Kalu Ram Sunda

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Author:Laxman Burdak, IFS (Retd.)

Kalu Ram Sunda (born:1879-death:) from village Kudan (Sikar, Rajasthan) was a leading Freedom Fighter who took part in Shekhawati farmers movement in Rajasthan.

Genealogy

Kalu Ram Sunda was married in Burdak family of Palthana. His son Govind Ram Sunda also took part in Shekhawati farmers movement and could not be arrested till last. Govind Ram Sunda's son is Ram Chandra Sunda, a politician. Ram Chandra Sunda has two sons 1....., 2. Prakash Chandra Sunda. Prakash Chandra Sunda got two sons 1. Praveen Sunda and 2. Anurag Sunda.

Foundation of Jat Boarding House Sikar

Jat Boarding House Sikar was started under the guidance of Ishwar Singh Bhamu and Kalu Ram Sunda. Meanwhile, Master Kanhaiya Lal started Jat Hostel under a shed. In 1945 Sir Chhotu Ram inaugurated this Jat Hostel.

Yagyaman of Jat Prajapati Mahayagya, 1934

Chaudhary Kaluram of village Kudan was the Yagyaman of Jat Prajapati Mahayagya, 1934 organized in Sikar. It was organized at Sikar from 20-29 January 1934.

जाट जन सेवक

रियासती भारत के जाट जन सेवक (1949) पुस्तक में ठाकुर देशराज द्वारा चौधरी कलूराम कूदन (सीकर राज्य) का विवरण पृष्ठ 294-295 पर प्रकाशित किया गया है । ठाकुर देशराज[1] ने लिखा है ....चौधरी कलूराम कूदन (सीकर राज्य) - [पृ.294]:आप की उम्र करीब 70 साल की है। आपका जन्म स्थान कुदन है। आप का गोत्र सुंडा है। आपकी जम्मीदारी है और गांव


[पृ.295] के पटेल हैं। आप संवत 1990 (1933 ई.) के पहले सीकर राज्य के सच्चे सेवक रहे हैं। उस समय तक आपकी भावना यही बनी रही कि राज्य का किसी तरह फायदा होना चाहिए और राज्य वालों ने भी जहां कहीं जाट किसानों ने चीख-पुकार करी वही चौधरी कालूराम को भेज दिया और यह जाकर राज्य का हित हो उसी ढंग से मामला समटा करके आ जाते। पर संवत 1990 में जाट महान यज्ञ के ऊपर और आपने सच्ची स्थिति को अपनी आंखों से देखा उसी दिन से जबसे चौधरी गणेशराम मेहरिया ने सच्ची स्थिति आप को समझाई और आपने इतने ढाणी बधालों की में प्रण किया, अगर जाती सेवा के लिए शीश भी कटाना पड़ेगा तो पहला सिर चौधरी कालूराम का होगा।

आप दो भाई थे। बड़े भाई का नाम गिदाराम था और आपने जाती सेवा के लिए अपने को निछावर कर दिया है।

आप एक दर्शनीय मूर्ति हैं और बुढ़ापे में भी सुंदर लगते हैं। दिल से आप साफ हैं। छल कपट के पास नहीं फटकते। ऋषि स्वभाव के आदमी हैं। लोगों में आपकी कद्र है।

जीवन परिचय

भिवानी जाने वाले शेखावाटी के जत्थे में - शेखावाटी में किसान आन्दोलन और जनजागरण के बीज गांधीजी ने सन 1921 में बोये. सन् 1921 में गांधीजी का आगमन भिवानी हुआ. इसका समाचार सेठ देवीबक्स सर्राफ को आ चुका था. सेठ देवीबक्स सर्राफ शेखावाटी जनजागरण के अग्रदूत थे. आप शेखावाटी के वैश्यों में प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने ठिकानेदारों के विरुद्ध आवाज उठाई. देवीबक्स सर्राफ ने शेखावाटी के अग्रणी किसान नेताओं को भिवानी जाने के लिए तैयार किया. भिवानी जाने वाले शेखावाटी के जत्थे में आप भी प्रमुख व्यक्ति थे. [2]

सीकर यज्ञ में योगदान

ठाकुर देशराज[3] ने लिखा है .... जनवरी 1934 के बसंती दिनों में सीकर के आर्य महाविद्यालय के कर्मचारियों द्वारा सीकर यज्ञ आरंभ हुआ। उन दिनों यज्ञ भूमि एक ऋषि उपनिवेश सी जांच रही थी। बाहर से आने वालों के 100 तम्बू और और छोलदारियाँ थी और स्थानीय लोगों के लिए फूस की झोपड़ियों की छावनी बनाई।

20000 आदमी के बैठने के लिए पंडाल बनाया गया था जिसकी रचना चातुरी में श्रेय नेतराम सिंह जी गोरीर और चौधरी पन्ने सिंह जी बाटड़, बाटड़ नाऊ को है। यज्ञ स्थल 100 गज चौड़ी और 100 गज लंबी भूमि में बनाया गया था जिसमें चार यज्ञ कुंड चारों कोनों पर और एक बीच में था। चारों यज्ञ कुंड ऊपर यज्ञोपवीत संस्कार होते थे और बीच के यज्ञ कुंड पर कभी भी न बंद होने वाला यज्ञ।


[पृ.227]: 25 मन घी और 100 मन हवन सामग्री खर्च हुई। 3000 स्त्री पुरुष यज्ञोपवीत धारण किए हुये थे।

यज्ञ पति थे आंगई के राजर्षि कुंवर हुकुम सिंह जी और यज्ञमान थे कूदन के देवतास्वरुप चौधरी कालूराम जी। ब्रह्मा का कृत्य आर्य जाति के प्रसिद्ध पंडित श्री जगदेव जी शास्त्री द्वारा संपन्न हुआ था। यह यज्ञ 10 दिन तक चला था। एक लाख के करीब आदमी इसमें शामिल हुए थे। इस बीसवीं सदी में जाटों का यह सर्वोपरि यज्ञ था। यज्ञ का कार्य 7 दिन में समाप्त हो जाने वाला था। परंतु सीकर के राव राजा साहब द्वारा जिद करने पर कि जाट लोग हाथी पर बैठकर मेरे घर में होकर जलूस नहीं निकाल सकेंगे।

3 दिन तक लाखों लोगों को और ठहरना पड़ा। जुलूस के लिए हाथी जयपुर से राजपूत सरदार का लाया गया था, वह भी षड्यंत्र करके सीकर के अधिकारियों ने रातों-रात भगवा दिया। किंतु लाखों आदमियों की धार्मिक जिद के सामने राव राजा साहब को झुकना पड़ा और दशवें दिन हाथी पर जुलूस वैदिक धर्म की जय, जाट जाति की जय के तुमुलघोषों के साथ निकाला गया और इस प्रकार सीकर का यह महान धार्मिक जाट उत्सव समाप्त हो गया।

25 अप्रेल 1935 को कूदन में क्रूरता का तांडव

नोट - यह सेक्शन राजेन्द्र कसवा की पुस्तक मेरा गाँव मेरा देश (वाया शेखावाटी), प्रकाशक: कल्पना पब्लिकेशन, जयपुर, फोन: 0141 -2317611, संस्करण: 2012, ISBN 978-81-89681-21-0, P. 134-152 से साभार लिया गया है.

यह वास्तविकता है कि कूदन पूरी सीकर वाटी का चेतना केंद्र बन गया था. कूदन में ही कालूराम सुंडा तथा गणेशराम महरिया जैसे किसान नेता थे. पृथ्वी सिंह गोठड़ा का कूदन में ससुराल था. कैप्टन वेब 25 अप्रेल 1935 को कूदन पहुंचा तो वहां आस-पास के गाँवों से बड़ी संख्या में जाट एकत्रित हो गए थे और राजस्व अधिकारियों को लगान वसूल नहीं करने दिया और विरोध को तैयार हो गए. (राजेन्द्र कसवा,p.134)

25 अप्रेल 1935 को कूदन में ग्रामीणों ने देखा कि सैंकड़ों घुड़सवारों ने गाँव को चारों और से घेर लिया है. अन्य गाँवों के बहुत से किसान उपस्थित थे. आन्दोलन का नेतृत्व कूदन ही कर रहा था. भीड़ ने आम सभा का रूप ले लिया. कुछ देर पश्चात रियासती पुलिस के दो सिपाही बखाल में पानी भरने के लिए गाँव के कुए पर आये. गाँव वालों ने उनको पानी भरने से रोक दिया. उसी समय तहसीलदार वगैरह भी आ गए. कुए के निकट ही धर्मशाला है. उसमें बैठकर तहसीलदार ने गाँव के प्रमुख व्यक्तियों को बुलाया. लगान के मुद्दे पर देर तक बात चली और यह सहमती बनी कि लगान चुका देंगे. (राजेन्द्र कसवा,p.136)

धापी दादी का विद्रोह - जिस वक्त धर्मशाला में गाँव के प्रमुख व्यक्तियों के साथ बातचीत चल रही थी, उसी समय गाँव की एक दबंग महिला धापी दादी अपनी भैंस को पानी पिलाने कुए पर आई थी. उसने सुना कि लगान सम्बन्धी चर्चा चल रही है, तो वह कुछ देर खड़ी रही. तभी बातचीत करके गाँव के चौधरी धर्मशाला से बहार निकले. किसी के पूछने पर चौधरियों ने जवाब दिया, 'हाँ हम लगान चुकाने की हामी भर आये हैं'. यह वाक्य धापी ने सुना तो उसके तन-मन में जैसे आग लग गयी. उसके हाथ में भैंस हांकने वाली कटीली छड़ी थी. धापी ने क्रोध में आकर एक छड़ी चौधरी पेमाराम महरिया के सर पर मारी और आवेश में आकर उसे अपशब्द कहे. पेमाराम का साफा कटीली छड़ी के साथ ही धापी के हाथ में आ गया. पेमा राम इस आकस्मिक वार से हक्का-बक्का रह गया और जान बचाने के लिए धर्मशाला की और दौड़ा. पेमा राम को भागकर धर्मशाला में घुसते लोगों ने देखा. धापी दादी छड़ी में उलझे पेमाराम के साफे को लहरा-लहरा कर पूछ रही थी, 'इन दो चार लोगों को किसने अधिकार दिया कि वे बढ़ा हुआ लगान चुकाने की हामी भरें?' सभी ने धापी दादी के प्रश्न को जायज ठहराया. (राजेन्द्र कसवा,p.138)

वास्तव में धापी दादी की बात सही थी. लगान चुकाने का फैसला किसान पंचायत ही कर सकती थी. चौधरियों को तो यों ही लगान में हिस्सा मिलता था. उपस्थित जन समुदाय क्रोधित हो गया. धापी दादी ने आदेश दिया, 'मेरा मूंह क्या देख रहे हो इन चौधरियों को पकड़कर धर्मशाला से बाहर ले जाओ.' बाहर शोर बढ़ रहा था. धर्मशाला में बैठे तहसीलदार, पटवारी, अन्य कर्मचारी और गाँव के चौधरी भय से थर-थर कांपने लगे. उन्हें लगा कि यह भीड़ अब उनकी पिटाई करेगी. चौधरियों ने तहसीलदार सहित कर्मचारियों को बगल के पंडित जीवनराम शर्मा के घर में छुपा दिया. इस भागदौड़ में ग्रामीणों ने एक सिपाही को पकड़कर पीट दिया जो ग्रामीणों को अपमानित कर रहा था. (राजेन्द्र कसवा,p.138)

किसान और रियासती पुलिस आमने सामने -कूदन गाँव के दक्षिण में सुखाणी नाम की जोहड़ी है. जोहड़ी क्या, विशाल सार्वजनिक मैदान जैसा भूखंड था, उसमें किसानों का विशाल जनसमूह खड़ा था. कुछ ही दूरी पर रियासत और रावराजा की पुलिस खड़ी थी. दृश्य कुछ वैसा ही था, जैसे युद्ध के मैदान में सेनाएं आमने-सामने खड़ी हों. अधिकांश किसान निहत्थे थे. सामने घुड़सवार पुलिस थी. जाहिर था यदि हिंसा हुई तो किसान मरे जायेंगे. यही सोच कर पृथ्वीसिंह गोठडा जनसमूह के बीच गए और समझाया, 'हम हिंसा से नहीं लड़ेंगे. हम शांतिपूर्ण विरोध करेंगे.' (राजेन्द्र कसवा,p.139)

कैप्टन वेब द्वारा फायरिंग का हुक्म - कैप्टन वेब ने जनसमूह को तितर-बितर होने का आदेश दिया और साथ ही बढ़े हुए लगान को चुकाने का हुक्म दिया. वेब की चेतावनी का किसानों पर कोई असर नहीं हुआ. वे अपनी जगह से हिले नहीं. मि. वेब ने निहत्थे किसानों पर गोली चलाने का हुक्म दे दिया. जनसमूह में कोहराम मच गया. लोग इधर-उधर भागने लगे. चीख-पुकार मच गयी. जब तूफ़ान रुका तो पता लगा कि पुलिस की गोली से निकटवर्ती गाँव गोठड़ा के चेतराम, टीकूराम, तुलछाराम एवं अजीतपुरा गाँव के आशाराम शहीद हो गए. सचमुच गाँव का चारागाह मैदान युद्ध स्थल बन गया. (राजेन्द्र कसवा,p.136)

इसी बीच जयपुर रियासत की सशत्र पलिस आ धमकी. दिन के 12 बजे कैप्टन वेब एवं एक अन्य अधिकारी बापना सहित 500 पुलिस के सिपाही कूदन गाँव के उस चौक में आये, जहाँ छाछ-राबड़ी की कड़ाही अब भी रखी थी और बड़ी परात में रोटियां थीं. लेकिन उपस्थित जनसमूह नहीं था. गोलीकांड के बाद काफी किसान एक चौधरी कालूराम सुंडा के घर पर एकत्रित हो गए थे. यह बात गाँव कूदन के ही राजपूत सिपाही मंगेजसिंह को पता थी. चौधरी कालूराम सुंडा के घर के दरवाजे पर कैप्टन वेब खड़ा हो गया. चौधरी कालूराम अपनी हवेली के प्रथम मंजिल के कमरे में थे, अंग्रेज अफसर ने कड़क आवाज में हुक्म दिया, 'कालू राम नीचे आओ.' (राजेन्द्र कसवा,p.139)

चौधरी कालूराम नीचे नहीं आये. जब पुलिस हवेली पर चढ़ने लगी तो छत से भोलाराम गोठड़ा ने राख की हांड़ी कैप्टन वेब की और फैंकी वेब ने गुस्से में आकर तुरंत गोली चला दी गोली का निशाना तो चूक गया लेकिन भोलाराम गोठड़ा के चेहरे पर गोली के कुछ छर्रे लगे. इसके पश्चात् वेब खुद छत पर गया. वेब ने ऊपर से किसी हमले की आशंका के परिपेक्ष्य में सर पर एक छोटी खात रखी और छत पर चढ़ गया. ऊपर चढ़े सभी किसानों को गिरफ्तार कर लिया. गाँव कूदन के ही राजपूत सिपाही मंगेजसिंह ने चौधरी कालू राम को गिरफ्तार कर बेब को सौंपा. वेब के हुक्म के अनुसार कालू राम को दोनों हाथ बांध कर पूरे कूदन में घुमाया. कालू राम के घर काम करने वाले चूड़ाराम बलाई को भी गिरफ्तार कर लिया.(राजेन्द्र कसवा,p.140)

राख फैंकने की घटना से अपमानित कैप्टन वेब ने चीख कर हुक्म दिया, 'घर-घर की तलासी लो !' 'कूदन गाँव को जलादो !!' (राजेन्द्र कसवा,p.139)

पुलिस के सिपाही घर-घर में घुसने लगे. घरों की तलासी ली जाने लगी. जो भी पुरुष दिखाई दिया, उसे गिरफ्तार कर लिया. कूदन का ठाकुर सिपाही मंगेजसिंह तलासी लेने और महिलाओं को धमकाने में सबसे आगे था. उनके अमूल्य सामान को नष्ट करने में मजा आ रहा था. किसानों के घरों में घी की भरी हुई हांड़ी रखी थी. मंगेज सिंह जिस भी घर में घुसता, सबसे पहले वह घी की मटकी उठाता और फर्श पर जोर से मारता. किसान के लिए अमृत बना घी फर्श पर बहने लगा. सामान घरों से निकला गया, बर्तन-भांडे तोड़े गए एवं लुटे गए. घरों में फैलाये गए दूध और घी की सड़ांध से पूरा गाँव महक गया. (राजेन्द्र कसवा,p.136)

एक किसान का घर बंध था. पुलिस ने भूराराम खाती को बुलाया और कहा, 'इस किवाड़ को तोड़ दो.' भूरा राम ने आदेश मानने से इनकार कर दिया. उसे गिरफ्तार कर लिया. (राजेन्द्र कसवा,p.140)

25 अप्रेल 1935 को कुल 106 किसानों को गिरफ्तार किया गया. अधिकांश को देवगढ़ जेल में 81 दिन तक बंद रखा गया. कुल 106 में से 57 किसान कूदन गाँव के थे. गिरफ्तार लोगों में 13 वर्ष से 70 वर्ष तक के लोग थे. सीकर उपकारागार के रिकोर्ड के अनुसार दो को छोड़ सभी जाट थे. कालूराम के घर काम करने वाला चूड़ाराम बलाई एक मात्र दलित था. दूसरा भूराराम खाती था. (राजेन्द्र कसवा,p.142)

इस संघर्ष में कूदन के जिन किसानों ने आगे बढ़कर भाग लिया और अंत तक गिरफ्तार नहीं हुए, उनमें प्रमुख थे - गोविन्द राम सुंडा, मुकन्दा राम सुंडा, गोरु राम सुंडा, सुखदेवा राम एवं रामू राम.

रावराजा सीकर का निर्वासन 1938

सन् 1938 में सीकर रावराजा के सीकर से निर्वासन प्रकरण में सीकर व पंचपना शेखावाटी के सारे ठिकानेदार व राजपूत पहले से ही रावराजा सीकर के पक्ष में थे. रावराजा सीकर ने सीकरवाटी जाट किसान पंचायत के सदस्यों को देवीपुरा की कोठी में बुलाया. जो पंच गए उन में आप भी सम्मिलित थे.[4]

शेखावाटी किसान आन्दोलन पर रणमल सिंह

शेखावाटी किसान आन्दोलन पर रणमल सिंह[5] लिखते हैं कि [पृष्ठ-113]: सन् 1934 के प्रजापत महायज्ञ के एक वर्ष पश्चात सन् 1935 (संवत 1991) में खुड़ी छोटी में फगेडिया परिवार की सात वर्ष की मुन्नी देवी का विवाह ग्राम जसरासर के ढाका परिवार के 8 वर्षीय जीवनराम के साथ धुलण्डी संवत 1991 का तय हुआ, ढाका परिवार घोड़े पर तोरण मारना चाहता था, परंतु राजपूतों ने मना कर दिया। इस पर जाट-राजपूत आपस में तन गए। दोनों जातियों के लोग एकत्र होने लगे। विवाह आगे सरक गया। कैप्टन वेब जो सीकर ठिकाने के सीनियर अफसर थे , ने हमारे गाँव के चौधरी गोरूसिंह गढ़वाल जो उस समय जाट पंचायत के मंत्री थे, को बुलाकर कहा कि जाटों को समझा दो कि वे जिद न करें। चौधरी गोरूसिंह की बात जाटों ने नहीं मानी, पुलिस ने लाठी चार्ज कर दिया। इस संघर्ष में दो जाने शहीद हो गए – चौधरी रत्नाराम बाजिया ग्राम फकीरपुरा एवं चौधरी शिम्भूराम भूकर ग्राम गोठड़ा भूकरान । हमारे गाँव के चौधरी मूनाराम का एक हाथ टूट गया और हमारे परिवार के मेरे ताऊजी चौधरी किसनारम डोरवाल के पीठ व पैरों पर बत्तीस लठियों की चोट के निशान थे। चौधरी गोरूसिंह गढ़वाल के भी पैरों में खूब चोटें आई, पर वे बच गए।

चैत्र सुदी प्रथमा को संवत बदल गया और विक्रम संवत 1992 प्रारम्भ हो गया। सीकर ठिकाने के जाटों ने लगान बंदी की घोषणा करदी, जबरदस्ती लगान वसूली शुरू की। पहले भैरुपुरा गए। मर्द गाँव खाली कर गए और चौधरी ईश्वरसिंह भामू की धर्मपत्नी जो चौधरी धन्नाराम बुरड़क, पलथना की बहिन थी, ने ग्राम की महिलाओं को इकट्ठा करके सामना किया तो कैप्टेन वेब ने लगान वसूली रोकदी। चौधरी बक्साराम महरिया ने ठिकाने को समाचार भिजवा दिया कि हम कूदन में लगान वसूली करवा लेंगे।

कूदन ग्राम के पुरुष तो गाँव खाली कर गए। लगान वसूली कर्मचारी ग्राम कूदन की धर्मशाला में आकर ठहर गए। महिलाओं की नेता धापू देवी बनी जिसका पीहर ग्राम रसीदपुरा में फांडन गोत्र था। उसके दाँत टूट गए थे, इसलिए उसे बोखली बड़िया (ताई) कहते थे। महिलाओं ने काँटेदार झाड़ियाँ लेकर लगान वसूली करने वाले सीकर ठिकाने के कर्मचारियों पर आक्रमण कर दिया, अत: वे धर्मशाला के पिछवाड़े से कूदकर गाँव के बाहर ग्राम अजीतपुरा खेड़ा में भाग गए। कर्मचारियों की रक्षा के लिए पुलिस फोर्स भी आ गई। ग्राम गोठड़ा भूकरान के भूकर एवं अजीतपुरा के पिलानिया जाटों ने पुलिस का सामना किया। गोठड़ा गोली कांड हुआ और चार जने वहीं शहीद हो गए। इस गोली कांड के बाद पुलिस ने गाँव में प्रवेश किया और चौधरी कालुराम सुंडा उर्फ कालु बाबा की हवेली , तमाम मिट्टी के बर्तन, चूल्हा-चक्की सब तोड़ दिये। पूरे गाँव में पुरुष नाम की चिड़िया भी नहीं रही सिवाय राजपूत, ब्राह्मण, नाई व महाजन परिवार के। नाथाराम महरिया के अलावा तमाम जाटों ने ग्राम छोड़ कर भागे और जान बचाई।


[पृष्ठ-114]: कूदन के बाद ग्राम गोठड़ा भूकरान में लगान वसूली के लिए सीकर ठिकाने के कर्मचारी पुलिस के साथ गए और श्री पृथ्वीसिंह भूकर गोठड़ा के पिताजी श्री रामबक्स भूकर को पकड़ कर ले आए। उनके दोनों पैरों में रस्से बांधकर उन्हें (जिस जोहड़ में आज माध्यमिक विद्यालय है) जोहड़े में घसीटा, पीठ लहूलुहान हो गई। चौधरी रामबक्स जी ने कहा कि मरना मंजूर है परंतु हाथ से लगान नहीं दूंगा। उनकी हवेली लूट ली गई , हवेली से पाँच सौ मन ग्वार लूटकर ठिकाने वाले ले गए।

कूदन के बाद जाट एजीटेशन के पंचों – चौधरी हरीसिंह बुरड़क, पलथना, चौधरी ईश्वरसिंह भामु, भैरूंपुरा; पृथ्वी सिंह भूकर, गोठड़ा भूकरान; चौधरी पन्ने सिंह बाटड़, बाटड़ानाऊ; एवं चौधरी गोरूसिंह गढ़वाल (मंत्री) कटराथल – को गिरफ्तार करके देवगढ़ किले मैं कैद कर दिया। इस कांड के बाद कई गांवों के चुनिन्दा लोगों को देश निकाला (ठिकाना बदर) कर दिया। मेरे पिताजी चौधरी गनपत सिंह को ठिकाना बदर कर दिया गया। वे हटूँड़ी (अजमेर) में हरिभाऊ उपाध्याय के निवास पर रहे। मई 1935 में उन्हें ठिकाने से निकाला गया और 29 फरवरी, 1936 को रिहा किया गया।

जब सभी पाँच पंचों को नजरबंद कर दिया गया तो पाँच नए पंच और चुने गए – चौधरी गणेशराम महरिया, कूदन; चौधरी धन्नाराम बुरड़क, पलथाना; चौधरी जवाहर सिंह मावलिया, चन्दपुरा; चौधरी पन्नेसिंह जाखड़; कोलिडा तथा चौधरी लेखराम डोटासरा, कसवाली। खजांची चौधरी हरदेवसिंह भूकर, गोठड़ा भूकरान; थे एवं कार्यकारी मंत्री चौधरी देवीसिंह बोचलिया, कंवरपुरा (फुलेरा तहसील) थे। उक्त पांचों को भी पकड़कर देवगढ़ किले में ही नजरबंद कर दिया गया। इसके बाद पाँच पंच फिर चुने गए – चौधरी कालु राम सुंडा, कूदन; चौधरी मनसा राम थालोड़, नारसरा; चौधरी हरजीराम गढ़वाल, माधोपुरा (लक्ष्मणगढ़); मास्टर कन्हैयालाल महला, स्वरुपसर एवं चौधरी चूनाराम ढाका , फतेहपुरा

References

  1. Thakur Deshraj:Jat Jan Sewak, 1949, p.294-295
  2. राजेन्द्र कसवा: मेरा गाँव मेरा देश (वाया शेखावाटी), जयपुर, 2012, ISBN 978-81-89681-21-0, P. 70
  3. Thakur Deshraj: Jat Jan Sewak, 1949, p.226-227
  4. डॉ पेमाराम: शेखावाटी किसान आन्दोलन का इतिहास, 1990, p.158
  5. रणमल सिंह के जीवन पर प्रकाशित पुस्तक - 'शताब्दी पुरुष - रणबंका रणमल सिंह' द्वितीय संस्करण 2015, ISBN 978-81-89681-74-0 पृष्ठ 113-114

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