Kankhal

From Jatland Wiki
(Redirected from Kankhala)
Jump to navigation Jump to search
Haridwar district map

Kankhal (कनखल) is a site of ancient historical and religious importance near Haridwar in Uttarakhand state in India.

Variants of name

Mention by Panini

Dakshi-nagara (दाक्षि-नगर) is mentioned by Panini in Ashtadhyayi. [1]

History

There is ancient temple of Daksha Mahadev situated in the south Kankhal town. The mythological story about this place is that King Daksha Prajapati, father of Sati (Lord Shiva 's first wife ) performed yagya at this place. Daksha Prajapati did not invite Lord Shiva and Sati felt insulted . Therefore she burnt herself in the yagya Kund . Shiva burned with anger, sent the terrible demi-god Vīrabhadra and his ganas. On the direction of Shiva, Virabhadra appeared with Shiva's ganas in the midst of Daksha's assembly like a storm wind and waged a fierce war on the gods and mortals present culminating in the beheading of Daksha.

Sati Kund, another well-known mythological heritage worth visit is situated in the Kankhal region. Legend has it that Sati laid down her life in this kund. Pilgrims from all over India visit this place and feel blessed.

Kankhal was the summer capital and Kurukshetra the winter capital of Shiva. Shiva after ascending to the throne visited plain areas, the present Haridwar. To give a warm welcome to Shiva the site of Haridwar was made a welcome-gate hence called Haridwar.

कुब्जाम्रक

विजयेन्द्र कुमार माथुर[2] ने लेख किया है ...कुब्जाम्रक (p.202) - कूर्मपुराण, उपरि.34,34 के अनुसार कनखल है.

कनखल

विजयेन्द्र कुमार माथुर[3] ने लेख किया है ...कनखल (AS, p.130) हरिद्वार के निकट अति प्राचीन स्थान है. पुराणों के अनुसार दक्ष प्रजापति ने अपनी राजधानी कनखल में ही वह यज्ञ किया था, जिसमें आने का निमंत्रण उसने भगवान शिव को नहीं दिया। बिना निमंत्रण के ही माता सती अपनी पिता दक्ष के इस यज्ञ में पहुँच गईं। तब दक्ष ने सभी लोगों के समक्ष शिव को अपशब्द कहे और उनका भारी अपमान किया। अपने पति शिव का अपमान सहन न करने के कारण दक्ष कन्या सती उसी यज्ञ की अग्नि में जल कर भस्म हो गईं। कनखल में दक्ष का मंदिर तथा यज्ञ स्थान आज भी बने हुए हैं।

महाभारत में कनखल का तीर्थ रूप में वर्णन इस प्रकार है- 'कुरुक्षेत्रसमागंगा यत्र तत्रावगाहिता, विशेषो वैकनखले प्रयागे परमं महत्।' (वन पर्व महाभारत 85,88)

'एते कनखला राजनृषीणांदयिता नगा:, एषा प्रकाशते गंगा युधिष्ठिर महानदी' (वन पर्व महाभारत 135,5)

मेघदूत में कालिदास ने कनखल का उल्लेख मेघ की अलका-यात्रा के प्रसंग में किया- 'तस्माद् गच्छेरनुकनखलं शैलराजावतीर्णां जह्नो: कन्यां सगरतनयस्वर्गसोपान पंक्तिम्।' (पूर्वमेघ, 52)

हरिवंश पुराण में भी कनखल को पुण्य स्थान माना गया है-'गंगाद्वारं कनखलं सोमो वै तत्र संस्थित:' तथा 'हरिद्वारे कुशावर्ते नील के भिल्लपर्वते, स्नात्वा कनखले तीर्थे पुनर्जन्म न विद्यते'।

मोनियर विलियम्स के संस्कृत-अंग्रेज़ी कोश के अनुसार 'कनखल' का अर्थ "छोटा खला" या "गर्त" है। कनखल के पहाड़ों के बीच के एक छोटे-से स्थान में बसा होने के कारण यह व्युत्पत्ति सार्थक भी मानी जा सकती है। 'स्कंदपुराण' में कनखल शब्द का अर्थ इस प्रकार दर्शाया गया है- 'खल: को नाम मुक्तिं वै भजते तत्र मज्जनात्, अत: कनखलं तीर्थं नाम्ना चक्रुर्मुनीश्वरा:' अर्थात् "खल या दुष्ट मनुष्य की भी यहाँ स्नान से मुक्ति हो जाती है, इसीलिए इसे 'कनखल' कहते हैं।"

कनखल परिचय

कनखल हिन्दुओं का एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है, जो हरिद्वार से लगभग एक मील की दूरी पर दक्षिण में तथा ज्वालापुर से दो मील पश्चिम गंगा के पश्चिमी किनारे पर स्थित है। यहाँ नगर के दक्षिण में दक्ष प्रजापति का भव्य मंदिर है, जिसके निकट 'सतीघाट' के नाम से वह भूमि है, जहाँ पुराणों (कूर्मपुराण 2.38 अ., लिंगपुराण 100.8) के अनुसार भगवान शिव ने सती के प्राणोत्सर्ग के पश्चात्‌ दक्ष के यज्ञ का ध्वंस किया था। कनखल एक पुण्य तीर्थ स्थल है, जहाँ प्रति वर्ष लाखों तीर्थयात्री दर्शनार्थ आते हैं।

उद्यान: 'कनखल' में अनेक प्रसिद्ध उद्यान हैं, जिनमें केला, आलूबुखारा, लीची, आडू, चकई, लुकाट आदि फल भारी मात्रा में उत्पन्न होते हैं। यहाँ के अधिकांश निवासी ब्राह्मण हैं, जिनका पेशा प्राय: हरिद्वार अथवा कनखल में 'पौरोहित्य' या 'पंडगिरी' है।

संदर्भ: भारतकोश-कनखल

वीरभद्र से जाट गोत्रों की उत्पत्ति

दलीपसिंह अहलावत[4] ने लिखा है...शिवजी महाराज का राज्य कैलाश पर्वत से काशी तक जिसमें शिवालक (शिवजी की जटायें - राज्य की जटायें) पहाड़ी क्षेत्र और हरद्वार शामिल थे।

उसी समय पुरुवंशी राजा वीरभद्र हरद्वार के निकट तलखापुर का राजा था। यह क्षेत्र भी शिव की जटा कहलाता था। राजा वीरभद्र शिवजी का अनुयायी था। शिवजी महाराज को जब सती के मरने का समाचार मिला तो वे राजा वीरभद्र के दरबार में पहुंचे और क्रोध में आकर उसके सामने अपनी जटा खसोट डाली और वीरभद्र को, दोषी राजा दक्ष को दण्ड देने का आदेश दिया। राजा वीरभद्र ने अपनी सेना तथा गणों को लेकर कनखल पर चढाई कर दी और दक्ष को मार दिया। आज भी उस महान् योद्धा वीरभद्र के उस स्थान पर, उसके नाम का एक रेलवे स्टेशन वीरभद्र है जो हरद्वार से ऋषिकेश को जाने वाली रेलवे लाइन पर ऋषिकेश से दो मील पहले है। इस वीरभद्र नाम के स्थान पर भारत सरकार ने दवाइयां बनाने का एक बड़ा कारखाना स्थापित कर रखा है। राजा वीरभद्र का राज्य वह स्थान था, जहां पर गंगा नदी पहाड़ों से उतरकर मैदानी क्षेत्र में बहने लगती है । पुराणों की कथानुसार गंगा का निकास शिव की जटाओं से है। इसका अर्थ भी साफ है कि शिवजी के राज्य की जटाओं या पहाड़ियों से सम्राट् भगीरथ खोदकर इस गंगा को लाया था और वह पहाड़ियों से बहती हुई हरद्वार में आकर मैदान में बहने लगती है। लगे हाथों जाटगंगा का वर्णन करना उचित है जो इस प्रकार से है –

भैरों घाटी जो कि गंगोत्री से 6 मील नीचे को है, यहां पर ऊपर पहाड़ों से भागीरथी गंगा उत्तर-पूर्व की ओर से और नीलगंगा (जाटगंगा) उत्तर पश्चिम की ओर से आकर दोनों मिलती हैं। इन दोनों के मिलाप के बीच के शुष्क स्थान को ही भैरों घाटी कहते हैं। जाटगंगा के दाहिने किनारे को 'लंका' कहते हैं। इस जाटगंगा का पानी इतना शुद्ध है कि इसमें रेत का कोई अणु नहीं है। भागीरथी का पानी मिट्टी वाला है। दोनों के मिलाप के बाद भी दोनों के पानी बहुत दूर तक अलग-अलग दिखाई देते हैं। जाटगंगा का पानी साफ व नीला है इसलिए इसको नीलगंगा कहते हैं। महात्माओं और साधुओं का कहना है कि भागीरथी गंगा तो सम्राट् भगीरथ ने खोदकर निकाली थी और इस नीलगंगा को जाट खोदकर लाये थे इसलिए इसका नाम जाटगंगा है। इसके उत्तरी भाग पर जाट रहते हैं। इस कारण भी इसको जाटगंगा कहते हैं। इस जाट बस्ती को, चीन के युद्ध के समय, भारत सरकार ने, वहां से उठाकर सेना डाल दी और जाटों को, हरसल गांव के पास, भूमि के


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-103


बदले भूमि देकर आबाद किया। जाटों ने यहां गंगा के किनारे अपना गांव बसाया जिसका नाम बघौरी रखा। यह गांव गंगा के किनारे-किनारे लगभग 300 मीटर तक बसा हुआ है जिसमें लगभग 250 घर हैं। लोग बिल्कुल आर्य नस्ल के हैं। स्त्री-पुरुष और बच्चे बहुत सुन्दर हैं। ये लोग बौद्ध धर्म को मानते हैं। इनके गांव में बौद्ध मन्दिर है। ये लोग भेड़ बकरियां पालते हैं। और तिब्बत से ऊन का व्यापार करते हैं। ये अपने घरों में ऊनी कपड़े बुनते हैं।1

नोट - हरसल गांव दोनों गंगाओं के मिलाप से लगभग 7 मील नीचे को गंगा के दाहिने किनारे पर है। बघौरी गांव हरसल से लगा हुआ है2

जटाओं से उत्पन्न हुए वीरभद्र आदि गणों को जाट मान लेने की कथा के अन्दर जो ऐतिहासिक तत्त्व छिपा हुआ है, वह यह है –

चन्द्रवंशी सम्राट ययाति के पुत्र अनु की 9वीं पीढी में राजा उशीनर जिसके कई पुत्रों में एक का नाम शिवि था (देखो प्रथम अध्याय, अनु की वंशावली)। इसी प्रसिद्ध दानी सम्राट् शिवि से शिविवंश प्रचलित हुआ जो कि जाटवंश (गोत्र) है। इस चन्द्रवंशी शिवि जाटवंश का विस्तार से वर्णन तृतीय अध्याय में लिखा जायेगा।

पुरुवंशी राजा वीरभद्र जाट राजा था जिसके शिविवंशी गण (संघ) शिव की जटा (शिवालक पहाड़ियों) में थे। इसकी राजधानी हरद्वार के निकट तलखापुर थी। शिवपुराण में लिखा है कि वीरभद्र की संतान से बड़े-बड़े जाट गोत्र प्रचलित हुए

वीरभद्र की वंशावली राणा धौलपुर जाट नरेश के राजवंश इतिहास से ली गई है जो निम्नलिखित हैं।

राजा वीरभद्र के 5 पुत्र और 2 पौत्रों से जो जाटवंश चले (जाट इतिहास पृ० 83 लेखक लेफ्टिनेंट रामसरूप जून) -

ययाति
वीरभद्र

(1) पौनभद्र (पौनिया या पूनिया गोत्र) (2) कल्हनभद्र (कल्हन गोत्र) (3) अतिसुरभद्र (अंजना गोत्र) (4) जखभद्र (जाखड़ गोत्र) (5) ब्रह्मभद्र (भिमरौलिया गोत्र) (6) दहीभद्र (दहिया गोत्र)


1, 2. उत्तराखण्ड हिमालय के प्रसिद्ध योगी संसार की योग संस्थान के अध्यक्ष श्री योगेश्वरानन्द जी महाराज (ब्रह्मचारी व्यासदेव जी) के शिष्य ब्रह्मचारी सदाराम योगाचार्य ग्राम लोहारहेड़ी जिला रोहतक (हरयाणा) ने यह वर्णन मुझे मौखिक बताया। वह वहां पर काफी समय तक रहकर आये हैं। (लेखक)


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-104


  1. पौनभद्र के नाम से पौनिया (पूनिया) गोत्र चला। यह जाट गोत्र हरयाणा, राजस्थान, बृज, उत्तरप्रदेश, पंजाब तथा पाकिस्तान में फैला हुआ है।
  2. कल्हनभद्र के नाम से कल्हन जाट गोत्र प्रचलित हुआ। इस गोत्र के जाट काठियावाड़ एवं गुजरात में हैं।
  3. अतिसुरभद्र के नाम से अंजना जाट गोत्र प्रचलित हुआ। ये लोग मालवा, मेवाड़ और पाकिस्तान में हैं।
  4. जखभद्र के नाम से जाखड़ जाट गोत्र चला। ये लोग हरयाणा, राजस्थान, पंजाब, कश्मीर और पाकिस्तान में फैले हुए हैं।
  5. ब्रह्मभद्र के नाम से भिमरौलिया जाट गोत्र चला। जाट राणा धौलपुर इसी गोत्र के थे। धौलपुर की राजवंशावली में वीरभद्र से लेकर धौलपुर के नरेशों तक सब राजाओं के नाम लिखे हुए हैं। इस जाट गोत्र के लोग हरयाणा, हरद्वार क्षेत्र, पंजाब, जम्मू-कश्मीर और पाकिस्तान में हैं।
  6. दहीभद्र से दहिया जाट गोत्र प्रचलित हुआ। दहिया जाट हरयाणा, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, पंजाब तथा मध्य एशिया में फैले हुए हैं।
नोट - ऊपरलिखित नामों पर, चन्द्रवंशी क्षत्रिय आर्यों के संघ से ये जाट गोत्र प्रचलित हुए।

शिवी और जाट संघ

ठाकुर देशराज[5] ने लिखा है ....शिवि - यह खानदान बहुत पुराना है। वैदिक काल से लेकर किसी न किसी रूप में सिकंदर के आक्रमण के समय तक इनका जिक्र पाया जाता है। पुराणों ने शिवि लोगों को उशीनर की संतानों में से बताया है। राजा ययाति के पुत्रों में यदु, पुरू, तुर्वषु, अनु और द्रुहयु आदि थे। उशीनर ने अनु खानदान के थे। पुराणों में इनकी जो वंशावली दी है वह इस प्रकार है:- 1. चंद्र 2. बुद्ध 3. पुरुरवा 4. आयु 5. नहुष 6. ययाति* 7. (ययाति के तीसरे पुत्र) अनु 8. सभानर 9. कालनर 10. सृजय 11. जन्मेजय 12.


* कुछ लोग राजा ययाति की राजधानी शाकंभरी अर्थात सांभर झील को मानते हैं जो कि इस समय जयपुर जोधपुर की सीमा पर है।


[पृ.92]:महाशील 13. महामना 14. महामना के दूसरे पुत्र उशीनर और 15. उशीनर के पुत्र शिवि। प्रसिद्ध दानी महाराज शिवि की कथाओं से सारी हिंदू जाति परिचित है।* ईसा से 326 वर्ष पूर्व जब विश्वविजेता सिकंदर का भारत पर आक्रमण हुआ था, उस समय शिवि लोग मल्लों के पड़ोस में बसे हुए थे। उस समय के इनके वैभव के संबंध में सिकंदर के साथियों ने लिखा है:- "कि इनके पास 40,000 तो पैदल सेना थी।" कुछ लोगों ने पंजाब के वर्तमान शेरकोट को इनकी राजधानी बताया है।हम 3 स्थानों में इनके फैलने का वर्णन पाते हैं। आरंभ में तो यह जाति मानसरोवर के नीचे के हिस्से में आबाद थी। फिर यह उत्तर-पूर्व पंजाब में फैल गई। यही पंजाब के शिवि लोग राजपूताना में चित्तौड़ तक पहुंचते हैं। जहां इनकी मध्यमिका नगरी में राजधानी थी। यहां से इनके सिक्के भी प्राप्त हुए हैं जिन पर लिखा हुआ है- 'मज्झिम निकाय शिव जनपदस' दूसरा समुदाय इनका तिब्बत को पार कर जाता है जो वहां शियूची नाम से प्रसिद्ध होता है। कई इतिहासकारों का कहना है कि कुशान लोग शियूची जाति की एक शाखा थे।


* शिवि जाति के कुछ प्रसिद्ध राजाओं का हाल परिशिष्ट में पढ़िए।

यह शेरकोट पहले शिविपुर कहलाता था। कुछ लोग धवला नदी के किनारे के शिवप्रस्थ को शिवि लोगों की राजधानी मानते हैं।


[पृ.93]: महाराजा कनिष्क कुशान जाति के ही नरेश थे। तीसरा दल इनका जाटों के अन्य दलों के साथ यूरोप में बढ़ जाता है। स्केंडिनेविया और जटलैंड दोनों ही में इनका जिक्र आता है। टसीटस, टोलमी, पिंकर्टन तीनों ही का कहना है कि-" जट्टलैंड में जट लोगों की 6 जातियां थी। जिनमें सुएवी, किम्ब्री हेमेन्द्री और कट्टी भी शामिल थीं, जो एल्व और वेजर नदियों के मुहाने तक फैल गईं थीं। वहां पर इन्होंने युद्ध के देवता के नाम पर इमर्नश्यूल नाम का स्तूप खड़ा किया था।” बौद्ध लोगों का कहना है कि भगवान बुद्ध तथागत ने पहले एक बार शिवि लोगों में भी जन्म लिया था। इन लोगों में हर-गौरी और पृथ्वी की पूजा प्रचलित थी। संघ के अधिपति को गणपति व गणेश कहते थे। इनकी जितनी भी छोटी-छोटी शाखाएं थी वह जाति राष्ट्र में सम्मिलित हो गई थी।

आरंभकाल में भारत में शिवि लोगों को दक्ष लोगों से भी भयंकर युद्ध करना पड़ा था। वीरभद्र नाम का इनका सेनापति दक्षनगर को विध्वंस करने के कारण ही प्रसिद्ध हुआ था। एक बार इन में गृह कलह भी हुआ था। जिसका समझौता इस प्रकार हुआ कि हस्ति शाखा के प्रमुख को पार्लियामेंट का इनको सर्वसम्मति से प्रधान चुनना पड़ा।* मालूम ऐसा होता है


* पुराणों में यह कथा बड़े गोलमोल के साथ वर्णन की गई है। हस्ति कबीले के लोग पीछे काबुल नदी के किनारे बसे थे। उनका हस्तीनगर आजकल न्यस्तन्यस कहलाता है।


[पृ.94]:शिवि लोगों के संघ में जब कि वह जाति राष्ट्र के रूप में परिवर्तित हुआ सभी शिवि लोग शामिल हो गए थे। यह भी सही बात है कि नाग लोग भी शिव लोगों की ही शाखा के हैं। क्योंकि पूनिया जाट कहा करते हैं कि आदि जाट तो हम हैं और शिवजी की जटाओं से पैदा हुए हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि शिवि जाटों की संख्या एक समय बहुत थी। क्योंकि सिकंदर के समय में 40 हजार तो उनके पास पैदल सेना ही थी। यदि हम दस आदमियों पीछे भी एक सैनिक बना दे तो इस तरह वे 4 लाख होते हैं और जबकि उनके दो बड़े-बड़े समूह चीन और यूरोप की ओर चले गए थे। यदि समस्त शिवि जाटों की अंदाज से ही गिनती करें तो वह 10 लाख के करीब साबित हो सकते हैं।

शायद कुछ लोग कहें कि 'यह माना कि शिवि एक महान और संपन्न जाति भारत में थी किंतु यह कैसे माना जाए किसी भी शिवि लोग जाट थे'? इसका उत्तर प्रमाण और दंतकथा दोनों के आधार पर हम देते हैं।

(1) पहली दंतकथा तो यह है कि जाट शिव की जटाओं में से हुए हैं। अर्थात शिवि लोग जाट थे।

(2) जाट शिव के गणों में से हैं अर्थात गणतंत्री शिवि जाट थे।

(3) जाट का मुख्य शिव ने बनाया, इसके वास्तविक माने यह है कि 'जाट-राष्ट्रों' में प्रमुख शिवि हैं।

यह इन दंतकथाओं के हमारे किए अर्थ न माने जाएं, तब भी इतना तो इन दंतकथाओं के आधार पर स्वीकार करना ही पड़ेगा कि जाट और शिवि लोगों का कोई


[पृ.95]: न कोई संबंध तो है ही। हम कहते हैं कि संबंध यही है कि शिवि लोग जाट थे। इसके लिए प्रमाण भी लीजिए। "ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ द नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविन्सेज एंड अवध" नामक पुस्तक में मिस्टर डबल्यू क्रुक साहब लिखते हैं:

The Jats of the south-eastern provinces divide them selves into two sections - Shivgotri or of the family of Shiva and Kashyapagotri.

अर्थात् - दक्षिणी पूर्वी प्रान्तों के जाट अपने को दो भागों में विभक्त करते हैं - शिवगोत्री या शिव के वंशज और कश्यप गोत्री ।

इसी तरह की बात कर्नल टॉड भी प्रसिद्ध इतिहासकार टसीटस (Tacitus) के हवाले से लिखते हैं:- "स्कंदनाभ देश में जट नामक एक महापराक्रमी जाति निवास करती थी। इस जाति के वंश की बहुत सी शाखाएं थी। उन शाखाओं में शैव और शिवि लोगों की विशेष प्रतिष्ठा थी। "

हिंदुओं के प्राचीन ग्रंथकारों ने शिवि लोगों को शैवल और शैव्य कर के भी लिखा है। इनमें कई सरदार बड़े प्रतापी हुए हैं। उनके जीवन पर परिशिष्ट भाग में थोड़ा सा प्रकाश डालेंगे।

In Mahabharata

Kanakhala (कनखल) (Tirtha) is mentioned in Mahabharata (III.82.26), (III.88.19),


Vana Parva, Mahabharata/Book III Chapter 82 mentions names Pilgrims. Kanakhala (कनखल) (Tirtha) is mentioned in Mahabharata (III.82.26).[6].... Bathing next at Kanakhala (कनखल) (III.82.26), and fasting there for three nights, a person reapeth the merit of the horse-sacrifice and goeth to heaven.


Vana Parva, Mahabharata/Book III Chapter 88 mentions Tirthas in the North. Kanakhala (कनखल) (Tirtha) is mentioned in Mahabharata (III.88.19)[7]....O king, Sanatkumara regardeth that spot visited by Brahmarshis, as also the tirtha Kanakhala (कनखल) (III.88.19) that is near to it, as sacred. There also is the mountain named Puru (पुरु-पर्वत) (III.88.19) which is resorted to by great Rishis and where Pururavas (पुरूरव) (III.88.19) was born, and Bhrigu practised ascetic austerities.

External links

References

  1. V. S. Agrawala: India as Known to Panini, 1953, p.73
  2. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.202
  3. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.130
  4. Jat History Dalip Singh Ahlawat, p.103-105
  5. Jat Itihas (Utpatti Aur Gaurav Khand)/Pancham Parichhed ,pp.91-95
  6. ततः कनखले सनात्वा तरिरात्रॊपॊषितॊ नरः, अश्वमेधम अवाप्नॊति सवर्गलॊकं च गच्छति (III.82.26)
  7. सनत कुमारः कौरव्य पुण्यं कनखलं तथा, पर्वतश च पुरुर नाम यत्र जातः पुरूरवः (III.88.19)

Back to Jat Villages