Kedarnath

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Author:Laxman Burdak, IFS (R)

Map of Uttarakhand

Kedarnath (केदारनाथ) is a religious town in Uttarakhand and has gained importance because of Kedarnath Temple. It is a nagar panchayat in Rudraprayag district. It is the most remote of the four Char Dham sites of Hinduism.

Variants

Location

Kedarnath is located in the Himalayas, about 3,583 m (11,755 ft) above sea level near Chorabari Glacier, the head of river Mandakini, and is flanked by snow-capped peaks. The nearest road head is at Gaurikund, at a distance of 14 k.m. Kedarnath is located at a distance of 223 km from Rishikesh in Uttarakhand.

The town suffered extensive destruction during June 2013 from flash floods caused by torrential rains in Uttarakhand state.

Origin of name

The name "Kedarnath" means "the lord of the field": it derives from the Sanskrit words kedara ("field") and natha ("lord"). The text Kashi Kedara Mahatmya states that it is so called because "the crop of liberation" grows here.[1]

History

Kedarnath and its temple exist from the Mahabharata era when the Pandavas are supposed to have pleased Lord Shiva by doing penance there. It is one of the most important dhams amongst the Chota Char Dham. The Shiva statue here is considered to be decapitated where as the head is believed to be in Doleshwor Mahadeva Temple in Bhaktapur, Nepal.

Kedarnath has been a pilgrimage centre since the ancient times, although it is not certain who constructed the original Kedarnath temple and when. A mythological account ascribes the temple's construction to the legendary Pandava brothers mentioned in the Mahabharata.[2][3] However, the Mahabharata does not mention any place called Kedarnath. One of the earliest references to Kedarnath occurs in the Skanda Purana (c. 7th-8th century), which names Kedara (Kedarnath) as the place where Shiva released the holy water from his matted hair, resulting in the formation of the Ganges river.[4]

According to the hagiographies based on Madhava's Sankshepa-shankara-vijaya, the 8th century philosopher Adi Shankara died at Kedaranatha (Kedarnath); although other hagiographies, based on Anandagiri's Prachina-Shankara-Vijaya, state that he died at Kanchi. The ruins of a monument marking the purported resting place of Shankara are located at Kedarnath.[5] Kedarnath was definitely a prominent pilgrimage centre by the 12th century, when it is mentioned in Kritya-kalpataru written by the Gahadavala minister Bhatta Lakshmidhara.[6]

केदारनाथ

विजयेन्द्र कुमार माथुर[7] ने लेख किया है ... केदारनाथ (AS, p.323) (जिला रुद्रप्रयाग, उत्तराखंड) - यह उत्तराखंड का प्रसिद्ध तीर्थ है. शिव का भारत प्रसिद्ध मंदिर 11850 फुट की (समुद्र तल से) ऊंचाई पर स्थित है. इस घाटी के अन्य मंदिरों की भांति केदारनाथ के मंदिर पर भी दक्षिण की वास्तु शैली का स्पष्ट प्रभाव है. कुछ लोगों के मत में मंदिर के अग्रभाग के छाजन पर यूनानी कला का प्रभाव दिखाई पड़ता है. किंतु यह मत असंगत है क्योंकि इसकी शैली इस प्रदेश में प्रचलित विशेषकर नेपाली वास्तु शैली से ही प्रभावित है. मंदिर के दो खंड हैं:- पहले खंड में, जिसके ऊपर शिखर स्थित है, शिव की मूर्ति है. बाहर सभामंडप है जहां कई शिलालेख अंकित हैं. मंदिर कत्यूरी शासन के समय में बना जान पड़ता है जैसा कि शिखर की ऊपरली काष्ठवेष्टनी से सूचित होता है. कुछ विद्वानों का मत है कि कत्यूरी काल से पहले यहां कोई मंदिर अवश्य था क्योंकि कई शिलालेख और मूर्तियां बहुत प्राचीन हैं. मंदिर के चारों कोनों पर चार प्रस्तर-स्तंभ हैं. भित्तियाँ बहुत स्थूल हैं. गर्भगृह के द्वार पर चौखट के चारों ओर अनेक मूर्तियां उत्कीर्ण हैं.सभामंडप में भी चार विशाल प्रस्तर-स्तंभ हैं. दीवारों के गोखों में भी मूर्तियां हैं जिन्हें पांडवों की प्रतिमाएं कहा जाता है. मंदिर के बाहर नंदी की विशाल मूर्ति है. केदारनाथ की शिव मूर्ति की गणना शिव के 12 ज्योतिर्लिंग में है. मंदिर के पास आदि शंकराचार्य की समाधि है. कहते हैं कि मंदिर का निर्माण उन्होंने ही करवाया था और यही उनका शरीर अंत हुआ था. समाधि के कोने में उसके निर्माताओं का नाम पट्ट लगा है.

केदारनाथ परिचय

हिमालय सदियों से ऋषि-मुनियों तथा देवताओं की तप:स्थली रहा है। महान् विभूतियों ने यहाँ तपस्या करके आध्यात्मिक शक्ति अर्जित की और विश्व में भारत का गौरव बढ़ाया। उत्तराखण्ड प्रदेश के हिमालय क्षेत्र में चारधाम के नाम से बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री तथा यमुनोत्री प्रसिद्ध हैं। ये तीर्थ देश के सिर-मुकुट में चमकते हुए बहुमूल्य रत्न हैं। इनमें बद्रीनाथ और केदारनाथ तीर्थो के दर्शन का विशेष महत्त्व है। केदारखण्ड में द्वादश (बारह) ज्योतिर्लिंग में आने वाले केदारनाथ दर्शन के सम्बन्ध में लिखा है कि जो कोई व्यक्ति बिना केदारनाथ भगवान का दर्शन किये यदि बद्रीनाथ क्षेत्र की यात्रा करता है, तो उसकी यात्रा निष्फल अर्थात् व्यर्थ हो जाती है- अकृत्वा दर्शनं वैश्वय केदारस्याघनाशिन:। यो गच्छेद् बदरीं तस्य यात्रा निष्फलतां व्रजेत्।।

श्री केदारनाथ जी का मन्दिर पर्वतराज हिमालय की 'केदार' नामक चोटी पर अवस्थित है। इस चोटी की पूर्व दिशा में कल-कल करती उछलती अलकनन्दा नदी के परम पावन तट पर भगवान बद्री विशाल का पवित्र देवालय स्थित है तथा पश्चिम में पुण्य सलिला मन्दाकिनी नदी के किनारे भगवान श्री केदारनाथ विराजमान हैं। अलकनन्दा और मंदाकिनी उन दोनों नदियों का पवित्र संगम रुद्रप्रयाग में होता है और वहाँ से ये एक धारा बनकर पुन: देवप्रयाग में ‘भागीरथी-गंगा’ से संगम करती हैं। देवप्रयाग में गंगा उत्तराखण्ड के पवित्र तीर्थ 'गंगोत्री' से निकलकर आती है। देवप्रयाग के बाद अलकनन्दा और मंदाकिनी का अस्तित्त्व विलीन होकर गंगा में समाहित हो जाता है तथा वहीं गंगा प्रथम बार हरिद्वार की समतल धरती पर उतरती हैं। भगवान केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन के बाद बद्री क्षेत्र में भगवान नर-नारायण का दर्शन करने से मनुष्य के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। और उसे जीवन-मुक्ति भी प्राप्त हो जाती है। इसी आशय को शिव पुराण के कोटि रुद्र संहिता में भी व्यक्त किया गया है- तस्यैव रूपं दृष्ट्वा च सर्वपापै: प्रमुच्यते। जीवन्मक्तो भवेत् सोऽपि यो गतो बदरीबने।। दृष्ट्वा रूपं नरस्यैव तथा नारायणस्य च। केदारेश्वरनाम्नश्च मुक्तिभागी न संशय:।।[8]

वास्तु शिल्प: केदारेश्वर (केदारनाथ) ज्योतिर्लिंग के प्राचीन मन्दिर का निर्माण पाण्डवों ने कराया था, जो पर्वत की 11750 फुट की ऊँचाई पर अवस्थित है। पौराणिक प्रमाण के अनुसार ‘केदार’ महिष अर्थात् भैंसे का पिछला अंग (भाग) है। केदारनाथ मन्दिर की ऊँचाई 80 फुट है, जो एक विशाल चौकोर चबूतरे पर खड़ा है। इस मन्दिर के निर्माण में भूरे रंग के पत्थरों का उपयोग किया गया है। सबसे बड़े आश्चर्य की बात यह है कि, यह भव्य मन्दिर प्राचीन काल में यान्त्रिक साधनों के अभाव में ऐसे दुर्गम स्थल पर उन विशाल पत्थरों को लाकर कैसे स्थापित किया गया होगा? यह भव्य मन्दिर पाण्डवों की शिव भक्ति, उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति तथा उनके बाहुबल का जीता जागता प्रमाण है।

केदारनाथ मन्दिर: इस मन्दिर में उत्तम प्रकार की कारीगरी की गई है। मन्दिर के ऊपर स्तम्भों में सहारे लकड़ी की छतरी निर्मित है, जिसके ऊपर ताँबा मढ़ा गया है। मन्दिर का शिखर (कलश) भी ताँबे का ही है, किन्तु उसके ऊपर सोने की पॉलिश की गयी है। मन्दिर के गर्भ गृह में केदारनाथ का स्वयंमभू ज्योतिर्लिंग है, जो अनगढ़ पत्थर का है। यह लिंगमूर्ति चार हाथ लम्बी तथा डेढ़ हाथ मोटी है, जिसका स्वरूप भैंसे की पीठ के समान दिखाई पड़ता है। इसके आस-पास सँकरी परिक्रमा बनी हुई है, जिसमें श्रद्धालु भक्तगण प्रदक्षिणा करते हैं। इस ज्योतिर्लिंग के सामने जल, फूल, बिल्वपत्र आदि को चढ़ाया जाता है और इसके दूसरे भाग में यात्रीगण घी पोतते हैं। भक्त लोग इस लिंगमूर्ति को अपनी बाँहों में भरकर भगवान से मिलते भी हैं।

अन्य मंदिर और कुण्ड: मन्दिर के जगमोहन में द्रौपदी सहित पाँच पाण्डवों की विशाल मूर्तियाँ हैं। केदारनाथ-मन्दिर के प्रवेश द्वार पर नन्दी की विशाल प्रतिमा स्थापित है और वहाँ से दक्षिण की ओर एक पहाड़ी पर श्री भैरव जी का एक सुन्दर मन्दिर है। केदारनाथ-मन्दिर के द्वार पर दोनों ओर द्वारपालों की मूर्तियाँ हैं। केदारनाथ की श्रृंगार मूर्ति पाँच मुखवाली है और इसे हमेशा वस्त्र तथा आभूषणों से सजाया जाता है। मन्दिर में उक्त मूर्तियों के अतिरिक्त पन्द्रह अन्य देवमूर्तियाँ भी स्थापित हैं। मन्दिर से पीछे लगभग तीन हाथ लम्बा एक कुण्ड है, जिसे 'अमृतकुण्ड' कहा जाता है। इस अमृतकुण्ड में दो शिवलिंग हैं। इनके पूर्व और उत्तर भाग में 'हंसकुण्ड' और 'रेतसकुण्ड' स्थित हैं। यहाँ की परम्परा है कि रेतसकुण्ड में पैर (जंघा) टेककर बायें हाथ से तीन आचमन किये जाते हैं। यहीं पर ईशानेश्वर-महादेव की प्रतिमा विराजमान है। वासुकी ताल केदारनाथ से 8 किमी की दूरी पर और समुद्रतल से 4135 मी की ऊँचाई पर स्थित है। यह झील शानदार हिमालय पर्वतश्रृंखलाओं के बीच स्थित है और उत्तराखण्ड का महत्वपूर्ण पर्यटक गंतव्य है।

केदारनाथजी के मन्दिर के सामने एक छोटे मन्दिर में 'उदक कुण्ड' है। इस कुण्ड में भी रेतसकुण्ड के समान ही आचमन लेने की प्रथा प्रचलित है। इस मन्दिर के पीछे मीठे जल का एक कुण्ड स्थित है, जिसका पानी भक्तगण पीते हैं। श्रावण के महीने में केदारेश्वर की पूजा गंगाजल, बिल्वपत्र तथा ब्रह्मकमल के फूलों से की जाती है। केदारघाटी के इस क्षेत्र में पंचकेदार (पाँच केदारनाथ) प्रसिद्ध हैं, जिनके स्थान मन्दिर और शिवलिंगों का अपना-अपना विशेष महत्त्व है।

गंगोत्री और यमुनोत्री: उत्तराखण्ड के चारों धाम की यात्रा में पहले यमुनोत्री की यात्रा का विधान है। गंगोत्री, यमुनोत्री तीर्थों के बाद भक्तगण केदारनाथ का दर्शन करते हैं, फिर अन्त में बद्रीनाथ जाते हैं।

गंगोत्री से केदारनाथ जाने के लिए दो मोटर मार्ग हैं। प्रथम मार्ग गंगोत्री से भैरोघाटी, हरसिल, भटवाड़ी, उत्तरकाशी, धरासू, टिहरी, घनसाली, चिरबटिया, अगस्त्यमुनि, गुप्तकाशी, फोटा, सोनप्रयाग, गौरीकुण्ड तथा गरुड़चट्टी होकर केदारनाथ पहुँचता है। इस रास्ते की कुल दूरी 348 किलोमीटर बैठती है। गंगोत्री से केदारनाथ जाने के लिए एक दूसरा मार्ग भी है, जिसकी कुल दूरी 343 किलोमीटर पड़ती है। गंगोत्री से भैरवघाटी, उत्तरकाशी, धरासू, टिहरी, श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, तिलवाड़ा और गौरी कुण्ड होते हुए केदारनाथ पहुँचा जाता है।

कोटद्वार से केदारनाथ: कोटद्वार से दुगड्डा, पौडी, श्रीनगर, गुप्तकाशी और गौरीकुण्ड होकर केदारनाथ जाने का भी मार्ग है। रुद्रप्रयाग 171 किलोमीटर पड़ता है, जबकि रुद्रप्रयाग से गौरीकुण्ड की दूरी 70 किलोमीटर। गुप्तकाशी की ऊँचाई समुद्रतल से 1479 मीटर है। केदारनाथ के लिए यात्रियों को गोचर से हेलिकाप्टर-सेवा भी उपलब्ध है। किसी भी मार्ग से यात्रा की जाये, किन्तु गौरीकुण्ड चौदह किलोमीटर पैदल चलकर ही केदारनाथ पहुँचना पड़ता हैं।

संदर्भ: भारतकोश-केदारनाथ

क्षीरगंगा

विजयेन्द्र कुमार माथुर[9] ने लेख किया है ...क्षीरगंगा (AS, p.249) केदारनाथ, गढ़वाल मंडल, उत्तर प्रदेश के निकट बहने वाली नदी.

Places of interest

  • Bhairava temple - Other than Kedarnath temple, on the eastern side of the town is Bhairava temple and the deity of this temple, the Bhairava, is believed to protect the town during winter months.
  • Gandhi Sarovar - About 6 k.m. upstreams from the town, lies Chorabari Tal, a lake cum glacier also called Gandhi Sarovar.
  • Bhairav Jhamp - Near Kedarnath, there is a cliff called Bhairav Jhamp, from where pilgrims used to jump to death, believed to get instant moksha or salvation and this practice was banned by British Government in the 19th century.

In Mahabharata

Kedara (केदार) in Mahabharata (III.81.59), (III.83.15),

Kedara Ashrama (केदार आश्रम) (Tirtha) in Mahabharata (III.85.19),


Vana Parva, Mahabharata/Book III Chapter 81 mentions names of Tirthas (Pilgrims). Kedara (केदार) is mentioned in Mahabharata (III.81.59). [10]... O bull among men, with pure mind and subdued soul, as also in the tirtha called Kedara (केदार) (3.81.59) of the high-souled Kapila, and beholding Brahma who is there, one's soul being purified from all sins, one goeth to the abode of Brahma. Proceeding next to the inaccessible tirtha called Kedara of Kapila, and burning one's sins (p. 177) there by ascetic penances, one acquireth the power of disappearance at will.


Vana Parva, Mahabharata/Book III Chapter 83 mentions names of Pilgrims. Kedara (केदार) is mentioned in Mahabharata (III.83.15). [11]....Here is Matanga's tirtha called Kedara (केदार) (III.83.15), O son of the Kuru race! Bathing in it, O foremost of the Kurus, a man obtaineth the merit of giving away a thousand kine. Going to the mountain Sree, one who toucheth the waters of the stream that is there by worshipping there the god having the bull for his mark obtaineth the merit of the horse-sacrifice.


Vana Parva, Mahabharata/Book III Chapter 85 mentions sacred asylums, tirthas, mountans and regions of eastern country. Kedara Ashrama (केदार आश्रम) (Tirtha) is mentioned in Mahabharata (III.85.19).[12]....In that direction also lieth the high-souled Matanga's excellent asylum, called Kedara (केदार) (III.85.19) which is sacred and auspicious and celebrated over the world.

References

  1. Diana L. Eck (2013). Banaras: City of Light. Knopf Doubleday. pp. 185–186. ISBN 978-0-307-83295-5.
  2. J. Gordon Melton; Martin Baumann, eds. (2010). Religions of the World: A Comprehensive Encyclopedia of Beliefs and Practices. 1 (A-B) (2nd ed.). ABC-CLIO. p. 1624. ISBN 978-1-59884-204-3.
  3. James G. Lochtefeld (2002). The Illustrated Encyclopedia of Hinduism: A-M. Rosen. pp. 363–364. ISBN 978-0-8239-3179-8.
  4. Alex McKay (2015). Kailas Histories: Renunciate Traditions and the Construction of Himalayan Sacred Geography. BRILL. p. 135. ISBN 978-90-04-30618-9.
  5. N. V. Isaeva (1993). Shankara and Indian Philosophy. SUNY Press. pp. 90–91. ISBN 978-0-7914-1282-4.
  6. Edward Quinn (2014). Critical Companion to George Orwell. Infobase. p. 232. ISBN 978-1-4381-0873-5.
  7. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.323
  8. शिव पुराण, कोटि रुद्र संहिता, 19/20-21
  9. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.249
  10. तत्र सप्तर्षिकुण्डेषु सनातस्य कुरुपुंगव, केदारे चैव राजेन्द्र कपिष्ठल महात्मनाः (III.81.59)
  11. मतङ्गस्य तु केदारस तत्रैव कुरुनन्दन, तत्र सनात्वा नरॊ राजन गॊसहस्रफलं लभेत (III.83.15)
  12. पवित्रॊ मङ्गलीयश च खयातॊ लॊके सनातनः, केदारश च मतङ्गस्य महान आश्रम उत्तमः (III.85.19)