Konkan

From Jatland Wiki
(Redirected from Kongkana)
Jump to navigation Jump to search
Author:Laxman Burdak, IFS (R)

Konkan (कोंकण) is a rugged section of the western coastline of India. It consists of the coastal districts of the Western Indian states of Maharashtra, Goa, and the South Indian state of Karnataka. The ancient Saptakonkana is a slightly larger region. The region is known as Karavali in Karnataka.

Variants

Etymology

According to the Sahyadrikhanda of the Skanda Purana, Parashurama shot his arrow into the sea and commanded the Sea God to recede up to the point where his arrow landed. The new piece of land thus recovered came to be known as Sapta-Konkana, meaning "piece of earth", "corner of earth", or "piece of corner", derived from Sanskrit words: koṇa (कोण, corner) + kaṇa (कण, piece).[1][2]

Xuanzang, the noted Chinese Buddhist monk, mentioned this region in his book as Konkana Desha; Varahamihira's Brihat-Samhita described Konkan as a region of India; and 15th century author Ratnakosh mentioned the word Konkanadesha.[3]

Jat clans

Konkan (कोंकण) Kekan (केकन)/Kikan (किकन)[4] is a Gotra of Jats.[5] It derives name from Konkan province mentioned in Mahabharata. [6]

History

Ram Swarup Joon[7] writes that The Balhara (Balahara) gotra is found among the Sikh, Muslim and Hindu Jats. In 900 A. D. a King of this gotra was a powerful ruler in the Western Punjab. He has been greatly praised by historian Sulaiman Nadwi, who came to India as a trader. According to him this ruler was one of the four big rulers of world at the time (857 A.D.). He was a friend of the Arabs and his army had a large number of elephants and camels. His country was called Kokan (Kaikan) 'near river Herat. The boundaries of this Kingdom extended from China to the Sea and his neighbors were the Takshak and Gujar kings. Their capital was Mankir.


Rajatarangini[8] mentions the victory of Kashmira king Lalitaditya over Konkana kingdom. ....Karnāta submitted on his approach. A beautiful Karnāti lady named Ratti who ruled supreme in the south, her territories extending


[p.69]: as far as the Vindhya hills, also submitted to him. The army then rested on the banks of the Kaveri beneath the palm trees, drinking the water of coconuts. Thence he marched to Chandanadri. And then the king crossed the sea passing from one Island to another ; and thence marched towards the west, the sea singing the songs of his victory. He then attacked the seven Kramuka and the seven Kongkana which suffered much thereby. His army was anxious to enter Dvaraka situated on the Western Sea. The army then crossed the Vindhya hills and entered Avanti where there was an image of Shiva named Mahakala.

कोंकण

विजयेन्द्र कुमार माथुर[9] ने लेख किया है ...कोंकण (AS, p.228) प्राचीन साहित्य में इसे अपरांत का उत्तरी भाग माना गया है। महाभारत शान्ति पर्व 49, 66-67 में अपरांत भूमि का सागर द्वारा परशुराम के लिए उत्सर्जित किये जाने का उल्लेख है।(देखें - अपरान्त) कोंकण का उल्लेख दशकुमारचरित के आठवें उच्छवास में है।

कोंकण परिचय

कोंकण भारत के पश्चिमी भाग में सह्य पर्वत और अरब सागर के बीच उस भूभाग की वह पतली पट्टी है जिसमें ठाणा, कोलाबा, रत्नागिरि, बंबई और उसके उपनगर, गोमांतक (गोवा) तथा उसके दक्षिण का कुछ अंश सम्मिलित है। यह भाग कोंकण कहलाता है। कोंकण का क्षेत्र फल 3,907 वर्गमील है।

प्राचीन काल में भड़ोच से दक्षिण का भूभाग अपरांत कहलाता था और उसी को कोंकण भी कहते थे। सातवीं शती ई. के ग्रंथ प्रपंचहृदय में कोंकण का कूपक, केरल, मूषक, आलूक, पशुकोंकण और परकोंकण के रूप में उल्लेख हुआ है। सह्याद्रि खंड में सात कोंकण कहे गए है- केरल, तुलंग, सौराष्ट्र, कोंकण, करहाट, कर्णाट और बर्बर। इससे ऐसा जान पड़ता है कि लाट से लेकर केरल तक की समस्त पट्टी कोंकण मानी जाती थी। चीनी यात्री युवानच्वांग के वर्णन से ऐसा प्रतीत होता हे कि कोंकण से वनवासी, बेलगाव, धारवाड़, और घाटापलिकड का प्रदेश अभिप्रेत था। मध्यकाल में कोंकण के तीन भाग कहे जाते थे- तापी से लेकर बसई तक बर्बर, वहाँ से बाणकोट तक विराट और उसके आगे देवगढ़ तक किरात कहा जाता था।

नामकरण: इस प्रदेश के नामकरण के संबंध में लोगों में अनेक प्रकार के प्रवाद प्रचलित हैं। एक मत के अनुसार परशुराम की माता कुंकणा के नाम पर इस प्रदेश को कोंकण कहते हैं। इस क्षेत्र में जमदग्नि, परशुराम और रेणुका की मूर्ति कोंकण देव के नाम से पूजित हैं। कुछ लोग इसके मूल में चेर देश के कांग अथवा कोंगु को देखते है; कुछ इसका विकास तमिल भाषा से मानते है। वस्तुस्थिति जो भी हो, यह नाम ईसा पूर्व चौथी शती से ही प्रचलित चला आ रहा है। महाभारत, हरिवंश, विष्णु पुराण, वरामिहिरकृत बृहत्संहिता, कल्हण कृत राजरंगिणी एवं चालुक्य नरेशों के अभिलेखों में कोंकण का उल्लेख है। पेरिप्लस, प्लीनी, टॉलेमी, स्टेबो, अलबेरूनी आदि विदेशों लेखकों ने भी इसकी चर्चा की है। उन दिनों यूनान, मिस्र, चीन आदि देश के लोग भी इस देश और इसके नाम से परिचित थे। बेबिलोन, रोम आदि के साथ इसका व्यापारिक संबंध था। [Bharuch|भड़ोच]], चाल, बनवासी, नवसारी, शूर्पारक, चंद्रपुर और कल्याण व्यापार के केंद्र थे।

कोंकण पर अधिकार: ईसा पूर्व की तीसरी-दूसरी शती में यह प्रदेश मौर्य साम्राज्य के अंतर्गत था। पश्चात् इस प्रदेश पर सातवाहनों का अधिकार हुआ। चौथी-पाँचवी शती ई. में यह कलचुरि नरेशों के अधिकार में आया। छठीं शती ई. में यहाँ स्थानीय चालुक्यनरेश पुलकेशिन ने अपना अधिकार स्थापित किया। उसके आद लगभग साढ़े चार सौ वर्ष तक यह भूभाग सिलाहार नरेशों के अधिकार में रहा। 1260 ई. में देवगिरि नरेश महादेव ने इसे अपने राज्य में सम्मिलित किया। 1347 ई. में यादव नरेश नागरदेव को पराजित कर गुजरात सुलतान ने इस पर अपना अधिकार जमाया। जब 16वीं शती का पुर्तग़ालियों ने भारत में प्रवेश किया तो उन्होंने यहाँ के निवासियों का धर्मोन्मूलन कर ईसाई मत फैलाया। छत्रपति शिवाजी के समय जंजीरा को छोड़कर समूचा कोंकण उनके अधिकार में रहा, पश्चात् 1739 ई. तक पुर्तग़ालियों का इस पर एक छत्र अधिकार रहा। उस वर्ष चिमणजी अप्पा ने बसई के क़िले को जीत कर पुर्तग़ालियों की सत्ता नष्ट कर दी और कोंकण पर पेशवा की सत्ता स्थापित हुई, पश्चात् वह अंग्रेज़ों के अधिकार में चला गया।

कोंकण प्रदेश में अनेक बौद्ध एवं हिंदू लयण हैं। ठाणा ज़िले में कन्हेरी, कांदिब्त, जोगेश्वरी मंडपेश्वर, मागाठन, धारापुरी (एलिफैंटा) कोंडाणे आदि स्थानों के लयण काफ़ी प्रसिद्ध हैं।

भौगोलिक दृष्टि: भौगोलिक दृष्टि से इस भूभाग में 75 से 100 इंच तक वर्षा प्रति वर्ष होती है। समुद्र तटीय क्षेत्रों में नारियल के वृक्ष होते हैं और पश्चिमी घाट के ढाल वनों से आच्छादित है। इस प्रदेश में कोई बड़ी और महत्त्वपूर्ण नदी नहीं हैं। फिर भी यह क्षेत्र काफ़ी उपजाऊ है। धान, दाल, चारा, काफ़ी पैदा होती है।

संदर्भ: भारतकोश-कोंकण

In Mahabharata

Konkana (कॊङ्कण) in Mahabharata (VI.10.58)

Bhisma Parva, Mahabharata/Book VI Chapter 10 describes geography and provinces of Bharatavarsha. Konkana (कॊङ्कण) is mentioned in Mahabharata in the list of the other Provinces in south in verse (VI.10.58).[10]


Sandhya Jain[11] writes that Konkana (कॊङ्कण) Mentioned in 'geography' Mahabharata (VI.10.58), a southern tribe, which did not fight in the war.

External links

References

  1. Shastri Gaytonde, Gajanan (ed.). Shree Scanda Puran (Sayadri Khandha) (in Marathi). Mumbai: Shree Katyani Publication.
  2. Satoskar, B. D. Gomantak Prakruti ani Sanskruti. Part 1 (in Marathi). Shubhada Publication. p. 206.
  3. Saradesāya, Manohararāya (2000). "The Land, the People and the Language". A History of Konkani Literature: From 1500 to 1992. Sahitya Akademi. pp. 1–14. ISBN 8172016646.
  4. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Parishisht-I, s.n. क-71
  5. Dr Pema Ram:‎Rajasthan Ke Jaton Ka Itihas, p.297
  6. Mahendra Singh Arya et al.: Adhunik Jat Itihas, Agra 1998, p. 232
  7. Ram Swarup Joon| History of the Jats/Chapter V,p.73
  8. Rajatarangini of Kalhana:Kings of Kashmira/Book IV,p.68-69
  9. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.228
  10. कर्णिकाः कुन्तिकाश चैव सौब्धिदा नलकालकाः, कौकुट्टकास तदा चॊलाः कॊङ्कणा मालवाणकाः (VI.10.58)
  11. Sandhya Jain: Adi Deo Arya Devata - A Panoramic View of Tribal-Hindu Cultural Interface, Rupa & Co, 7/16, Ansari Road Daryaganj, New Delhi, 2004,p.132,sn. 71