Konark

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Author:Laxman Burdak, IFS (R)

Puri district Map

Konark (कोणार्क) is a town in the Puri district in Odisha, India.

Variants

  • Arkakshetra (आर्कक्षेत्र) = Padmakshetra (पद्मक्षेत्र) = Konark (कोणार्क) (AS, p.39)
  • Konark (कोणार्क) (उड़ीसा) (AS, p.233)
  • Konakona (कोनकोन) दे. Konark कोणार्क (AS, p.235)

Location

It lies on the coast by the Bay of Bengal, 60 kms from the capital of the state, Bhubaneswar. It is the site of the 7th-century Sun Temple, also known as the Black Pagoda, built in black granite during the reign of Narasimhadeva-I. The temple is a World Heritage Site. The temple is now mostly in ruins, and a collection of its sculptures is housed in the Sun Temple Museum, which is run by the Archaeological Survey of India.

Origin

The name Konârka is derived from the Sanskrit word Kona (meaning angle) and word Arka (meaning sun) in reference to the temple which was dedicated to the Sun god Surya.[7]

History

In 1559, Mukunda Gajapati came to throne in Cuttack. He aligned himself as an ally of Akbar and an enemy of the Sultan of Bengal, Sulaiman Khan Karrani. After a few battles, Odisha finally fell. The fall was also aided by the internal turmoil of the state. In 1568, the Konark temple was damaged by the army of Kalapahad, a general of the Sultan.[1] Kalapahad is also said to be responsible for damages to several other temples during the conquest.

Konark Sun Temple

The Sun Temple was built in the 13th century and designed as a gigantic chariot of the Sun God, Surya, with twelve pairs of ornamented wheels pulled by seven horses. Some of the wheels are 3 meters wide. Only six of the seven horse still stand today. The temple fell into disuse after an envoy of Jahangir desecrated the temple in the early 17th century.

There was a diamond in the centre of the idol which reflected the sun rays that passed. In 1627, the then Raja of Khurda took the Sun idol from Konark to the Jagannath temple in Puri.The Sun temple belongs to the Kalingan school of Indian temple architecture. The alignment of the Sun Temple is along the East-West direction. The inner sanctum or vimana used to be surmounted by a tower or shikara but it was razed in the 19th century. The audience hall or jagamohana still stands and comprises majority of the ruins. The roof of the dance hall or natmandir has fallen off. It stands at the eastern end of the ruins on a raised platform.

Sun temples in Jat History

Bhim Singh Dahiya [2] writes....When the Jats under Kasvans (Kushanas) come to the Indian border they were worshipping the Ksun, Skando, Kumaro, Mahaseno and Bizago gods, corresponding to the Sanskrit Surya, Skanda, Kumara, Mahasen, and Vishakha respectively. Skanda and Vishakha are mentioned by Panini as Laukika Devata i.e. popular gods. Skanda Kartikeya is the tutelary god of the brave Yaudheyas, the residents of Rohtak, and was definitely connected with the Sun-god, as is clear from the seals found by J. Marshall at Bhita, which have the legend, "Sri Skandasuryasya". The Ksun (Sun) temple of the Jats at Gandhara seen by the Chinese pilgrims, who praised its reliious importance in the nearby areas9 and


9. BRWW, Vol. II, pp. 284-85.


[p.87]: the Sun temple at Multan, built by the Jauhla/Johla Jats under Toramana and Mihirakula. In 505 A.D. 10 are too well known to need further details. The Sun temple at Mathura and Gwalior were built by them; and we may yet find evidence showing that the Konark, (Orissa) Sun temple too, was built by the Jats of Tank clan, whose numerous coins 'Tank' gave the name of 'Taka' to Indian coins. Historians agree that these Tanks/Taks, were Kusanas and are called the "Puri- Kusanas". Our purpose here is to show the predominant sun worship of the Jats- a thing which is common with the pre-Christianised Russians and the ancient Aryans. Their (Massagetae) only god was the Sun-god and they sacrificed horses to him. This fact shows that these Massagetae were identical to the race which brought to India the worship of the Sun.... and which celebrated in his honour the Asvamedha or horse sacrifice ritual described in the Rig Veda11 It is interesting to note that the sacrifice of the horse, especially a white horse on the top of the mountain, is mentioned as an act of good faith and seal of treaty of friendship between the Hunas and Chinese, even in later period.12


10. Chachnama.

11. Rig Veda, I, 162, 2, 3, 18.

12. J.F. Hewitt, The Ruling Races of Pre-historic Times, p. 483.

कोणार्क

विजयेन्द्र कुमार माथुर[3] ने लेख किया है ... कोणार्क (AS, p.233) उड़ीसा राज्य की प्राचीन राजधानी था। किंवदन्ती के अनुसार चक्रक्षेत्र (जगन्नाथपुरी) के उत्तरपूर्वी कोण में यहाँ अर्क या सूर्य का मन्दिर स्थित होने के कारण इस स्थान को कोणार्क कहा जाता था। पुराणों में कोणार्क को मैत्रेयवन और पद्मक्षेत्र भी कहा गया है.

एक कथा में वर्णन है कि इस क्षेत्र में सूर्योपासना के फलस्वरूप श्रीकृष्ण के पुत्र सांब का कुष्ठ रोग दूर हो गया था और यहीं चंद्रभागा में बहते हुए कमल पत्र पर उसे सूर्य की प्रतिमा मिली थी। आइना-ए-अकबरी में अबुल फ़ज़ल लिखता है कि यह मन्दिर अकबर के समय से लगभग सात सौ तीस वर्ष पुराना था, किन्तु मंडलापंजी नामक उड़ीसा के प्राचीन इतिहास-ग्रंथों के आधार पर यह कहना अधिक समीचीन होगा कि इस मन्दिर को गंगावंशीय लांगुल नरसिंह देव ने बंगाल के नवाब तुग़ानख़ाँ पर अपनी विजय के स्मारक के रूप में बनवाया था। इसका शासन काल 1238-1264 ई. में माना जाता है। एक ऐतिहासिक अनुश्रुति में मन्दिर के निर्माण की तिथि शक संवत 1204 (=1126 ई.) मानी गई है। जान पड़ता है कि मूलरूप में इससे भी पहले इस स्थान पर प्राचीन सूर्य मन्दिर था। सातवीं शती ई. में चीनी यात्री युवानच्वांग कोणार्क आया था। उसने इस नगर का नाम चेलितालों लिखते हुए उसका घेरा 20ली बताया है। उस समय यह नगर एक राजमार्ग पर स्थित था और समुद्रयात्रा पर जाने वाले पथिकों या व्यापारियों का विश्राम स्थल भी था। मन्दिर का शिखर बहुत ऊँचा था और उसमें अनेक मूर्तियाँ प्रतिष्ठित थीं। जगन्नाथपुरी मन्दिर में सुरक्षित उड़ीसा के प्राचीन इतिहास ग्रंथों से पता चलता है कि सूर्य और चंद्र की मूर्तियों को भयवंशीय नरेश नृसिंहदेव के समय (1628-1652) में पुरी ले जाया गया था।

1824 ई. में स्टार्लिंग नामक अंग्रेज ने इस मंदिर को देखा था. उस समय यह नष्टप्राय अवस्था में था. वह लिखता है कि 'मंदिर के ध्वस्त होने का कारण स्थानीय लोग यह बताते हैं कि प्राचीन काल में इस मंदिर के उच्च शिखर पर एक विशाल चुंबक लगा हुआ था जिसके कारण निकटवर्ती समुद्र में चलने वाले जलयान खींचकर रेतीले किनारे पर लग जाया करते थे. मुगलकाल में एक जहाज के मल्लाहों ने इस आपत्ति से बचने के लिए मंदिर के शिखर का चुंबक उतार दिया और शिखर को भी तोड़-फोड़ डाला. मंदिर के पुजारियों ने इस घटना को अपशकुन मानते हुये मूर्तियों को भी मंदिर से हटाकर पुरी भेज दिया.' स्टार्लिंग ने अपने समय की बचीखुची मूर्तियों की सुंदर कला को सराहा है. वह लिखता है कि कोणार्क की मूर्तिकारी की तुलना गोथिक मूर्तिकला की अलंकरण रचनाओं के सर्वोत्कृष्ट

[p.234]: उदाहरणों से सरलता से की जा सकती है. कोणार्क के सूर्य मंदिर को कृष्ण मंदिर या ब्लैक पैगोडा भी कहते हैं. इसकी आकृति सूर्य के रथ के अनुरूप है. इसके विशाल एवं भव्य-चक्रों पर जो मनोरम मूर्तिकारी अंकित है वह सर्वथा अभूतपूर्व एवं अनोखी है. मंदिर का शिखर 'आमलक' प्रकार का है जिसके ऊपर अमृतकलश आधृत है. मंदिर में उड़ीसा की प्राचीन मंदिर निर्माण शैली के अनुरूप ही स्तंभों का अभाव है. कोणार्क का मंदिर भारत के सुंदरतम प्राचीन स्मारकों में से है. इसका विशेष वर्णन नीचे दिया जाता है.

मंदिर का विशेष वर्णन: प्राचीन जनश्रुतियों के अनुसार 1200 कलाकारों ने इस मंदिर का निर्माण किया था. उन्होंने रातदिन परिश्रम करके इसे बनाया था किंतु इसके निर्माण का कार्य इतना विराट था कि मंदिर फिर भी पूरा न बन सका. मंदिर को बनाने के समय चंद्रभागा और चित्रोत्पला नदियों का प्रवाह रोकना पड़ा था. कहा जाता है कि इस मंदिर पर कुल 12 सौ करोड़ रुपए हुआ था. शायद संसार के इतिहास में किसी एक भवन के निर्माण में इतना धन व्यय नहीं हुआ. मंदिर की संरचना सूर्यदेव के विराट रथ या विमान के सात अश्वों के परिचायक रूप हैं.

एक किंवदंती है कि कोणार्क का प्राचीन नाम कोन-कोन था. सूर्य (अर्क) के मंदिर बन जाने से यह नाम कोनार्क या कोणार्क हो गया. सूर्य मंदिर के दो भाग हैं-- रेखा अथवा शिखर और भद्र अथवा जगमोहन, जिसके ऊपर शिखर निर्मित है. तांत्रिक मत के अनुसार (तांत्रिकों का प्रभाव उड़ीसा में काफी समय तक रहा है) मंदिर के दोनों भाग पुरुष और स्त्रीत्व के वास्तु-प्रतीक हैं जो अभिन्न रूप में जुड़े हैं. रेखा भाग 180 और भद्र 140 फुट ऊँचा है. मंदिर के चतुर्दिक परकोटा खिंचा हुआ है और पूर्व, दक्षिण और उत्तर की ओर इसके प्रवेश द्वार हैं. मुख्य द्वार पूर्व की ओर है जहां हाथी की पीठ पर आसीन सिंहों की मूर्तियां निर्मित हैं. दक्षिणी प्रवेश द्वार पर दो अश्वमूर्तियाँ और उत्तरी द्वार पर मनुष्यों को सूंड पर उठाए हुए दो हाथी प्रदर्शित हैं. पहले सभी द्वारों पर मूर्तियां उत्कीर्ण थीं किंतु अब केवल पूर्वी द्वार पर ही नक्काशी शेष है. द्वार के ऊपर नवग्रहों का अंकन था. (यह मूर्तिखंड कोणार्क के संग्रहालय में है). इसके ऊपर, सूर्य देव की पद्मासनस्ठ मूर्ति गोखा में स्थित थी.

मंदिर के सामने एक मंडप था जिसे 18वीं सदी में मराठों ने पुरी भेज दिया था. जगमोहन के आगे एक नाट्य मंदिर है जिसकी तक्षणकला

[p.235]: सराहनीय है. मंदिर के आधार के निम्नतम भाग में वन्य पशुओं तथा हाथियों के आखेट के जीवंत मूर्तिचित्र हैं. इसके ऊपर अनेक मूर्तियां विभिन्न प्रणयमुद्राओं में अंकित हैं जिससे मंदिर पर तांत्रिक प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है. मंदिर मध्ययुगीन होते हुए भी गुप्तकालीन वास्तु परंपरा का उदाहरण है. अबुलफ़ज़ल इसके लिए ठीक ही लिखा है कि कला के आलोचक इस मंदिर को देखकर आश्चर्यचकित रह जाते हैं. वास्तव में यह अद्भुत कलाकृति अपने महान निर्माता के स्वप्न की साकार अभिव्यक्ति जान पड़ती है.

सूर्य मंदिर कोणार्क का परिचय

कोणार्क का सूर्य मंदिर भारत के उड़ीसा राज्य के पुरी ज़िले के कोणार्क नामक क़स्बे में स्थित है। सूर्य मंदिर अपने निर्माण के 750 साल बाद भी अपनी अद्वितीयता, विशालता व कलात्मक भव्यता से हर किसी को निरुत्तर कर देता है। वास्तव में जिसे हम कोणार्क के सूर्य मन्दिर के रूप में पहचानते हैं, वह पार्श्व में बने उस सूर्य मन्दिर का जगमोहन या महामण्डप है, जो कि बहुत पहले ध्वस्त हो चुका है। कोणार्क का सूर्य मंदिर को अंग्रेज़ी में ब्लैक पैगोडा भी कहा जाता है।

पुराविद व वास्तुकार मन्दिर की संरचना, मूर्तिशिल्प व पत्थरों पर उकेरी आकृतियों को वैज्ञानिक, तकनीकी व तार्किक कसौटी पर कसने के बाद तथ्यों को दुनिया के सामने रखते रहे हैं और यह क्रम लगातार जारी है। बहरहाल इस महामण्डप या जगमोहन की विराटता व भग्न हो चुके मुख्य मन्दिर के आधार पर उत्कीर्ण सज्जा से ही इसे यूनेस्को के विश्व विरासत स्थल की पहचान मिली है।

भारत से ही नहीं बल्कि दुनिया भर से लाखों पर्यटक इसको देखने कोणार्क आते हैं। कोणार्क में बनी इस भव्य कृति को महज देखकर समझना कठिन है कि यह कैसे बनी होगी। इसे देखने का आनन्द तभी है जब इसके इतिहास की पृष्ठभूमि में जाकर इसे देखा जाए।

स्थापना: सूर्य मंदिर को गंग वंश के राजा नरसिम्हा देव प्रथम ने लगभग 1278 ई. में बनवाया था। कहा जाता है कि ये मंदिर अपनी पूर्व निर्धारित अभिकल्पना के आधार पर नहीं बनाया जा सका। मंदिर के भारी गुंबद के हिसाब से इसकी नींव नहीं बनी थी। यहाँ के स्थानीय लोगों की मानें तो ये गुम्बद मंदिर का हिस्सा था पर इसकी चुम्बकीय शक्ति की वजह से जब समुद्री पोत दुर्घटनाग्रस्त होने लगे, तब ये गुम्बद हटाया गया। शायद इसी वज़ह से इस मंदिर को ब्लैक पैगोडा भी कहा जाता है।

वास्तु रचना: स्थान चयन से लेकर मन्दिर निर्माण सामग्री की व्यवस्था और मूर्तियों के निर्माण के लिए बड़ी योजना को रूप दिया गया। चूँकि उस काल में निर्माण वास्तुशास्त्र के आधार पर ही होता था, इसलिए मन्दिर निर्माण में भूमि से लेकर स्थान व दिन चयन में निर्धारित नियमों का पालन किया गया। इसके निर्माण में 1200 कुशल शिल्पियों ने 12 साल तक लगातार काम किया। शिल्पियों को निर्देश थे कि एक बार निर्माण आरम्भ होने पर वे अन्यत्र न जा सकेंगे। निर्माण स्थल में निर्माण योग्य पत्थरों का अभाव था। इसलिए सम्भवतया निर्माण सामग्री नदी मार्ग से यहाँ पर लाई गई। इसे मन्दिर के निकट ही तराशा गया। पत्थरों को स्थिरता प्रदान करने के लिए जंगरहित लोहे के क़ब्ज़ों का प्रयोग किया गया। इसमें पत्थरों को इस प्रकार से तराशा गया कि वे इस प्रकार से बैठें कि जोड़ों का पता न चले।


सूर्यमन्दिर भारत का इकलौता सूर्य मन्दिर है जो पूरी दुनिया में अपनी भव्यता और बनावट के लिए जाना जाता है। सूर्य मन्दिर उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर से 65 किलोमीटर दूर कोणार्क में अपने समय की उत्कृष्ट वास्तु रचना है। पूर्वी गंग वंश के राजा नरसिंह देव प्रथम ने सूर्य मन्दिर को तेरहवीं शताब्दी में बनवाया था। प्राचीन उड़िया स्थापत्य कला का यह मन्दिर बेजोड़ उदाहरण है। सूर्य मन्दिर की रचना इस तरह से की गई है कि यह सभी को आकर्षित करती है। सूर्य को ऊर्जा, जीवन और ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। सूर्य देवता की सभी संस्कृतियों में पूजा की जाती रही है। सूर्य की इस मन्दिर में मानवीय आकार में मूर्ति है जो अन्य कहीं नहीं है।

इस मंदिर को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि अपने सात घोड़े वाले रथ पर विराजमान सूर्य देव अभी-अभी कहीं प्रस्थान करने वाले हैं। यह मूर्ति सूर्य मन्दिर की सबसे भव्य मूतियों में से एक है। सूर्य की चार पत्नियाँ रजनी, निक्षुभा, छाया और सुवर्चसा मूर्ति के दोनों तरफ़ हैं। सूर्य की मूर्ति के चरणों के पास ही रथ का सारथी अरुण भी उपस्थित है।

कोणार्क का अर्थ: कोणार्क शब्द, 'कोण' और 'अर्क' शब्दों के मेल से बना है। अर्क का अर्थ होता है सूर्य जबकि कोण से अभिप्राय कोने या किनारे से रहा होगा। कोणार्क का सूर्य मंदिर पुरी के उत्तर पूर्वी किनारे पर समुद्र तट के क़रीब निर्मित है।

निर्माण सम्बन्धी अनुश्रुतियाँ: मुख्य मन्दिर की संरचना को लेकर अनेक कहानियाँ प्रचलित हैं। कहा जाता है कि जहाँ पर मुख्य मन्दिर था, उसके गर्भगृह में सूर्यदेव की मूर्ति ऊपर व नीचे चुम्बकीय प्रभाव के कारण हवा में दोलित होती थी। प्रात: सूर्य की किरणें रंगशाला से होते हुए वर्तमान में मौजूद जगमोहन से होते हुए कुछ देर के लिए गर्भगृह में स्थित मूर्ति पर पड़ती थीं। समुद्र का तट उस समय मन्दिर के समीप ही था, जहाँ बड़ी नौकाओं का आवागमन होता रहता था। अक्सर चुम्बकीय प्रभाव के कारण नौकाओं के दिशा मापक यन्त्र दिशा का ज्ञान नहीं करा पाते थे। इसलिए इन चुम्बकों को हटा दिया गया और मन्दिर अस्थिर होने से ध्वस्त हो गया। इसकी ख्याति उत्तर में जब मुग़लों तक पहुँची तो उन्होंने इसे नष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 16वीं सदी के मध्य में मुग़ल आक्रमणकारी कालापहाड़ ने इसके आमलक को नुक़सान पहुँचाया व कई मूर्तियों को खण्डित किया, जिसके कारण मन्दिर का परित्याग कर दिया गया। इससे हुई उपेक्षा के कारण इसका क्षरण होने लगा। कुछ विद्वान मुख्य मन्दिर के टूटने का कारण इसकी विशालता व डिजाइन में दोष को बताते हैं।

जो रेतीली भूमि में बनने के कारण धँसने लगा था, लेकिन इस बारे में एक राय नहीं है। कुछ का यह मानना है कि यह मन्दिर कभी पूर्ण नहीं हुआ, जबकि आईने अकबरी में अबुल फ़ज़ल ने इस मन्दिर का भ्रमण करके इसकी कीर्ति का वर्णन किया है। कुछ विद्वानों का मत है कि काफ़ी समय तक यह मन्दिर अपने मूल स्वरूप में ही था। ब्रिटिश पुराविद फ़र्ग्युसन ने जब 1837 में इसका भ्रमण किया था, तो उस समय मुख्य मन्दिर का एक कोना बचा हुआ था, जिसकी ऊँचाई उस समय 45 मीटर बताई गई। कुछ विद्वान मुख्य मन्दिर के खण्डित होने का कारण प्रकृति की मार यथा भूकम्प व समुद्री तूफ़ान आदि को मानते हैं। लेकिन इस क्षेत्र में भूकम्प के बाद भी निकटवर्ती मन्दिर कैसे बचे रह गए, यह विचारणीय है। गिरने का अन्य कारण इसमें कम गुणवत्ता का पत्थर प्रयोग होना भी है, जो काल के थपेड़ों व इसके भार को न सह सका। किन्तु एक सर्वस्वीकार्य तथ्य के अनुसार समुद्र से ख़ारे पानी की वाष्प युक्त हवा के लगातार थपेड़ों से मन्दिर में लगे पत्थरों का क्षरण होता चला गया और मुख्य मन्दिर ध्वस्त हो गया। यह प्रभाव सर्वत्र दिखाई देता है।

कोणार्क उड़ीसा की प्राचीन वास्तुशैली का विशिष्ट मन्दिर है, जिसमें मन्दिर में मुख्य मन्दिर, महामण्डप, रंगशाला व सटा भोगमण्डप होते थे। इनमें से ज़्यादातर में जगमोहन व मुख्य मन्दिर एक साथ जुड़े होते थे। कोणार्क मन्दिर में थोड़ी भिन्नता है। यहाँ पर जगमोहन व मुख्य मन्दिर सटे थे। पूर्व में स्थित प्रवेश द्वार के बाद नाट्यमण्डप हैं। द्वार पर दोनों ओर दो विशालकाय सिंह एक हाथी को दबोचे हैं। नाट्यमण्डप पर स्तम्भों को तराश कर विभिन्न आकृतियों से सज्जित किया गया है। मन्दिर का भोगोंडप मन्दिर से पृथक् निर्मित है। मुख्य सूर्य मन्दिर में महामण्डप व मुख्य मन्दिर जुड़े थे, जबकि भोगमण्डप रथ से पृथक् था।

मन्दिर की विशेषता: मन्दिर को रथ का स्वरूप देने के लिए मन्दिर के आधार पर दोनों ओर एक जैसे पत्थर के 24 पहिए बनाए गए। पहियों को खींचने के लिए 7 घोड़े बनाए गए। इन पहियों का व्यास तीन मीटर है। मन्दिर के डिजायन व अंकरण में उस समय के सामाजिक व सांस्कृतिक परिवेश का ध्यान रखा गया। आधार की बाहरी दीवार पर लगे पत्थरों पर विभिन्न आकृतियों को इस प्रकार से उकेरा गया कि वे जीवन्त लगें। इनमें कुछ स्थानों पर खजुराहो की तरह कामातुर आकृतियाँ तो कहीं पर नारी सौंदर्य, महिला व पुरुष वादकों व नर्तकियों की विभिन्न भाव-भंगिमाओं को उकेरा गया।

इसके अलावा इसमें मानव, पेड़-पौधों, जीव-जन्तुओं के साथ पुष्पीय व ज्यामितीय अंकरण हैं। मन्दिर का महामण्डप चबूतरे सहित कुल 39 मीटर है। इसकी विशालता से मुख्य मन्दिर की ऊँचाई का अनुमान लगाया जा सकता है, जो सम्भवतया लिंगराज व पुरी से भव्य रहा होगा। पुरातत्त्ववेत्ता महामण्डप के पीछे इस रेखा मन्दिर या उर्ध्व मन्दिर की ऊँचाई 65 मीटर तक मानते हैं। इस भग्न मन्दिर के एक ओर साढ़े तीन मीटर ऊँची सूर्यदेव की मूर्ति बेहद आकर्षक हैं। इस मन्दिर की मूर्तियाँ लेहराइट, क्लोराइट और खोण्डोलाइट नाम के पत्थरों से बनाई गई हैं। कोर्णाक में ये पत्थर नहीं पाए जाते, इसलिए यह अनुमान लगाया जाता है कि नरसिंह देव ने इसे बाहर से मंगवाया होगा। इस मन्दिर के तीन हिस्से हैं-

1. नृत्यमन्दिर, 2. जगमोहन, 3. गर्भगृह।

मन्दिर का महामण्डप बेहद आकर्षक है, जिसका शीर्ष पिरामिड के आकार का है। इसमें विभिन्न स्तरों पर सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, शनि आदि नक्षत्रों की प्रतिमाएँ हैं। इसके ऊपर विशाल आमलक है। समीप ही सूर्य की पत्नी मायादेवी व वैष्णव मन्दिर खण्डित अवस्था में है। समीप में भोगमण्डप था। एक नवग्रह मन्दिर भी यहाँ पर है।

नाट्य शाला: जैसे ही इस मंदिर के पूर्वी प्रवेश द्वार से आप घुसेंगे तो सामने एक नाट्य शाला दिखाई देती है जिसकी ऊपरी छत अब नहीं है। 'कोणार्क नृत्योत्सव' के समय हर साल यहाँ देश के नामी कलाकार अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते है।

मान्यताएँ: सूर्यमन्दिर के निर्माण में 1200 कुशल शिल्पियों ने 12 साल तक लगातार काम किया। शिल्पियों को निर्देश थे कि एक बार निर्माण आरम्भ होने पर वे अन्यत्र न जा सकेंगे। निर्माण स्थल में निर्माण योग्य पत्थरों का अभाव था। इसलिए सम्भवतया निर्माण सामग्री नदी मार्ग से यहाँ पर लाई गई। इसे मन्दिर के निकट ही तराशा गया। पत्थरों को स्थिरता प्रदान करने के लिए जंगरहित लोहे के क़ब्ज़ों का प्रयोग किया गया। इसमें पत्थरों को इस प्रकार से तराशा गया कि वे इस प्रकार से बैठें कि जोड़ों का पता न चले।

कोणार्क के आध्यात्मिक महत्त्व, वर्तमान मन्दिर की स्थापना, इसके परित्याग करने से लेकर, मुख्य मन्दिर के ध्वस्त होने के बारे में अनेकानेक मान्यताएँ और अनुश्रुतियाँ हैं। मन्दिर के सम्बन्ध में कई बातें अब भी इतिहास के गर्भ में हैं। इसलिए कई बातों से विद्वतजन एकमत नहीं हैं। स्कन्दपुराण में कोणार्क की पहचान में सूर्यक्षेत्र, ब्रह्म पुराण में कोणादित्य, कपि संहिता में रवि क्षेत्र, भाम्बपुराण में मित्रवन व प्राचीन महात्यम में अर्कतीर्थ आदि नामों से की गई है। वहीं निकट में एक सूर्य मन्दिर था। पुराणों में वर्णित मित्रवन व चन्द्रभागा की पहचान के बारे में अलग-अलग तर्क हैं। कुछ लोग इसे पाकिस्तान के मुल्तान में बताते हैं, जिसका प्राचीन नाम भाम्बापुरा था और यहीं से चिनाब या चन्द्रभागा गुज़रती है। उधर कोणार्क में भाम्बापुरा तो नहीं है किन्तु मन्दिर से 2 किलोमीटर दूर चन्द्रभागा का तट है, जहाँ पर माघ माह की सप्तमी को विशाल मेला लगता है। गंग नरेश नरसिंह देव ने सूर्य मन्दिर का ही निर्माण क्यों करवाया, इसे लेकर अनेक मान्यताएँ हैं।

बारह महीने के प्रतीक चक्र: दीवार पर मन्दिर के बाहर बने विशालकाय चक्र पर्यटकों का ध्यान खींच लेते हैं। हर चक्र का व्यास तीन मीटर से ज़्यादा है। चक्रों के नीचे हाथियों के समूह को बेहद बारीकी से उकेरा गया है। सूर्य देवता के रथ के चबूतरे पर बारह जोड़ी चक्र हैं, जो साल के बारह महीने के प्रतीक हैं।

खोज व संरक्षण: 1806 में जब इसका पता चला तो उस समय यह स्थान चारों ओर पेड़ों व झाड़ियों से घिरा व रेत से ढका था। 1838 में एशियाटिक सोसाइटी ने पहली बार इसके संरक्षण की बात उठाई। यहाँ से जंगल, झाड़ियों व रेत को हटाया गया। एक बात अच्छी रही कि दबे होने से मन्दिर आतताइयों से सुरक्षित रहा। उस समय मन्दिर का जगमोहन सुरक्षित था, जबकि मुख्य मन्दिर का पिछला हिस्सा ध्वस्त अवस्था में था और चारों ओर खण्डित मन्दिर के पत्थरों की बहुलता थी। 1900 में यहाँ पर वास्तविक संरक्षण करने का प्रयास हुआ। खण्डित हिस्सों को पुरानी संरचना के अनुसार संरक्षित करने का प्रयास किया गया। महामण्डप जो कि गिरने की हालत में था, को बचाने के लिए दरारों को पाटा गया। इसके लिए महामण्डप के आन्तरिक भाग को पत्थरों से भर दिया गया। शेष दोनों ओर के दरवाज़े भी चिनाई करके बन्द कर दिये गये। इस पर लगे पत्थरों का रासायनिक उपचार करके मन्दिर के स्वरूप को निखारा गया। संरक्षण का काम कई सालों तक चला। 20वीं सदी के मध्य में इसे भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के अधीन कर दिया गया। अन्य सामग्री को लेकर निकट एक संग्रहालय बनाया गया। 1984 के बाद इसे विश्व विरासत स्थल घोषित किया गया।

पौराणिक भारत के अलग-अलग प्रान्तों में धर्मिक उत्सवों के दौरान शोभायात्रा में देव मूर्तियों को लकड़ी के बने रथ पर सज़ा कर श्रद्धालुओं के बीच में ले जाया जाता था। इसीलिए यह माना जाता है कि सूर्य के इस मन्दिर को रथ का रूप दे दिया गया होगा।[1]

अन्य सूर्य मंदिर: कोणार्क के अतिरिक्त एक अन्य सूर्य मंदिर उत्तराखण्ड के अल्मोड़ा में कटारमल नामक स्थान पर भी स्थित है। इस कारण इसे 'कटारमल सूर्य मन्दिर' कहा जाता है। यह सूर्य मन्दिर न सिर्फ़ समूचे कुमाऊँ मंडल का सबसे विशाल, ऊँचा और अनूठा मन्दिर है, बल्कि उड़ीसा के 'कोणार्क सूर्य मन्दिर' के बाद एकमात्र प्राचीन सूर्य मन्दिर भी है।

संदर्भ: सूर्य मंदिर कोणार्क

External links

References

  1. Patnaik, Durga Prasad (1989). Palm Leaf Etchings of Odisha. Abhinav Publications. p. 4
  2. Jats the Ancient Rulers (A clan study)/Relationship with the Aryans,pp.86-87
  3. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.233-235