Kartar Singh

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क्रांतिकारी शहीद करतारसिंह

क्रांतिकारी शहीद करतारसिंह सराभा

जन्म- 16 नवम्बर 1896 ,

शहीदी- 16 नवम्बर 1915

गोत्र - ग्रेवाल,

गाँव सराभा, जिला लुधियाना, पंजाब.

पिता के इकलोते पुत्र.

अमरीका में छपने वाले 'गदर' के संपादक रहे. कामागाटामारू जहाज से वापस आने पर सैनिक छावनियों में बगावत की चिनगारी लगाते हुए एक साथी की गद्दारी से पकडे गए. सरकार इन्हें उड़ना सांप कहती थी. इन्हें मात्र 19 वर्ष की आयु में फांसी दे दी गयी.

जीवन परिचय

सरदार करतारसिंह - आप जि० लुधियाना में गांव सरावा के जाट जमींदार स० मंगलसिंह के पुत्र थे। आपका जन्म सन् 1896 में सरावा गांव में हुआ था। रासबिहारी बोस और भाई परमानन्द एम० ए० तक इस वीर से आशान्वित थे। इन्हें अपने चाचा के पास उड़ीसा में पढ़ने के समय बंगाल के क्रान्तिकारियों का सम्पर्क मिला। ये पढ़ने के नाम पर ही अमेरिका, सानफ्रांसिस्को पहुंचे। वहां इनको लाला हरदयाल एम० ए० के साथ रहने का सुयोग मिला। उनके और अन्य सहयोगियों के साथ उन्होंने 1913 ई० में ‘गदर पार्टी’ की स्थापना की और ‘गदर’ नामक पत्र का प्रकाशन आरम्भ किया। इस पत्र में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध विद्रोही भावनाएं उभारी जाती थीं। 1914 ई० में महायुद्ध छिड़ने पर इन्होंने भारत आकर देहातियों को क्रान्ति सेना में भर्ती होने और सेनाओं को विद्रोह की तैयारी में जुटने के लिए उभारा। बंगाल में रासबिहारी और शचीन्द्रनाथ सान्याल के साथ सहयोग करके स्वतन्त्रता संग्राम की तैयारी की। एक ही दिन विद्रोह के लिए तय भी कर लिया किन्तु समय से पहले भेद खुल गया और काबुल जाते हुए एक छावनी के सैनिकों में सरकार के विरुद्ध प्रचार करते हुए सरदार करतारसिंह पकड़ लिए गए। उस समय उनकी आयु केवल 20 वर्ष की थी। इन पर डाकेजनी तथा सैनिक विद्रोह कराने का अभियोग लगाया तो इन्होंने सब स्वीकार कर लिया और कहा - “हम ब्रिटिश सरकार को भारत पर शासन नहीं करने दे सकते, मैंने इसी कार्य के लिए जनता और सेना को तैयार किया था, इसी के लिए मैं अमेरिका से लौटा था।” जज ने उनके बयान नहीं लिखे, उसे सोचकर बोलने के लिए अगला दिन दिया। अगले दिन भी इस वीर के बयान वही थे। वीरता पर मुग्घ हुए जज ने लिखा कि “यह करतारसिंह 61 अभियुक्तों में सबसे मुख्य है, इसने लगाए सभी आरोप स्वीकार कर लिए हैं। इसे अपने कारनामों पर भारी गर्व है।” फांसी का आदेश सुनकर उसने जज को “थैंक्यू” (आपका धन्यवाद) कहा और मुस्करा दिया।

स्मरण रहे इसी कार्य में भाई परमानन्द भी अभियुक्त थे। उन्होंने अपनी आत्मकथा में


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-834


लिखा है - “करतारसिंह को मैंने अमेरिका में देखा था। हथकड़ी बेड़ी में कसकर जब जेल में लाया गया तो अपने दो साथियों के साथ प्रसन्न होता हुआ और हंसता हुआ जेल में आया। शुरु में इसके पांवों में जंजीर डालकर जेल के दरवाजे से बांधा गया जबकि यह हथकड़ी भी पहने हुए था। भले ही यह 18-20 वर्ष का नौजवान था परन्तु सच तो यह है कि पंजाब में सारी हलचल का वास्तविक लीडर करतारसिंह था। उस लड़के का पुरुषार्थ और साहस आश्चर्यजनक था।”[1]


Life Sketch in English

Kartar Singh Sarabha Grewal was born in a Grewal Sikh family at village Sarabha in the district of Ludhiana, Punjab, on 24 May 1896.

The name of his father was Sardar Mangal Singh, who passed away when Kartar Singh was a small child. His grandfather brought him up with great care. After receiving his primary education in his own village, Kartar Singh entered the Malwa Khalsa High school at Ludhiana for his matriculation. He was in tenth class when he went to live with his uncle in Orissa where he completed his high school level studies and then he joined there for college Education. At the age of about fifteen, his guardian put him on board a ship for America in search of work there. The ship landed at the American port of San Francisco in January 1912. There he started to meet some of the revolutionaries.

On 21 April 1913, the Indians of California assembled and formed the Ghadar Party with the aim to get rid of the slavery of the country from the British yoke by taking to arms and then set up a national democratic government in free India. Their slogan was "Put at stake everything for the freedom of the country." On 1 November 1913, the Ghadar Party started a paper named Ghadar which was a multi-lingual paper. Kartar Singh was also associated with it.

A group of the revolutionaries on return to India, to foment anti British revolution in Indian army, was arrested including therein the young Sarabha and sent to Lahore Jail in the First Lahore conspiracy case.

Along with several others, he was put to trial. He was considered one of the most dangerous of rebels by the British. "He is very proud of the crimes committed by him. He does not deserve mercy and should be sentenced to death". He was hanged in the Central Jail of Lahore on 16 November 1915 at the age of 19.

External links

References



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