति इस समय लखनऊ म्यूजियम में रखी हुई है जो पांच फीट के लगभग ऊंची है किन्तु सिर कटा हुआ है। घुटनों से नीचे तक अंगरखा, हाथ में गदा जैसा हथियार है। किन्तु शायद गदा नहीं है। मूर्ति विशाल पुरुष की जैसी है।2
  • किशनगढ़ में अगम जाट का एक कूप है जिसका वर्णन पं. जयरामजी वैद्य ने जाटवीर के लेखों में किया था।
  • इटावा और कानपुर के मध्य में एक शहर फफूंद है। उसमें जाट नरेश भागमल के, जो कि महाराज सूरजमल के समकालीन थे किले के चिन्ह मिलते हैं। एक मसजिद के पत्थर में जो कि उन्होंने मुसलमानों की प्रार्थना पर बनवाई होगी, उनका नाम खुदा हुआ है।3राजा भागमल शायद मीठे गोत के जाट थे।
  • सिन्ध में मोहन-जो-दड़ो की खुदाई में कुछ मोहरें ऐसी निकली हैं जिन पर शिव देवता के उपासक जाट लोगों के देवता का नाम अंकित है।
  • पुष्कर में महाराज जवाहरसिंह का जवाहर-घाट बना हुआ है। साथ ही मकानात भी हैं। वहां जाटों का एक मन्दिर है।
  • आगरा और शिमला में कोठियां हैं। शिमला की कोठी व्रजेन्द्र-मण्डल कहलाती है।
  • पंजाब में जहां भी देखिए जाट-साम्राज्यों का वैभव दिखाई देगा।

1. वाकए राजपूताना, जिल्द दोयम।
2. इस प्रस्तर मूर्ति को हमने स्वयं म्यूजियम में जाकर देखा है। (लेखक)
3. यू.पी. के जाट नामक पुस्तक से।

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  • मथुरा मेमायर्स के पढ़ने से मालूम होता है कि नोहवार जाटों ने नोह झील को खुदवाया था।
  • बिलोचिस्तान में हिंगलाज नाम की देवी का मन्दिर जाटों का बनवाया हुआ है जिसे कि एक कन्या के रूप में मानते थे।
  • कप्तान एबट को उदयान के निकट पूर्व समय में ऐसे चिन्ह मिले थे जो कि वहां के यज्ञ-प्रेमी जाटों के ही कहे जा सकते हैं।
  • पण्डित जयराम ने अपने जीवन-काल में जाट जाति के कुछ समृद्धि चिन्हों का पता लगाया था और जाटवीर के द्वारा उन्होंने अपनी खोज में पाये हुए शिलालेखों और सिक्कों के सम्बन्ध में लेख भी लिखे थे। उन्हीं लेखों का सार हम यहां देते हैं।

जेवल्या की छतरी: नराना गांव

किशनगढ़ में तीन छतरियां हमने देखीं - दो राजपूतों की और एक तीसरे वंश की छतरी देखी गई। यह छतरी बहुत ही पुरानी है और जेवल्या गोत के जाट सरदार की है। इसके पच्छिम-दक्षिण की ओर एक बड़ा भारी कीर्ति-स्तम्भ खड़ा है। इस पत्थर में मनुष्य की मूर्ति खुदी हुई है और संबत 1111 का लेख खुदा हुआ है। यह शिलालेख बहुत ही पुराना होने से घिस गया है इसलिए समूचा लेख साफ-साफ पढ़ने में नहीं आता। दूसरे दो राज-वंशों की छतरियों के पास ऐसे अक्षय पुण्यदान के चिन्ह देखने में नहीं आते जैसे जाट की छतरी के पास देखने में आ रहे हैं। छतरी से करीब दस हाथ उत्तर की ओर गौओं की प्यास के लिए कुआं बनाया गया है। इस कुएं की चुनाई अपनी प्राचीनता को बता रही है। पत्थरों को काटकर पूठियां खड़ी हुई हैं। जैसे गाड़ी के पहियों की पूठियां होती हैं, वैसी पूठियों को जोड़कर कुआं चुनाया गया है। इसलिए इस कुएं की मजबूती ऐसी है कि हजारों वर्ष तक रह सकता है। कुएं के पास गौओं को जल पीने के लिए खेली बनाई गई है। खेली की कारीगरी भी देखने योग्य है। पांच-पांच हाथ लम्बी और तीन-तीन हाथ चौड़ी पत्थर की शिलाओं को जमीन में गाड़कर खेली बांधी गई है, जिससे पत्थर की मरम्मत का सैकड़ों वर्षों तक भी काम न पड़ सके। लोगों से सुना गया है कि जिस जाट की कीर्ति को चिरकाल तक स्मरण रखने के लिए कुआं और छतरी बनाये थे, उसी महापुरुष का बनाया हुआ, उसकी छतरी के पश्चिम की ओर एक तालाब है जो गौओं के जल पीने के लिए खुदवाकर बनाया गया था। यह तालाब बड़ा भारी है। लगभग पचास बीघें में होगा। जाटों के खोजने से


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थोड़े बहुत जो प्राचीन इतिहास के चिन्ह मिलते हैं वे प्रमाद, अत्याचार और दूसरों की बुराई के कभी नहीं मिलते। किन्तु संसार की भलाई, परोपकार, गोचर भूमि-दान, तालाब, कुआं और निर्बल की रक्षा करने के लिए वीरता, ये ही चिन्ह प्राचीन जाटवीरों के इतिहासों में मिलते हैं। नराना गांव के नीचे अठारह हजार बीघे जमीन है। अन्दाजन छः हजार बीघे जमीन जोती जाती है और करीब बारह हजार बीघों में गायें चरती है। इस गांव में गाय और भैंसों का झुंड देखकर सतयुग याद आता है। हर एक आदमी के घर में दूध दही के भण्डार भरे ही रहते हैं।

राजपूताने में जाटों के राज्यों के बाद कई राजवंशों के राज्य हो गए हैं। इसलिए जाटों के इतिहास खोजने के लिए सहसा कोई खड़ा नहीं होता। लोगों को ऐसा विश्वास नहीं होता कि राजपूताने में जाट सदा से हल जोतकर दूसरों को खिलाने वाले ही नहीं थे किन्तु जाट ही भूमिपति थे और अपनी भूमि की मालगुजारी जाट दूसरों से लेते थे।

महादानी भक्त चौधरी हर्षराम: आकोदा

बहुत दिनों से सुनते आए हैं कि रियासत जोधपुर के आकोदा गांव में एक कुआं है। वह राजा सगर का बनाया हुआ सतयुग का है और जब तक पृथ्वी आकाश रहेंगे तब तक यह कुआं भी रहेगा। कोई कहता है कि कुआं देवताओं का बनाया हुआ है क्योकि ऐसे कुएं बनाने में मनुष्य की शक्ति काम नहीं कर सकती। इस कुएं को बनाने वाले हमारी ही जाट जाति के एक महान पुरुष थे। विक्रम संबत् 1000 के आरम्भ में हर्षरामजी नाम के एक बड़े भारी दानी ईश्वर भक्त फगोड़चा गोत्र के जाट भूमिपति हो गए हैं। यह प्रान्त जो चौरासी कहलाता है (जिसमें 84 गांव हैं) इन्हीं के शासन में था। सिवाय दिल्ली-पति सम्राट के ये दूसरे किसी को खिराज नहीं देते थे। करीब एक हजार वर्ष हुए इन्होंने अकोदा गांव बसाया था और गांव के उत्तर की तरफ 525 बीघे बीड़े के नाम से गोचर भूमि छोड़ी थी जिसमें दो तालाब हैं। यह बीड़ अभी तक मौजूद है जो फगोड़चा का बीड़ कहलाता है। इसी महापुरुष का बनाया हुआ अकोंदा का कुआं है जिसको देखकर यही कहना पड़ता है कि संसार में सात चीज आश्चर्य की बताते हैं यदि आठवीं चीज इस कुएं को भी मान लिया जाए तो भी अत्युक्ति नहीं समझनी चाहिए। चार-चार हाथ लम्बाई में, दस-दस हाथ भीतर पोल की गहराई में ढोलों की नाल का रद्दा एक हाथ चौड़ा है। आकार में समझ लीजिए पोल बांस की भोगली (नाल) वा चाम से बिना मंढा हुआ पोला ढोल दोनों तरफ खुला हुआ मुंह का, इस तरह से पत्थर के 16 ढोल बनाकर पानी के पैंदे से लेकर ऊपर तक कच्चे कुएं के बीच बैठा दिए गए हैं। जैसे चूड़ी पर चूड़ी रखने से चूड़ा बन जाता है वैसे ही ऊपर-ऊपर 16 ढोलों को रखने से 64 हाथ लम्बी कुएं की नाल बन गई है।


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इन ढोलों का रंग लाल है। इससे अनुमान किया जाता है कि ये पत्थर खाटू के पहाड़ के हैं। इस कुएं से खाटू बारह कोस है। अचम्भे की बात यह है कि यदि खाटू से पत्थर लाकर अकोदा में ढोल बनाए गए हों तो एक-एक पत्थर में एक-एक हजार मन भार होगा इतने भारी पत्थर कैसे लाए गए और यदि खाटू में ही पत्थरों को भीतर से खुदवाकर बने बनाए, ढोल मंगवाए हो तो भी एक-एक ढोल में चार सौ मन से कम बोझा न होगा। ये भी कैसे लाए गए और इतने भारी ढोल कुएं में ऊपर नीचे कैसे जचाए गए। एक मन आध मन के तो पत्थर थे ही नहीं जो हाथों में रख दिए जाते। इतने भारी ढोल बराबर की मोटाई में कैसे काटे गए? किस औजार से ये ढोल 64 हाथ गहरे कुएं में पहुंचाए गए? गांव के राजपूत ठाकुर, वेश्य, जाट आदि को हमने इस कुएं की जांच के लिए पूछ-ताछ की। राजपूत तो बोले कि इस कुएं को राजा सगर ने बनाया था। बहुत काल के बाद यह कुआं जमीन में गड़ गया था और बहुत काल तक जमीन में ही गड़ा रहा। संबत् 1000 के आरम्भ में हर्षराम चौधरी से देवी प्रसन्न होकर बोली कि हे ईश्वर भक्त, गो सेवक, धर्म-मूर्ति महादानी चौ. हर्षराम! मैं तुम से बहुत प्रसन्न होकर आज्ञा देती हूं कि तू यहां गांव बसा और इस जगह राजा सागर का बनाया हुआ कुआं है इसको खुदवाकर जमीन से निकलवा ले। चौधरी हर्षराम ने जमीन खुदवाकर कुएं को ठीक किया। इस प्रकार की अनेक दन्त-कथाएं हैं। चौ. गंगाराम ने बताया कि हमारे पुरखा हर्षराम ने स्वयं इस कुएं को बनाया था। न तो देवी ने बताया और न राजा सगर या देवताओं का बनाया हुआ है। फिर लोगों में विवाद हुआ कि हर्षराम मनुष्य होकर ऐसा कुआं कैसे बना सकते थे? चौ. गंगारामजी ने कहा कि हमारे यहां कोई सौ वर्ष पहले की लिखी हुई पोथी मौजूद है जिसमें लिखा है कि चौधरी हर्षराम ने इस कुएं को खुद बनवाया था और इसका पूरा-पूरा विवरण कुएं के भीतर के ढोल में शिलालेख है उसको देख लें। भाट की पुस्तक को सब पंचों ने सही मानकर महापुरुष हर्षराम के पुरुषार्थ को याद करके सभी लोग आश्चर्य में मग्न हो गए।

एक हजार वर्ष पहले जाट जाति में कैसी विद्या और पुरुषार्थ था कि जाटों के बनाए हुए कुओं को लोग देवताओं के बनाए बतलाते हैं क्योंकि लोगों की बुद्धि में नहीं जंचता कि मनुष्य होकर ऐसे कुएं बना सकते । लोगों का विचार ठीक ही है क्योंकि उस समय की जाट जाति में इतनी विद्या थी तभी इस जाति का गौरव सूर्य आकाश में तपा था। यदि आजकल के बड़े भारी इंजीनियर भी इस कुएं को देखें तो उनको भी आश्चर्य हुए बिना न रहे। यदि भारतवर्ष के प्राचीन शिल्पविद्या की मूर्ति का नमूना देखना हो तो चौ. हर्षराम के बनाए हुए हजार वर्ष के पुराने कुएं के दर्शन कर जाइए। यह जाट जाति के ही गौरव की चीज नहीं है वरन् हिन्दू जाति की प्राचीन विद्या के नमूना दिखने के लिए चौ. हर्षराम का


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कुआं आदर्श वस्तु है। जिस जाति में अपने महापुरखाओं के इतिहास जब तक बने रहेंगे, तब तक वह जाति अमर रहेगी और जो जाति अपने महापुरखाओं के इतिहासों की कदर करेगी वह दीन-हीन दशा भोगकर भी फिर उन्नति के शिखर पर चढ़ेगी, क्योंकि गिरी हुई जाति को उठाने वाला अपने पुरखाओं का इतिहास ही है। महादानी राजर्षि हर्षराम की संक्षिप्त जीवनी जाति को समर्पण करके मैं अपना अहोभाग्य मानता हूं।

उगम जाट कीर्ति-स्तम्भ: भादवा गांव

राज्य श्री जयपुर के सांभर प्रान्त में करड़ और काकरा नाम के ग्रामों में 800 वर्ष के पुराने जो जादू के मन्दिर कहलाते हैं वे जाट भूमिपति के बनाए हुए हैं। इन मन्दिरों से तीन कोस दक्षिण की ओर भादवा गांव है। यहां एक बहुत पुरानी बावड़ी और एक कुआं है। बड़ी-बड़ी पत्थरों की शिलाओं को घड़कर पूठियों को जोड़-जोड़कर कुएं की नाल बनाई गई है। इस कुएं की मजबूती, सुन्दरता और प्राचीन शिल्प प्रशंसनीय है। इस कुएं से उत्तर की ओर एक बड़ा भारी नील पत्थर कीर्ति-स्तम्भ खड़ा है। कीर्ति-स्तम्भ के दक्षिण भाग में घुड़सवार सामने खड़े हुए दुश्मन पर दाहिने हाथ से तलवार का वार करते हुए वीर उगम जाट बाएं हाथ से घोड़े की लगान खींचे हुए अपनी इतिहास प्रसिद्ध जाति की स्वाभाविक वीरता दिखला रहे हैं। एक शत्रु कटा हुआ घोड़े के पैरों में पड़ा है और दूसरे के सिर के ऊपर उगम वीर की तलवार का वार हो रहा है। कीर्ति-स्तम्भ के उत्तर भाग में ऊपर शंख, चक्र, गदा, पद्म धारे हुए मस्तक पर मुकुट से सुशोभित भगवान कृष्णचन्द खड़े हैं। उनके चरणों के नीचे ऐसा शिलालेख खुदा हुआ है -

उगम जाट भादवा का सं. 1116 वि. आषाढ़ सुदी 9 मंगलवार।

यह अनुमान अच्छी तरह से किया जा सकता है कि उगम जाट कोई साधारण मनुष्य नहीं था। क्योंकि कई हजार रुपयों की लागत का कुआं और बावड़ी जिसने बनवाकर राजाओं के तुल्य अपना नाम चिरस्मरण रखने के लिए ऐसा विशाल कीति-स्तम्भ खड़ा किया था वह अवश्य कोई बड़ा भारी रईस था। और जो इतिहास लेखक भूल से लिख गए हैं कि वर्तमान देवनागरी अक्षर चार-पांच सौ वर्षों से प्रचलित हुए हैं यह लोगों का झूठा विश्वास नराना गांव के सं. 1111 के जेबल्या जाट के कीर्ति-स्तम्भ से अकोदा के हर्षराम चौ. के सं. 1000 के लेख से, और भादवा के उगम जाट के सं. 1116 के कीर्ति-स्तम्भ की नागरी लिपि और हिन्दी भाषा से, खंडित हो जाना चाहिए और जानना चाहिए कि एक हजार वर्ष पहले राजपूताने में नागरी लिपि और हिन्दी भाषा प्रचलित थीं और राजपूताने में बड़े भारी बुद्धिमान बसते थे। और यह भी जाना जाता है कि विक्रम संवत् 1111, और सं. 1116 में राजपूताने के जाटों की कीर्ति, गौरव, स्वतंत्रता, वीरता - ये सब उनके पास मौजूद थीं।


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जाट सिक्के

राज्य किशनगढ़ के स्थान निराने से हमको 4 सिक्के मिले हैं। तीन सिक्के चांदी और तांबा के मेल के हैं। एक सिक्का सोने का है। (यह आठ माशे की मोहर है)। एक हजार वर्ष के बाद के पुराने जितने सिक्के राजपूताने में मिले हैं उन सब सिक्कों से ये सिक्के पुराने मालूम होते हैं। सं. 1111 का जो जेवल्या गोत के जाट की छतरी से पश्चिम की ओर घिसा हुआ कीर्ति-स्तम्भ है उस कीर्ति-स्तम्भ के पास दो वर्ष पहले एक गूजर जमीन खोद रहा था। उसकी जमीन में मिट्टी के दो ढकनों के बीच ये सिक्के मिले थे। सोने की मोहर में एक ओर मनुष्य की मूर्ति है । इसके बाएं हाथ में धनुष है और दाहिने हाथ में तीर है। मोहर के दूसरी ओर अग्निकुण्ड है जिसमें से अग्नि की झलें निकल रही हैं और झलों के बीच एक मूर्ति दिख रही है। इस दृश्य से साफ-साफ अनुमान किया जाता है कि एक हजार वर्ष पहले जाटों का मुख्य धर्म अग्नि-पूजा (यज्ञ-हवन) करना था। संबत् 1111 की बनी हुई जाट की छतरी, 50 बीघों में इसका बनाया हुआ तालाब, कुआं, कीर्ति-स्तम्भ इतने जाट चिन्हों के पास यह मोहर मिली है। इससे अनुमान किया जाता है कि रईस जाट दसवीं शताब्दी के पहले इसके वंश मे कोई बड़ा भारी राजा हुआ था जिसकी यह मोहर और सिक्का है। राजा की मूर्ति के दाहिने और छड़ी (राज दण्ड) खड़ी है। इस मूर्ति के मस्तक के बराबर द्वितीया के चन्द्रमा की मूर्ति का अभिप्राय यह है कि यदि पूर्ण चन्द्रमा की मूर्ति रखते तो चन्द्र और सूर्य की पहचान होना कठिन हो जाता। दसवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक के जाट वीरों की पाषाण मूर्तियां घुड़सवार हाथ में भाला या तलवार लिए हुए हैं। पर मोहर वाली मूर्ति दसवीं शताब्दी से पुरानी होने से इसके हाथों में धनुष बाण है। इन पाषाण मूर्तियों में वीर क्षत्रियों के चिन्ह होने से जाना जाता है कि बारहवीं शताब्दी तक जाट जाति अपने को वीर क्षत्रिय जाति मानती चली आई है और इनकी पाषाण मूर्ति या सिक्कों में चन्द्रमा की मूर्ति अवश्य होने से जाट जाति अपने को चन्द्रवंशी यादव क्षत्रिय मानने में किसी भी तरह सन्देह नहीं कर सकती।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-729

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची (ग्रन्थ क्रम से)

1. अथर्ववेद

2. अभिधान जातक

3. अवदान शतक

4. अवेस्ता

5. आर्य संस्कृति का उत्कर्षापार्ष

6. आर्यों का मूल स्थान

7. ऋग्वेद

8. एसेन्स ऑफ लंग्वेज

9. कट्टिहार जातक

10. चौधरी गौरव (अप्रकाशित)

11. जाटों की उत्पत्ति

12. जैन आदि पुराण

13. जैन सूर्य पुराण

14. जैन हरिवंश पुराण

15. तारीख-ए-तबरी

16. तिरमितजी अबवाबुल इम्साल

17. देव संहिता

18. धम्मपद

19. धर्म इतिहास रहस्य

20. नन्द महोत्सव

21. फरीदकोट का इतिहास

22. बंगला विश्वकोष, जिल्द-7

23. बावेरू जातक

24. बोधायन सूत्रा

25. भट्साल जातक

26. भागवत पुराण

27. भारत का धार्मिक इतिहास

28. भारत का राष्ट्रीय इतिहास (अप्रकाशित)

29. भारत के देशी राज्य

30. भारत के प्राचीन राजवंश (राष्ट्रकूट)

31. भारत के प्राचीन राजवंश, भाग-2

32. भारत भूमि और उसके निवासी

33. मनु स्मृति

34. मसीरूल उमरा

35. महापरिनिव्वान सुत्त

36. महाभारत

37. महावग्ग

38. मुरुक्क-ए-अलवर

39. मैगस्थनीज का भारत विवरण

40. यदूकुल सर्वस्व

41. याज्ञवल्क्य स्मृति

42. यादव कुल दिग्विजय

43. यू.पी. के जाट

44. राजतरंगिणी

45. वाक-आत जैसलमेरी

46. वाल्मीकि रामायण

47. विनय पिटक

48. विष्णु पुराण

49. शतपथ ब्राह्मण

50. सुप्पारक जातक

51. सुंग युन का यात्रा विवरण

52. सैरे-पंजाब

53. स्कन्द पुराण

55. हुमायूं नामा

56. होम ऑफ दी ऋषि


अंग्रेजी ग्रन्थ (लेखक क्रम से)

1. Bhattacharya - Indian Castes and Tribes

2. Bingle, Major - Seventh Day of Accounts of Rajputs

3. Daniel, C. - Industrial Competitioin of Asia

4. Cropoke, W. - Tribes and castes of the north-western Frontier Provinces and Avadh

5. Davids, Rhys - Buddhist India

6. Elliot, Henry, M - Memoirs on the Histroy, folkore and distribution of other races of the north western provinces of India

7. Howell, E.B. - The History of Aryan Rule in India

8. Ibottson - Punjab Castes

9. Klk, P. - India in Greek

10. Jayaswal, K.P. - Hindu Polity

11. Letham, R.G. - Ethnology of India

12. Pargiter. A - Ancient Indian Historical Tradition

13. Quanungo, Kalikaranjan - History of Jats

14. Sherman, John - Army Collection

15. Smith, V.A. - Buddhist India

16. Smith, V.A. - Early History of India

17. Taylor, cook - Nations of Antiquity

18. Vaidya, C.V. - History of Hindu Medieval India



नोट - इस पुस्तक में दिए गए चित्र मूल पुस्तक के भाग नहीं हैं. ये चित्र विषय को रुचिकर बनाने के लिए जाटलैंड चित्र-वीथी से लिए गए हैं.


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