Jat Varna Mimansa

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Jat Varna Mimansa (1910) is book by Author: Pandit Amichandra Sharma, Published by Lala Devidayaluji Khajanchi। जाट वर्ण मीमांसा (1910), लेखक: पंडित अमीचन्द्र शर्मा, प्रकाशक: लाला देवीदयालु खजानची

जाट वर्ण मीमांसा (1910) पुस्तक में लेखक पंडित अमीचन्द्र शर्मा ने विभिन्न जाट गोत्रों की वंशावली दी हैं। इस पुस्तक में 31 जाट गोत्रों का विवरण विस्तार से दिया है। पुस्तक के अंत में 114 जाट गोत्रों की सूची दी है और यह भी बताया गया है कि कौनसे क्षत्रिय संघ में कौन-कौन से जाट गोत्र थे। (पृ. 56-58)

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राजपूत से जाट उत्पत्ति का खण्डन: जाट वर्ण मीमांसा (1910) पुस्तक में लेखक पंडित अमीचन्द्र शर्मा ने माना है कि वास्तव में राजपूत और जाट एक ही हैं। दोनों ही क्षत्रिय हैं। इनमें कुछ भेद नहीं है। जाट जन्म से और कर्म से क्षत्रिय हैं। (p.56) लेखक ने पुस्तक में विभिन्न जाट गोत्रों की वंशावली दी हैं। लेखक ने जाट गोत्रों को क्षत्रिय तो माना है परंतु जाट गोत्रों की उत्पत्ति के बारे में भाटों के अभिलेख के आधार पर यह लिखा है कि -

1. अमुख राजपूत ने जाटनी से शादी कर ली, इसलिए उसकी सन्तान के लोग अमुख गोत्र के जाट कहे जाते हैं,

2. अमुख गोत्र के जाट ने कराव कर लिया इसलिए वह राजपूत से जाट हो गया।

लेखक की जाट गोत्र उत्पत्ति की ये व्याख्या जाट इतिहास और परम्पराओं के परिपेक्ष्य में मान्य योग्य नहीं है। पंडित अमीचन्द्र शर्मा ने यह पुस्तक वर्ष 1910 ई. में लिखी थी जब कोई जाट इतिहास की पुस्तक उपलब्ध नहीं थी। वर्तमान में जाट इतिहास पर अनेक पुस्तकें आ चुकी हैं। इन अभिलेखीय आधारों से अब यह स्पष्ट है कि जाट गोत्र की उत्पत्ति जाट जाति के किसी विख्यात महापुरुष के नाम पर होती है, किसी स्त्री की गोत्र या जाति या उसके किसी से शादी करने के आधार पर नहीं। लेखक ने पुस्तक में अनेक स्थानों पर यह तथ्य स्वयं भी लिखा है कि गोत्र की उत्पत्ति किसी विख्यात महापुरुष के नाम पर होती है। कराव प्रथा जाटों में प्राचीन काल से ही प्रचलित है इसलिए इस प्रथा के कारण राजपूत से जाट बनना भी स्वीकार्य नहीं है।

राजपूत संघ तो सातवीं शताब्दी में अस्तित्व में आया और राजपूत शब्द का प्रचलन 13 वीं -14 वीं सदी में हुआ था। जबकि जाट जाति और जाट गोत्र प्राचीन काल से प्रचलित हैं। पाणिनी के समय से ही जाट शब्द और विभिन्न जाट गोत्र अस्तित्व में हैं। विभिन्न जाट गोत्र पाणिनी के द्वारा आयुधजीवी संघ माने गए हैं।


राजपूतों ने अपनी बढ़ती के समय के सम्पूर्ण राजनैतिक इतिहास पर अधिकार कर लिया। प्रत्येक जाति जिसने कुछ दिनों भी राज्य किया उनमें मिल गई। (जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठ.115)


अग्निवंशी राजपूतों के सम्बन्ध में यह हो सकता है जैसा कि भाई परमानन्दजी ने ‘तारीख पंजाब’ में लिखा है कि - ‘वह भारत की पिछड़ी हुई और जंगली जातियों से क्षत्रिय श्रेणी में लाए गए।’ चिन्तामणि वैद्य के ‘हिन्दू भारत का उत्कर्ष’ में लिखा हुआ यह कथन भी सही माना जा सकता है कि - ‘परिहार और बड़गूजर गूजरों से राजपूत बनाए गये।’ राजपूतों के जाटू गोत्रों का निकास जाटों से हुआ है, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं । मि.आर.जी. लेथम के ‘एथनोलोजी ऑफ इण्डिया’ पृष्ट के एक नोट से जाट-राजपूत के सम्बन्ध में इस तरह प्रकाश पड़ता है - "The Jat in blood is neither more nor less than a converted Rajput and vice versa, a Rajput may be a Jat of the ancient faith." अर्थात् - रक्त में जाट परिवर्तन किए हुए राजपूत से न तो अधिक ही है और न कम ही है। इसमें अदल-बदल भी है। एक राजपूत प्राचीन धर्म का पालन करने वाला एक जाट हो सकता है। (जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठ.116)


राजनैतिक और धार्मिक मतभेद ने एक-एक राजवंश और कुल को विभिन्न दलों या जातियों में बांट दिया। इस प्रश्न का हल वंशावली रखने वाले भाटों व व्यासों ने एक विचित्र और बेढंगे तरीके से किया है। उनका कहना है कि जो-जो राजपूत सरदार किसी जाटनी से शादी करते गये, जाट हो गये। एक तो यह उत्तर अथवा धारणा यों ही गलत है कि उनके यहां एक भी जाट गोत ऐसा न मिलेगा जिसके लिये उन्होंने यह न लिखा हो कि वह अमुक राजपूत के जाटनी से शादी कर लेने के कारण जाट हो गये। जब सभी जाट इस प्रकार राजपूत के जाटनी से सम्बन्ध कर लेने के कारण हुए हैं तो आखिर वे जाटनी कहां से आईं जिनसे कि वे सम्बन्ध कर लेते थे। दूसरे, हमें हिन्दू धर्म-ग्रन्थों में ऐसे प्रमाण तो मिलते हैं कि स्त्री चाहे किसी भी गोत व जाति की हो, पति के गोत व कुल में आने पर उसके ही कुल की हो जाती है, और उसकी संतान बाप के वंश के नाम से पुकारी जाती है । किन्तु यह कहीं भी लिखा हुआ नहीं मिलता कि पुरूष शादी की हुई स्त्री के कुल का हो जाये और उसकी संतान स्त्री के कुल की कही जाए। ‘मनु’ तो कहता है कि - ‘स्त्री’ किसी भी कुल की हो और रत्न कहीं भी प्राप्त हो ग्रहण कर लेना चाहिए। (जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठ.117)


जाट गोत्रों के आयुधजीवी संघ होने से जाट गोत्रों का एक संघ से दूसरे संघ में जाने के कारण सामाजिक और राजनैतिक रहे हैं। कुछ क्षत्रिय वर्गों के राज्य संघ यथा चौहान संघ के प्रभावशील होने पर जाट गोत्र उनमें सम्मिलित हुये और चौहान सत्ता के पतन के पश्चात विभिन्न कारणों से ये जाट गोत्र पुनः जाट संघ में समाहित हो गए। चौहान संघ मुख्यत: जाट गोत्रों से ही बना था। अतः राजपूत से जाट जाति के उत्पत्ति का प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता है। जाट संघ में पुनः मिलने से राजपूत उनसे घृणा करने लगे और भाटों का महत्व कम होने से जाटों के बारे में ऊल-जलूल, कपोल कल्पित उत्पत्ति लिखने लगे।


पंडित अमीचन्द्र शर्मा ने इस पुस्तक के पृष्ठ 39 पर लिखा है - पृथ्वीराज चौहान की एक रानी पूनिया गोत्र की थी। पूनिया गोत्र की रानी से 2 पुत्र हुये 1. डबास 2. दहिया। डबास से डबास जाट गोत्र शुरू हुआ और दहिया से दहिया गोत्र। लेखक पंडित अमीचन्द्र शर्मा ने अन्य गोत्रों में लिखा है कि अमुख राजपूत ने जाटनी से शादी करली इसलिए वह जाट हो गया और उससे अमुख जाट गोत्र निकला तो यहाँ प्रश्न उपस्थित होता है कि पृथ्वीराज चौहान भी पूनिया जाट गोत्र की रानी से शादी करने के कारण जाट ही कहलाना चाहिए? उनको राजपूत क्यों माना गया ? (Laxman Burdak (talk))

जाट इतिहासकर भीम सिंह दहिया ने इस तथ्य पर उनकी पुस्तक 'जाट्स द एनसिएन्ट रुलर्स' में विस्तार से प्रकाश डाला है। (देखें परिशिष्ठ-1)


हम ऐसे असत्य लेखों तथा भाटों की बहियों का खण्डन करते हैं। जस्टिस कैम्पवेल का मत भी यह है कि “जाटों से राजपूत बने परन्तु राजपूतों से एक भी जाटवंश प्रचलित नहीं हुआ।” (देखें - जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठ-300)


जाट गोत्रों की वंशावलियों का वर्णन संक्षेप में नीचे किया जा रहा है।

हुड्डा गोत्र

हुड्डा – (p.8-9) जिला रोहतक में हुड्डा गोत्री जाटों के 24 ग्राम हैं। उनमें सांघी, खड़वाली, कलोई ये 3 ग्राम मुख्य हैं। सांघी में चौधरी मातूराम प्रधान आर्यसमाजी के घर मुझे गरीबाबाद जिला दिल्ली का रहने वाला भोलाराम भाट मिला था। मैंने सांघी के हुड्डा गोत्री जाटों की वंशावली उसकी बही से लिखी है। पृथ्वीराज चौहान के पुत्र हुये रोड़, उसके पुत्र हुये भोलण, उसके पुत्र हुआ हुड्डा, उसका पुत्र हरड़ा। हरड़ा ने पंघाल गोत्री सुखा जाट की पुत्री नंदोदेवी से कराव कर लिया। तब से हरड़ा चौहान संघ से अलग हो गया तथा पुनः जाट संघ में सामिल हो गया।

हरड़ा का पुत्र अल्ली हुआ, उसका पुत्र गेगला हुआ जिसने सांघी गाँव बसाया। गेगला का पुत्र दाहड़ हुआ, जिसका पुत्र देडू हुआ, जिसका पुत्र बीसल, बीसल का पुत्र धर्मसी, धर्मसी के दो पुत्र हुये 1. गांधरे, 2. लेखू । लेखू का पुत्र डालू हुआ जिसके नाम पर सांघी ग्राम में डाल्याण पान्ना (मुहल्ला) विख्यात है। गांधारे का पुत्र बोड़ा हुआ जिसके नाम पर सांघी गाँव में बोड़ान पान्ना प्रसिद्ध है।

पृथ्वीराज चौहान (1149–1192 CE) से डालू और बोड़ा की वंशावली इस प्रकार है:

1. पृथ्वीराज चौहान, 2. रोड़, 3. भोलण, 4. हुड्डा, 5. हरड़ा 6. अल्ली 7. गेगला (जिसने सांघी गाँव बसाया 1263 ई.), 8. दाहड़जस्सू, 9. देड़ू 10. बीसल, 11. धर्मसी, 12. गांधरेलेखू, 13. डालू (सांघी ग्राम में डाल्याण पान्ना) – बोड़ा (सांघी ग्राम में बोड़ान पान्ना)

घन घस गोत्र

घन घस - [p.10] जिला हिसार में धनाणा जाटों का बड़ा गाँव है। यहाँ जाटों का घन घस गोत्र है। हिसार की तहसील भिवानी में जाटू गोत्री क्षत्रियों का एक बड़ा गाँव कैरू है। कैरू के राजपूत और धनाणा के घंघस जाट 25 वीं पीढ़ी ऊपर एक हो जाते हैं। कैरू ग्राम के बुजुर्ग ठाकुर अगड़ी सिंह ने मुझे वंशावली लिखाई है। उसने मुझे यह भी बताया कि इस समय के धनाणा गाँव के जाटों से 24 वीं पीढ़ी में मिलता हूँ। जिला हिसार तहसील भिवानी के ढ़ानी माहू के बुजुर्ग राजपूत ठाकुर रणजीत सिंह ने भी मुझे बताया कि इस समय के धनाना गाँव के जाटों से 24 वीं पीढ़ी में मिलता हूँ। अब हम कैरू ग्राम के ठाकुर अगड़ी सिंह की वंशावली लिखकर घंघस गोत्र का वर्णन करेंगे।

जयपुर रियासत के शेखावाटी भाग में गूगौर और बागौर नाम के दो गाँव थे। इनके स्वामी जयपरतनामी क्षत्रिय थे।

जयपरतनामी के 4 पुत्र हुये 1. जाटू, 2. सतरोल, 3. राघू, और 4. जरावता

जाटू का विवाह सिरसा नगर के सरोहा गोत्री ठाकुर की पुत्री के साथ हुआ। जाटू के दो पुत्र हुये पाड़ और हरपाल। पाड़ ने राजली ग्राम बसाया जो अब जिला हिसार में पड़ता है।


[p.11] राजली सारा जाटों का गाँव है जिसके स्वामी भी जाट हैं। हरपाल ने गुराणा गाँव बसाया जो राजली के पास ही है। यह ग्राम भी जाटों का है।

चेतंग नदी, जो यमुना से निकलती है, के किनारे पर जाटों के अनेक गाँव हैं। इन गांवों को सतरोला ने बसाया इसीलिए इनको सतरौले बोलते हैं जिनमें सामिल हैं – नार नाद, भैनी, पाली, खांडा, बास, पेट वाड़, सुलचाणी, राजथल आदि प्रसिद्ध गाँव हैं। यहाँ सतरोला का खेड़ा भी है। इसीसे यह प्रमाणित होता है कि ये सारे गाँव सतरोला ने बसाये। इन सारे ग्रामों का स्वामी सतरौला था।

तहसील हांसी जिला हिसार में जाटों का सिसाय नाम का बड़ा गाँव है। इस ग्राम के स्वामी जाट हैं। इस ग्राम को राघू का ग्राम कहते हैं। डाटा, मसूदपुरा आदि और भी कई गाँव हैं जिनको राघू के ग्राम कहते हैं।ये सारे गाँव सिसाय के पास ही हैं ये सब राघू के बसाये ग्राम हैं।

पाड़ के 5 पुत्र हुये – 1. अमृता, 2. बसुदेव, 3. पद्मा, 4. अब्भा, 5. लौआ

अमृता ने खूड़ाना गाँव बसाया जो रियासत पटियाला में है।

बसुदेव ने भिवानी नगर बसाया जो अब हिसार की तहसील है। भिवानी से 7 कोस के अंतर पर बवानी खेड़ा और बलियाली ग्राम भी बसुदेव ने बसाये जो अब तहसील हांसी में हैं। बलियाली ग्राम के सारे राजपूत अब मुस्लिम हैं। बवानी खेड़ा के आधे राजपूत हिन्दू मत में


(p.12) और आधे मुस्लिम हैं। भवानी नगर के सारे राजपूत हिन्दू मत के हैं।

भिवानी, बवानी खेड़ा और बलियाली के राजपूत वसुदेव की संतान हैं। भारत में जब महम्मदी लोगों का राज्य हो गया था तब बलियाली ग्राम के सारे और बवानी खेड़ा के आधे मुस्लिम बन गए थे।

पद्मा ने सवाणी और मंगाली ने दो ग्राम बसाये थे ये जिला हिसार में हैं। दोनों ग्रामों के राजपूत लोग मुस्लिम हो गए।

अब्भा ने पातली और हिन्दू वाना ग्राम बसाये थे। पातली जिला गुड़गांव में है और सारा जाटों का है। हिंदवाना जिला हिसार में है और यह भी सारा जाटों का है।

लौरा ने कूंगड़ और भैनी लुहारी और तिगड़ाना ये 4 गाँव बसाये। ये चारों ही गाँव जिला हिसार में हैं। इनमें से लुहारी और तिगड़ाना हिन्दू राजपूतों के हैं और कूंगड़ तथा भैनी दोनों जाटों के गाँव हैं।

हरपाल के 5 पुत्र हुये – 1. राणा, 2. आब्भा, 3. महीपाल, 4. लाखा, 5 बीलण

राणा की संतान के तीन ग्राम थे - 1. तलवंडी, 2. नगथला, 3. साली

आब्भा की संतान के तीन गाँव थे - 1. कुलेरी, 2. सुनाणा, और 3. सवूर

महिपाल की संतान के 4 गाँव थे - 1. बापोड़ा, 2. सिवाड़ा, 3. कैरू, और 4. बजीणा

पीछे आकर महिपाल की संतान के 30 गाँव हो गए। इनको आजकल अमरान के गाँव कहते हैं। इनमें से बहुतसे जिला हिसार में हैं।


[p.13]: लाखा के 4 गाँव - 1. मुंडाल, 2. मांडेरी, 3. जताई, 4. तालू । ये सारे गाँव जिला हिसार में और जाटों के हैं।

बीलण की संतान का धनाना गाँव है। बीलण हरपाल का 5 वां पुत्र था। धनाना गाँव सारा जाटों का है और जिला हिसार में है । बीलण सरोया संघ से अलग होकर पुनः जाट संघ में सामिल हो गया। सरोया संघ भी जाट गोत्रों से मिलकर ही बना था। कहते हैं बीलण ने कीकर की एक मोटीसी लकड़ी घन के साथ घसाकर काट डाली थी इसलिए घनघस कहलाए। [1] .......


  1. नोट- भाट की यह व्याख्या मान्य करने योग्य नहीं है। Laxman Burdak (talk) 12:24, 12 July 2017 (EDT)

[p.14] बीलण और महिपाल परस्पर सहोदर भाई थे। वे हरपाल के पुत्र और राजा जाटू के पौत्र थे। महिपाल की संतान राजपूत संघ में ही रही। बीलण की संतान जाट संघ में आ गई।


[p.15] महिपाल की वंशावली इस प्रकार है: महिपाल का पुत्र सनता हुआ, जिसके 3 पुत्र हुये - 1. मूड़, 2. काला, 3. बींदड़

मूड़ का पुत्र जगसी हुआ जिसके 4 पुत्र थे - 1. अमर, 2. वीक्रमसी, 3. राजासी और 4. पनुआ

अमर वजीणा ग्राम का स्वामी हुआ। वजीणा हिन्दू राजपूतों का ग्राम है हिसार जिले में।

विक्रमसी की संतान का ग्राम नगाणा था जो हिसार में है और सब मुस्लिम राजपूत हैं।

रामसी का दीनोद गाँव है जो जिला हिसार में है और हिन्दू राजपूतों का गाँव है।

पनुआ का जोहड़ बापोड़ा ग्राम में है उसका कोई पुत्र नहीं था। बापोड़ा हिन्दू राजपूतों का गाँव है। यह जिला हिसार में है।

अमर के 7 पुत्र हुये - 1. सौंत, 2. औछत, 3. ऊदला, 4. थीरी, 5. जौणपाल, 6. लाला, 7. गांगदे

ठाकुर अगड़ीसिंह की वंशावली इस प्रकार है – 1. महिपाल 2. संतना 3. मूड़ 4. जगसी 5. अमर 6. सौंत 7. सलवान 8. बाला 9. अणदीत 10. राजा 11. गदाड़ 12. जैता 13. फूला 14. रूड़ा 15. हाथी 16. सेखू 17. राधा 18. जूजा 19. दरबारी 20. जगमाल 21. अमरू 22. किसना 23. शार्दूल 24. अगड़ीसिंह 25. सूजाद सिंह जवाहरजी फतेहसिंह

जाटू वंशज महिपाल राजपूत क्षत्रिय से कैरू ग्राम के जाटू वंशज राजपूत क्षत्रिय अगड़ीसिंह तक वंशावली दी है। अगड़ीसिंह महिपाल से 24 पीढ़ी में है वह राजपूत है और कैरूँ ग्राम भी राजपूतों का है। धनाना ग्राम जाटों का है और बीलण की संतान का है। कैरू, वजीणा, ढानीमाहू,


[p.16] दीनोद और बापोडा के राजपूत और धनाणा के जाट परस्पर भाई हैं। जब कैरू आदि के राजपूत क्षत्रिय हैं तो धनाना के घंघस जाट भी क्षत्रिय हैं।


जागलाण गोत्र

जागलाण गोत्र: [p.16] जींद रियासत में जींद नगर से 2 कोस दूरी पर जायलाल पुरा जिसका दूसरा नाम बड़ी छान है, जागलाण गोत्र के जाटों का एक ग्राम है जिसमें चौधरी इंद्राज नामके वृद्ध जाट रहते हैं उनको अपनी सारी वंशावली स्मरण है।


[p.17]: उसी ग्राम में एक डूम का बालक है उसे भी जागलाण गोत्र के जाटों की वंशावली याद है। जागलाण गोत्र के जाटों के ओर भी गाँव हैं। जिला करनाल में नऊलथा नाम का गाँव भी जागलाण जाटों का है। बड़ी छान के जाटों का गोत्र जागलाण है। इनका बड़ा प्रख्यात जागल नामी हुआ है। उसके नाम पर उसकी संतान जागलाण कहलाई। चौधरी इंदराज जागल से 19 पीढ़ी पीछे हैं। जागल चौहान संघ में सामिल था और उससे प्रथक होकर जाट संघ में आ गया। चौधरी इंद्राज की वंशावली निम्नानुसार है:

1. चाह, 2. चंद, 3. विजयराव, 4. थावर, 5. भीम, 6. जागल, 7. सहजू, 8. बैरछी, 9. रोम्मा, 10. कौरा, 11. दुनिअर, 12. खोखरा, 13. दफ़र, 14. रनमल, 15. वीरखान, 16. देसू, 17. गोकुल, 18. दिलावर, 19. नैन, 20. श्रीचंद, 21. मलूक, 22. सौंदा, 23. मसानिया, 24. इंद्राज

चौधरी इंद्राज चाह से 24 और जागल से 19 पीढ़ी पीछे है। जागल तक चौहान कहलाते थे और जागल से जाट। चौहान संघ मुख्यत: जाट गोत्रों से ही बना था। बड़ी छान के जागलाण गोत्र का प्रथन निकास ददरेड़ा ग्राम का है और दूसरा निकास लुद्दस ग्राम का है जो अब हिसार जिले में है। चौहान राजपूत क्षत्रिय हैं और जागलाण जाट भी क्षत्रिय हैं।

शिवराण गोत्र

शिवराण गोत्र: [p.18]: रियासत नीमराना का स्वामी अति विख्यात संकटराव चौहान वंशी क्षत्रिय हुये। संकट राव ने 120 वर्ष (?) की आयु में दूसरा विवाह नावाँ और कादमा ग्राम के राजपूत क्षेत्रीय की पुत्री पवन रेखा के साथ करवाया था। पवन रेखा ने संकटराव से यह वचन लिया था कि आप की मृत्यु के पश्चात राज्य के स्वामी उसकी संतान ही होंगी।

रानी पवन रेखा के 2 पुत्र हुये – 1 लाह , और 2 लौरे

बड़ी रानी के 19 पुत्र हुये – 1 हरसराज, 2 ग्रहराज, 3 बहराज, 4 नलदूदा, 5 सीर, 6 पीथे 7 त्रानचंद, 8 त्रिलोकचंद, 9 मान, 10 खैणसी, 11 मैणसी, 12 सैंसमल, 13 खैरा, 14 काहूड़ासी, 15 बुक्कणसी, 16 विजयराव, 17 शिवराव, 18 राधाकृष्ण, 19 परमानंद

संकट राव के देहांत के बाद दोनों रानियों की संतानों में राज्य के लिए संघर्ष हुआ। उस समय दिल्ली का बादशाह हुमायूँ (1508–1556) था। उसकी आज्ञा से पवनरेखा के बड़े पुत्र


[p.19]: लाह को राज्य मिला। पवनरेखा ने बादशाह हुमायूँ की आज्ञा पाकर बड़ी रानी के 19 पुत्रों को देश निकाला दे दिया और वे देश के विभिन्न भागों में चले गए और बस गए।

शिवराव ने बुड़ोली गाँव बसाया। वह चौहान संघ छोडकर पुनः जाट संघ में सम्मिलित हो गया। शिवराव की संतान शिवराण कहलाई। चौहान संघ मुख्यत: जाट गोत्रों से ही बना था। तहसील दादरी चरखी रियासत जींद में शिवराण गोत्र के 25 ग्राम हैं। उनमे मुख्य ग्राम बेरला है। लुहारु रियासत में नवाब साहिब शासन कर रहे थे वहाँ इस गोत्र के 25 ग्राम हैं। शिवराण गोत्र के जाट चौहान वंशी हैं।

4 वर्ष के लगभग हुये कि बड़ी खोथ जिला हिसार में नंदराम और नानग भाट आए थे। उन्होने बड़ी खोथ के शिवराण गोत्र के जाटों की वंशावली सुनाई थी। बड़ी खोथ का सरस्वती राम नंबरदार शिवराव से 24 पीढ़ी पीछे हुआ है जिसकी वंशावली निम्नानुसार है:

1 राव संकट, 2 शिवराव, 3 पीथा, 4 बाला, 5 उमरा, 6 रातू, 7 पून, 8 अंचल, 9 ?, 10 राणा, 11 रंतपाल,


[प.20]: 12 अजनूपल्ल, 13 भालू, 14 मैनपाल, 15 जीतू, 16 सोभन, 17 मेघराज, 18 चंदू, 19 जगता, 20 फूल्लू, 21 सुखचंद, 22 उष्णाक, 23 रामलाल, 24 सरस्वतीराम

यह वंशावली नानग और नंदराम भाट की बही से लिखी गई है। ये ग्राम श्यामपुरा, थाना सतनाली, तहसील नारनौल रियासत पटियाला के हैं।

अब हम जिला रोहतक के खेड़ी सुलतान नामक ग्राम के चौहान वंशी राजपूत क्षत्रियों की वंशावली लिखते हैं:

1 संकटराव, 2 हरसराज, 3 विजयराज, 4 पद्मपाल, 5 जगतू, 6 सूढ़े, 7 मलसी , 8 अम्बा, 9 आल्हाणसी, 10 भरेपाल, 11 पिचाण 12 मानकचन्द, 13 वाद्दा, 14 चन्दा, 15 नरसिंह 16 राम सिंह, 17 काशीराम, 18 इंद्रभान, 19 अमरसिंह, 20 सेवासिंह, सुलतानसिंह

हरसराज और शिवराव संकटराव के पुत्र थे। हरसराज की संतान के खेड़ी सुलतान के ठाकुर सेवा सिंह और ठाकुर सुलतान सिंह राजपूत क्षत्रिय हैं और राव संकट राव से 20 वीं पीढ़ी


[p 21]: पीछे हुये हैं। बड़ी खोथ के चौधरी सरस्वती राम राव संकट से 24 वीं पीढ़ी पीछे हुये। ये जाट क्षत्रिय हैं।

सांगवाण, काद्यान, जाखड़, गठवाला गोत्र

सांगवाण गोत्र - [p 21]: सांगवाण गोत्र का बड़ा सांगू सरोहा क्षत्रिय था। सांगू अजमेर से चलकर हिसार प्रांत में आकर बसगया। सांगू के बड़े सूर्यवंशी सरोहा क्षत्रिय थे। उनकी पदवी राजा की थी। सांगू के पूर्वज मारवाड़ देशीय सारसू जांगला नामी ग्राम में रहते थे। इनका पूर्वज आदि राजा था। उसकी संतान 13 पुश्त तक सारसू जांगला रही। पीछे आदिराजा की संतान के लोग अजमेर आकर बसे। 9 पुश्त तक अजमेर में रहे। पुनः सांगू किसी कारण से अजमेर से चलकर चरखी और दादरी के बीच जंगल में एक कूप पर आकर रुक गए। उस कूप के पास खेड़ी ग्राम बसता है। सांगू के 3 भाई और थे वे भी साथ ही आए थे।

सांगू की संतान के 40 ग्राम तो तहसील दादरी रियासत जींद में हैं। अन्य प्रान्तों में भी सांगवान गोत्र के बहुत गाँव हैं। सांगू का डीघल ग्राम में, जो अब जिला रोहतक में है,


[प.22]: सांगू जाटों के धडे में मिल गया। झोझु ग्राम के सांगवान गोत्र के जाटों की वंशावली निम्नानुसार है।

1 आदि राजा, 2 युगादिराजा, 3 ब्रहमदत्त राजा, 4 अतरसोम राजा, 5 नन्द राजा, 6 महानन्द राजा, 7 अग्निकुमार राजा, 8 मेर राजा ,9 मारीच राजा, 10 कश्यप राजा, 11 सूर्य राजा, 12 शाह राजा, 13 शालीवाहन राजा।

यहाँ तक सारसू जांगल में रहे थे। और राजा की पदवी भी रही।

शालीवाहन का पुत्र लहर हुआ वह अजमेर आ गया। उसकी राणा की पदवी हो गई। 9 पीढ़ी तक अजमेर में रहे। लैहर से 9 पीढ़ी पीछे आकार राणा सांगू हुआ। अब सांगू से लेकर झोझू निवासी हरनारायन प्रधान आर्यसमाज झोझु तक की वंशावली इस प्रकार है –

1 सांगू, 2 खमू, 3 वणगू, 4 दूजन, 5 सेद्दा, 6 डूंगर, 7 बूड़ा, 8 कौरसिल, 9 रूपचन्द, 10 माधो, 11 केसरीसिंह, 12 अभयराम, 13 तुलसीराम, 14 बहादुर, 15 दौला, 16 चेतराम, 17 लक्ष्मण, 18 हरनारायण, 19 भरतसिंह

आदिराजा सरोहा क्षत्रिय हैं और उनके वंशज सांगू भी क्षत्रिय हैं। यह समाचार मुझको झोझु ग्राम निवासी पंडित मोहरसिंह ने लिखवाया।

काद्यान गोत्र: [प.23]: काद्यान गोत्र के जाटों का बड़ा कादा था। कादा भी सरोहा क्षत्रिय था। वह सांगू का सहोदर भाई था। कादे को कादू भी कहते थे। कादू भी अपने भाई सांगू के साथ ही अजमेर से आया था और जिला रोहतक में बस गया। कादू भी जाट संघ में सामिल हो गया। उसने करेवा किया था। कादू के नाम पर काद्यान गोत्र प्रारम्भ हुआ। जिला रोहतक में इनके 12 गाँव हैं – बेरी , माजरा, दूबलधन आदि इनके मुख्य गाँव हैं।

जाखड़ गोत्र: [p.23]: जाखड़ गोत्र के जाटों का बड़ा जाखू था। जाखू भी सरोहा क्षत्रिय था। वह सांगू का सहोदर भाई था। जाखू भी अपने भाई सांगू के साथ ही अजमेर से आया था और बीकानेर रियासत के ग्राम रिडी में बस गया। एक बार द्वारिका के महाराज ने अपनी पुत्री का स्वयंवर रचा था, जाखू भी वहाँ पहुंचा था, जाखू उस स्वयंबर के नियम पूर्ण नहीं कर सका


[p.24]: जाखू ने द्वारका से आकर कराव कर लिया और जाट संघ में मिल गया। राजपूत उससे घृणा करने लगे। जाखू की संतान जाखड़ कहलाई। जिला रोहतक तहसील झज्जर में जाखड़ों के बहुत से गाँव हैं। उनमे लड़ान, सालास, झाडली आदि मुख्य गाँव हैं। जाखू की संतानों में एक लाड़ा हुये जिसने लड़ान गाँव बसाया। महम्मदियों के शासनकाल में इस गाँव का मालिक एक पठान था, पुनः यह गाँव किसी प्रकार लाडा के हाथ आ गया। यह सारा विवरण चौधरी बिहारी सिंह आल्ला नंबरदार और चौधरी रामनाथ हवलदार ने लिखवाया।

गठवाला गोत्र: [p.24]: जिला रोहतक और जींद में गठवाला गोत्र के जाटों के कई गाँव हैं। गठवाला जाटों को मलिक क्षत्रिय भी कहते हैं। हुलाणा, बिड़ाना, डबरपुर, मोखरा, सामलो, गुत्तोली आदि


[p.25]: गठवाला जाटों के बड़े गाँव हैं। हुलाणा में चौधरी जमनाराम अतिविख्यात जाट हैं। उनके पुत्र घासीराम भी बड़े सम्मानित व्यक्ति हैं।

जिला दिल्ली में डबरुपुर एक गाँव है। वहाँ नामी शूरवीर गठवाला जाट क्षत्रिय बिछाराम हुये। उनकी एक दौहती डीघल ग्राम जिला रोहतक में ब्याही थी।जिला रोहतक में कलानौर नामका महम्मदी राजपूतों का गाँव है। अंग्रेज़ सरकार से पहले इस गाँव में यह प्रथा थी कि जब कोई नवोढ़ा स्त्री अपने पतिग्रह में आया करती थी तो उसके लिए यह बंधनकारी होता था कि वह प्रथम रात्री कलानौर के महम्मदी राजपूतों के घर में रहे। इस रीति को कौला धौकना कहते थे। इस रीति के अनुसार बिछाराम की आत्मजा को भी कलानौर के महम्मदी राजपूतों के घर कौला धौकने जाना पड़ा। बिछराम की शूरवीर पुत्री इस अनुचित रीति को कब अंगीकार करने वाली थी। वह रात्री में अवसर पाकर अपने जनक ने गाँव की ओर भाग गई। उसका जनक अपनी पुत्री को भागते देख कर उसे हनन करने की इच्छा प्रकट करने लगा। पिता बोला हे पुत्री तू अपने पतिग्रह से रूठकर आई है इस


[p.26]: लिए हंतव्या है। पुत्री ने यह भयानक घटना देखकर अश्रुपूर्ण आँखों से पिता को कहा कि मैं अपराधी हूँ तो आप तलवार से मुझे अवश्य हनन करदें। आपने मेरा विवाह जाट के साथ किया है कि रांगड़ के साथ। कन्या ने पूरा किस्सा सुनाया और कहा कि मैं कौला धौकने का अनुचित काम नहीं कर सकती। क्या जाटों का क्षत्रिय धर्म नष्ट हो गया है। बिछाराम ने जाट क्षत्रियों से चर्चा कर उनकी सहायता से कलानौर पर चढ़ाई की और कलानौर को नष्ट कर सभी जतियों के लोगों को कौला धौकने की अनुचित रीति से बचाया। गठवाला सरोहा क्षत्रियों से अलग होकर जाट संघ में मिले। ग्राम ललित खेड़ा के दाताराम जी इसी गोत्र के क्षत्रिय हैं।

सींदड़, ढ़ुल गोत्र

[p.27]: तहसील हांसी जिला हिसार में सींदड़ गोत्र के जाटों का खांडा एक प्रसिद्ध ग्राम है। ये चौहान संघ में थे और इनके बड़े का नाम सींदड़ था जिसके नाम से यह गोत्र प्रचलित हुआ। सींदड़ ने कराव किया और चौहान संघ से अलग हुआ। खांडा में सर्वप्रथम आर्य धर्म का प्रचार हुआ। हिसार प्रांत का पौराणिक पंडितों ने आर्य धर्म को रोकने के लिए खांडा पर बड़े बड़े आक्रमण किए। खांडा के आर्य पुरुषों ने बड़ी शांति के साथ पौराणिक लोगों का मुक़ाबला किया।


ढ़ुल गोत्र - [p.28]: ढ़ुल गोत्र के बड़े का नाम ढ़ुल था। ढ़ुल और सींदड़ सहोदर भाई थे। इसलिए आज भी परस्पर विवाह संबंध नहीं होते। ढ़ुल गोत्र चौहान संघ से अलग होकर बना है। ढ़ुल ने कराव किया और चौहान संघ से निकलकर जाट संघ में आ गया। रामराय और इकस इनके बड़े और प्रसिद्ध गाँव हैं।

रापड़ गोत्र

[p.28]:तहसील हांसी जिला हिसार में नारनौन्द एक नामी बड़ा गाँव है। इसमें रापड़ गोत्र का एक घर है। रियासत पटियाला में बालू और जिला हिसार में टिटानी रापड़ गोत्र के ग्राम हैं। रापड़ गोत्र के बड़े का नाम रापड़ था। उसने कराव किया और तूर क्षत्रिय से अलग होकर जाट संघ में मिल गया। रापड़ गोत्र के जाट दिल्ली से चलकर आए और ग्राम दीनोद जिला हिसार में आकर बसे। अब तक भी रापड़ गोत्र के जाटों की सती दीनोद में ही है। ये लोग सती की पूजा करने के लिए यहाँ आते हैं। यह विवरण नारनौन्द के रापड़ गोत्र के जाट चौधरी शिवनाथ ने उपलब्ध कराया।

ढोंचक गोत्र

[p.29]: तहसील पानीपत जिला करनाल में ढोंचक गोत्र के जाटों का बींझोल एक नामी बड़ा गाँव है। जिला रोहतक में भी ढोंचक गोत्र का एक गाँव है लाट। इस गोत्र के बड़े का नाम ढोंचक था जिससे यह गोत्र चला। पँवार संघ से अलग होकर जाट संघ में मिल गया। पँवार संघ में अधिकतर जाट गोत्र ही थे। यह विवरण बींझोल गाँव के के ढोंचक गोत्र के जाट चौधरी गोरखा ने उपलब्ध कराया।

तूर गोत्र

[p.29]: तहसील पानीपत जिला करनाल में तूर गोत्र के जाटों का डिमाना एक नामी गाँव है। इसमें तूर जाटों के कई घर हैं। इस गोत्र के बड़े का नाम राजा तूर था जिससे यह गोत्र चला। यह विवरण इस गाँव के तूर गोत्र के जाट चौधरी जुगलाल ने उपलब्ध कराया। उसको पूरी वंशावली याद थी पर स्थानाभाव के कारण यहाँ नहीं दी जा रही है। इनके पुरोहित विवाह के समय अब तक भी डिमाना के तूर वंशी जाटों की वंशावली राजा तूर तक बताते हैं। डिमाना के ब्राह्मणों ने भी ऐसा ही बताया।

लव खत्री गोत्र

[p.30]: लव खत्री गोत्र के जाटों के दो गाँव हैं – बनेरा और बांकनेर जो सुनपत जिला दिल्ली में पड़ते हैं। इनके ओर भी कई गाँव हैं। इनके बड़े का नाम लव था। वह खत्री संघ में था जिससे से अलग हो गया। उसकी संतान लव खत्री कहलाई। खत्री संस्कृत के क्षत्रिय शब्द से बिगड़ कर बना है। इस गोत्र की वंशावली भी ग्रंथ विस्तार के भय से नहीं लिखी गई है।

पंघाल गोत्र

[p.30]: पंघाल गोत्र के बड़े का नाम थीथा था जो चौहान संघ में था। चौहान संघ मुख्यतया जाट गोत्रों का ही संघ था। वह सांभर के आस-पास किसी ग्राम में रहता था, वहाँ से चलकर तुशाम जिला हिसार में एक टूण गोत्री जाट के घर रहने लगा। थीथा और उस जाट में प्रेम हो गया। थीथा सुंदर और प्रवीण था।


[p.31]: वह जाट वहाँ का नंबरदार था। वह औरंगजेब को ग्रामकर (माल) भरने दिल्ली जाया करता था तब वह थीथा को भी साथ लेजाया करता था। बाद में जाट ने थीथा को ही अपना मुखिया बना लिया और अपनी पुत्री का विवाह उसके साथ कर दिया। अब थीथा की दिल्ली में पहचान हो चुकी थी। जब जाट मर गया तो थीथा के साथ जाट के पुत्रों का विरोध हुआ। जाट के पुत्रों ने थीथा को मारना चाहा। थीथा की स्त्री को नाईन ने यह खबर देदी। थीथा ने दिल्ली जाकर बादशाह औरंगजेब की सहायता ली। बादशाह ने सेनापति भेजकर तूण जाटों पर हमला कर दिया जिसमें कुछ तूण जाट मर गए और कुछ भाग गए। थीथा ने अपने घर की रक्षा के लिए मोर पक्षियों के पंख का चिन्ह कर दिया था इसलिए थीथा के घर को पंखालय कहा गया और उसकी सन्तानें बाद में पंखाल बोली जाने लगी जिसका रूपांतर पंघाल हो गया। पंघाल जाटों के संघ का वही गोत्र है जो चौहान संघ का पंघाल है। यह विवरण तालू ग्राम के चौधरी पखिरियाराम के पुत्र रामलाल ने लिखाया। वह पंघाल जाट है।

नोट - टूण गोत्र जाटों में नहीं होता यह संभवत: दूण या दुहण होना चाहिए। [1]

17. सुहाग, 18. मान, 19. दलाल, 20 देसवाल गोत्र

[p.33]: कोड खोखर नामका सरदार उदयपुर रियासत में रहता था। वह चौहान संघ में था और वहाँ से चलकर ददरेड़े नामक गाँव में आ बसा। बाद में वह पल्लूकोट में आ बसा। पल्लूकोट और ददरेड़ा दोनों मारवाड़ में हैं।


[p.34]: कोड खोखर के 4 पुत्र हुये – 1. मान, 2. सुहाग, 3. देसा, 4. दलाल

  • मान की संतान मान गोत्र के जाट कहलाए,
  • सुहाग की संतान सुहाग गोत्र के जाट,
  • देसा से देसवाल और
  • दलाल से दलाल जाट गोत्र प्रचलित हुआ।

सुहाग गोत्र के विख्यात जाट ने मातनहेल गाँव बसाया। जो अब जिला रोहतक में है। मातनहेल गाँव के सुहाग गोत्री जाटों की वंशावली निम्नानुसार है:

1 वीर राणा, 2 धीर राणा, 3 पल्ल राणा, 4 कोड खोखर राणा, 5 सुहाग, 6 बाह, 7 खुतेसा, 8 खोखू, 9 मैयल, 10 महन, 11 रत्न, 12 बालू, 13 कैंबो, 14 नासी, 15 मालम, 16 सहवाज़, 17 बाग्घो, 18 कल्ला, 19 महासिंह, 20 आलम, 21 हठिया , 22 दुल्लो, 23 साहिब सुख, 24 नत्थन सिंह जैलदार, 25 रतिया


18. मान गोत्र: [p.34]: कोड खोखर का पुत्र मान चौहान संघ में था। चौहान संघ में अधिकांस जाट गोत्र ही थे। वह सुहाग गोत्र के प्रवर्तक सुहाग का सहोदर था। मान चौहान संघ छोडकर जाट संघ में मिल गया। जिला हिसार में राजथल और जिला करनाल में बलेग्राम मान गोत्र के गाँव हैं। अन्य प्रान्तों के कई ग्रामों में मान गोत्र के जाट हैं।


19 दलाल गोत्र : [p.35]: दलाल भी चौहान संघ में था । वह कोड खोखर का पुत्र और सुहाग का सहोदर भाई था। जिला रोहतक में दलाल गोत्री जाटों के बहुत गाँव हैं। अन्य जिलों में भी दलाल हैं। माणौठी और छारा बड़े गाँव हैं।

20 देसवाल गोत्र : [p.35]: देसवाल गोत्र का प्रवर्तक देसा भी चौहान संघ में था । वह कोड खोखर का पुत्र और सुहाग का सहोदर भाई था। जिला देसवाल गोत्र जाटों के बहुत गाँव हैं।

21. पहोड़ गोत्र

पहोड़ गोत्र : [p.36]: जिला हिसार तहसील सिरसा में एक गाँव है शेरगढ़ जहां पहोड़ भाटी के कई घर हैं। ये भाटी संघ से निकल कर जात संघ में मिले हैं। भाटी संघ में अधिकांस जाट गोत्र ही थे। इस गोत्र के जाटों का बड़ा भरानसिंह था। वह जैसलमर में रहा करता था। वह किसी कारण से पंजाब में आ गया। उसने झोरड़ जाट गोत्र की स्त्री से शादी की। भरानसिंह की वंशावली निम्नानुसार है:

1. भरानसिंह, 2. सालम सिंह, 3. त्रिलोक सिंह, 4. वजीर सिंह, कहर सिंह, उद्योगपाल सिंह, भूदेवपाल, टेक सिंह,

22 गुराइण गोत्र

गुराइण गोत्र : [p.36]: जिला हिसार (अब भिवानी) में बामला गुराइण गोत्री जाटों का एक गाँव


[p.37]: है, तूर वंश में एक अति विख्यात जाटू नाम का राजा था। जाटू राजा के बड़े पुत्र का नाम पाड़ था। उसका पुत्र गोरा प्रसिद्ध हुआ। गोरा का पुत्र कालू, कालू का पूत्र सधीव, सधीव का पुत्र धेरपाल हुआ। बामला के गोरा की संतान गुराइण गोत्री जाट हैं। गुराइन गोत्री जाटों के ओर भी कई ग्राम हैं। गोरा की संतान में से कोई राजली ग्राम से चलकर बौन्द ग्राम में आ गया। बौन्द रियासत जींद में है। बौन्द में ठीक नहीं जमा तो वह कलिंगा ग्राम जिला रोहतक आ गया। यहाँ के ठाकुर ने उसको बसने के लिए थोड़ी जमीन दे दी। ठाकुर का पुत्र भी उसके पास ही रहने लगा। उस महाशय के दो पुत्र हुये। 1 बीधू, 2 भाकू ...उस महाशय ने ठाकुर से बहुत सारी जमीन लेली और उसमे बामला गाँव बसाया। इस गाँव मे 3 पान्ने हैं। जाट पुत्रों के नाम पर क्रमश: बीधू का बीधवान और भाकू का भाकल। ठाकुर के बेटे का नौरंगाबाद पानना है।


[p.38]: बामला के जाटों का निकास राजली ग्राम है। बामला के गुराइण गोत्र के जाटों की वंशावली निम्नानुसार है:

1. राजा जाटू, 2. पाड़, 3. गोरा, 4. कालूसिंह, 5. सधीन, 6. धरेपाल, 7. धांधू, 8. मुलकशृंगार, 9. लाखू, 10. छज्जू, 11. बीधू, भाखू, 12. बुकण, 13. आसिल, 14. बड़सी, 15. लाहड़, 16. भागन, 17. केशो, 18. कुशला, 19. रतिया, 20. जाहरिया, 21. जोदधा, 22. हंसराम, 23. परशराम

गोरा की संतान में छ्ज्जू सिंह तूर संघ से जाट संघ में मिला। तूर संघ मुख्यतया जाट गोत्रों से ही बना था। धरेपाल के भतीजे की संतान अब तक भी जताई ग्राम जिला हिसार (वर्तमान जिला भिवानी) में हैं, वे राजपूत हैं। जताई के राजपूत और बामला के जाट परस्पर भाई हैं।

23 डबास, 24. दहिया गोत्र

[p.39]: जिला हिसार में सीसर नामक एक गाँव है। इसमें डबास गोत्री जाटों के बहुत से घर हैं। डबास जाट चौहान संघ से अलग हुये। चौहान संघ मुख्यरूप से जाट गोत्रों का संघ था। पृथ्वीराज चौहान की एक रानी पूनिया गोत्र की थी। पूनिया गोत्र की रानी से 2 पुत्र हुये 1. डबास 2. दहिया

डबास से डबास जाट गोत्र शुरू हुआ और दहिया से दहिया गोत्र। यह विवरण सीसर के चौधरी फतेह सिंह ने लिखवाया।

नोट- नोट- लेखक पंडित अमीचन्द्र शर्मा ने अन्य गोत्रों में लिखा है कि अमुख राजपूत ने जाटनी से शादी करली इसलिए वह जाट हो गया और उससे अमुख जाट गोत्र निकला तो यहाँ पृथ्वीराज चौहान ने पूनीया जाट रानी से शादी की थी तो वह भी जाट ही कहलाना चाहिए? [2]

25. बोला गोत्र

[p.40]: सिसाय ग्राम में एक बोला पानना है। यहाँ के जाटों का निकास रतिया ग्राम से है। जो जिला हिसार में है। इनका गोत्र सुहाग है। बोला उपगोत्र है। बोला पान्ने का छज्जूराम रतिया से आकर सिसाय में बसा था। सुहाग की संतान में से कोई जाकर रतिया में बसा था। पुनः उसके वंश में रतिया से आकर सिसाय में बस गया। कहते हैं वह कान से बोला अर्थात बहरा था इसलिए उसकी संतान बोला कहलाने लगी। छज्जूराम से लेकर सिसाय के चौधरी जगराम जैलदार तक की वंशावली निम्नानुसार है।

1 छज्जूराम, 2 ऊद, 3 लाद, 4 बागड़ा, 5 धीरा, 6 सादा, 7 राजा, 8 जीऊ, 9 छमीर, 10 भीखा, 11 तेजपाल, 12 राजरूप, 13 नूपा, 14 सेडू, 15 श्यामदास , 16 बट्टू , 17 दयासुख, 18 गंगाराम, 19 उजाला, 20 जगराम जैलदार 21 मामन

26. कालीरावण गोत्र

कालीरावण गोत्र : [p.41]: जिला हिसार में जाटों के बड़े गाँव सिसाय में एक कालीरावण पान्ना है। इनका गोत्र कालीरावण है। उनके बड़े का नाम कालीरावण था और वह सरोहा क्षत्रिय संघ में था। सरोहा संघ में मुख्यतया जाट गोत्र थे। कालीरावण सिरसा का रहने वाला था और वहाँ से आकर सिसाय ग्राम में रहने लगा था। वह जाट संघ में मिल गया। उसकी संतान कालीरावण जाट हैं।

27. पूनिया गोत्र

[p.41]: रियासत बीकानेर में पूनिया गोत्र के कई गाँव हैं। इनके बड़े का नाम बाहड़ था। उसने अपने प्राक्रम से बीकानेर रियासत का बहुत सा देश अपने वश में कर लिया था। उसने बाड़मेल कोटर नाम का गाँव बसाया। जब उसकी संतान बढ़ गई तो वहां से चलकर झांसल ग्राम बसाया जो बीकानेर रियासत में है। उसके 12 पुत्र हुये – 1 पुनिया, 2 धानिया, 3 छाछरेक, 4 बाली, 5 बरबरा, 6 सुलखन, 7 चिड़िया, 8 चांदिया, 9 खोख, 10 धनाज, 11 लेतर, 12 ककरके

इनके नाम पर जाटों के 12 गोत्र शुरू हुये। सबसे बड़ा पूनिया था उसने झांसल के आसपास बहुत गाँव बसाये। इसीलिए उस भाग को पूनिया इलाका कहते हैं।


[p.42]: आईने अकबरी में इलाका पूनिया प्रथक लिखा है। बाहड़ का पुत्र पूनिया था। जिससे पूनिया गोत्र चला। पूनिया जाट अपने आपको शिव गोत्री बताते हैं। दूसरे जाटों को कश्यप गोत्री बताते हैं। लेखक ने यह विवरण सरकारी किताब से लिखा है जो जिला हिसार के पुराने बंदोबस्त में जिला हिसार के सब जातियों के वर्णन में दिया है।

28 पँवार गोत्र

[p.42]: जिला रोहतक में बैहलंभा जाटों का बड़ा गाँव है जिसमें पँवार जाटों का एक पान्ना है। जब भारत में बौद्ध मत का प्रचार था तो ब्राह्मण लोगों ने अर्बुदगिरि पर हवन किया। तब पँवार, चौहान सोलंकी क्षत्रिय उतपन्न हुये। कुछ गोत्र के जाटों ने पँवार संघ का समर्थन किया।

29. मदेरणा गोत्र

[p.43]: पटियाला रियासत में धारसूल ग्राम मदेरणा गोत्र के जाटों का एक बड़ा गाँव है। मदेरणा गोत्र का एक बड़ा गाँव सांगा रियासत जींद में भी है। सांगा गाँव के मदेरना गोत्र के जाटों की वंशावली निम्नानुसार है:

1 चाहू, 2 बूड़ा, 3 माणक, 4 जाला, 5 पूना, 6 सेखा, 7 अतमल, 8 दादू, 9 नारायनदास, 10 छज्जू, 11 रामकौर, 12 चेतू, 13 फूलू, 14 बाला, 15 हरसूख, 16 जीराम, 17 ऊदा, 18 सोहन, 19 जयगोपाल

सांगा के मदेरना गोत्र के जाटों का पहला निकास धारसूल है। दूसरा निकास बैहलंभा गाँव जिला रोहतक है, तीसरा निकास बौंद ग्राम जो रियासत जींद में है। सांगा के मदेरना जाटों का कोई बड़ा बौन्द से चलकर सांगा ग्राम में आकर बस गया। यह रियासत जींद में है। यह विवरण सांगा के चौधरी रामबकस ने लिखाया।

गोत्र की उत्पत्ति लेखक द्वारा ऊल-जलूल बताई गई है इसलिए यहाँ छोड़दी गई है गई है।

30 गुदारा गोत्र

[p.44]: गुदारा जाटों ने गहलोत संघ का समर्थन किया । गुदारा गोत्र के जाटों का निकास जैसलमर है।


विभिन्न संघों के समर्थक जाट गोत्रों की सूची

चौहान संघ के जाट गोत्र – 1 हुड्डा, 2 जगलान, 3 शिवराण, 4 सींदड़, 5 ढुल, 6 पंघाल, 7 सुहाग, 8 मान, 9 दलाल, 10 डबास, 11 दहिया, 12 बोला, 13 चहल, 14 लाखलाण, 15 मोर, 16 माहल, 17 लुहान, 18 लहावत, 19 दूण, 20 लुहाच, 21 भट्टू, 22 भाखर, 23 भारीवास, 24 सार, 25 सिवाहे, 26 खूंगा, 27 सहू, 28 गेहल, 29 राऊ, 30 नैरा, 31 लूणी, 32 वैनिवाल, 33 लेगा, 34 जनावा, 35 बेडवाल, 36 मैल्ला, 37 धैया, 38 मैराण, 39 साइण, 40 रोझिया, ....अनेक ओर भी गोत्र

तूर संघ के जाट गोत्र – 1 घंघस, 2 रापड़, 3 तूर, 4 गुराइण, 5 मूण्ड, 6 पिलानिया, 7 नैन, 8 महलाण, 9 बिच्छी, 10 लांबा, 11 खटगर, 12 खर्ब, 13 जतासरा, 14 डा•डा 15 भाटू,


[प.57]: 16 खैरवाल, 17 ढाका, 18 सूखेरा, 19 बांचरी, 20 नारद, 21 मालू, 22 रुहिल, 23 साकन, 24 वीरवाल .... अनेक ओर गोत्र भी

सरोहा संघ के जाट गोत्र – 1 सांगवाण, 2 काद्यान, 3 जाखड़, 4 गठवाला, 5 कालीरावण, 6 महोरी, 7 हाजराव, 8 सरोआ, 9 काजला, 10 सरावत, 11 सूरी, 12 खोत, 13 बलैहरा.... अनेक ओर गोत्र भी

पँवार संघ के जाट गोत्र – 1 पँवार, 2 ढोंचक, 3 कैरवान, 4 पचार, 5 लोहचब, 6 मामन (मोहन?).... अनेक ओर गोत्र भी

भाटी संघ के जाट गोत्र – 1 लाड़, 2 भेरों, 3 माकर, 4 मौन्द, 5 कुहार, 6 सारण, 7 ईसरवाल, 8 खेतलान, 9 जाटई, 10 खोदमा, 11 वणोद, 12 बटटू, 13 धोला.... अनेक ओर गोत्र भी

खोखर संघ के जाट गोत्र – 1 खोखर

पनिहार संघ के जाट गोत्र – 1 सौंदा, 2 मरर


[p.58]: जुईया संघ के जाट गोत्र – 1 पाहल, 2 मोंदला, 3 खिचड़ा, 4 माचरा, 5 कचरोआ, 6 समोर, 7 जोईया

लल्ल संघ के जाट गोत्र – 1 जड़िया

राठोड संघ के जाट गोत्र – गावर्ना

कछवाह संघ के जाट गोत्र – दुण्डवाल

गहलोत संघ के जाट गोत्र – गुदारा

पहोड़ भाटी संघ के जाट गोत्र – पहोड़

लव खत्री - लव खत्री

गौड़ संघ – 1 गुलिया, 2 मदेरना


  1. Laxman Burdak (talk) 13:07, 22 July 2017 (EDT)
  2. Laxman Burdak (talk) 13:12, 22 July 2017 (EDT)